विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 280, कुल 558 में से
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अ० ९] * चतुर्थ अंश * २६१
| अथ दैत्यैरुपैत्य राजिरात्मसाहाय्यादानायाभ्यर्थितः प्राह॥ ६॥ योत्स्येऽहं भवदर्थे यद्यहममरजयाद्भवतामिन्द्रो भविष्यामीत्याकर्ण्यैतत्तैरभिहितम् ॥ ७॥ न वयमन्यथा वदिष्यामोऽन्यथा करिष्यामोऽस्माकमिन्द्रः प्रह्लादस्तदर्थमेवायमुद्यम इत्युक्त्वा गतेष्वसुरेषु देवैरप्यसाववनिपतिरेवमेवोक्तस्तेनापि च तथैवोक्ते देवैरिन्द्रस्त्वं भविष्यसीति समन्वीप्सितम् ॥ ८ ॥ | तब दैत्यों ने जाकर रजि से अपनी सहायता के लिये प्रार्थना की, इस पर रजि बोले- ॥ ६ ॥ "यदि देवताओं को जीतने पर मैं आपलोगों का इन्द्र हो सकूँ तो आपके पक्ष में लड़ सकता हूँ॥ ७॥ यह सुनकर दैत्यों ने कहा- "हमलोग एक बात कहकर उसके विरुद्ध दूसरी तरह का आचरण नहीं करते। हमारे इन्द्र तो प्रह्लाद जी हैं और उन्हीं के लिये हमारा यह सम्पूर्ण उद्योग है", ऐसा कहकर जब दैत्यगण चले गये तो देवताओं ने भी आकर राजा से उसी प्रकार प्रार्थना की और उनसे भी उसने वही बात कही। तब देवताओं ने यह कहकर कि 'आप ही हमारे इन्द्र होंगे' उसकी बात स्वीकार कर ली॥ ८ ॥ |
| रजिनापि देवसैन्यसहायनानेकैर्महास्त्रैस्तदशेषमहासुरबलं निष्षूदितम् ॥ ९॥ अथ जितारिपक्षश्च देवेन्द्रो रजिचरणयुगलमात्मनः शिरसा निपीड्याह ॥ १० ॥ भयत्राणान्नदानाद्द्रवानस्मत्पिताऽशेषलोकानामुत्तमोत्तमो भवान् यस्याहं पुत्रस्त्रिलोकेन्द्रः ॥ ११॥ | अतः रजि ने देव-सेना की सहायता करते हुए अनेक महान् अस्त्रों से दैत्यों की सम्पूर्ण सेना नष्ट कर दी॥ ९॥ तदनन्तर शत्रु-पक्ष को जीत चुकने पर देवराज इन्द्र ने रजि के दोनों चरणों को अपने मस्तक पर रखकर कहा- ॥ १०॥ 'भय से रक्षा करने और अन्न-दान देने के कारण आप हमारे पिता हैं, आप सम्पूर्ण लोकों में सर्वोत्तम हैं; क्योंकि मैं त्रिलोकेन्द्र आपका पुत्र हूँ' ॥ ११ ॥ |
| स चापि राजा प्रहस्याह ॥ १२॥ एवमस्त्वेवमस्त्वनतिक्रमणीया हि वैरिपक्षादप्यनेकविधचाटुवाक्यगर्भा प्रणतिरित्युक्त्वा स्वपुरं जगाम ॥ १३ ॥ | इस पर राजा ने हँसकर कहा-'अच्छा, ऐसा ही सही। शत्रु पक्ष की भी नाना प्रकार की चाटुवाक्ययुक्त अनुनय-विनय का अतिक्रमण करना उचित नहीं होता [फिर स्वपक्ष की तो बात ही क्या है]।' ऐसा कहकर वे अपनी राजधानी को चले गये ॥ १२-१३ ॥ |
| शतक्रतुरपीन्द्रत्वं चकार ॥ १४ ॥ स्वर्गते तु रजौ नारदर्षिचोदिता रजिपुत्राश्शतक्रतुमात्मपितृपुत्रं समाचाराद्राज्यं याचितवन्तः ॥ १५ ॥ अप्रदानेन च विजित्येन्द्रमतिबलिनः स्वयमिन्द्रत्वं चक्रुः ॥ १६ ॥ | इस प्रकार शतक्रतु ही इन्द्र-पद पर स्थित हुआ। पीछे, रजि के स्वर्गवासी होने पर देवर्षि नारद जी की प्रेरणा से रजि के पुत्रों ने अपने पिता के पुत्रभाव को प्राप्त हुए शतक्रतु से व्यवहार के अनुसार अपने पिता का राज्य माँगा ॥ १४-१५ ॥ किन्तु जब उसने न दिया, तो उन महाबलवान् रजि-पुत्रों ने इन्द्र को जीतकर स्वयं ही इन्द्र-पद का भोग किया ॥ १६ ॥ |
| ततश्च बहुतिथे काले ह्यतीते बृहस्पतिमेकान्ते दृष्ट्वा अपहृतत्रैलोक्ययज्ञभागः शतक्रतुरुवाच ॥ १७ ॥ बदरीफलमात्रमप्यर्हसि ममाप्यायनाय पुरोडाशखण्डं दातुमित्युक्तो बृहस्पतिरुवाच ॥ १८॥ यद्येवं त्वयाहं पूर्वमेव चोदितस्स्यां तन्मया त्वदर्थं किमकत्र्त्तव्यमित्यल्पैरेवाहोभिस्त्वां निजं पदं प्रापयिष्यामीत्यभिधाय तेषामनुदिनमाभिचारिकं बुद्धिमोहाय शक्रस्य तेजोऽभिवृद्धये जुहाव ॥ १९ ॥ | फिर बहुत-सा समय बीत जाने पर एक दिन बृहस्पति जी को एकान्त में बैठे देख त्रिलोकी के यज्ञभाग से वंचित हुए शतक्रतु ने उनसे कहा- ॥ १७ ॥ क्या 'आप मेरी तृप्ति के लिये एक बेर के बराबर भी पुरोडाशखण्ड मुझे दे सकते हैं?' उनके ऐसा कहने पर बृहस्पति जी बोले- ॥ १८ ॥ 'यदि ऐसा है, तो पहले ही तुमने मुझसे क्यों नहीं कहा? तुम्हारे लिये भला मैं क्या नहीं कर सकता? अच्छा, अब थोड़े ही दिनों में मैं तुम्हें अपने पद पर स्थित कर दूँगा।' ऐसा कह बृहस्पति जी रजि-पुत्रों की बुद्धिको मोहित करने के लिये अभिचार और इन्द्र की तेजोवृद्धि के लिये हवन करने लगे॥ १९॥ |