भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 558 में से

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पृष्ठ 332

अ० ३ ] * पञ्चम अंश * ३२१


(मूल संस्कृत श्लोक)(हिन्दी अनुवाद)
समुद्राद्रिनदीद्वीपवनपत्तनभूषणा ।<br>ग्रामखर्वटखेटाढ्या समस्ता पृथिवी शुभे ॥ १३<br>समस्तवह्नयोऽम्भांसि सकलाश्च समीराणाः ।<br>ग्रहर्क्षतारकाचित्रं विमानशतसंकुलम् ॥ १४<br>अवकाशमशेषस्य यद्ददाति नभःस्थलम् ।<br>भूर्लोकश्च भुवर्लोकस्स्वर्लोकोऽथ महर्जनः ॥ १५<br>तपश्च ब्रह्मलोकश्च ब्रह्माण्डमखिलं शुभे ।<br>तदन्तरे स्थिता देवा दैत्यगन्धर्वचारणाः ॥ १६<br>महोरगास्तथा यक्षा राक्षसाः प्रेतगुह्यकाः ।<br>मनुष्याः पशवश्चान्ये ये च जीवा यशस्विनि ॥ १७<br>तैरन्तःस्थैरनन्तोऽसौ सर्वगः सर्वभावनः ॥ १८<br>रूपकर्मस्वरूपाणि न परिच्छेदगोचरे ।<br>यस्याखिलप्रमाणानि स विष्णुर्गर्भगतस्तव ॥ १९<br>त्वं स्वाहा त्वं स्वधा विद्या सुधा त्वं ज्योतिरम्बरे ।<br>त्वं सर्वलोकरक्षार्थमवतीर्णा महीतले ॥ २०<br>प्रसीद देवि सर्वस्य जगतश्शं शुभे कुरु ।<br>प्रीत्या तं धारयेशानं धृतं येनाखिलं जगत् ॥ २१हे शुभे! समुद्र, पर्वत, नदी, द्वीप, वन और नगरोंसे सुशोभित तथा ग्राम, खर्वट और खेटादिसे सम्पन्न समस्त पृथिवी, सम्पूर्ण अग्नि और जल तथा समस्त वायु, ग्रह, नक्षत्र एवं तारागणोंसे चित्रित तथा सैकड़ों विमानोंसे पूर्ण सबको अवकाश देनेवाला आकाश, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा मह, जन, तप और ब्रह्मलोकपर्यन्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा उसके अन्तर्वर्ती देव, असुर, गन्धर्व, चारण, नाग, यक्ष, राक्षस, प्रेत, गुह्यक, मनुष्य, पशु और जो अन्यान्य जीव हैं, हे यशस्विनि! वे सभी अपने अन्तर्गत होनेके कारण जो श्रीअनन्त सर्वगामी और सर्वभावन हैं तथा जिनके रूप, कर्म, स्वभाव तथा [बालत्व महत्त्व आदि] समस्त परिमाण परिच्छेद (विचार)-के विषय नहीं हो सकते वे ही श्रीविष्णुभगवान् तेरे गर्भमें स्थित हैं॥ १३—१९॥ तू ही स्वाहा, स्वधा, विद्या, सुधा और आकाशस्थिता ज्योति है। सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये ही तूने पृथिवीमें अवतार लिया है॥ २०॥ हे देवि! तू प्रसन्न हो। हे शुभे! तू सम्पूर्ण जगत्‌का कल्याण कर। जिसने इस सम्पूर्ण जगत्‌को धारण किया है उस प्रभुको तू प्रीतिपूर्वक अपने गर्भमें धारण कर॥ २१॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


तीसरा अध्याय

भगवान्‌का आविर्भाव तथा योगमायाद्वारा कंसकी वंचना

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
एवं संस्तूयमाना सा देवैर्देवमधारयत् ।<br>गर्भेण पुण्डरीकाक्षं जगतस्त्राणकारणम् ॥ १हे मैत्रेय! देवताओंसे इस प्रकार स्तुति की जाती हुई देवकीजीने संसारकी रक्षाके कारण भगवान् पुण्डरीकाक्षको गर्भमें धारण किया॥ १॥
ततोऽखिलजगत्पद्मबोधायाच्युतभानुना ।<br>देवकीपूर्वसन्ध्यायामाविर्भूतं महात्मना ॥ २तदनन्तर सम्पूर्ण संसाररूप कमलको विकसित करनेके लिये देवकीरूप पूर्व सन्ध्यामें महात्मा अच्युतरूप सूर्यदेवका आविर्भाव हुआ॥ २॥
तज्जन्मदिनमत्यर्थमाह्लाद्यमलदिङ्मुखम् ।<br>बभूव सर्वलोकस्य कौमुदी शशिनो यथा ॥ ३चन्द्रमाकी चाँदनीके समान भगवान्‌का जन्म-दिन सम्पूर्ण जगत्‌को आह्लादित करनेवाला हुआ और उस दिन सभी दिशाएँ अत्यन्त निर्मल हो गयीं॥ ३॥
सन्तस्सन्तोषमधिकं प्रशमं चण्डमारुताः ।<br>प्रसादं निम्नगा याता जायमाने जनार्दने ॥ ४श्रीजनार्दनके जन्म लेनेपर सन्तजनोंको परम सन्तोष हुआ, प्रचण्ड वायु शान्त हो गया तथा नदियाँ अत्यन्त स्वच्छ हो गयीं॥ ४॥