विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 269, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 269
२५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५
पाँचवाँ अध्याय
निमि-चरित्र और निमिवंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| इक्ष्वाकुतनयो योऽसौ निमिर्नाम सहस्रं वत्सरं सत्रमारेभे ॥ १ ॥ वसिष्ठं च होतारं वरयामास ॥ २ ॥ तमाह वसिष्ठोऽहमिन्द्रेण पञ्चवर्षशतयागार्थं प्रथमं वृतः ॥ ३ ॥ तदनन्तरं प्रतिपाल्यतामागतस्तवापि ऋत्विग्भविष्यामीत्युक्ते स पृथिवीपतिर्न किञ्चिदुक्तवान् ॥ ४ ॥<br><br>वसिष्ठोऽप्यनेन समन्वीप्सितमित्यमरपतेर्यागमकरोत् ॥ ५ ॥ सोऽपि तत्काल एवान्यैर्गौतमादिभिर्यागमकरोत् ॥ ६ ॥<br><br>समाप्ते चामरपतेर्यागे त्वरया वसिष्ठो निमियज्ञं करिष्यामीत्याजगाम ॥ ७ ॥ तत्कर्मकर्तृत्वं च गौतमस्य दृष्ट्वा स्वपते तस्मै राज्ञे मां प्रत्याख्यायैतदनेन गौतमाय कर्मान्तरं समर्पितं यस्मात्तस्मादयं विदेहो भविष्यतीति शापं ददौ ॥ ८ ॥ प्रबुद्धश्चासाववनिपतिरपि प्राह ॥ ९ ॥ यस्मान्मामसम्भाष्याज्ञानत एव शयानस्य शापोत्सर्गमसौ दुष्टगुरुश्चकार तस्मात्तस्यापि देहः पतिष्यतीति शापं दत्त्वा देहमत्यजत् ॥ १० ॥<br><br>तच्छापाच्च मित्रावरुणयोस्तेजसि वसिष्ठस्य चेतः प्रविष्टम् ॥ ११ ॥ उर्वशीदर्शनादुद्भूतबीजप्रपातयोस्तयोस्सकाशाद्वसिष्ठो देहमपरं लेभे ॥ १२ ॥ निमेरपि तच्छरीरमतिमनोहरगन्धतैलादिभिरुपसंस्क्रियमाणं नैव क्लेदादिकं दोषमवाप सद्यो मृत इव तस्थौ ॥ १३ ॥<br><br>यज्ञसमाप्तौ भागग्रहणाय देवानागतानृत्विज ऊचुर्यजमानाय वरो दीयतामिति ॥ १४ ॥ देवैश्च छन्दितोऽसौ निमिराह ॥ १५ ॥ भगवन्तोऽखिलसंसारदुःखहन्तारः ॥ १६ ॥ न ह्येतादृगन्यद्दुःखमस्ति यच्छरीरात्मनोर्वियोगे भवति ॥ १७ ॥ तदहमिच्छामि सकललोकलोचनेषु वस्तुं न पुनश्शरीरग्रहणं कर्तुमित्येवमुक्तैर्देवैरसावशेष- | इक्ष्वाकुका जो निमि नामक पुत्र था उसने एक सहस्रवर्षमें समाप्त होनेवाले यज्ञका आरम्भ किया ॥ १ ॥ उस यज्ञमें उसने वसिष्ठजीको होता वरण किया ॥ २ ॥ वसिष्ठजीने उससे कहा कि पाँच सौ वर्षके यज्ञके लिये इन्द्रने मुझे पहले ही वरण कर लिया है ॥ ३ ॥ अतः इतने समय तुम ठहर जाओ, वहाँसे आनेपर मैं तुम्हारा भी ऋत्विक् हो जाऊँगा। उनके ऐसा कहनेपर राजाने उन्हें कुछ भी उत्तर नहीं दिया ॥ ४ ॥<br><br>वसिष्ठजीने यह समझकर कि राजाने उनका कथन स्वीकार कर लिया है इन्द्रका यज्ञ आरम्भ कर दिया ॥ ५ ॥ किन्तु राजा निमि भी उसी समय गौतमादि अन्य होताओंद्वारा अपना यज्ञ करने लगे ॥ ६ ॥<br><br>देवराज इन्द्रका यज्ञ समाप्त होते ही 'मुझे निमिका यज्ञ कराना है' इस विचारसे वसिष्ठजी भी तुरंत ही आ गये ॥ ७ ॥ उस यज्ञमें अपना [होताका] कर्म गौतमको करते देख उन्होंने सोते हुए राजा निमिको यह शाप दिया कि 'इसने मेरी अवज्ञा करके सम्पूर्ण कर्मका भार गौतमको सौंपा है इसलिये यह देहहीन हो जायगा' ॥ ८ ॥ सोकर उठनेपर राजा निमिने भी कहा— ॥ ९ ॥ “इस दुष्ट गुरुने मुझसे बिना बातचीत किये अज्ञानतापूर्वक मुझ सोये हुएको शाप दिया है, इसलिये इसका देह भी नष्ट हो जायगा।” इस प्रकार शाप देकर राजाने अपना शरीर छोड़ दिया ॥ १० ॥<br><br>राजा निमिके शापसे वसिष्ठजीका लिंगदेह मित्रावरुणके वीर्यमें प्रविष्ट हुआ ॥ ११ ॥ और उर्वशीके देखनेसे उसका वीर्य स्खलित होनेपर उसीसे उन्होंने दूसरा देह धारण किया ॥ १२ ॥ निमिका शरीर भी अति मनोहर गन्ध और तैल आदिसे सुरक्षित रहनेके कारण गला-सड़ा नहीं, बल्कि तत्काल मरे हुए देहके समान ही रहा ॥ १३ ॥<br><br>यज्ञ समाप्त होनेपर जब देवगण अपना भाग ग्रहण करनेके लिये आये तो उनसे ऋत्विक्गण बोले कि— “यजमानको वर दीजिये” ॥ १४ ॥ देवताओंद्वारा प्रेरणा किये जानेपर राजा निमिने उनसे कहा— ॥ १५ ॥ “भगवन्! आपलोग सम्पूर्ण संसार-दुःखको दूर करनेवाले हैं ॥ १६ ॥ मेरे विचारमें शरीर और आत्माके वियोग होनेमें जैसा दुःख होता है वैसा और कोई दुःख नहीं है ॥ १७ ॥ इसलिये मैं अब फिर शरीर ग्रहण करना नहीं चाहता, समस्त लोगोंके नेत्रोंमें ही वास करना चाहता हूँ।” |