विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 260, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 260
अ० ३ ] * चतुर्थ अंश * २४९
| वीर्यस्सकलगन्धर्वान्निजघान ॥ ९ ॥ पुनश्च स्वपुरमाजगाम ॥ १० ॥ सकलपन्नगाधि-पतयश्च नर्मदाये वरं ददुः। यस्तेऽनुस्मरणसमवेतं नामग्रहणं करिष्यति न तस्य सर्पविषभयं भविष्य-तीति ॥ ११ ॥ अत्र च श्लोकः ॥ १२ ॥ | अपने शरीरका बल बढ़ जानेसे सम्पूर्ण गन्धर्वोंको मार डाला और फिर अपने नगरमें लौट आया ॥ ९-१० ॥ उस समय समस्त नागराजोंने नर्मदाको यह वर दिया कि जो कोई तेरा स्मरण करते हुए तेरा नाम लेगा उसको सर्प-विषसे कोई भय न होगा ॥ ११ ॥ इस विषयमें यह श्लोक भी है— ॥ १२ ॥ |
| नर्मदायै नमः प्रातर्नर्मदायै नमो निशि।<br>नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पतः ॥ १३ | ‘नर्मदाको प्रातःकाल नमस्कार है और रात्रिकालमें भी नर्मदाको नमस्कार है। हे नर्मदे! तुमको बारम्बार नमस्कार है, तुम मेरी विष और सर्पसे रक्षा करो’ ॥ १३ ॥ |
| इत्युच्चार्याहर्निशमन्धकारप्रवेशे वा सर्पेर्न दश्यते न चापि कृतानुस्मरणभुजो विषमपि भुक्तमुपघाताय भवति ॥ १४ ॥ पुरुकुत्साय सन्ततिविच्छेदो न भविष्यतीत्युरगपतयो वरं ददुः ॥ १५ ॥ | इसका उच्चारण करते हुए दिन अथवा रात्रिमें किसी समय भी अन्धकारमें जानेसे सर्प नहीं काटता तथा इसका स्मरण करके भोजन करनेवालेका खाया हुआ विष भी घातक नहीं होता ॥ १४ ॥ पुरुकुत्सको नागपतियोंने यह वर दिया कि तुम्हारी सन्तानका कभी अन्त न होगा ॥ १५ ॥ |
| पुरुकुत्सो नर्मदायां त्रसदस्युमजीजनत् ॥ १६ ॥ त्रसदस्युतस्सम्भूतोऽनरण्यः, यं रावणो दिग्विजय जघान ॥ १७ ॥ अनरण्यस्य पृषदश्वः पृषदश्वस्य हर्यश्वः पुत्रोऽभवत् ॥ १८ ॥ तस्य च हस्तः पुत्रोऽभवत् ॥ १९ ॥ ततश्च सुमनास्तस्यापि त्रिधन्वा त्रिधन्वनस्त्रय्यारुणिः ॥ २० ॥ त्रय्यारुणे-स्सत्यव्रतः, योऽसौ त्रिशङ्कुसंज्ञामवाप ॥ २१ ॥ | पुरुकुत्सने नर्मदासे त्रसदस्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ १६ ॥ त्रसदस्युसे अनरण्य हुआ, जिसे दिग्विजयके समय रावणने मारा था ॥ १७ ॥ अनरण्यके पृषदश्व, पृषदश्वके हर्यश्व, हर्यश्वके हस्त, हस्तके सुमना, सुमनाके त्रिधन्वा, त्रिधन्वाके त्रय्यारुणि और त्रय्यारुणिके सत्यव्रत नामक पुत्र हुआ, जो पीछे त्रिशंकु कहलाया ॥ १८—२१ ॥ |
| स चाण्डालतामुपगतश्च ॥ २२ ॥ द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां विश्वामित्र-कलत्रापत्यपोषणार्थं चाण्डालप्रतिग्रहपरिहरणाय च जाह्नवतीरन्यग्रोधे मृगमांसमनुदिनं बबन्ध ॥ २३ ॥ स तु परितुष्टेन विश्वामित्रेण सशरीरस्स्वर्गमारोपितः ॥ २४ ॥ | वह त्रिशंकु चाण्डाल हो गया था ॥ २२ ॥ एक बार बारह वर्षतक अनावृष्टि रही। उस समय विश्वामित्र मुनिके स्त्री और बाल-बच्चोंके पोषणार्थ तथा अपनी चाण्डालताको छुड़ानेके लिये वह गंगाजीके तटपर एक वटके वृक्षपर प्रतिदिन मृगका मांस बाँध आता था ॥ २३ ॥ इससे प्रसन्न होकर विश्वामित्रजीने उसे सदेह स्वर्ग भेज दिया ॥ २४ ॥ |
| त्रिशङ्कोर्हरिश्चन्द्रस्तस्माच्च रोहिताश्वस्ततश्च हरितो हरितस्य चञ्चुश्चञ्चोर्विजयवसुदेवौ रुरुको विजयाद्रुरुकस्य वृकः ॥ २५ ॥ ततो वृकस्य बाहुर्योऽसौ हैहयतालजङ्घादिभिः पराजितोऽन्तर्वत्न्या महिष्या सह वनं प्रविवेश ॥ २६ ॥ तस्याश्च सपत्न्या गर्भस्तम्भनाय गरो दत्तः ॥ २७ ॥ तेनास्या गर्भस्सप्तवर्षाणि जठर एव तस्थौ ॥ २८ ॥ स च बाहुर्वृद्धभावादौर्वाश्रम-समीपे ममार ॥ २९ ॥ सा तस्य भार्या चितां कृत्वा | त्रिशंकुसे हरिश्चन्द्र, हरिश्चन्द्रसे रोहिताश्व, रोहिताश्वसे हरित, हरितसे चंचु, चंचुसे विजय और वसुदेव, विजयसे रुरुक और रुरुकसे वृकका जन्म हुआ ॥ २५ ॥ वृकके बाहु नामक पुत्र हुआ जो हैहय और तालजंघ आदि क्षत्रियोंसे पराजित होकर अपनी गर्भवती पटरानीके सहित वनमें चला गया था ॥ २६ ॥ पटरानीकी सौतने उसका गर्भ रोकनेकी इच्छासे उसे विष खिला दिया ॥ २७ ॥ उसके प्रभावसे उसका गर्भ सात वर्षतक गर्भाशयहीमें रहा ॥ २८ ॥ अन्तमें, बाहु वृद्धावस्थाके कारण और्व मुनिके आश्रमके समीप मर गया ॥ २९ ॥ तब उसकी पटरानीने चिता बनाकर |