भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 335
३२४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ४

चौथा अध्याय

वसुदेव-देवकीका कारागारसे मोक्ष

श्रीपराशर उवाच
कंसस्तदोद्विग्नमनाः प्राह सर्वान्महासुरान्।
प्रलम्बकेशप्रमुखानाहूयासुरपुंगवान् ॥ १॥
श्रीपराशरजी बोले— तब कंसने खिन्नचित्तसे प्रलम्ब और केशी आदि समस्त मुख्य-मुख्य असुरोंको बुलाकर कहा॥ १॥

कंस उवाच
हे प्रलम्ब महाबाहो केशिन् धेनुक पूतने।
अरिष्टाद्यास्तथैवान्ये श्रूयतां वचनं मम॥ २॥
कंस बोला— हे प्रलम्ब! हे महाबाहो केशिन्! हे धेनुक! हे पूतने! तथा हे अरिष्ट आदि अन्य असुरगण! मेरा वचन सुनो—॥ २॥

मां हन्तुममरैर्यत्नः कृतः किल दुरात्मभिः।
मद्वीर्यतापितान्वीरो न त्वेतानागणयाम्यहम्॥ ३॥
यह बात प्रसिद्ध हो रही है कि दुरात्मा देवताओंने मेरे मारनेके लिये कोई यत्न किया है; किन्तु मैं वीर पुरुष अपने वीर्यसे सताये हुए इन लोगोंको कुछ भी नहीं गिनता हूँ॥ ३॥

किमिन्द्रेणाल्पवीर्येण किं हरेणैकचारिणा।
हरिणा वापि किं साध्यं छिद्रेष्वसुरघातिना॥ ४॥
अल्पवीर्य इन्द्र, अकेले घूमनेवाले महादेव अथवा छिद्र (असावधानीका समय) ढूँढ़कर दैत्योंका वध करनेवाले विष्णुसे उनका क्या कार्य सिद्ध हो सकता है?॥ ४॥

किमादित्यैः किं वसुभिरल्पवीर्यैः किमग्निभिः।
किं वान्यैरमरैः सर्वैर्मद्बाहुबलनिर्जितैः॥ ५॥
मेरे बाहुबलसे दलित आदित्यों, अल्पवीर्य वसुगणों, अग्नियों अथवा अन्य समस्त देवताओंसे भी मेरा क्या अनिष्ट हो सकता है?॥ ५॥

किं न दृष्टोऽमरपतिर्मया संयुगमेत्य सः।
पृष्ठेनैव वहन्बाणानपागच्छन्न वक्षसा॥ ६॥
आपलोगोंने क्या देखा नहीं था कि मेरे साथ युद्धभूमिमें आकर देवराज इन्द्र, वक्षःस्थलमें नहीं, अपनी पीठपर बाणोंकी बौछार सहता हुआ भाग गया था॥ ६॥

मद्राष्ट्रे वारिता वृष्टिर्यदा शक्रेण किं तदा।
मद्बाणभिन्नैर्जलदैर्नापो मुक्ता यथेप्सिताः॥ ७॥
जिस समय इन्द्रने मेरे राज्यमें वर्षाका होना बन्द कर दिया था उस समय क्या मेघोंने मेरे बाणोंसे बिंधकर ही यथेष्ट जल नहीं बरसाया?॥ ७॥

किमुर्व्यामवनीपाला मद्बाहुबलभीरवः।
न सर्वे सन्नतिं याता जरासन्धमृते गुरुम्॥ ८॥
हमारे गुरु (श्वशुर) जरासन्धको छोड़कर क्या पृथिवीके और सभी नृपतिगण मेरे बाहुबलसे भयभीत होकर मेरे सामने सिर नहीं झुकाते?॥ ८॥

अमरेषु ममावज्ञा जायते दैत्यपुंगवाः।
हास्यं मे जायते वीरास्तेषु यत्नपरेष्वपि॥ ९॥
हे दैत्यश्रेष्ठगण! देवताओंके प्रति मेरे चित्तमें अवज्ञा होती है और हे वीरगण! उन्हें अपने (मेरे) वधका यत्न करते देखकर तो मुझे हँसी आती है॥ ९॥

तथापि खलु दुष्टानां तेषामप्यधिकं मया।
अपकाराय दैत्येन्द्रा यतनीयं दुरात्मनाम्॥ १०॥
तथापि हे दैत्येन्द्रो! उन दुष्ट और दुरात्माओंके अपकारके लिये मुझे और भी अधिक प्रयत्न करना चाहिये॥ १०॥

तद्ये यशस्विनः केचित्पृथिव्यां ये च याजकाः।
कार्यो देवापकाराय तेषां सर्वात्मना वधः॥ ११॥
अतः पृथिवीमें जो कोई यशस्वी और यज्ञकर्ता हों उनका देवताओंके अपकारके लिये सर्वथा वध कर देना चाहिये॥ ११॥


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