विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें२५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४
[संस्कृत मूल पाठ]
रामोऽपि बाल एव विश्वामित्रयागरक्षणाय गच्छंस्ताटकां जघान ॥ ८८ ॥
यज्ञे च मारीचमिषुवाताहतं समुद्रे चिक्षेप ॥ ८९ ॥
सुबाहुप्रमुखांश्च क्षयमनयत् ॥ ९० ॥
दर्शनमात्रेणाहल्यामपापां चकार ॥ ९१ ॥
जनकगृहे च माहेश्वरं चापमनायासेन बभञ्ज ॥ ९२ ॥
सीतामयौनिजां जनकराजतनयां वीर्यशुल्कां लेभे ॥ ९३ ॥
सकलक्षत्रियक्षयकारिणमशेषहैहयकुलधूमकेतुभूतं च परशुराममपास्तवीर्यबलावलेपं चकार ॥ ९४ ॥
पितृवचनाच्चावगणितराज्याभिलाषो भ्रातृभार्यासमेतो वनं प्रविवेश ॥ ९५ ॥
विराधखरदूषणादीन् कबन्धवालिनौ च निजघान ॥ ९६ ॥
बद्ध्वा चाम्भोनिधिमशेषराक्षसकुलक्षयं कृत्वा दशाननापहृतां भार्यां तद्वधादपहतऽकलंकामप्यनलप्रवेशशुद्धामशेषदेवसङ्घैः स्तूयमानशीलां जनकराजकन्यामयोध्यामानीन्ये ॥ ९७ ॥
ततश्चाभिषेकमङ्गलं मैत्रेय वर्षशतेनापि वक्तुं न शक्यते सङ्क्षेपेण श्रूयताम् ॥ ९८ ॥
लक्ष्मणभरतशत्रुघ्नविभीषणसुग्रीवाङ्गदजाम्बवद्धनुमत्प्रभृतिभिस्समुत्फुल्लवदनैश्छत्रचामरादियुतैः सेव्यमानो दाशरथिर्ब्रह्मेन्द्राग्नियमनिर्रृतिवरुणवायुकुबेरेशानप्रभृतिभिस्सर्वामरैर्वसिष्ठवामदेववाल्मीकिमार्कण्डेयविश्वामित्रभरद्वाजागस्त्यप्रभृतिभिर्मुनिवरैः ऋग्यजुस्सामाथर्वभिस्संस्तूयमानो नृत्यगीतवाद्याद्यखिललोकमङ्गलवाद्यैर्वीणावेणुमृदङ्गभेरीपटहशङ्खकाहलगोमुखप्रभृतिभिस्सुनादैस्समस्तभूभृतां मध्ये सकललोकरक्षार्थं यथोचितमभिषिक्तो दाशरथिः कोसलेन्द्रो रघुकुलतिलको जानकीप्रियो भ्रातृत्रयप्रियस्सिंहासनगत एकादशाब्दसहस्त्रं राज्यमकरोत् ॥ ९९ ॥
[हिन्दी अनुवाद]
रामजीने बाल्यावस्थामें ही विश्वामित्रजीकी यज्ञरक्षाके लिये जाते हुए मार्गमें ही ताटका राक्षसीको मारा, फिर यज्ञशालामें पहुँचकर मारीचको बाणरूपी वायुसे आहत कर समुद्रमें फेंक दिया और सुबाहु आदि राक्षसोंको नष्ट कर डाला ॥ ८८–९० ॥
उन्होंने अपने दर्शनमात्रसे अहल्याको निष्पाप किया, जनकजीके राजभवनमें बिना श्रम ही महादेवजीका धनुष तोड़ा और पुरुषार्थसे ही प्राप्त होनेवाली अयौनिजा जनकराजनन्दिनी श्रीसीताजीको पत्नीरूपसे प्राप्त किया ॥ ९१–९३ ॥
और तदनन्तर सम्पूर्ण क्षत्रियोंको नष्ट करनेवाले, समस्त हैहयकुलके लिये अग्निस্বরূপ परशुरामजीके बल-वीर्यका गर्व नष्ट किया ॥ ९४ ॥
फिर पिताके वचनसे राज्यलक्ष्मीको कुछ भी न गिनकर भाई लक्ष्मण और धर्मपत्नी सीताके सहित वनमें चले गये ॥ ९५ ॥
वहाँ विराध, खर, दूषण आदि राक्षस तथा कबन्ध और वालीका वध किया और समुद्रपर पुल बाँधकर सम्पूर्ण राक्षसकुलका विध्वंस किया तथा रावणद्वारा हरी हुई और उसके वधसे कलंकहीना होनेपर भी अग्निप्रवेशसे शुद्ध हुई समस्त देवगणोंसे प्रशंसित स्वभाववाली अपनी भार्या जनकराजकन्या सीताको अयोध्यामें ले आये ॥ ९६–९७ ॥
हे मैत्रेय ! उस समय उनके राज्याभिषेकजैसा मंगल हुआ उसका तो सौ वर्षमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता; तथापि संक्षेपसे सुनो ॥ ९८ ॥
दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी प्रसन्नवदन लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, विभीषण, सुग्रीव, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान् आदिसे छत्र-चामरादिद्वारा सेवित हो, ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशान आदि सम्पूर्ण देवगण, वसिष्ठ, वामदेव, वाल्मीकि, मार्कण्डेय, विश्वामित्र, भरद्वाज और अगस्त्य आदि मुनिजन तथा ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेदोंसे स्तुति किये जाते हुए तथा नृत्य, गीत, वाद्य आदि सम्पूर्ण मंगलसामग्रियोंसहित वीणा, वेणु, मृदंग, भेरी, पटह, शंख, काहल और गोमुख आदि बाजोंके घोषके साथ समस्त राजाओंके मध्यमें सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये विधिपूर्वक अभिषिक्त हुए। इस प्रकार दशरथकुमार कोसलाधिपति, रघुकुलतिलक, जानकीवल्लभ, तीनों भ्राताओंके प्रिय श्रीरामचन्द्रजीने सिंहासनारूढ़ होकर ग्यारह हजार वर्ष राज्य-शासन किया ॥ ९९ ॥