विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४
अनन्तरं च तेनापि भगवतैवाभिहितोऽस्मीत्युक्ते किं किं मयाभिहितमिति मुनिः पुनरपि समाधौ तस्थौ ॥ ५४॥ समाधिविज्ञानावगतार्थश्चानुग्रहं तस्मै चकार नात्यन्तिकमेतद्द्वादशाब्दं तव भोजनं भविष्यतीति ॥ ५५ ॥ असावपि प्रतिगृहोदकाञ्जलिं मुनिशापप्रदानायोद्यतो भगवन्नयमस्मद्गुरुर्नाहंस्येनं कुलदेवताभूतमाचार्यं शप्तुमिति मदयन्त्या स्वपत्न्या प्रसादितस्सस्याम्बुदरक्षणार्थं तच्छापाम्बु नोर्व्यां न चाकाशे चिक्षेप किं तु तेनैव स्वपादौ सिषेच ॥ ५६ ॥ तेन च क्रोधाश्रितेनाम्बुना दग्धच्छायौ तत्पादौ कल्माषतामुपगतौ ततस्स कल्माषपादसंज्ञामवाप ॥ ५७॥ वसिष्ठशापाच्च षष्ठे षष्ठे काले राक्षसस्वभावमेत्याटव्यां पर्यटन्ननेकशो मानुषानभक्षयत् ॥ ५८ ॥
एकदा तु कञ्चिन्मुनिमृतुकाले भार्यासंगतं ददर्श ॥ ५९ ॥ तयोश्च तमतिभीषणं राक्षसस्वरूपमवलोक्य त्रासाद्दम्पत्योः प्रधावितयोर्ब्राह्मणं जग्राह ॥ ६० ॥ ततस्सा ब्राह्मणी बहुशस्तमभियाचितवती ॥ ६१ ॥ प्रसीदेक्ष्वाकुकुलतिलकभूतस्त्वं महाराजो मित्रसहो न राक्षसः ॥ ६२ ॥ नार्हसि स्त्रीधर्मसुखाभिज्ञो मय्यकृतार्थायामस्मद्भर्तारं हन्तुमित्येवं बहुप्रकारं तस्यां विलपन्त्यां व्याघ्रः पशुमिवारण्येऽभिमतं तं ब्राह्मणमभक्षयत् ॥ ६३ ॥
ततश्चातिकोपसमन्विता ब्राह्मणी तं राजानं शशाप ॥ ६४ ॥ यस्मादेवं मय्यतृप्तायां त्वयायं मत्पतिर्भक्षितः तस्मात्त्वमपि कामोपभोगप्रवृत्तोऽन्तं प्राप्स्यसीति ॥ ६५ ॥ शप्त्वा चैवं साग्निं प्रविवेश ॥ ६६ ॥
ततस्तस्य द्वादशाब्दपर्यये विमुक्तशापस्य स्त्रीविषयाभिलाषिणो मदयन्ती तं स्मारयामास ॥ ६७ ॥
तदनन्तर राजाके यह कहनेपर कि 'भगवन्! आपनेही ऐसी आज्ञा की थी,' वसिष्ठजी यह कहते हुए कि 'क्या मैंने ही ऐसा कहा था?' फिर समाधिस्थ हो गये ॥ ५४ ॥ समाधिद्वारा यथार्थ बात जानकर उन्होंने राजापर अनुग्रह करते हुए कहा—"तू अधिक दिन नरमांस भोजन न करेगा, केवल बारह वर्ष ही तुझे ऐसा करना होगा" ॥ ५५ ॥ वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर राजा सौदास भी अपनी अंजलिमें जल लेकर मुनीश्वरको शाप देनेके लिये उद्यत हुआ। किन्तु अपनी पत्नी मदयन्तीद्वारा 'भगवन्! ये हमारे कुलगुरु हैं, इन कुलदेवरूप आचार्यको शाप देना उचित नहीं है'—ऐसा कहे जानेसे शान्त हो गया तथा अन्न और मेघकी रक्षाके कारण उस शाप-जलको पृथिवी या आकाशमें नहीं फेंका, बल्कि उससे अपने पैरोंको ही भिगो लिया ॥ ५६ ॥ उस क्रोधयुक्त जलसे उसके पैर झुलसकर कल्माषवर्ण (चितकबरे) हो गये। तभीसे उनका नाम कल्माषपाद हुआ ॥ ५७ ॥ तथा वसिष्ठजीके शापके प्रभावसे छठे कालमें अर्थात् तीसरे दिनके अन्तिम भागमें वह राक्षस-स्वभाव धारणकर वनमें घूमते हुए अनेकों मनुष्योंको खाने लगा ॥ ५८ ॥
एक दिन उसने एक मुनीश्वरको ऋतुकालके समय अपनी भार्यासे संगम करते देखा ॥ ५९ ॥ उस अति भीषण राक्षस-रूपको देखकर भयसे भागते हुए उन दम्पतियोंमेंसे उसने ब्राह्मणको पकड़ लिया ॥ ६० ॥ तब ब्राह्मणीने उससे नाना प्रकारसे प्रार्थना की और कहा—"हे राजन्! प्रसन्न होइये। आप राक्षस नहीं हैं बल्कि इक्ष्वाकुकुलतिलक महाराज मित्रसह हैं ॥ ६१-६२ ॥ आप स्त्री-संयोगके सुखको जाननेवाले हैं; मैं अतृप्त हूँ, मेरे पतिको मारना आपको उचित नहीं है।' इस प्रकार उसके नाना प्रकारसे विलाप करनेपर भी उसने उस ब्राह्मणको इस प्रकार भक्षण कर लिया जैसे बाघ अपने अभिमत पशुको वनमें पकड़कर खा जाता है ॥ ६३ ॥
तब ब्राह्मणीने अत्यन्त क्रोधित होकर राजाको शाप दिया— ॥ ६४ ॥ 'अरे! तूने मेरे अतृप्त रहते हुए भी इस प्रकार मेरे पतिको खा लिया, इसलिये कामोपभोगमें प्रवृत्त होते ही तेरा अन्त हो जायगा' ॥ ६५ ॥ इस प्रकार शाप देकर वह अग्निमें प्रविष्ट हो गयी ॥ ६६ ॥
तदनन्तर बारह वर्षके अन्तमें शापमुक्त हो जानेपर एक दिन विषय-कामनामें प्रवृत्त होनेपर रानी मदयन्तीने उसे ब्राह्मणीके शापका स्मरण करा दिया ॥ ६७ ॥