विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 266, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ * चतुर्थ अंश * $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ २५५
[ संस्कृत मूल ]
ततः परमसौ स्त्रीभोगं तत्याज॥ ६८॥ वसिष्ठश्चापुत्रेण राज्ञा पुत्रार्थमभ्यर्थितो मदयन्त्यां गर्भाधानं चकार॥ ६९॥ यदा च सप्तवर्षाण्यसौ गर्भो न जज्ञे ततस्तं गर्भमश्मना सा देवी जघान॥ ७० ॥ पुत्रश्चाजायत॥ ७१ ॥ तस्य चाश्मक इत्येव नामाभवत्॥ ७२ ॥ अश्मकस्य मूलको नाम पुत्रोऽभवत्॥ ७३ ॥ योऽसौ निःक्षत्रे क्ष्मातलेऽस्मिन् क्रियमाणे स्त्रीभिर्विवस्त्राभिः परिवार्य रक्षितस्ततस्तं नारीकवचमुदाहरन्ति॥ ७४॥
मूलकाद्दशरथस्तस्मादिलिविलस्ततश्चविश्वसहः॥ ७५ ॥ तस्माच्च खट्वाङ्गो योऽसौ देवासुरसङ्ग्रामे देवैरभ्यर्थितोऽसुराज्जघान॥ ७६॥ स्वर्गे च कृतप्रियैर्देवैर्वरग्रहणाय चोदितः प्राह॥ ७७ ॥ यद्यवश्यं वरो ग्राह्यस्तन्ममायुः कथ्यतामिति॥ ७८॥ अनन्तरं च तैरुक्तं एकमुहूर्त्तप्रमाणं तवायुरित्युक्तोऽथास्खलितगतिना विमानेन लघिमगुणो मर्त्यलोकमागम्येदमाह॥ ७९ ॥ यथा न ब्राह्मणेभ्यस्सकाशादात्मापि मे प्रियतरो न च स्वधर्मोल्लङ्घनं मया कदाचिदप्यनुष्ठितं न च सकलदेवमानुषपशुपक्षिवृक्षादिकेष्वच्युतव्यतिरेकवती दृष्टिमैमाभूत् तथा तमेवं मुनिजनानुस्मृतं भगवन्तमस्खलितगतिः प्रापयेयमित्यशेषदेवगुरौ भगवत्यनिर्देश्यवपुषि सत्तामात्रामन्त्यात्मानं परमात्मनि वासुदेवाख्ये युयोज तत्रैव च लयमवाप॥ ८० ॥
अत्रापि श्रूयते श्लोको गीतस्सप्तर्षिभिः पुरा।
खट्वांगेन समो नान्यः कश्चिदुर्व्यां भविष्यति॥ ८१
येन स्वर्गादिहागम्य मुहूर्तं प्राप्य जीवितम्।
त्रयोऽभिसंहिता लोका बुद्ध्या सत्येन चैव हि॥ ८२
खट्वाङ्गाद्दीर्घबाहुः पुत्रोऽभवत्॥ ८३॥ ततो रघुरभवत्॥ ८४॥ तस्मादप्यजः॥ ८५॥ अजाद्दशरथः॥ ८६॥ तस्यापि भगवानब्जनाभो जगतः स्थित्यर्थमात्मांशेन रामलक्ष्मणभरतशत्रुघ्नरूपेण चतुर्द्धा पुत्रत्वमायासीत्॥ ८७॥
[ हिन्दी अनुवाद ]
तभीसे राजाने स्त्री-सम्भोग त्याग दिया॥ ६८॥ पीछे पुत्रहीन राजाके प्रार्थना करनेपर वसिष्ठजीने मदयन्तीके गर्भाधान किया॥ ६९॥ जब उस गर्भने सात वर्ष व्यतीत होनेपर भी जन्म न लिया तो देवी मदयन्तीने उसपर पत्थरसे प्रहार किया॥ ७० ॥ इससे उसी समय पुत्र उत्पन्न हुआ और उसका नाम अश्मक हुआ॥ ७१-७२॥ अश्मकके मूलक नामक पुत्र हुआ॥ ७३॥ जब परशुरामजीद्वारा यह पृथिवीतल क्षत्रियहीन किया जा रहा था उस समय उस (मूलक)-की रक्षा वस्त्रहीना स्त्रियोंने घेरकर की थी, इससे उसे नारीकवच भी कहते हैं॥ ७४॥
मूलकके दशरथ, दशरथके इलिविल, इलिविलके विश्वसह और विश्वसहके खट्वांग नामक पुत्र हुआ, जिसने देवासुरसंग्राममें देवताओंके प्रार्थना करनेपर दैत्योंका वध किया था॥ ७५-७६॥ इस प्रकार स्वर्गमें देवताओंका प्रिय करनेसे उनके द्वारा वर माँगनेके लिये प्रेरित किये जानेपर उसने कहा—॥ ७७॥ “यदि मुझे वर ग्रहण करना ही पड़ेगा तो आपलोग मेरी आयु बतलाइये”॥ ७८॥ तब देवताओंके यह कहनेपर कि तुम्हारी आयु केवल एक मुहूर्त और रही है वह [देवताओंके दिये हुए] एक अनवरुद्धगति विमानपर बैठकर बड़ी शीघ्रतासे मर्त्यलोकमें आया और कहने लगा—॥ ७९॥ 'यदि मुझे ब्राह्मणोंकी अपेक्षा कभी अपना आत्मा भी प्रियतर नहीं हुआ, यदि मैंने कभी स्वधर्मका उल्लंघन नहीं किया और सम्पूर्ण देव, मनुष्य, पशु, पक्षी और वृक्षादिमें श्रीअच्युतके अतिरिक्त मेरी अन्य दृष्टि नहीं हुई तो मैं निर्विघ्नतापूर्वक उन मुनिजनवन्दित प्रभुको प्राप्त होऊँ।' ऐसा कहते हुए राजा खट्वांगने सम्पूर्ण देवताओंके गुरु, अकथनीयस्वरूप, सत्तामात्र-शरीर, परमात्मा भगवान् वासुदेवमें अपना चित्त लगा दिया और उन्हींमें लीन हो गये॥ ८०॥
इस विषयमें भी पूर्वकालमें सप्तर्षियोंद्वारा कहा हुआ श्लोक सुना जाता है। [उसमें कहा है—] 'खट्वांगके समान पृथिवीतलमें अन्य कोई भी राजा नहीं होगा, जिसने एक मुहूर्तमात्र जीवनके रहते ही स्वर्गलोकसे भूमण्डलमें आकर अपनी बुद्धिद्वारा तीनों लोकोंको सत्यस्वरूप भगवान् वासुदेवमय देखा'॥ ८१-८२॥
खट्वांगसे दीर्घबाहु नामक पुत्र हुआ। दीर्घबाहुसे रघु, रघुसे अज और अजसे दशरथने जन्म लिया॥ ८३–८६॥ दशरथजीके भगवान् कमलनाभ जगत्की स्थितिके लिये अपने अंशोंसे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न-इन चार रूपोंसे पुत्र-भावको प्राप्त हुए॥ ८७॥