विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६
स्वल्पेनैव तु कालेन रिङ्गणौ तौ तदा व्रजे।
घृष्टजानुकरौ विप्र बभूवतुरुभावपि॥ १०
करीषभस्मदिग्धाङ्गौ भ्रममाणावितस्ततः।
न निवारयितुं शेके यशोदा तौ न रोहिणी॥ ११
गोवाटमध्ये क्रीडन्तौ वत्सवाटं गतौ पुनः।
तदहर्जातगोवत्सपुच्छाकर्षणतत्परौ ॥ १२
यदा यशोदा तौ बालावेकस्थानचरावुभौ।
शशाक नो वारयितुं क्रीडन्तावतिचञ्चलौ॥ १३
दाम्ना मध्ये ततो बद्ध्वा बबन्ध तमुलूखले।
कृष्णमक्लिष्टकर्माणमाह चेदममर्षिता॥ १४
यदि शक्नोषि गच्छ त्वमतिचञ्चलचेष्टित।
इत्युक्त्वाथ निजं कर्म सा चकार कुटुम्बिनी॥ १५
व्यग्रायामथ तस्यां स कर्षमाण उलूखलम्।
यमलार्जुनमध्येन जगाम कमलेक्षणः॥ १६
कर्षता वृक्षयोर्मध्ये तिर्यग्गतमुलूखलम्।
भग्नावुत्तुङ्गशाखाग्रौ तेन तौ यमलार्जुनौ॥ १७
ततः कटकटाशब्दसमाकर्णनतत्परः।
आजगाम व्रजजनो ददर्श च महाद्रुमौ॥ १८
नवोद्गताल्पदन्तांशुसितहासं च बालकम्।
तयोर्मध्यगतं दाम्ना बद्धं गाढं तथोदरे॥ १९
ततश्च दामोदरतां स ययौ दामबन्धनात्॥ २०
गोपवृद्धास्ततः सर्वे नन्दगोपपुरोगमाः।
मन्त्रयामासुरुद्विग्ना महोत्पातातिभीरवः॥ २१
स्थानेनेह न नः कार्यं व्रजामोऽन्यन्महावनम्।
उत्पाता बहवो ह्यत्र दृश्यन्ते नाशहेतवः॥ २२
पूतनाया विनाशश्च शकटस्य विपर्ययः।
विना वातादिदोषेण द्रुमयोः पतनं तथा॥ २३
वृन्दावनमितः स्थानात्समाद्गच्छाम मा चिरम्।
यावद्भौममहोत्पातदोषो नाभिभवेद्व्रजम्॥ २४
इति कृत्वा मतिं सर्वे गमने ते व्रजौकसः।
ऊचुस्स्वं स्वं कुलं शीघ्रं गम्यतां मा विलम्बथ॥ २५
हे विप्र! वे दोनों बालक थोड़े ही दिनोंमें गौओंके गोष्ठमें रेंगते-रेंगते हाथ और घुटनोंके बल चलनेवाले हो गये॥ १०॥ गोबर और राख-भरे शरीरसे इधर-उधर घूमते हुए उन बालकोंको यशोदा और रोहिणी रोक नहीं सकती थीं॥ ११॥ कभी वे गौओंके घोषमें खेलते और कभी बछड़ोंके मध्यमें चले जाते तथा कभी उसी दिन जन्मे हुए बछड़ोंकी पूँछ पकड़कर खींचने लगते॥ १२॥
एक दिन जब यशोदा, सदा एक ही स्थानपर साथ-साथ खेलनेवाले उन दोनों अत्यन्त चंचल बालकोंको न रोक सकी तो उसने अनायास ही सब कर्म करनेवाले कृष्णको रस्सीसे कटिभागमें कसकर ऊखलमें बाँध दिया और रोषपूर्वक इस प्रकार कहने लगी— ॥ १३-१४॥ "अरे चंचल! अब तुझमें सामर्थ्य हो तो चला जा।" ऐसा कहकर कुटुम्बिनी यशोदा अपने घरके धन्धेमें लग गयी॥ १५॥
उसके गृहकार्यमें व्यग्र हो जानेपर कमलनयन कृष्ण ऊखलको खींचते-खींचते यमलार्जुनके बीचमें गये॥ १६॥ और उन दोनों वृक्षोंके बीचमें तिरछी पड़ी हुई ऊखलको खींचते हुए उन्होंने ऊँची शाखाओंवाले यमलार्जुन वृक्षको उखाड़ डाला॥ १७॥ तब उनके उखड़नेका कट-कट शब्द सुनकर वहाँ ब्रजवासीलोग दौड़ आये और उन दोनों महावृक्षोंको तथा उनके बीचमें कमरमें रस्सीसे कसकर बँधे हुए बालकको नन्हें-नन्हें अल्प दाँतोंकी श्वेत किरणोंसे शुभ्र हास करते देखा। तभीसे रस्सीसे बँधनेके कारण उनका नाम दामोदर पड़ा॥ १८-२०॥
तब नन्दगोप आदि समस्त वृद्ध गोपोंने महान् उत्पातोंके कारण अत्यन्त भयभीत होकर आपसमें यह सलाह की— ॥ २१॥ 'अब इस स्थानपर रहनेका हमारा कोई प्रयोजन नहीं है, हमें किसी और महावनको चलना चाहिये, क्योंकि यहाँ नाशके कारणस्वरूप, पूतना-वध, छकड़ेका लोट जाना तथा आँधी आदि किसी दोषके बिना ही वृक्षोंका गिर पड़ना इत्यादि बहुत-से उत्पात दिखायी देने लगे हैं॥ २२-२३॥ अतः जबतक कोई भूमिसम्बन्धी महान् उत्पात ब्रजको नष्ट न करे तबतक शीघ्र ही हमलोग इस स्थानसे वृन्दावनको चल दें'॥ २४॥
इस प्रकार वे समस्त ब्रजवासी चलनेका विचारकर अपने-अपने कुटुम्बके लोगोंसे कहने लगे—'शीघ्र ही चलो, देरी मत करो'॥ २५॥