विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 328
अ० १ ] * पञ्चम अंश * ३१७
| सकलावरणातीत निरालम्बनभावन ।<br>महाभूतिसंस्थान नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ ५०<br>नाकारणात्कारणाद्वा कारणाकारणान्न च ।<br>शरीरग्रहणं वापि धर्मत्राणाय केवलम् ॥ ५१ | आप समस्त आवरणशून्य, असहायोंके पालक और सम्पूर्ण महाविभूतियोंके आधार हैं, हे पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है ॥ ५० ॥ आप किसी कारण, अकारण अथवा कारणाकारणसे शरीर-ग्रहण नहीं करते, बल्कि केवल धर्म-रक्षाके लिये ही करते हैं ॥ ५१ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्येवं संस्तवं श्रुत्वा मनसा भगवानजः ।<br>ब्रह्माणमाह प्रीतेन विश्वरूपं प्रकाशयन् ॥ ५२ | श्रीपराशरजी बोले—इस प्रकार स्तुति सुनकर भगवान् अज अपना विश्वरूप प्रकट करते हुए ब्रह्माजीसे प्रसन्नचित्तसे कहने लगे ॥ ५२ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>भो भो ब्रह्मंस्त्वया मत्तस्सह देवैर्यदिष्यते ।<br>तदुच्यतामशेषं च सिद्धमेवावधार्यताम् ॥ ५३ | श्रीभगवान् बोले—हे ब्रह्मन् ! देवताओंके सहित तुमको मुझसे जिस वस्तुकी इच्छा हो वह सब कहो और उसे सिद्ध हुआ ही समझो ॥ ५३ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>ततो ब्रह्मा हरेर्दिव्यं विश्वरूपमवेक्ष्य तत् ।<br>तुष्टाव भूयो देवेषु साध्वसावनतात्मसु ॥ ५४ | श्रीपराशरजी बोले—तब श्रीहरिके उस दिव्य विश्वरूपको देखकर समस्त देवताओंके भयसे विनीत हो जानेपर ब्रह्माजी पुनः स्तुति करने लगे ॥ ५४ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः<br>सहस्रबाहो बहुवक्त्रपाद ।<br>नमो नमस्ते जगतः प्रवृत्ति-<br>विनाशसंस्थानकराप्रमेय ॥ ५५ | ब्रह्माजी बोले—हे सहस्रबाहो ! हे अनन्तमुख एवं चरणवाले ! आपको हजारों बार नमस्कार हो । हे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करनेवाले ! हे अप्रमेय ! आपको बारम्बार नमस्कार हो ॥ ५५ ॥ |
| सूक्ष्मातिसूक्ष्मातिबृहत्प्रमाण<br>गरीयसामप्यतिगौरवात्मन् ।<br>प्रधानबुद्धीन्द्रियवत्प्रधान-<br>मूलात्परात्मन्भगवन्प्रसीद ॥ ५६ | हे भगवन् ! आप सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, गुरुसे भी गुरु और अति बृहत् प्रमाण हैं, तथा प्रधान (प्रकृति) महत्तत्त्व और अहंकारादिमें प्रधानभूत मूल पुरुषसे भी परे हैं; हे भगवन् ! आप हमपर प्रसन्न होइये ॥ ५६ ॥ |
| एषा मही देव महीप्रसूतै-<br>र्महासुरैः पीडितशैलकन्धा ।<br>परायणां त्वां जगतामुपैति<br>भारावतारार्थमपारसार ॥ ५७ | हे देव ! इस पृथिवीके पर्वतरूपी मूलबन्ध इसपर उत्पन्न हुए महान् असुरोंके उत्पातसे शिथिल हो गये हैं। अतः हे अपरिमितवीर्य ! यह संसारका भार उतारनेके लिये आपकी शरणमें आयी है ॥ ५७ ॥ |
| एते वयं वृत्ररिपुस्तथायं<br>नासत्यदस्रौ वरुणस्तथैव ।<br>इमे च रुद्रा वसवस्ससूर्या-<br>स्समीरणाग्निप्रमुखास्तथान्ये ॥ ५८<br>सुरास्समस्तास्सुरनाथ कार्य-<br>मेभिर्मया यच्च तदीश सर्वम् ।<br>आज्ञापयाज्ञां परिपालयन्त-<br>स्तथैव तिष्ठाम सदास्तदोषाः ॥ ५९ | हे सुरनाथ ! हम और यह इन्द्र, अश्विनीकुमार तथा वरुण, ये रुद्रगण, वसुगण, सूर्य, वायु और अग्नि आदि अन्य समस्त देवगण यहाँ उपस्थित हैं, इन्हें अथवा मुझे जो कुछ करना उचित हो उन सब बातोंके लिये आज्ञा कीजिये । हे ईश ! आपकी आज्ञाका पालन करते हुए हम सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त हो सकेंगे ॥ ५८-५९ ॥ |