विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 336, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] * पञ्चम अंश * ३२५
उत्पन्नश्चापि मे मृत्युर्भूतपूर्वस्स वै किल।
इत्येतद्दारिका प्राह देवकीगर्भसम्भवा ॥ १२
तस्माद्बालेषु च परो यत्नः कार्यो महीतले।
यत्रोद्रिक्तं बलं बाले स हन्तव्यः प्रयत्नतः ॥ १३
इत्याज्ञाप्यासुरान्कंसः प्रविश्याशु गृहं ततः।
मुमोच वसुदेवं च देवकीं च निरोधतः ॥ १४
कंस उवाच
युवयोषार्तिता गर्भा वृथैवैते मयाधुना।
कोऽप्यन्य एव नाशाय बालो मम समुद्गतः ॥ १५
तदलं परितापेन नूनं तद्भाविनो हि ते।
अर्भका युवयोर्दोषाच्चायुषो यद्वियोजिताः ॥ १६
श्रीपराशर उवाच
इत्याश्वास्य विमुक्त्वा च कंसस्तौ परिशंकितः।
अन्तर्गृहं द्विजश्रेष्ठ प्रविवेश ततः स्वकम् ॥ १७
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुई बालिकाने यह भी कहा है कि, वह मेरा भूतपूर्व (प्रथम जन्मका) काल निश्चय ही उत्पन्न हो चुका है ॥ १२ ॥ अतः आजकल पृथिवीपर उत्पन्न हुए बालकोंके विषयमें विशेष सावधानी रखनी चाहिये और जिस बालकमें विशेष बलका उद्रेक हो उसे यत्नपूर्वक मार डालना चाहिये ॥ १३ ॥ असुरोंको इस प्रकार आज्ञा दे कंसने कारागृहमें जाकर तुरन्त ही वसुदेव और देवकीको बन्धनसे मुक्त कर दिया ॥ १४ ॥
कंस बोला— मैंने अबतक आप दोनोंके बालकोंकी तो वृथा ही हत्या की, मेरा नाश करनेके लिये तो कोई और ही बालक उत्पन्न हो गया है ॥ १५ ॥ परन्तु आपलोग इसका कुछ दुःख न मानें; क्योंकि उन बालकोंकी होनहार ऐसी ही थी। आपलोगोंके प्रारब्धदोषसे ही उन बालकोंको अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ा है ॥ १६ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजश्रेष्ठ! उन्हें इस प्रकार ढाँढ़स बँधा और बन्धनसे मुक्तकर कंसने शंकित चित्तसे अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया ॥ १७ ॥
पाँचवाँ अध्याय
पूतना-वध
श्रीपराशर उवाच
विमुक्तो वसुदेवोऽपि नन्दस्य शकटं गतः।
प्रहृष्टं दृष्टवान्नन्दं पुत्रो जातो ममेति वै ॥ १
वसुदेवोऽपि तं प्राह दिष्ट्या दिष्ट्येति सादरम्।
वार्द्धकेऽपि समुत्पन्नस्तनयोऽयं तवाधुना ॥ २
दत्तो हि वार्षिकस्सर्वो भवद्भिर्नृपतेः करः।
यदर्थमागतास्तस्मान्नात्र स्थेयं महाधनैः ॥ ३
यदर्थमागताः कार्यं तन्निष्पन्नं किमास्यते।
भवद्भिर्गम्यतां नन्द तच्छीघ्रं निजगोकुलम् ॥ ४
ममापि बालकस्तत्र रोहिणीप्रभवो हि यः।
स रक्षणीयो भवता यथायं तनयो निजः ॥ ५
इत्युक्ताः प्रययुर्गोपा नन्दगोपपुरोगमाः।
शकटारोपितैर्भाण्डैः करं दत्त्वा महाबलाः ॥ ६
श्रीपराशरजी बोले— बन्दीगृहसे छूटते ही वसुदेवजी नन्दजीके छकड़ेके पास गये तो उन्हें इस समाचारसे अत्यन्त प्रसन्न देखा कि 'मेरे पुत्रका जन्म हुआ है' ॥ १ ॥ तब वसुदेवजीने भी उनसे आदरपूर्वक कहा—अब वृद्धावस्थामें भी आपने पुत्रका मुख देख लिया यह बड़े ही सौभाग्यकी बात है ॥ २ ॥ आपलोग जिसलिये यहाँ आये थे वह राजाका सारा वार्षिक कर दे ही चुके हैं। यहाँ धनवान् पुरुषोंको और अधिक न ठहरना चाहिये ॥ ३ ॥ आपलोग जिसलिये यहाँ आये थे वह कार्य पूरा हो चुका, अब और अधिक किसलिये ठहरे हुए हैं? [यहाँ देरतक ठहरना ठीक नहीं है] अतः हे नन्दजी! आपलोग शीघ्र ही अपने गोकुलको जाइये ॥ ४ ॥ वहाँपर रोहिणीसे उत्पन्न हुआ जो मेरा पुत्र है उसकी भी आप उसी तरह रक्षा कीजियेगा जैसे अपने इस बालककी ॥ ५ ॥
वसुदेवजीके ऐसा कहनेपर नन्द आदि महाबलवान् गोपगण छकड़ोंमें रखकर लाये हुए भाण्डोंसे कर चुकाकर चले गये ॥ ६ ॥