भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 271

२६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६


छठा अध्याय

सोमवंशका वर्णन; चन्द्रमा, बुध और पुरूरवाका चरित्र

श्रीमैत्रेय उवाचमैत्रेयजी बोले—
सूर्यस्य वंश्या भगवन्कथिता भवता मम।<br>सोमस्याप्यखिलान्वंश्याञ्छ्रोतुमिच्छामि पार्थिवान्॥ १<br>कीर्त्यते स्थिरकीर्तीनां येषामद्यापि सन्ततिः।<br>प्रसादसुमुखस्तान्मे ब्रह्मन्नाख्यातुमर्हसि॥ २भगवन्! आपने सूर्यवंशीय राजाओंका वर्णन तो कर दिया, अब मैं सम्पूर्ण चन्द्रवंशीय भूपतियोंका वृत्तान्त भी सुनना चाहता हूँ। जिन स्थिरकीर्ति महाराजोंकी सन्ततिका सुयश आज भी गान किया जाता है, हे ब्रह्मन्! प्रसन्न-मुखसे आप उन्हींका वर्णन मुझसे कीजिये॥ १-२॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
श्रूयतां मुनिशार्दूल वंशः प्रथिततेजसः।<br>सोमस्यान्क्रमोत्ख्याता यत्रोर्वीपतयोऽभवन्॥ ३हे मुनिशार्दूल! परम तेजस्वी चन्द्रमाके वंशका क्रमशः श्रवण करो जिसमें अनेकों विख्यात राजालोग हुए हैं॥ ३॥
अयं हि वंशोऽतिबलपराक्रमद्युतिशीलचेष्टावद्भिरतिगुणान्वितैर्नहुषययातिकार्तवीर्यार्जुनादिभिर्भूपालैरलङ्कृतस्तमहं कथयामि श्रूयताम्॥ ४॥यह वंश नहुष, ययाति, कार्तवीर्य और अर्जुन आदि अनेकों अति बल-पराक्रमशील, कान्तिमान्, क्रियावान् और सद्गुणसम्पन्न राजाओंसे अलंकृत हुआ है। सुनो, मैं उसका वर्णन करता हूँ॥ ४॥
अखिलजगत्स्रष्टुर्भगवतो नारायणस्य नाभिसरोजसमुद्भवोऽब्जयोनेर्ब्रह्मणः पुत्रोऽत्रिः॥ ५॥सम्पूर्ण जगत्के रचयिता भगवान् नारायणके नाभि-कमलसे उत्पन्न हुए भगवान् ब्रह्माजीके पुत्र अत्रि प्रजापति थे॥ ५॥
अत्रेस्सोमः॥ ६॥इन अत्रिके पुत्र चन्द्रमा हुए॥ ६॥
तं च भगवानब्जयोनिः अशेषौषधिद्विजनक्षत्राणामाधिपत्येऽभ्यषेचयत्॥ ७॥कमल-योनि भगवान् ब्रह्माजीने उन्हें सम्पूर्ण औषधि, द्विजजन और नक्षत्रगणके आधिपत्यपर अभिषिक्त कर दिया था॥ ७॥
स च राजसूयमकरोत्॥ ८॥चन्द्रमाने राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया॥ ८॥
तत्प्रभावादत्युत्कृष्टाधिपत्याधिष्ठातृत्वाच्चैनं मद आविवेश॥ ९॥अपने प्रभाव और अति उत्कृष्ट आधिपत्यके अधिकारी होनेसे चन्द्रमापर राजमद सवार हुआ॥ ९॥
मदावलेपाच्च सकलदेवगुरोर्बृहस्पतेस्तारां नाम पत्नीं जहार॥ १०॥तब मदोन्मत्त हो जानेके कारण उसने समस्त देवताओंके गुरु भगवान् बृहस्पतिजीकी भार्या ताराको हरण कर लिया॥ १०॥
बहुशश्च बृहस्पतिचोदितेन भगवता ब्रह्मणा चोद्यमानः सकलैश्च देवर्षिभिर्याच्यमानोऽपि न मुमोच॥ ११॥तथा बृहस्पतिजीकी प्रेरणासे भगवान् ब्रह्माजीके बहुत कुछ कहने-सुनने और देवर्षियोंके माँगनेपर भी उसे न छोड़ा॥ ११॥
तस्य चन्द्रस्य च बृहस्पतेर्द्वेषादुशना पार्ष्णिग्राहोऽभूत्॥ १२॥बृहस्पतिजीसे द्वेष करनेके कारण शुक्रजी भी चन्द्रमाके सहायक हो गये
अङ्गिरसश्च सकाशादुपलब्धविद्यो भगवान्रुद्रो बृहस्पतेः साहाय्यमकरोत्॥ १३॥और अंगिरासे विद्या-लाभ करनेके कारण भगवान् रुद्रने बृहस्पतिकी सहायता की [क्योंकि बृहस्पतिजी अंगिराके पुत्र हैं]॥ १२-१३॥
यतश्चोशना ततो जम्भकुम्भाद्याः समस्ता एव दैत्यदानवनिकाया महान्तमुद्यमं चक्रुः॥ १४॥जिस पक्षमें शुक्रजी थे उस ओरसे जम्भ और कुम्भ आदि समस्त दैत्य-दानवादिनें भी [सहायता देनेमें] बड़ा उद्योग किया॥ १४॥

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