भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 329

३१८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १

श्रीपराशर उवाच<br>एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्परमेश्वरः।<br>उज्जहारात्मनः केशौ सितकृष्णौ महामुने ॥ ६०<br>उवाच च सुरानेतौ मत्केशौ वसुधातले।<br>अवतीर्य भुवो भारक्लेशहानिं करिष्यतः ॥ ६१<br>सुराश्च सकलास्स्वांशैरवतीर्य महीतले।<br>कुर्वन्तु युद्धमुन्मत्तः पूर्वोत्पन्नैर्महासुरैः ॥ ६२<br>ततः क्षयमशेषास्ते दैतेया धरणीतले।<br>प्रयास्यन्ति न सन्देहो मद्द्दक्पातविचूर्णिताः ॥ ६३<br>वसुदेवस्य या पत्नी देवकी देवतोपमा।<br>तत्रायमष्टमो गर्भो मत्केशो भविता सुराः ॥ ६४<br>अवतीर्य च तत्रायं कंसं घातयिता भुवि।<br>कालनेमिं समुद्भूतमित्युक्त्वान्तर्दधे हरिः ॥ ६५<br>अदृश्याय ततस्तस्मै प्रणिपत्य महामुने।<br>मेरुपृष्ठं सुरा जग्मुरवतेरुश्च भूतले ॥ ६६<br>कंसाय चाष्टमो गर्भो देवक्या धरणीधरः।<br>भविष्यतीत्याचचक्षे भगवान्नारदो मुनिः ॥ ६७<br>कंसोऽपि तदुपश्रुत्य नारदात्कुपितस्ततः।<br>देवकीं वसुदेवं च गृहे गुप्तावधारयत् ॥ ६८<br>वसुदेवेन कंसाय तेनैवोक्तं यथा पुरा।<br>तथैव वसुदेवोऽपि पुत्रमर्पितवान्द्विज ॥ ६९<br>हिरण्यकशिपोः पुत्राष्षड्गर्भा इति विश्रुताः।<br>विष्णुप्रयुक्ता तान्निद्रा क्रमाद्गर्भानयोजयत् ॥ ७०<br>योगनिद्रा महामाया वैष्णवी मोहितं यया।<br>अविद्यया जगत्सर्वं तामाह भगवान्हरिः ॥ ७१<br>श्रीभगवानुवाच<br>निद्रे गच्छ ममादेशात्पातालतलसंश्रयान्।<br>एकैकत्वेन षड्गर्भान्देवकीजठरं नय ॥ ७२<br>हतेषु तेषु कंसेन शेषाख्योऽशस्सतो मम।<br>अंशांशेनोदरे तस्यास्सप्तमः सम्भविष्यति ॥ ७३**श्रीपराशरजी बोले—**हे महामुने! इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान् परमेश्वरने अपने श्याम और श्वेत दो केश उखाड़े॥६०॥ और देवताओंसे बोले—'मेरे ये दोनों केश पृथ्वीपर अवतार लेकर पृथिवीके भाररूप कष्टको दूर करेंगे॥६१॥ सब देवगण अपने-अपने अंशोंसे पृथिवीपर अवतार लेकर अपनेसे पूर्व उत्पन्न हुए उन्मत्त दैत्योंके साथ युद्ध करें॥६२॥ तब निःसन्देह पृथिवीतलपर सम्पूर्ण दैत्यगण मेरे दृष्टिपातसे दलित होकर क्षीण हो जायेंगे॥६३॥ वसुदेवजीकी जो देवीके समान देवकी नामकी भार्या है उसके आठवें गर्भसे मेरा यह (श्याम) केश अवतार लेगा॥६४॥ और इस प्रकार यहाँ अवतार लेकर यह कालनेमिके अवतार कंसका वध करेगा।' ऐसा कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये॥६५॥ हे महामुने! भगवान्के अदृश्य हो जानेपर उन्हें प्रणाम करके देवगण सुमेरुपर्वतपर चले गये और फिर पृथिवीपर अवतीर्ण हुए॥६६॥<br>इसी समय भगवान् नारदजीने कंससे आकर कहा कि देवकीके आठवें गर्भमें भगवान् धरणीधर जन्म लेंगे॥६७॥ नारदजीसे यह समाचार पाकर कंसने कुपित होकर वसुदेव और देवकीको कारागृहमें बन्द कर दिया॥६८॥ हे द्विज! वसुदेवजी भी, जैसा कि उन्होंने पहले कह दिया था, अपने प्रत्येक पुत्रको कंसको सौंपते रहे॥६९॥ ऐसा सुना जाता है कि पहले छः गर्भ हिरण्यकशिपुके पुत्र थे। भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे योगनिद्रा उन्हें क्रमशः गर्भमें स्थित करती रही *॥७०॥ जिस अविद्या-रूपिणीसे सम्पूर्ण जगत् मोहित हो रहा है, वह योगनिद्रा भगवान् विष्णुकी महामाया है उससे भगवान् श्रीहरिने कहा—॥७१॥<br>**श्रीभगवान् बोले—**हे निद्रे! जा, मेरी आज्ञासे तू पातालमें स्थित छः गर्भोको एक-एक करके देवकीकी कुक्षिमें स्थापित कर दे॥७२॥ कंसद्वारा उन सबके मारे जानेपर शेष नामक मेरा अंश अपने अंशांशसे देवकीके सातवें गर्भमें स्थित होगा॥७३॥

* ये बालक पूर्वजन्ममें हिरण्यकशिपुके भाई कालनेमिके पुत्र थे; इसीसे इन्हें उसका पुत्र कहा गया है। इन राक्षसकुमारोंने हिरण्यकशिपुका अनादर कर भगवान्‌की भक्ति की थी; अतः उसने कुपित होकर इन्हें शाप दिया कि तुमलोग अपने पिताके हाथसे ही मारे जाओगे। यह प्रसंग हरिवंशमें आया है।