विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ६ ] * पञ्चम अंश * ३२९
| ततः क्षणेन प्रययुः शकटैर्गोधनैस्तथा।<br>यूथशो वत्सपालाश्च कालयन्तो व्रजौकसः॥ २६<br><br>द्रव्यावयवनिर्द्धूतं क्षणमात्रेण तत्तथा।<br>काकभाससमाकीर्णं व्रजस्थानमभूद्द्विज ॥ २७<br><br>वृन्दावनं भगवता कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>शुभेन मनसा ध्यातं गवां सिद्धिमभीप्सता ॥ २८<br><br>ततस्तत्रातिरूक्षेऽपि घर्मकाले द्विजोत्तम।<br>प्रावृट्काल इवोद्भूतं नवशष्पं समन्ततः॥ २९<br><br>स समावासितः सर्वो व्रजो वृन्दावने ततः।<br>शकटीवाटपर्यन्तश्चन्द्राद्धाकारसंस्थितिः॥ ३०<br><br>वत्सपालौ च संवृत्तौ रामदामोदरौ ततः।<br>एकस्थानस्थितौ गोष्ठे चेरतुर्बाललीलया ॥ ३१<br><br>बर्हिपत्रकृतापीडौ वन्यपुष्पावतंसकौ।<br>गोपवेणुकृतातोद्यपत्रवाद्यकृतस्वनौ ॥ ३२<br><br>काकपक्षधरौ बालौ कुमाराविव पावकौ।<br>हसन्तौ च रमन्तौ च चेरतुः स्म महावनम् ॥ ३३<br><br>क्वचिद्वहन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ तथा परैः।<br>गोपपुत्रैस्समं वत्सांश्चारयन्तौ विचेरतुः॥ ३४<br><br>कालेन गच्छता तौ तु सप्तवर्षौ महाव्रजे।<br>सर्वस्य जगतः पालौ वत्सपालौ बभूवतुः॥ ३५<br><br>प्रावृट्कालस्ततोऽतीवमेघौघस्थगिताम्बरः।<br>बभूव वारिधाराभिरैक्यं कुर्वन्दिशामिव ॥ ३६<br><br>प्ररूढनवशष्पाढ्या शक्रगोपाचिता मही।<br>तथा मारकतीवासीत्पद्मरागविभूषिता॥ ३७<br><br>ऊहुरुन्मार्गवाहीनि निम्नगाम्भांसि सर्वतः।<br>मनांसि दुर्विनीतानां प्राप्य लक्ष्मीं नवामिव ॥ ३८<br><br>न रेजेऽन्तरितश्चन्द्रो निर्मलो मलिनैर्घनैः।<br>सद्वादिवादो मूर्खाणां प्रगल्भाभिरिवोक्तिभिः॥ ३९ | तब वे व्रजवासी वत्सपाल दल बाँधकर एक क्षणमें ही छकड़ों और गौओंके साथ उन्हें हाँकते हुए चल दिये ॥ २६ ॥ हे द्विज ! वस्तुओंके अवशिष्टांशोंसे युक्त वह व्रजभूमि क्षणभरमें ही काक तथा भास आदि पक्षियोंसे व्याप्त हो गयी ॥ २७ ॥<br><br>तब लीलाविहारी भगवान् कृष्णने गौओंकी अभिवृद्धिकी इच्छासे अपने शुद्धचित्तसे वृन्दावन (नित्य-वृन्दावनधाम)-का चिन्तन किया ॥ २८ ॥ इससे, हे द्विजोत्तम ! अत्यन्त रूक्ष ग्रीष्मकालमें भी वहाँ वर्षाऋतुके समान सब ओर नवीन दूब उत्पन्न हो गयी ॥ २९ ॥ तब चारों ओर अर्द्धचन्द्राकारसे छकड़ोंकी बाड़ लगाकर वे समस्त व्रजवासी वृन्दावनमें रहने लगे ॥ ३० ॥<br><br>तदनन्तर राम और कृष्ण भी बछड़ोंके रक्षक हो गये और एक स्थानपर रहकर गोष्ठमें बाललीला करते हुए विचरने लगे ॥ ३१ ॥ वे काकपक्षधारी दोनों बालक सिरपर मयूर-पिच्छका मुकुट धारणकर तथा वन्यपुष्पोंके कर्णभूषण पहन ग्वालोचित वंशी आदिसे सब प्रकारके बाजोंकी ध्वनि करते तथा पत्तोंके बाजेसे ही नाना प्रकारकी ध्वनि निकालते, स्कन्दके अंशभूत शाख-विशाख कुमारोंके समान हँसते और खेलते हुए उस महावनमें विचरने लगे ॥ ३२-३३ ॥ कभी एक-दूसरेको अपने पीठपर ले जाते तथा कभी अन्य ग्वाल-बालोंके साथ खेलते हुए वे बछड़ोंको चराते साथ-साथ घूमते रहते ॥ ३४ ॥ इस प्रकार उस महाव्रजमें रहते-रहते कुछ समय बीतनेपर वे निखिललोकपालक वत्सपाल सात वर्षके हो गये ॥ ३५ ॥<br><br>तब मेघसमूहसे आकाशको आच्छादित करता हुआ तथा अतिशय वारिधाराओंसे दिशाओंको एकरूप करता हुआ वर्षाकाल आया ॥ ३६ ॥ उस समय नवीन दूर्वाके बढ़ जाने और वीरबहूटियोंसे* व्याप्त हो जानेके कारण पृथिवी पद्मरागविभूषिता मरकतमयी-सी जान पड़ने लगी ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार नया धन पाकर दुष्ट पुरुषोंका चित्त उच्छृंखल हो जाता है, उसी प्रकार नदियोंका जल सब ओर अपना निर्दिष्ट मार्ग छोड़कर बहने लगा ॥ ३८ ॥ जैसे मूर्ख मनुष्योंकी धृष्टतापूर्ण उक्तियोंसे अच्छे वक्ताकी वाणी भी मलिन पड़ जाती है वैसे ही मलिन मेघोंसे आच्छादित रहनेके कारण निर्मल चन्द्रमा भी शोभाहीन हो गया ॥ ३९ ॥ |
* एक प्रकारके लाल कीड़े, जो वर्षा-कालमें उत्पन्न होते हैं, उन्हें शक्रगोप और वीरबहूटी कहते हैं।