भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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  • श्रीविष्णुपुराण *

[ अ० २


दूसरा अध्याय

भगवान्‌का गर्भ-प्रवेश तथा देवगणद्वारा देवकीकी स्तुति

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
यथोक्तं सा जगद्धात्री देवदेवेन वै तथा।<br>षड्गर्भगर्भविन्यासं चक्रे चान्यस्य कर्षणम्॥ १हे मैत्रेय! देवदेव श्रीविष्णुभगवान्‌ने जैसा कहा था उसके अनुसार जगद्धात्री योगमायाने छः गर्भोँको देवकीके उदरमें स्थित किया और सातवेंको उसमेंसे निकाल लिया॥ १॥
सप्तमे रोहिणीं गर्भे प्राप्ते गर्भं ततो हरिः।<br>लोकत्रयोपकाराय देवक्याः प्रविवेश ह॥ २इस प्रकार सातवें गर्भके रोहिणीके उदरमें पहुँच जानेपर श्रीहरिने तीनों लोकोंका उद्धार करनेकी इच्छासे देवकीके गर्भमें प्रवेश किया॥ २॥
योगनिद्रा यशोदायास्तस्मिन्नेव तथा दिने।<br>सम्भृता जठरे तद्वद्यथोक्तं परमेष्ठिना॥ ३भगवान् परमेश्वरके आज्ञानुसार योगमाया भी उसी दिन यशोदाके गर्भमें स्थित हुई॥ ३॥
ततो ग्रहगणस्सम्यक्प्रचचार दिवि द्विज।<br>विष्णोरंशे भुवं याते ऋतवश्चाबभुश्शुभाः॥ ४हे द्विज! विष्णु-अंशके पृथिवीमें पधारनेपर आकाशमें ग्रहगण ठीक-ठीक गतिसे चलने लगे और ऋतुगण भी मंगलमय होकर शोभा पाने लगे॥ ४॥
न सेहे देवकीं द्रष्टुं कश्चिदप्यतितेजसा।<br>जाज्वल्यमानां तां दृष्ट्वा मनांसि क्षोभमाययुः॥ ५उस समय अत्यन्त तेजसे देदीप्यमाना देवकीजीको कोई भी देख न सकता था। उन्हें देखकर [दर्शकोंके] चित्त थकित हो जाते थे॥ ५॥
अदृष्टाः पुरुषैःस्त्रीभिर्देवकीं देवतागणाः।<br>बिभ्राणां वपुषा विष्णुं तुष्टुवुस्तामहर्निशम्॥ ६तब देवतागण अन्य पुरुष तथा स्त्रियोंको दिखायी न देते हुए, अपने शरीरमें [गर्भरूपसे] भगवान् विष्णुको धारण करनेवाली देवकीजीकी अहर्निश स्तुति करने लगे॥ ६॥
देवता ऊचुःदेवता बोले—
प्रकृतिस्त्वं परा सूक्ष्मा ब्रह्मगर्भंभवः पुरा।<br>ततो वाणी जगद्धातुर्वेदगर्भासि शोभने॥ ७हे शोभने! तू पहले ब्रह्म-प्रतिबिम्बधारिणी मूलप्रकृति हुई थी और फिर जगद्विधाताकी वेदगर्भा वाणी हुई॥ ७॥
सृज्यस्वरूपगर्भासि सृष्टिभूता सनातने।<br>बीजभूता तु सर्वस्य यज्ञभूताभवस्त्रयी॥ ८हे सनातने! तू ही सृज्य पदार्थोंको उत्पन्न करनेवाली और तू ही सृष्टिरूपा है; तू ही सबकी बीज-स्वरूपा यज्ञमयी वेदत्रयी हुई है॥ ८॥
फलगर्भा त्वमेवेज्या वह्निगर्भा तथारणिः।<br>अदितिर्देवगर्भा त्वं दैत्यगर्भा तथा दितिः॥ ९तू ही फलमयी यज्ञक्रिया और अग्नि-मयी अरणि है तथा तू ही देवमाता अदिति और दैत्यप्रसू दिति है॥ ९॥
ज्योत्स्ना वासरगर्भा त्वं ज्ञानगर्भासि सन्नतिः।<br>नयगर्भा परा नीतिर्लज्जा त्वं प्रश्रयोद्बहा॥ १०तू ही दिनकरी प्रभा और ज्ञानगर्भा गुरुशुश्रूषा है तथा तू ही न्यायमयी परमनीति और विनयसम्पन्ना लज्जा है॥ १०॥
कामगर्भा तथेच्छा त्वं तुष्टिः सन्तोषगर्भिणी।<br>मेधा च बोधगर्भासि धैर्यगर्भोद्बहा धृतिः॥ ११तू ही काममयी इच्छा, सन्तोषमयी तुष्टि, बोधगर्भा प्रज्ञा और धैर्यधारिणी धृति है॥ ११॥
ग्रहर्क्षतारकागर्भा द्यौरस्याखिलहेतुकी।<br>एता विभूतयो देवि तथान्याश्च सहस्त्रशः।<br>तथासंख्या जगद्धात्रि साम्प्रतं जठरे तव॥ १२ग्रह, नक्षत्र और तारागणको धारण करनेवाला तथा [वृष्टि आदिके द्वारा इस अखिल विश्वका] कारणस्वरूप आकाश तू ही है। हे जगद्धात्रि! हे देवि! ये सब तथा और भी सहस्रों और असंख्य विभूतियाँ इस समय तेरे उदरमें स्थित हैं॥ १२॥

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