भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 259

२४८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३

इत्येतन्मान्धातृदुहितृसम्बन्धादाख्यातम् ॥ १३२॥ यश्चैतत्सौभरिचरितमनुस्मरति पठति पाठयति शृणोति श्रावयति धरत्यवधारयति लिखति लेखयति शिक्षयत्यध्यापयत्युपदिशति वा तस्य षड् जन्मानि दुस्सन्ततिरसर्द्धर्मो वाङ्मनसयोरसन्मार्गाचरणमशेषहेतुषु वा ममत्वं न भवति॥ १३३॥

इस प्रकार मान्धाताकी कन्याओंके सम्बन्धमें मैंने इस चरित्रका वर्णन किया है। जो कोई इस सौभरि-चरित्रका स्मरण करता है, अथवा पढ़ता- पढ़ाता, सुनता-सुनाता, धारण करता-कराता, लिखता- लिखवाता तथा सीखता-सिखाता अथवा उपदेश करता है उसके छः जन्मोंतक दुःसन्तति, असद्धर्म और वाणी अथवा मनकी कुमार्गमें प्रवृत्ति तथा किसी भी पदार्थमें ममता नहीं होती॥ १३२-१३३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


तीसरा अध्याय

मान्धाताकी सन्तति, त्रिशंकुका स्वर्गारोहण तथा सगरकी उत्पत्ति और विजय

अतश्च मान्धातुः पुत्रसन्ततिरभिधीयते॥ १॥ अम्बरीषस्य मान्धातृतनयस्य युवनाश्वः पुत्रोऽभूत् ॥ २॥ तस्माद्धारीतः, यतोऽङ्गिरसो हारीताः ॥ ३॥ रसातले मौनेया नाम गन्धर्वा बभूवुष्षट्कोटिसंख्यातास्तैरशेषाणिनागकुलान्य- पहृतप्रधानरत्नाधिपत्यान्यक्रियन्त॥ ४॥ तैश्च गन्धर्ववीर्यावधूतैरुरगेश्वरैः स्तूयमानो भगवानशेषदेवेशः स्तवच्छ्रवणोन्मीलितोन्निद्र- पुण्डरीकनयनो जलशयनों निद्रावसानात् प्रबुद्धः प्रणिपत्याभिहितः। भगवन्नस्माकमेतेभ्यो गन्धर्वेभ्यो भयमुत्पन्नं कथमुपशममेष्यतीति॥ ५॥ आह च भगवाननादिनिधनपुरुषोत्तमो योऽसौ यौवनाश्वस्य मान्धातुः पुरुकुत्सनामा पुत्रस्त- महमनुप्रविश्य तानशेषान् दुष्टगन्धर्वानुपशमं नयिष्यामीति॥ ६॥ तदाकर्ण्य भगवते जलशायिने कृतप्रणामाः पुनर्नार्गलोकमागताः पन्नगाधिपतयो नर्मदां च पुरुकुत्सानयनाय चोदयामासुः॥ ७॥ सा चैनं रसातलं नीतवती॥ ८॥ रसातलगताश्चासौ भगवत्तेजसाप्यायितात्म-

अब हम मान्धाताके पुत्रोंकी सन्तानका वर्णन करते हैं॥ १॥ मान्धाताके पुत्र अम्बरीषके युवनाश्व नामक पुत्र हुआ॥ २॥ उससे हारीत हुआ जिससे अंगिरा-गोत्रीय हारीतगण हुए॥ ३॥ पूर्वकालमें रसातलमें मौनेय नामक छः करोड़ गन्धर्व रहते थे। उन्होंने समस्त नागकुलोंके प्रधान-प्रधान रत्न और अधिकार छीन लिये थे॥ ४॥ गन्धर्वोंके पराक्रमसे अपमानित उन नागेश्वरोंद्वारा स्तुति किये जानेपर उसके श्रवण करनेसे जिनकी विकसित कमलसदृश आँखें खुल गयी हैं निद्राके अन्तमें जगे हुए उन जलशायी भगवान् सर्वदेवेश्वरको प्रणाम कर उनसे नागगणने कहा—‘‘भगवन्! इन गन्धर्वोंसे उत्पन्न हुआ हमारा भय किस प्रकार शान्त होगा?’’॥ ५॥ तब आदि-अन्तरहित भगवान् पुरुषोत्तमने कहा—‘युवनाश्वके पुत्र मान्धाताका जो यह पुरुकुत्स नामक पुत्र है उसमें प्रविष्ट होकर मैं उन सम्पूर्ण दुष्ट गन्धर्वोंका नाश कर दूँगा’॥ ६॥ यह सुनकर भगवान् जलशायीको प्रणाम कर समस्त नागाधिपतिगण नागलोकमें लौट आये और पुरुकुत्सको लानेके लिये [अपनी बहिन एवं पुरुकुत्सकी भार्या] नर्मदाको प्रेरित किया॥ ७॥ तदनन्तर नर्मदा पुरुकुत्सको रसातलमें ले आयी॥ ८॥ रसातलमें पहुँचनेपर पुरुकुत्सने भगवान्‌के तेजसे

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