विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 264, कुल 558 में से
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अ० ४] * चतुर्थ अंश * २५३
| यज्ञमाजगाम ॥ ३१ ॥ सगरोऽप्यश्वमासाद्य तं यज्ञं समापयामास ॥ ३२ ॥ सागरं चात्मजप्रीत्या पुत्रत्वे कल्पितवान् ॥ ३३ ॥ तस्यांशुमतो दिलीपः पुत्रोऽभवत् ॥ ३४ ॥ दिलीपस्य भगीरथः योऽसौ गङ्गां स्वर्गादिहानीय भागीरथीसंज्ञां चकार ॥ ३५ ॥ | अपने पितामहकी यज्ञशालामें आया ॥ ३०-३१ ॥ राजा सगरने भी घोड़ेके मिल जानेपर अपना यज्ञ समाप्त किया और [अपने पुत्रोंके खोदे हुए] सागरको ही अपत्य-स्नेहसे अपना पुत्र माना ॥ ३२-३३ ॥ उस अंशुमान्के दिलीप नामक पुत्र हुआ और दिलीपके भगीरथ हुआ जिसने गंगाजीको स्वर्गसे पृथिवीपर लाकर उनका नाम भागीरथी कर दिया ॥ ३४-३५ ॥ |
| भगीरथात्सुहोत्रस्सुहोत्राच्छ्रुतः, तस्यापि नाभागः ततोऽम्बरीषः, तत्पुत्रस्सिन्धुद्वीपः सिन्धुद्वीपादयतायुः ॥ ३६ ॥ तत्पुत्रश्च ऋतुपर्णः, योऽसौ नलसहायोऽक्षहृदयज्ञोऽभूत् ॥ ३७ ॥ | भगीरथसे सुहोत्र, सुहोत्रसे श्रुति, श्रुतिसे नाभाग, नाभागसे अम्बरीष, अम्बरीषसे सिन्धुद्वीप, सिन्धुद्वीपसे अयुतायु और अयुतायुसे ऋतुपर्ण नामक पुत्र हुआ जो राजा नलका सहायक और द्यूतक्रीड़ाका पारदर्शी था ॥ ३६-३७ ॥ |
| ऋतुपर्णपुत्रस्सर्वकामः ॥ ३८ ॥ तत्तनयस्सुदासः ॥ ३९ ॥ सुदासात्सौदासो मित्रसहनामा ॥ ४० ॥ स चाटव्यां मृगयार्थी पर्यटन् व्याघ्रद्वयमपश्यत् ॥ ४१ ॥ ताभ्यां तद्वनमपमृगं कृतं मत्वैकं तयोर्बाणेन जघान ॥ ४२ ॥ म्रियमाणश्चासावतिभीषणाकृतिरतिकरालवदनो राक्षसोऽभूत् ॥ ४३ ॥ द्वितीयोऽपि प्रतिक्रियां ते करिष्यामीत्युक्त्वान्तर्धानं जगाम ॥ ४४ ॥ | ऋतुपर्णका पुत्र सर्वकाम था, उसका सुदास और सुदासका पुत्र सौदासमित्रसह हुआ ॥ ३८-४० ॥ एक दिन मृगयाके लिये वनमें घूमते-घूमते उसने दो व्याघ्र देखे ॥ ४१ ॥ इन्होंने सम्पूर्ण वनको मृगहीन कर दिया है—ऐसा समझकर उसने उनमेंसे एकको बाणसे मार डाला ॥ ४२ ॥ मरते समय वह अति भयंकररूप क्रूर-वदन राक्षस हो गया ॥ ४३ ॥ तथा दूसरा भी 'मैं इसका बदला लूँगा' ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गया ॥ ४४ ॥ |
| कालेन गच्छता सौदासो यज्ञमयजत् ॥ ४५ ॥ परिनिष्ठितयज्ञे आचार्ये वसिष्ठे निष्क्रान्ते तद्रक्षो वसिष्ठरूपमास्थाय यज्ञावसाने मम नरमांसभोजनं देयमिति तत्संस्क्रियतां क्षणादागमिष्यामीत्युक्त्वा निष्क्रान्तः ॥ ४६ ॥ भूयश्च सूदवेषं कृत्वा राजाज्ञया मानुषं मांसं संस्कृत्य राज्ञे न्यवेदयत् ॥ ४७ ॥ असावपि हिरण्यपात्रे मांसमादाय वसिष्ठागमनप्रतीक्षकोऽभवत् ॥ ४८ ॥ आगताय वसिष्ठाय निवेदितवान् ॥ ४९ ॥ | कालान्तरमें सौदासने एक यज्ञ किया ॥ ४५ ॥ यज्ञ समाप्त हो जानेपर जब आचार्य वसिष्ठ बाहर चले गये तब वह राक्षस वसिष्ठजीका रूप बनाकर बोला—'यज्ञके पूर्ण होनेपर मुझे नर-मांसयुक्त भोजन कराना चाहिये; अतः तुम ऐसा अन्न तैयार कराओ, मैं अभी आता हूँ' ऐसा कहकर वह बाहर चला गया ॥ ४६ ॥ फिर रसोइयेका वेष बनाकर राजाकी आज्ञासे उसने मनुष्यका मांस पकाकर उसे निवेदन किया ॥ ४७ ॥ राजा भी उसे सुवर्णपात्रमें रखकर वसिष्ठजीके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा और उनके आते ही वह मांस निवेदन कर दिया ॥ ४८-४९ ॥ |
| स चाप्यचिन्तयदहो अस्य राज्ञो दौश्शी्ल्यं येनैतन्मांसमस्माकं प्रयच्छति किमेतद्द्रव्यजातमिति ध्यानपरोऽभवत् ॥ ५० ॥ अपश्यच्च तन्मांसं मानुषम् ॥ ५१ ॥ अतः क्रोधकलुषीकृतचेता राजनि शापमुत्ससर्ज ॥ ५२ ॥ यस्मादभोज्यमेतदस्मद्विधानां तपस्विनामवगच्छन्नपि भवान्मह्यं ददाति तस्मात्तवैवात्र लोलुपता भविष्यतीति ॥ ५३ ॥ | वसिष्ठजीने सोचा—'अहो ! इस राजाकी कुटिलता तो देखो जो यह जान-बूझकर भी मुझे खानेके लिये यह मांस देता है।' फिर यह जाननेके लिये कि यह किसका है वे ध्यानस्थ हो गये ॥ ५० ॥ ध्यानावस्थामें उन्होंने देखा कि वह तो नरमांस है ॥ ५१ ॥ तब तो क्रोधके कारण क्षुब्धचित्त होकर उन्होंने राजाको यह शाप दिया ॥ ५२ ॥ 'क्योंकि तूने जान-बूझकर भी हमारे-जैसे तपस्वियोंके लिये अत्यन्त अभक्ष्य यह नरमांस मुझे खानेको दिया है इसलिये तेरी इसीमें लोलुपता होगी [अर्थात् तू राक्षस हो जायगा] ॥ ५३ ॥ |