भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 558 में से

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पृष्ठ 263

२५२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४

अत्रान्तरे च सगरो हयमेधमारभत ॥ १६ ॥ तस्य च पुत्रैरधिष्ठितमस्याश्वं कोऽप्यपहृत्य भुवो बिलं प्रविवेश ॥ १७ ॥ ततस्तत्तनयाश्चाश्वखुरगति-निबन्धैनावनीमेकैको योजनं चक्रुः ॥ १८ ॥ पाताले चाश्वं परिभ्रमन्तं तमवनीपतितनयास्ते ददृशुः ॥ १९ ॥ नातिदूरेऽवस्थितं च भगवन्तमपघने शरत्कालेऽर्कमिव तेजोभिरनवरतमूर्ध्वमधश्चाशेष दिशश्चोद्भासयमानं हयहर्तारं कपिलर्षिमपश्यन् ॥ २० ॥इसी समय सगरने अश्वमेध-यज्ञ आरम्भ किया॥ १६ ॥ उसमें उसके पुत्रोंद्वारा सुरक्षित घोड़ेको कोई व्यक्ति चुराकर पृथिवीमें घुस गया ॥ १७ ॥ तब उस घोड़ेके खुरोंके चिह्नोंका अनुसरण करते हुए उनके पुत्रोंमेंसे प्रत्येकने एक-एक योजन पृथिवी खोद डाली ॥ १८ ॥ तथा पातालमें पहुँचकर उन राजकुमारोंने अपने घोड़ेको फिरता हुआ देखा ॥ १९ ॥ पासहीमें मेघावरणहीन शरत्कालके सूर्यके समान अपने तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए घोड़ेको चुरानेवाले परमर्षि कपिलको सिर झुकाये बैठे देखा ॥ २० ॥
ततश्चोद्यतायुधा दुरात्मानोऽयमस्मदपकारी यज्ञविघ्नकारी हन्यतां हयहर्त्ता हन्यतामित्यवोच-न्नभ्यधावंश्च ॥ २१ ॥ ततस्तेनापि भगवता किञ्चिदीषत्परिवर्तितलोचनेनावलोकितास्स्व-शरीरसमुत्थेनाऽग्निना दह्यमाना विनेशुः ॥ २२ ॥तब तो वे दुरात्मा अपने अस्त्र-शस्त्रोंको उठाकर 'यही हमारा अपकारी और यज्ञमें विघ्न डालनेवाला है, इस घोड़ेको चुरानेवालेको मारो, मारो' ऐसा चिल्लाते हुए उनकी ओर दौड़े ॥ २१ ॥ तब भगवान् कपिलदेवके कुछ आँख बदलकर देखते ही वे सब अपने ही शरीरसे उत्पन्न हुए अग्निमें जलकर नष्ट हो गये ॥ २२ ॥
सगरोऽप्यवगम्याश्वानुसारि तत्पुत्रबलमशेषं परमर्षिणा कपिलेन तेजसा दग्धं ततोऽंशुमन्त-मसमञ्जसपुत्रमश्वानयनाय युयोज ॥ २३ ॥ स तु सगरतनयखातमार्गेण कपिलमुपगम्य भक्तिनम्रस्तदा तुष्टाव ॥ २४ ॥ अथैनं भगवानाह ॥ २५ ॥ गच्छैनं पितामहायाश्वं प्रापय वरं वृणीष्व च पुत्रक पौत्रश्च ते स्वर्गाद्गङ्गां भुवमानेष्यत इति ॥ २६ ॥ अथांशुमानपि स्वर्यातानां ब्रह्मदण्डहतानामस्मत्पितॄणामस्वर्ग-योग्यानां स्वर्गप्राप्तिकरं वरमस्माकं प्रयच्छेति प्रत्याह ॥ २७ ॥ तदाकर्ण्य तं च भगवानाह उक्तमेवैतन्मयाद्य पौत्रस्ते त्रिदिवाद्गङ्गां भुवमानेष्यतीति ॥ २८ ॥ तदम्भसा च संस्पृष्टेष्व-स्थिभस्मसु एते च स्वर्गमारोक्ष्यन्ति ॥ २९ ॥ भगवद्विष्णुपादांगुष्ठनिर्गतस्य हि जलस्यैतन्माहात्म्यम् ॥ ३० ॥ यन्न केवलमभि-सन्धिपूर्वकं स्नानाद्युपभोगेषूपकारकमनभि-संहितमप्यपेतप्राणस्यास्थिचर्मस्नायुकेशाद्युपस्पृष्टं शरीरजमपि पतितं सद्यश्शरीरिणं स्वर्गं नयतीत्युक्तः प्रणम्य भगवतेऽश्वमादाय पितामह-महाराज सगरको जब मालूम हुआ कि घोड़ेका अनुसरण करनेवाले उसके समस्त पुत्र महर्षि कपिलके तेजसे दग्ध हो गये हैं तो उन्होंने असमंजसके पुत्र अंशुमान्‌को घोड़ा ले आनेके लिये नियुक्त किया ॥ २३ ॥ वह सगर-पुत्रोंद्वारा खोदे हुए मार्गसे कपिलजीके पास पहुँचा और भक्तिविनम्र होकर उनकी स्तुति की ॥ २४ ॥ तब भगवान् कपिलने उससे कहा—"बेटा! जा, इस घोड़ेको ले जाकर अपने दादाको दे और तेरी जो इच्छा हो वही वर माँग ले। तेरा पौत्र गंगाजीको स्वर्गसे पृथिवीपर लायेगा" ॥ २५-२६ ॥ इसपर अंशुमान्‌ने यही कहा कि मुझे ऐसा वर दीजिये जो ब्रह्मदण्डसे आहत होकर मरे हुए मेरे अस्वर्ग्य पितृगणको स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला हो ॥ २७ ॥ यह सुनकर भगवान्‌ने कहा—"मैं तुझसे पहले ही कह चुका हूँ कि तेरा पौत्र गंगाजीको स्वर्गसे पृथिवीपर लायेगा ॥ २८ ॥ उनके जलसे इनकी अस्थियोंकी भस्मका स्पर्श होते ही ये सब स्वर्गको चले जायेंगे ॥ २९ ॥ भगवान् विष्णुके चरणनखसे निकले हुए उस जलका ऐसा माहात्म्य है कि वह कामनापूर्वक केवल स्नानादि कार्योंमें ही उपयोगी हो—सो नहीं, अपितु, बिना कामनाके मृतक पुरुषके अस्थि, चर्म, स्नायु अथवा केश आदिका स्पर्श हो जानेसे या उसके शरीरका कोई अंग गिरनेसे भी वह देहधारीको तुरंत स्वर्गमें ले जाता है।" भगवान् कपिलके ऐसा कहनेपर वह उन्हें प्रणाम कर घोड़ेको लेकर