विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 262, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 262
अ० ४] * चतुर्थ अंश * २५१
चौथा अध्याय सगर, सौदास, खट्वांग और भगवान् रामके चरित्रका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
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| काश्यपदुहिता सुमतिर्विदर्भराजतनया केशिनी च द्वे भार्ये सगरस्यास्ताम् ॥ १ ॥ ताभ्यां चापत्यार्थमौर्वः परमेण समाधिनाराधितो वरमदात् ॥ २ ॥ एका वंशकरमेकं पुत्रमपरा षष्टिं पुत्रसहस्त्राणां जनयिष्यतीति यस्या यदभिमतं तदिच्छया गृह्यतामित्युक्ते केन्येकं वरयामास ॥ ३ ॥ सुमतिः पुत्रसहस्राणि षष्टिं वव्रे ॥ ४ ॥ | काश्यपसुता सुमति और विदर्भराज-कन्या केशिनी ये राजा सगरकी दो स्त्रियाँ थीं ॥ १ ॥ उनसे सन्तानोत्पत्ति के लिये परम समाधिद्वारा आराधना किये जानेपर भगवान् और्वने यह वर दिया ॥ २ ॥ 'एकसे वंशकी वृद्धि करनेवाला एक पुत्र तथा दूसरीसे साठ हजार पुत्र उत्पन्न होंगे, इनमेंसे जिसको जो अभीष्ट हो वह इच्छापूर्वक उसीको ग्रहण कर सकती है।' उनके ऐसा कहनेपर केशिनीने एक तथा सुमतिने साठ हजार पुत्रोंका वर माँगा ॥ ३-४ ॥ |
| तथेत्युक्ते अल्पैरहोभिः केशिनी पुत्रमेक-मसमञ्जसनामान वंशकरमसूत ॥ ५ ॥ काश्यप-तनयायास्तु सुमत्याः षष्टिः पुत्रसहस्त्राण्यभवन् ॥ ६ ॥ तस्मादसमञ्जसा दंशुमान्नाम कुमारो जज्ञे ॥ ७ ॥ स त्वसमञ्जसो बालो बाल्यादेवा-सद्वृत्तोऽभूत् ॥ ८ ॥ पिता चास्याचिन्तयदद्य-मतीतबाल्यः सुबुद्धिमान् भविष्यतीति ॥ ९ ॥ अथ तत्रापि च वयस्यतीते असच्चरितमेनं पिता तत्याज ॥ १० ॥ तान्यपि षष्टिः पुत्रसहस्त्रा-ण्यसमञ्जसचरितमेवानुचक्रुः ॥ ११ ॥ | महर्षिके 'तथास्तु' कहनेपर कुछ ही दिनोंमें केशिनीने वंशको बढ़ानेवाले असमंजस नामक एक पुत्रको जन्म दिया और काश्यपकुमारी सुमतिसे साठ सहस्र पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ५-६ ॥ राजकुमार असमंजसके अंशुमान् नामक पुत्र हुआ ॥ ७ ॥ यह असमंजस बाल्यावस्थासे ही बड़ा दुराचारी था ॥ ८ ॥ पिताने सोचा कि बाल्यावस्थाके बीत जानेपर यह बहुत समझदार होगा ॥ ९ ॥ किन्तु यौवनके बीत जानेपर भी जब उसका आचरण न सुधरा तो पिताने उसे त्याग दिया ॥ १० ॥ उनके साठ हजार पुत्रोंने भी असमंजसके चरित्रका ही अनुकरण किया ॥ ११ ॥ |
| ततश्चासमञ्जसचरितानुसारिभिस्सागरैरप-ध्वस्तयज्ञादिसन्मार्गे जगति देवास्सकलविद्या-मयमसंस्पृष्टमशेषदोषैर्भगवतः पुरुषोत्तमस्यांश-भूतं कपिलं प्रणम्य तदर्थमूचुः ॥ १२ ॥ भगवन्नेऽभिस्सगरतनयैरसमञ्जसचरितमनु-गम्यते ॥ १३ ॥ कथमेभिरसद्वृत्तमनुसरद्भि-र्जगद्भविष्यतीति ॥ १४ ॥ अत्यार्त्तजगत्यरित्राणाय च भगवतोऽत्र शरीरग्रहणमित्याकर्ण्य भगवाना-हाल्पैरेव दिनैर्विनंङ्क्ष्यन्तीति ॥ १५ ॥ | तब असमंजसके चरित्रका अनुकरण करनेवाले उन सगरपुत्रोंद्वारा संसारमें यज्ञादि सन्मार्गका उच्छेद हो जानेपर सकल-विद्यानिधान, अशेषदोषहीन, भगवान् पुरुषोत्तमके अंशभूत श्रीकृष्णदेवसे देवताओंने प्रणाम करनेके अनन्तर उनके विषयमें कहा— ॥ १२ ॥ "भगवन्! राजा सगरके ये सभी पुत्र असमंजसके चरित्रका ही अनुसरण कर रहे हैं ॥ १३ ॥ इन सबके असन्मार्गमें प्रवृत्त रहनेसे संसारकी क्या दशा होगी? ॥ १४ ॥ प्रभो! संसारमें दीनजनोंकी रक्षाके लिये ही आपने यह शरीर ग्रहण किया है [अतः इस घोर आपत्तिसे संसारकी रक्षा कीजिये] ।" यह सुनकर भगवान् कपिलने कहा—"ये सब थोड़े ही दिनोंमें नष्ट हो जायँगे" ॥ १५ ॥ |