विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ६ ] * पञ्चम अंश * ३२७
| त्वां पातु दिक्षु वैकुण्ठो विदिक्षु मधुसूदनः।<br>हृषीकेशोऽम्बरे भूमौ रक्षतु त्वां महीधरः॥ २१ | भगवान् वैकुण्ठ दिशाओंमें, मधुसूदन विदिशाओं (कोणों) -में, हृषीकेश आकाशमें तथा पृथिवीको धारण करनेवाले श्रीशेषजी पृथिवीपर तेरी रक्षा करें॥ २१॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—इस प्रकार स्वस्तिवाचन कर नन्दगोपने बालक कृष्णको छकड़ेके नीचे एक खटोलेपर सुला दिया॥ २२॥ मरी हुई पूतनाके महान् कलेवरको देखकर उन सभी गोपोंको अत्यन्त भय और विस्मय हुआ॥ २३॥ |
| एवं कृतस्वस्त्ययनो नन्दगोपेन बालकः।<br>शायितश्शकटस्याधो बालपर्यङ्किकातले॥ २२ | |
| ते च गोपा महद्दृष्ट्वा पूतनायाः कलेवरम्।<br>मृतायाः परमं त्रासं विस्मयं च तदा ययुः॥ २३ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
छठा अध्याय
शकटभंजन, यमलार्जुन-उद्धार, ब्रजवासियोंका गोकुलसे वृन्दावनमें जाना और वर्षा-वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—एक दिन छकड़ेके नीचे सोये हुए मधुसूदनने दूधके लिये रोते-रोते ऊपरको लात मारी॥ १॥ उनकी लात लगते ही वह छकड़ा लोट गया, उसमें रखे हुए कुम्भ और भाण्ड आदि फूट गये और वह उलटा जा पड़ा॥ २॥ हे द्विज! उस समय हाहाकार मच गया, समस्त गोप-गोपीगण वहाँ आ पहुँचे और उस बालकको उत्तान सोये हुए देखा॥ ३॥ तब गोपगण पूछने लगे कि 'इस छकड़ेको किसने उलट दिया, किसने उलट दिया?' तो वहाँपर खेलते हुए बालकोंने कहा—'इस कृष्णने ही गिराया है॥ ४॥ हमने अपनी आँखोंसे देखा है कि रोते-रोते इसकी लात लगनेसे ही यह छकड़ा गिरकर उलट गया है। यह और किसीका काम नहीं है'॥ ५॥ |
| कदाचिच्छकटस्याधश्शयानो मधुसूदनः।<br>चिक्षेप चरणावूर्ध्वं स्तन्यार्थी प्ररुforceरोद ह॥ १ | |
| तस्य पादप्रहारेण शकटं परिवर्तितम्।<br>विध्वस्तकुम्भभाण्डं तद्विपरीतं पपात वै॥ २ | |
| ततो हाहाकृतं सर्वो गोपगोपीजनो द्विज।<br>आजगामाथ ददृशे बालमुत्तानशायिनम्॥ ३ | |
| गोपाः केनेति केनेदं शकटं परिवर्तितम्।<br>तत्रैव बालकाः प्रोचुर्बालेनानेन पातितम्॥ ४ | |
| रुदता दृष्टमस्माभिः पादविक्षेपपातितम्।<br>शकटं परिवृत्तं वै नैतदन्यस्य चेष्टितम्॥ ५ | |
| ततः पुनरतीवासन्गोपा विस्मयचेतसः।<br>नन्दगोपोऽपि जग्राह बालमत्यन्तविस्मितः॥ ६ | यह सुनकर गोपगणके चित्तमें अत्यन्त विस्मय हुआ तथा नन्दगोपने अत्यन्त चकित होकर बालकको उठा लिया॥ ६॥ फिर यशोदाने भी छकड़ेमें रखे हुए फूटे भाण्डोंके टुकड़ोंकी और उस छकड़ेकी दही, पुष्प, अक्षत और फल आदिसे पूजा की॥ ७॥ |
| यशोदा शकटारूढभग्नभाण्डकपालिकाः।<br>शकटं चार्चयामास दधिपुष्पफलाक्षतैः॥ ७ | |
| गर्गश्च गोकुले तत्र वसुदेवप्रचोदितः।<br>प्रच्छन्न एव गोपानां संस्कारानकरोत्तयोः॥ ८ | इसी समय वसुदेवजीके कहनेसे गर्गाचार्यने गोपोंसे छिपे-छिपे गोकुलमें आकर उन दोनों बालकोंके [द्विजोचित] संस्कार किये॥ ८॥ उन दोनोंके नामकरण-संस्कार करते हुए महामति गर्गजीने बड़ेका नाम राम और छोटेका कृष्ण बतलाया॥ ९॥ |
| ज्येष्ठं च राममित्याह कृष्णं चैव तथावरम्।<br>गर्गे मतिमतां श्रेष्ठो नाम कुर्वन्महामतिः॥ ९ |