विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 331, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 331
३२०
- श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० २
दूसरा अध्याय
भगवान्का गर्भ-प्रवेश तथा देवगणद्वारा देवकीकी स्तुति
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| यथोक्तं सा जगद्धात्री देवदेवेन वै तथा।<br>षड्गर्भगर्भविन्यासं चक्रे चान्यस्य कर्षणम्॥ १ | हे मैत्रेय! देवदेव श्रीविष्णुभगवान्ने जैसा कहा था उसके अनुसार जगद्धात्री योगमायाने छः गर्भोँको देवकीके उदरमें स्थित किया और सातवेंको उसमेंसे निकाल लिया॥ १॥ |
| सप्तमे रोहिणीं गर्भे प्राप्ते गर्भं ततो हरिः।<br>लोकत्रयोपकाराय देवक्याः प्रविवेश ह॥ २ | इस प्रकार सातवें गर्भके रोहिणीके उदरमें पहुँच जानेपर श्रीहरिने तीनों लोकोंका उद्धार करनेकी इच्छासे देवकीके गर्भमें प्रवेश किया॥ २॥ |
| योगनिद्रा यशोदायास्तस्मिन्नेव तथा दिने।<br>सम्भृता जठरे तद्वद्यथोक्तं परमेष्ठिना॥ ३ | भगवान् परमेश्वरके आज्ञानुसार योगमाया भी उसी दिन यशोदाके गर्भमें स्थित हुई॥ ३॥ |
| ततो ग्रहगणस्सम्यक्प्रचचार दिवि द्विज।<br>विष्णोरंशे भुवं याते ऋतवश्चाबभुश्शुभाः॥ ४ | हे द्विज! विष्णु-अंशके पृथिवीमें पधारनेपर आकाशमें ग्रहगण ठीक-ठीक गतिसे चलने लगे और ऋतुगण भी मंगलमय होकर शोभा पाने लगे॥ ४॥ |
| न सेहे देवकीं द्रष्टुं कश्चिदप्यतितेजसा।<br>जाज्वल्यमानां तां दृष्ट्वा मनांसि क्षोभमाययुः॥ ५ | उस समय अत्यन्त तेजसे देदीप्यमाना देवकीजीको कोई भी देख न सकता था। उन्हें देखकर [दर्शकोंके] चित्त थकित हो जाते थे॥ ५॥ |
| अदृष्टाः पुरुषैःस्त्रीभिर्देवकीं देवतागणाः।<br>बिभ्राणां वपुषा विष्णुं तुष्टुवुस्तामहर्निशम्॥ ६ | तब देवतागण अन्य पुरुष तथा स्त्रियोंको दिखायी न देते हुए, अपने शरीरमें [गर्भरूपसे] भगवान् विष्णुको धारण करनेवाली देवकीजीकी अहर्निश स्तुति करने लगे॥ ६॥ |
| देवता ऊचुः | देवता बोले— |
|---|---|
| प्रकृतिस्त्वं परा सूक्ष्मा ब्रह्मगर्भंभवः पुरा।<br>ततो वाणी जगद्धातुर्वेदगर्भासि शोभने॥ ७ | हे शोभने! तू पहले ब्रह्म-प्रतिबिम्बधारिणी मूलप्रकृति हुई थी और फिर जगद्विधाताकी वेदगर्भा वाणी हुई॥ ७॥ |
| सृज्यस्वरूपगर्भासि सृष्टिभूता सनातने।<br>बीजभूता तु सर्वस्य यज्ञभूताभवस्त्रयी॥ ८ | हे सनातने! तू ही सृज्य पदार्थोंको उत्पन्न करनेवाली और तू ही सृष्टिरूपा है; तू ही सबकी बीज-स्वरूपा यज्ञमयी वेदत्रयी हुई है॥ ८॥ |
| फलगर्भा त्वमेवेज्या वह्निगर्भा तथारणिः।<br>अदितिर्देवगर्भा त्वं दैत्यगर्भा तथा दितिः॥ ९ | तू ही फलमयी यज्ञक्रिया और अग्नि-मयी अरणि है तथा तू ही देवमाता अदिति और दैत्यप्रसू दिति है॥ ९॥ |
| ज्योत्स्ना वासरगर्भा त्वं ज्ञानगर्भासि सन्नतिः।<br>नयगर्भा परा नीतिर्लज्जा त्वं प्रश्रयोद्बहा॥ १० | तू ही दिनकरी प्रभा और ज्ञानगर्भा गुरुशुश्रूषा है तथा तू ही न्यायमयी परमनीति और विनयसम्पन्ना लज्जा है॥ १०॥ |
| कामगर्भा तथेच्छा त्वं तुष्टिः सन्तोषगर्भिणी।<br>मेधा च बोधगर्भासि धैर्यगर्भोद्बहा धृतिः॥ ११ | तू ही काममयी इच्छा, सन्तोषमयी तुष्टि, बोधगर्भा प्रज्ञा और धैर्यधारिणी धृति है॥ ११॥ |
| ग्रहर्क्षतारकागर्भा द्यौरस्याखिलहेतुकी।<br>एता विभूतयो देवि तथान्याश्च सहस्त्रशः।<br>तथासंख्या जगद्धात्रि साम्प्रतं जठरे तव॥ १२ | ग्रह, नक्षत्र और तारागणको धारण करनेवाला तथा [वृष्टि आदिके द्वारा इस अखिल विश्वका] कारणस्वरूप आकाश तू ही है। हे जगद्धात्रि! हे देवि! ये सब तथा और भी सहस्रों और असंख्य विभूतियाँ इस समय तेरे उदरमें स्थित हैं॥ १२॥ |
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth