भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 337
३२६* श्रीविष्णुपुराण *[अ० ५

वसतां गोकुले तेषां पूतना बालघातिनी।<br>सुप्तं कृष्णमुपादाय रात्रौ तस्मै स्तनं ददौ ॥ ७<br>यस्मै यस्मै स्तनं रात्रौ पूतना सम्प्रयच्छति।<br>तस्य तस्य क्षणेनाङ्गं बालकस्योपहन्यते ॥ ८<br>कृष्णास्तु तत्स्तनं गाढं कराभ्यामतिपीडितम्।<br>गृहीत्वा प्राणसहितं पपौ क्रोधसमन्वितः ॥ ९<br>सातिमुक्तमहारावा विच्छिन्नस्नायुबन्धना।<br>पपात पूतना भूमौ म्रियमाणातिभीषणा ॥ १०<br>तन्नादश्रुतिसन्त्रस्ताः प्रबुद्धास्ते व्रजौकसः।<br>ददृशुः पूतनोत्सङ्गे कृष्णं तां च निपातिताम् ॥ ११<br>आदाय कृष्णं सन्त्रस्ता यशोदापि द्विजोत्तम।<br>गोपुच्छभ्रामणेनाथ बालदोषमपाकरोत् ॥ १२<br>गोपुरीषमुपादाय नन्दगोपोऽपि मस्तके।<br>कृष्णस्य प्रददौ रक्षां कुर्वंश्चैतदुदीरयन् ॥ १३<br>नन्दगोप उवाच<br>रक्षतु त्वामशेषाणां भूतानां प्रभवो हरिः।<br>यस्य नाभिसमुद्भूतपङ्कजादभवज्जगत् ॥ १४<br>येन दंष्ट्राग्रविधृता धारयत्यवनिर्जगत्।<br>वराहरूपधृग्देवस्स त्वां रक्षतु केशवः ॥ १५<br>नखाङ्कुरविनिर्भिन्नवैरिवक्षस्थलो विभुः।<br>नृसिंहिरूपी सर्वत्र रक्षतु त्वां जनार्दनः ॥ १६<br>वामनो रक्षतु सदा भवन्तं यः क्षणादभूत्।<br>त्रिविक्रमः क्रमाक्रान्तत्रैलोक्यः स्फुरदायुधः ॥ १७<br>शिरस्ते पातु गोविन्दः कण्ठं रक्षतु केशवः।<br>गुह्यं च जठरं विष्णुर्जङ्घे पादौ जनार्दनः ॥ १८<br>मुखं बाहू प्रबाहू च मनः सर्वेन्द्रियाणि च।<br>रक्षत्वव्याहतैश्वर्यस्तव नारायणोऽव्ययः ॥ १९<br>शार्ङ्गचक्रगदापाणेश्शङ्खनादहताः क्षयम्।<br>गच्छन्तु प्रेतकूष्माण्डराक्षसा ये तवाहिताः ॥ २० | उनके गोकुलमें रहते समय बालघातिनी पूतना बालघातिनी पूतना ने रात्रिके समय सोये हुए कृष्णको गोदमें लेकर उनके मुखमें अपना स्तन दे दिया ॥ ७ ॥ रात्रिके समय पूतना जिस-जिस बालकके मुखमें अपना स्तन दे देती थी उसीका शरीर तत्काल नष्ट हो जाता था ॥ ८ ॥ कृष्णचन्द्रने क्रोधपूर्वक उसके स्तनको अपने हाथोंसे खूब दबाकर पकड़ लिया और उसे उसके प्राणोंके सहित पीने लगे ॥ ९ ॥ तब स्नायु-बन्धनोंके शिथिल हो जानेसे पूतना घोर शब्द करती हुई मरते समय महाभयंकर रूप धारणकर पृथिवीपर गिर पड़ी ॥ १० ॥ उसके घोर नादको सुनकर भयभीत हुए व्रजवासीगण जाग उठे और देखा कि कृष्ण पूतनाकी गोदमें हैं और वह मारी गयी है ॥ ११ ॥<br><br>हे द्विजोत्तम ! तब भयभीता यशोदाने कृष्णको गोदमें लेकर उन्हें गौकी पूँछसे झाड़कर बालकका ग्रह-दोष निवारण किया ॥ १२ ॥ नन्दगोपने भी आगेके वाक्य कहकर विधिपूर्वक रक्षा करते हुए कृष्णके मस्तकपर गोबरका चूर्ण लगाया ॥ १३ ॥<br><br>नन्दगोप बोले—जिनकी नाभिसे प्रकट हुए कमलसे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है वे सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्थान श्रीहरि तेरी रक्षा करें ॥ १४ ॥ जिनकी दाढ़ोंके अग्रभागपर स्थापित होकर भूमि सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करती है, वे वराह-रूप-धारी श्रीकेशव तेरी रक्षा करें ॥ १५ ॥ जिन विभुने अपने नखाग्रोंसे शत्रुके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया था, वे नृसिंहरूपी जनार्दन तेरी सर्वत्र रक्षा करें ॥ १६ ॥ जिन्होंने क्षणमात्रमें सशस्त्र त्रिविक्रमरूप धारण करके अपने तीन पगोंसे त्रिलोकीको नाप लिया था, वे वामनभगवान् तेरी सर्वदा रक्षा करें ॥ १७ ॥ गोविन्द तेरे सिरकी, केशव कण्ठकी, विष्णु गुह्यस्थान और जठरकी तथा जनार्दन जंघा और चरणोंकी रक्षा करें ॥ १८ ॥ तेरे मुख, बाहु, प्रबाहु,* मन और सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी अखण्ड-ऐश्वर्यसे सम्पन्न अविनाशी श्रीनारायण रक्षा करें ॥ १९ ॥ तेरे अनिष्ट करनेवाले जो प्रेत, कूष्माण्ड और राक्षस हों वे शार्ङ्ग धनुष, चक्र और गदा धारण करनेवाले विष्णुभगवान्‌की शंख-ध्वनिसे नष्ट हो जायें ॥ २० ॥ |

* घुटनेके नीचेका भाग।