विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ६ ] * पञ्चम अंश * ३२९
| ततः क्षणेन प्रययुः शकटैर्गोधनैस्तथा।<br>यूथशो वत्सपालाश्च कालयन्तो व्रजौकसः॥ २६<br><br>द्रव्यावयवनिर्द्धूतं क्षणमात्रेण तत्तथा।<br>काकभाससमाकीर्णं व्रजस्थानमभूद्द्विज ॥ २७<br><br>वृन्दावनं भगवता कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>शुभेन मनसा ध्यातं गवां सिद्धिमभीप्सता ॥ २८<br><br>ततस्तत्रातिरूक्षेऽपि घर्मकाले द्विजोत्तम।<br>प्रावृट्काल इवोद्भूतं नवशष्पं समन्ततः॥ २९<br><br>स समावासितः सर्वो व्रजो वृन्दावने ततः।<br>शकटीवाटपर्यन्तश्चन्द्राद्धाकारसंस्थितिः॥ ३०<br><br>वत्सपालौ च संवृत्तौ रामदामोदरौ ततः।<br>एकस्थानस्थितौ गोष्ठे चेरतुर्बाललीलया ॥ ३१<br><br>बर्हिपत्रकृतापीडौ वन्यपुष्पावतंसकौ।<br>गोपवेणुकृतातोद्यपत्रवाद्यकृतस्वनौ ॥ ३२<br><br>काकपक्षधरौ बालौ कुमाराविव पावकौ।<br>हसन्तौ च रमन्तौ च चेरतुः स्म महावनम् ॥ ३३<br><br>क्वचिद्वहन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ तथा परैः।<br>गोपपुत्रैस्समं वत्सांश्चारयन्तौ विचेरतुः॥ ३४<br><br>कालेन गच्छता तौ तु सप्तवर्षौ महाव्रजे।<br>सर्वस्य जगतः पालौ वत्सपालौ बभूवतुः॥ ३५<br><br>प्रावृट्कालस्ततोऽतीवमेघौघस्थगिताम्बरः।<br>बभूव वारिधाराभिरैक्यं कुर्वन्दिशामिव ॥ ३६<br><br>प्ररूढनवशष्पाढ्या शक्रगोपाचिता मही।<br>तथा मारकतीवासीत्पद्मरागविभूषिता॥ ३७<br><br>ऊहुरुन्मार्गवाहीनि निम्नगाम्भांसि सर्वतः।<br>मनांसि दुर्विनीतानां प्राप्य लक्ष्मीं नवामिव ॥ ३८<br><br>न रेजेऽन्तरितश्चन्द्रो निर्मलो मलिनैर्घनैः।<br>सद्वादिवादो मूर्खाणां प्रगल्भाभिरिवोक्तिभिः॥ ३९ | तब वे व्रजवासी वत्सपाल दल बाँधकर एक क्षणमें ही छकड़ों और गौओंके साथ उन्हें हाँकते हुए चल दिये ॥ २६ ॥ हे द्विज ! वस्तुओंके अवशिष्टांशोंसे युक्त वह व्रजभूमि क्षणभरमें ही काक तथा भास आदि पक्षियोंसे व्याप्त हो गयी ॥ २७ ॥<br><br>तब लीलाविहारी भगवान् कृष्णने गौओंकी अभिवृद्धिकी इच्छासे अपने शुद्धचित्तसे वृन्दावन (नित्य-वृन्दावनधाम)-का चिन्तन किया ॥ २८ ॥ इससे, हे द्विजोत्तम ! अत्यन्त रूक्ष ग्रीष्मकालमें भी वहाँ वर्षाऋतुके समान सब ओर नवीन दूब उत्पन्न हो गयी ॥ २९ ॥ तब चारों ओर अर्द्धचन्द्राकारसे छकड़ोंकी बाड़ लगाकर वे समस्त व्रजवासी वृन्दावनमें रहने लगे ॥ ३० ॥<br><br>तदनन्तर राम और कृष्ण भी बछड़ोंके रक्षक हो गये और एक स्थानपर रहकर गोष्ठमें बाललीला करते हुए विचरने लगे ॥ ३१ ॥ वे काकपक्षधारी दोनों बालक सिरपर मयूर-पिच्छका मुकुट धारणकर तथा वन्यपुष्पोंके कर्णभूषण पहन ग्वालोचित वंशी आदिसे सब प्रकारके बाजोंकी ध्वनि करते तथा पत्तोंके बाजेसे ही नाना प्रकारकी ध्वनि निकालते, स्कन्दके अंशभूत शाख-विशाख कुमारोंके समान हँसते और खेलते हुए उस महावनमें विचरने लगे ॥ ३२-३३ ॥ कभी एक-दूसरेको अपने पीठपर ले जाते तथा कभी अन्य ग्वाल-बालोंके साथ खेलते हुए वे बछड़ोंको चराते साथ-साथ घूमते रहते ॥ ३४ ॥ इस प्रकार उस महाव्रजमें रहते-रहते कुछ समय बीतनेपर वे निखिललोकपालक वत्सपाल सात वर्षके हो गये ॥ ३५ ॥<br><br>तब मेघसमूहसे आकाशको आच्छादित करता हुआ तथा अतिशय वारिधाराओंसे दिशाओंको एकरूप करता हुआ वर्षाकाल आया ॥ ३६ ॥ उस समय नवीन दूर्वाके बढ़ जाने और वीरबहूटियोंसे* व्याप्त हो जानेके कारण पृथिवी पद्मरागविभूषिता मरकतमयी-सी जान पड़ने लगी ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार नया धन पाकर दुष्ट पुरुषोंका चित्त उच्छृंखल हो जाता है, उसी प्रकार नदियोंका जल सब ओर अपना निर्दिष्ट मार्ग छोड़कर बहने लगा ॥ ३८ ॥ जैसे मूर्ख मनुष्योंकी धृष्टतापूर्ण उक्तियोंसे अच्छे वक्ताकी वाणी भी मलिन पड़ जाती है वैसे ही मलिन मेघोंसे आच्छादित रहनेके कारण निर्मल चन्द्रमा भी शोभाहीन हो गया ॥ ३९ ॥ |
* एक प्रकारके लाल कीड़े, जो वर्षा-कालमें उत्पन्न होते हैं, उन्हें शक्रगोप और वीरबहूटी कहते हैं।
३३० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निर्गुणेनापि चापेन शक्रस्य गगने पदम्।<br>अवाप्यताविवेकस्य नृपस्येव परिग्रहे॥ ४०<br><br>मेघपृष्ठे बलाकानां रराज विमला ततिः।<br>दुर्वृत्ते वृत्तचेष्टेव कुलीनस्यातिशोभना ॥ ४१<br><br>न बबन्धाम्बरे स्थैर्यं विद्युदत्यन्तचञ्चला।<br>मैत्रीव प्रवरे पुंसि दुर्जनेन प्रयोजिता ॥ ४२<br><br>मार्गा बभूवुरस्पष्टास्तृणशष्पचयावृताः।<br>अर्थान्तरमनुप्राप्ताः प्रजडानामिवोक्तयः ॥ ४३<br><br>उन्मत्तशिखिसारङ्गे तस्मिन्काले महावने।<br>कृष्णरामौ मुदा युक्तौ गोपालैश्चेरतुस्सह ॥ ४४<br><br>क्वचिद्गोभिस्समं रम्यं गेयतानरतावुभौ।<br>चेरतुः क्वचिदत्यर्थं शीतवृक्षतलाश्रितौ ॥ ४५<br><br>क्वचित्कदम्बस्रक्चित्रौ मयूरस्रग्विराजितौ।<br>विलिप्तौ क्वचिदासातां विविधैर्गिरिधातुभिः ॥ ४६<br><br>पर्णशय्यासु संसुप्तौ क्वचिन्निद्रान्तरैषिणौ।<br>क्वचिद्गर्जति जीमूते हाहाकाररवाकुलौ ॥ ४७<br><br>गायतामन्यगोपानां प्रशंसापरमौ क्वचित्।<br>मयूरकेकानुगतौ गोपवेणुप्रवादकौ ॥ ४८<br><br>इति नानाविधैर्भावैरुत्तमप्रीतिसंयुतौ।<br>क्रीडन्तौ तौ वने तस्मिंश्चेरतुस्तुष्टमानसौ ॥ ४९<br><br>विकाले च समं गोभिर्गोपवृन्दसमन्वितौ।<br>विहृत्याथ यथायोगं व्रजमेत्य महाबलौ ॥ ५०<br><br>गोपैस्समानैस्सहितौ क्रीडन्तावमराविव।<br>एवं तावूषतुस्तत्र रामकृष्णौ महाद्युती ॥ ५१ | जिस प्रकार विवेकहीन राजाके संगमें गुणहीन मनुष्य भी प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार आकाशमण्डलमें गुणरहित इन्द्र-धनुष स्थित हो गया ॥ ४० ॥ दुराचारी पुरुषमें कुलीन पुरुषकी निष्कपट शुभ चेष्टाके समान मेघमण्डलमें बगुलोंकी निर्मल पंक्ति सुशोभित होने लगी ॥ ४१ ॥ श्रेष्ठ पुरुषके साथ दुर्जनकी मित्रताके समान अत्यन्त चंचला विद्युत् आकाशमें स्थिर न रह सकी ॥ ४२ ॥ महामूर्ख मनुष्योंकी अन्यार्थिका उक्तियोंके समान मार्ग तृण और दूबसमूहसे आच्छादित होकर अस्पष्ट हो गये ॥ ४३ ॥<br><br>उस समय उन्मत्त मयूर और चातकगणसे सुशोभित महावनमें कृष्ण और राम प्रसन्नतापूर्वक गोपकुमारोंके साथ विचरने लगे ॥ ४४ ॥ वे दोनों कभी गौओंके साथ मनोहर गान और तान छेड़ते तथा कभी अत्यन्त शीतल वृक्षतलका आश्रय लेते हुए विचरते रहते थे ॥ ४५ ॥ वे कभी तो कदम्बपुष्पोंके हारसे विचित्र वेष बना लेते, कभी मयूरपिच्छकी मालासे सुशोभित होते और कभी नाना प्रकारकी पर्वतीय धातुओंसे अपने शरीरको लिप्त कर लेते ॥ ४६ ॥ कभी कुछ झपकी लेनेकी इच्छासे पत्तोंकी शय्यापर लेट जाते और कभी मेघके गर्जनेपर ‘हा-हा’ करके कोलाहल मचाने लगते ॥ ४७ ॥ कभी दूसरे गोपोंके गानेपर आप दोनों उसकी प्रशंसा करते और कभी ग्वालोंकी-सी बाँसुरी बजाते हुए मयूरकी बोलीका अनुकरण करने लगते ॥ ४८ ॥<br><br>इस प्रकार वे दोनों अत्यन्त प्रीतिके साथ नाना प्रकारके भावोंसे परस्पर खेलते हुए प्रसन्नचित्तसे उस वनमें विचरने लगे ॥ ४९ ॥ सायंकालके समय वे महाबली बालक वनमें यथायोग्य विहार करनेके अनन्तर गौ और ग्वाल-बालोंके साथ व्रजमें लौट आते थे ॥ ५० ॥ इस तरह अपने समवयस्क गोपगणके साथ देवताओंके समान क्रीडा करते हुए वे महातेजस्वी राम और कृष्ण वहाँ रहने लगे ॥ ५१ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अ० ७] * पञ्चम अंश * ३३१
सातवाँ अध्याय
कालिय-दमन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| एकदा तु विना रामं कृष्णो वृन्दावनं ययौ।<br>विचचार वृतो गोपैर्वन्यपुष्पस्रगुज्ज्वलः॥ १ | एक दिन रामको बिना साथ लिये कृष्ण अकेले ही वृन्दावनको गये और वहाँ वन्य पुष्पोंकी मालाओंसे सुशोभित हो गोपगणसे घिरे हुए विचरने लगे॥१॥ |
| स जगामाथ कालिन्दीं लोलकल्लोलशालिनीम्।<br>तीरसंलग्नफेनौघैर्हसन्तीमिव सर्वतः॥ २ | घूमते-घूमते वे चंचल तरंगोंसे शोभित यमुनाके तटपर जा पहुँचे जो किनारोंपर फेनके इकट्ठे हो जानेसे मानो सब ओरसे हँस रही थी॥२॥ |
| तस्याञ्चातिमहाभीमं विषाग्निश्रितवारिकम्।<br>ह्रदं कालियनागस्य ददर्शातिविभीषणम्॥ ३ | यमुनाजीमें उन्होंने विषाग्निसे सन्तप्त जलवाला कालियनागका महाभयंकर कुण्ड देखा॥३॥ |
| विषाग्निना प्रसरता दग्धतीरमहीरुहम्।<br>वाताहताम्बुविक्षेपस्पर्शदग्धविहङ्गमम्॥ ४ | उसकी विषाग्तिके प्रसारसे किनारेके वृक्ष जल गये थे और वायुके थपेड़ोंसे उछलते हुए जलकणोंका स्पर्श होनेसे पक्षिगण दग्ध हो जाते थे॥४॥ |
| तमतीव महारौद्रं मृत्युवक्त्रमिवापरम्।<br>विलोक्य चिन्तयामास भगवान्मधुसूदनः॥ ५ | मृत्युके अपर मुखके समान उस महाभयंकर कुण्डको देखकर भगवान् मधुसूदनने विचार किया—॥५॥ |
| अस्मिन्वसति दुष्टात्मा कालियोऽसौ विषायुधः।<br>यो मया निर्जितस्त्यक्त्वा दुष्टो नष्टः पयोनिधिम्॥ ६ | 'इसमें दुष्टात्मा कालियनाग रहता है जिसका विष ही शस्त्र है और जो दुष्ट मुझ [अर्थात् मेरी विभूति गरुड]-से पराजित हो समुद्रको छोड़कर भाग आया है॥६॥ |
| तेनेयं दूषिता सर्वा यमुना सागरङ्गमा।<br>न नैरैर्गोधनैश्चापि तृषार्तैरुपभुज्यते॥ ७ | इसने इस समुद्रगामिनी सम्पूर्ण यमुनाको दूषित कर दिया है, अब इसका जल प्यासे मनुष्यों और गौओंके भी काममें नहीं आता है॥७॥ |
| तदस्य नागराजस्य कर्तव्यो निग्रहो मया।<br>निस्त्रासास्तु सुखं येन चरेयुर्व्रजवासिनः॥ ८ | अतः मुझे इस नागराजका दमन करना चाहिये, जिससे ब्रजवासी लोग निर्भय होकर सुखपूर्वक रह सकें॥८॥ |
| एतदर्थं तु लोकेऽस्मिन्नवतारः कृतो मया।<br>यदेषामुत्पथस्थानां कार्या शान्तिर्दुरात्मनाम्॥ ९ | 'इन कुमार्गगामी दुरात्माओंको शान्त करना चाहिये, इसलिये ही तो मैंने इस लोकमें अवतार लिया है॥९॥ |
| तदेतं नातिदूरस्थं कदम्बमुरुशाखिनम्।<br>अधिरुह्य पतिष्यामि ह्रदेऽस्मिन्ननिलाशिनः॥ १० | अतः अब मैं इस ऊँची-ऊँची शाखाओंवाले पासहीके कदम्बवृक्षपर चढ़कर वायुभक्षी नागराजके कुण्डमें कूदता हूँ'॥१०॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| इत्थं विचिन्त्य बद्ध्वा च गाढं परिकरं ततः।<br>निपपात ह्रदे तत्र नागराजस्य वेगतः॥ ११ | हे मैत्रेय! ऐसा विचारकर भगवान् अपनी कमर कसकर वेगपूर्वक नागराजके कुण्डमें कूद पड़े॥११॥ |
| तेनातिपतता तत्र क्षोभितस्स महाह्रदः।<br>अत्यर्थं दूरजातांस्तु समसिञ्चन्महीरुहान्॥ १२ | उनके कूदनेसे उस महाह्रदने अत्यन्त क्षोभित होकर दूरस्थित वृक्षोंको भी भिगो दिया॥१२॥ |
३३२
* श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० ७
तेऽहिदुष्टविषज्वालातप्ताम्बुपवनोक्षिताः। जज्वलुः पादपास्सद्यो ज्वालाव्याप्तदिगन्तराः॥ १३ आस्फोटयामास तदा कृष्णो नागह्रदे भुजम्। तच्छब्दश्रवणाच्चाशु नागराजोऽभ्युपागमत्॥ १४ आताम्रनयनः कोपाद्विषज्वालाकुलैर्मुखैः। वृतो महाविषैश्चान्यैरुरगैरनिलाशनैः॥ १५ नागपत्न्यश्च शतशो हारिहारोपशोभिताः। प्रकम्पिततनुक्षेपचलत्कुण्डलकान्तयः॥ १६ ततः प्रवेष्टितस्सपैस्स कृष्णो भोगबन्धनैः। ददंशुस्तेऽपि तं कृष्णं विषज्वालाकुलैर्मुखैः॥ १७ तं तत्र पतितं दृष्ट्वा सर्पभोगैर्निपीडितम्। गोपा व्रजमुपागम्य चुक्रुशुः शोकलालसाः॥ १८
गोपा ऊचुः
एष मोहं गतः कृष्णो मग्नो वै कालियह्रदे। भक्ष्यते नागराजेन तमागच्छत पश्यत॥ १९ तच्छ्रुत्वा तत्र ते गोपा वज्रपातोपमं वचः। गोप्यश्च त्वरिता जग्मुर्यशोदाप्रमुखा ह्रदम्॥ २० हा हा क्वासौविति जनो गोपीनामतिविह्वलः। यशोदया समं भ्रान्तो द्रुतप्रस्खलितं ययौ॥ २१ नन्दगोपश्श्च गोपाश्च रामश्चाद्भुतविक्रमः। त्वरितं यमुनां जग्मुः कृष्णदर्शनलालसाः॥ २२ ददृशुश्चापि ते तत्र सर्पराजवशंगतम्। निष्प्रयत्नीकृतं कृष्णं सर्पभोगविवेष्टितम्॥ २३ नन्दगोपोऽपि निश्चेष्टो न्यस्य पुत्रमुखे दृशम्। यशोदा च महाभागा बभूव मुनिसत्तम॥ २४ गोप्यस्त्वन्या रुदन्त्यश्च ददृशुः शोककातराः। प्रोचुश्च केशवं प्रीत्या भयकातर्यगद्गदम्॥ २५
गोप्य ऊचुः
सर्वा यशोदया सार्धं विशामोऽत्र महाह्रदम्। सर्पराजस्य नो गन्तुमस्माभिर्युज्यते व्रजम्॥ २६ दिवसः को विना सूर्यं विना चन्द्रेण का निशा। विना वृषेण का गावो विना कृष्णेन को व्रजः॥ २७
उस सर्पके विषम विषकी ज्वालासे तपे हुए जलसे भीगनेके कारण वे वृक्ष तुरन्त ही जल उठे और उनकी ज्वालाओंसे सम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हो गयीं ॥ १३॥
तब कृष्णचन्द्रने उस नागकुण्डमें अपनी भुजाओंको ठोंका; उनका शब्द सुनते ही वह नागराज तुरंत उनके सम्मुख आ गया॥ १४॥ उसके नेत्र क्रोधसे कुछ ताम्रवर्ण हो रहे थे, मुखोंसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं और वह महाविषैले अन्य वायुभक्षी सर्पोंसे घिरा हुआ था॥ १५॥ उसके साथमें मनोहर हारोंसे भूषिता और शरीर-कम्पनसे हिलते हुए कुण्डलोंकी कान्तिसे सुशोभिता सैकड़ों नागपत्नयाँ थीं॥ १६॥ तब सर्पोंने कुण्डलाकार होकर कृष्णचन्द्रको अपने शरीरसे बाँध लिया और अपने विषाग्नि-सन्तप्त मुखोंसे काटने लगे॥ १७॥
तदनन्तर गोपगण कृष्णचन्द्रको नागकुण्डमें गिरा हुआ और सर्पोंके फणोंसे पीडित होता देख व्रजमें चले आये और शोकसे व्याकुल होकर रोने लगे॥ १८॥
**गोपगण बोले—**आओ, आओ, देखो! यह कृष्ण कालीदहमें डूबकर मूर्च्छित हो गया है, देखो इसे नागराज खाये जाता है॥ १९॥ वज्रपातके समान उनके इन अमंगल वाक्योंको सुनकर गोपगण और यशोदा आदि गोपियाँ तुरंत ही कालीदहपर दौड़ आयीं॥ २०॥ 'हाय! हाय! वे कृष्ण कहाँ गये?' इस प्रकार अत्यन्त व्याकुलतापूर्वक रोती हुई गोपियाँ यशोदाके साथ शीघ्रतासे गिरती-पड़ती चलीं॥ २१॥ नन्दजी तथा अन्यान्य गोपगण और अद्भुत-विक्रमशाली बलरामजी भी कृष्णदर्शनकी लालसासे शीघ्रतापूर्वक यमुना-तटपर आये॥ २२॥
वहाँ आकर उन्होंने देखा कि कृष्णचन्द्र सर्पराजके चंगुलमें फँसे हुए हैं और उसने उन्हें अपने शरीरसे लपेटकर निरुपाय कर दिया है॥ २३॥ हे मुनिसत्तम! महाभागा यशोदा और नन्दगोप भी पुत्रके मुखपर टकटकी लगाकर चेष्टाशून्य हो गये॥ २४॥ अन्य गोपियोंने भी जब कृष्णचन्द्रको इस दशामें देखा तो वे शोकाकुल होकर रोने लगीं और भय तथा व्याकुलताके कारण गद्गदवाणीसे उनसे प्रीतिपूर्वक कहने लगीं॥ २५॥
**गोपियाँ बोलीं—**अब हम सब भी यशोदाके साथ इस सर्पराजके महाकुण्डमें ही डूबी जाती हैं, अब हमें व्रजमें जाना उचित नहीं है॥ २६॥ सूर्यके बिना दिन कैसा? चन्द्रमाके बिना रात्रि कैसी? साँड़के बिना गौएँ क्या? ऐसे ही कृष्णके बिना व्रजमें भी क्या रखा है?॥ २७॥
अ० ७ ] * पञ्चम अंश * ३३३
विनाकृता न यास्यामः कृष्णेनानेन गोकुलम्।
अरम्यं नातिसेव्यं च वारिहीनं यथा सरः॥ २८
यत्र नेन्दीवरदलश्यामकान्तिरयं हरिः।
तेनापि मातृर्वासेन रतिरस्तीति विस्मयः॥ २९
उत्फुल्लपङ्कजदलस्पष्टकान्तिविलोचनम्।
अपश्यन्त्यो हरिं दीनाः कथं गोष्ठे भविष्यथ॥ ३०
अत्यन्तमधुरालापहृताशेषमनोरथम् ।
न विना पुण्डरीकाक्षं यास्यामो नन्दगोकुलम्॥ ३१
भोगेनावेष्टितस्यापि सर्पराजस्य पश्यत ।
स्मितशोभि मुखं गोप्यः कृष्णस्यास्मद्विलोकने॥ ३२
श्रीपराशर उवाच
इति गोपीवचः श्रुत्वा रौहिणेयो महाबलः।
गोपांश्च त्रासविधुरान्विलोक्य स्तिमितेक्षणान्॥ ३३
नन्दं च दीनमत्यर्थं न्यस्तदृष्टिं सुतानने।
मूर्च्छाकुलां यशोदां च कृष्णामाहात्मसंज्ञया॥ ३४
किमिदं देवदेवेश भावोऽयं मानुषस्त्वया।
व्यज्यतेऽत्यन्तमात्मानं किमनन्तं न वेत्सि यत्॥ ३५
त्वमेव जगतो नाभिरराणामिव संश्रयः।
कर्त्तापहर्त्ता पाता च त्रैलोक्यं त्वं त्रयीमयः॥ ३६
सेन्द्रै रुद्राग्निवसुभिरादित्यैर्मरुदश्विभिः।
चिन्त्यसे त्वमचिन्त्यात्मन् समस्तैश्चैव योगिभिः॥ ३७
जगत्यर्थं जगन्नाथ भारावतरणेच्छया।
अवतीर्णोऽसि मर्त्येषु तवांशश्चाहमग्रजः॥ ३८
मनुष्यलीलां भगवन् भजता भवता सुराः।
विडम्बयन्तस्तवलीलां सर्व एव सहासते॥ ३९
अवतार्य भवान्पूर्वं गोकुले तु सुराङ्गनाः।
क्रीडार्थमात्मनः पश्चादवतीर्णोऽसि शाश्वत॥ ४०
अत्रावतीर्णयोः कृष्ण गोपा एव हि बान्धवाः।
गोप्यश्च सीदतः कस्मादेतान्बन्धूनुपेक्षसे॥ ४१
दर्शितो मानुषो भावो दर्शितं बालचापलम्।
तदयं दम्यतां कृष्ण दुष्टात्मा दशनायुधः॥ ४२
कृष्णके बिना साथ लिये अब हम गोकुल नहीं जायँगी; क्योंकि इनके बिना वह जलहीन सरोवरके समान अत्यन्त अभव्य और असेव्य है॥ २८॥ जहाँ नीलकमलदलकी-सी आभावाले ये श्यामसुन्दर हरि नहीं हैं उस मातृ-मन्दिरसे भी प्रीति होना अत्यन्त आश्चर्य ही है॥ २९॥ अरी! खिले हुए कमलदलके सदृश कान्तियुक्त नेत्रोंवाले श्रीहरिको देखे बिना अत्यन्त दीन हुई तुम किस प्रकार व्रजमें रह सकोगी? ॥ ३०॥ जिन्होंने अपनी अत्यन्त मनोहर बोलीसे हमारे सम्पूर्ण मनोरथोंको अपने वशीभूत कर लिया है, उन कमलनयन कृष्णचन्द्रके बिना हम नन्दजीके गोकुलको नहीं जायँगी॥ ३१॥ अरी गोपियो! देखो, सर्पराजके फणसे आवृत होकर भी श्रीकृष्णका मुख हमें देखकर मधुर मुसकानसे सुशोभित हो रहा है॥ ३२॥
श्रीपराशरजी बोले— गोपियोंके ऐसे वचन सुनकर तथा त्रासविह्वल चकितनेत्र गोपोंको, पुत्रके मुखपर दृष्टि लगाये अत्यन्त दीन नन्दजीको और मूर्च्छाकुल यशोदाको देखकर महाबली रोहिणीनन्दन बलरामजीने अपने संकेतमें कृष्णजीसे कहा—॥ ३३-३४॥ "हे देवदेवेश्वर! क्या आप अपनेको अनन्त नहीं जानते? फिर किसलिये यह अत्यन्त मानव भाव व्यक्त कर रहे हैं॥ ३५॥ पहियोंकी नाभि जिस प्रकार अरोंका आश्रय होती है उसी प्रकार आप ही जगत्के आश्रय, कर्त्ता, हर्ता और रक्षक हैं तथा आप ही त्रैलोक्यस्वरूप और वेदत्रयीमय हैं॥ ३६॥ हे अचिन्त्यात्मन्! इन्द्र, रुद्र, अग्नि, वसु, आदित्य, मरुद्गण और अश्विनीकुमार तथा समस्त योगिजन आपहीका चिन्तन करते हैं॥ ३७॥ हे जगन्नाथ ! संसारके हितके लिये पृथिवीका भार उतारनेकी इच्छासे ही आपने मर्त्यलोकमें अवतार लिया है; आपका अग्रज मैं भी आपहीका अंश हूँ॥ ३८॥ हे भगवन्! आपके मनुष्य-लीला करनेपर ये गोपवेषधारी समस्त देवगण भी आपकी लीलाओंका अनुकरण करते हुए आपहीके साथ रहते हैं॥ ३९॥ हे शाश्वत ! पहले अपने विहारार्थ देवांगनाओंको गोपीरूपसे गोकुलमें अवतीर्णकर पीछे आपने अवतार लिया है॥ ४०॥ हे कृष्ण! यहाँ अवतीर्ण होनेपर हम दोनोंके तो ये गोप और गोपियाँ ही बान्धव हैं; फिर अपने इन दुःखी बान्धवोंकी आप क्यों उपेक्षा करते हैं॥ ४१॥ हे कृष्ण! यह मनुष्यभाव और बालचापल्य तो आप बहुत दिखा चुके, अब तो शीघ्र ही इस दुष्टात्माका जिसके शस्त्र दाँत ही हैं, दमन कीजिये"॥ ४२॥
३३४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर, मधुर मुसकानसे अपने ओष्ठसम्पुटको खोलते हुए श्रीकृष्णचन्द्रने उछलकर अपने शरीरको सर्पके बन्धनसे छुड़ा लिया ॥ ४३ ॥ और फिर अपने दोनों हाथोंसे उसका बीचका फण झुकाकर उस नतमस्तक सर्पके ऊपर चढ़कर बड़े वेगसे नाचने लगे ॥ ४४ ॥ |
|---|---|
| इति संस्मारितः कृष्णः स्मितभिन्नोष्ठसम्पुटः ।<br>आस्फोट्य मोचयामास स्वदेहं भोगिबन्धनात् ॥ ४३ | |
| आनम्य चापि हस्ताभ्यामुभाभ्यां मध्यमं शिरः ।<br>आरुह्याभुग्नशिरसः प्रननर्त्तोरुविक्रमः ॥ ४४ | |
| प्राणाः फणेऽभवंश्चास्य कृष्णास्याङ्घ्रिनिकुट्टनैः ।<br>यत्रोन्नतिं च कुरुते ननामास्य ततशिरः ॥ ४५ | कृष्णचन्द्रके चरणोंकी धमकसे उसके प्राण मुखमें आ गये, वह अपने जिस मस्तकको उठाता उसीपर कूदकर भगवान् उसे झुका देते ॥ ४५ ॥ श्रीकृष्णचन्द्रजीकी भ्रान्ति (भ्रम), रेचक तथा दण्डपात नामकी [नृत्यसम्बन्धिनी] गतियोंके ताडनसे वह महासर्प मूर्च्छित हो गया और उसने बहुत-सा रुधिर वमन किया ॥ ४६ ॥ इस प्रकार उसके सिर और ग्रीवाओंको झुके हुए तथा मुखोंसे रुधिर बहता देख उसकी पत्नियाँ करुणासे भरकर श्रीकृष्णचन्द्रके पास आयीं ॥ ४७ ॥ |
| मूर्च्छांमुपाययौ भ्रान्त्या नागः कृष्णस्य रेचकैः ।<br>दण्डपातनिपातेन ववाम रुधिरं बहु ॥ ४६ | |
| तं विभुग्नशिरोग्रीवमास्येभ्यःस्रुतशोणितम् ।<br>विलोक्यं करुणं जग्मुस्तत्पत्न्यो मधुसूदनम् ॥ ४७ | |
| नागपत्न्य ऊचुः | नागपत्नयाँ बोलीं—हे देवदेवेश्वर ! हमने आपको पहचान लिया; आप सर्वज्ञ और सर्वश्रेष्ठ हैं, जो अचिन्त्य और परम ज्योति है आप उसीके अंश परमेश्वर हैं ॥ ४८ ॥ जिन स्वयम्भू और व्यापक प्रभुकी स्तुति करनेमें देवगण भी समर्थ नहीं हैं उन्हीं आपके स्वरूपका हम स्त्रियाँ किस प्रकार वर्णन कर सकती हैं ? ॥ ४९ ॥ पृथिवी, आकाश, जल, अग्नि और वायुस्वरूप यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनका छोटे-से-छोटा अंश है, उसकी स्तुति हम किस प्रकार कर सकेंगी ॥ ५० ॥ योगिजन जिनके नित्यस्वरूपको यत्न करनेपर भी नहीं जान पाते तथा जो परमार्थरूप अणुसे भी अणु और स्थूलसे भी स्थूल है उसे हम नमस्कार करती हैं ॥ ५१ ॥ जिनके जन्ममें विधाता और अन्तमें काल हेतु नहीं हैं तथा जिनका स्थितिकर्ता भी कोई अन्य नहीं है उन्हें सर्वदा नमस्कार करती हैं ॥ ५२ ॥ इस कालियनागके दमनमें आपको थोड़ा-सा भी क्रोध नहीं है, केवल लोकरक्षा ही इसका हेतु है; अतः हमारा निवेदन सुनिये ॥ ५३ ॥ हे क्षमाशीलोंमें श्रेष्ठ ! साधु पुरुषोंको स्त्रियों तथा मूढ़ और दीन जन्तुओंपर सदा ही कृपा करनी चाहिये; अतः आप इस दीनका अपराध क्षमा कीजिये ॥ ५४ ॥ प्रभो ! आप सम्पूर्ण संसारके अधिष्ठान हैं और यह सर्प तो [आपकी अपेक्षा] अत्यन्त बलहीन है। आपके चरणोंसे पीड़ित होकर तो यह आधे मुहूर्तमें ही अपने प्राण छोड़ देगा ॥ ५५ ॥<br>हे अव्यय ! प्रीति समानसे और द्वेष उत्कृष्टसे देखे जाते हैं; फिर कहाँ तो यह अल्पवीर्य सर्प और कहाँ |
| ज्ञातोऽसि देवदेवेश सर्वज्ञस्त्वमनुत्तमः ।<br>परं ज्योतिरचिन्त्यं यत्तदंशः परमेश्वरः ॥ ४८ | |
| न समर्थाः सुरास्तोतुं यमनन्यभवं विभुम् ।<br>स्वरूपवर्णनं तस्य कथं योषित्करिष्यति ॥ ४९ | |
| यस्याखिलमहीव्योमजलाग्निपवनात्मकम् ।<br>ब्रह्माण्डमल्पकाल्पांशः स्तोष्यामस्तं कथं वयम् ॥ ५० | |
| यतन्तो न विदुर्न्नित्यं यत्स्वरूपं हि योगिनः ।<br>परमार्थमणोरल्पं स्थूलात्स्थूलं नताः स्म तम् ॥ ५१ | |
| न यस्य जन्मने धाता यस्य चान्ताय नान्तकः ।<br>स्थितिकर्त्ता न चान्योऽस्ति यस्य तस्मै नमस्सदा ॥ ५२ | |
| कोपः स्वल्पोऽपि ते नास्ति स्थितिपालनमेव ते ।<br>कारणं कालियस्यास्य दमने श्रूयतां वचः ॥ ५३ | |
| स्त्रियोऽनुकम्प्यास्साधूनां मूढा दीनाश्च जन्तवः ।<br>यतस्ततोऽस्य दीनस्य क्षम्यतां क्षमतां वर ॥ ५४ | |
| समस्तजगदाधारो भवानल्पबलः फणी ।<br>त्वत्पादपीडितो जह्यान्मुहूर्त्ताद्र्द्धेन जीवितम् ॥ ५५ | |
| क्व पन्नगोऽल्पवीर्योऽयं क्व भवान्भुवनाश्रयः ।<br>प्रीतिद्वेषौ समोत्कृष्टगोचरौ भवतोऽव्यय ॥ ५६ |
अ० ७ ] * पञ्चम अंश * ३३५
ततः कुरु जगत्स्वामिन्प्रसादमवसीदतः । प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षा प्रदीयताम् ॥ ५७
भुवनेश जगन्नाथ महापुरुष पूर्वज । प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षां प्रयच्छ नः ॥ ५८
वेदान्तवेद्य देवेश दुष्टदैत्यनिबर्हण । प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षा प्रदीयताम् ॥ ५९
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ते ताभिराश्वस्य क्लान्तदेहोऽपि पन्नगः । प्रसीद देवदेवेति प्राह वाक्यं शनैः शनैः ॥ ६०
कालिय उवाच
तवाष्टगुणमैश्वर्यं नाथ स्वाभाविकं परम् । निरस्तातिशयं यस्य तस्य स्तोष्यामि किन्वहम् ॥ ६१
त्वं परस्त्वं परस्याद्यः परं त्वत्तः परात्मक । परस्मात्परमो यस्त्वं तस्य स्तोष्यामि किन्वहम् ॥ ६२
यस्माद्ब्रह्मा च रुद्रश्च चन्द्रेन्द्रमरुदश्विनः । वसवश्च सहादित्यैस्तस्य स्तोष्यामि किन्वहम् ॥ ६३
एकावयवसूक्ष्मांशो यस्यैतदखिलं जगत् । कल्पनावयवश्यांशस्तस्य स्तोष्यामि किन्वहम् ॥ ६४
सदसद्रूपिणो यस्य ब्रह्माद्यास्त्रिदशेश्वराः । परमार्थं न जानन्ति तस्य स्तोष्यामि किन्वहम् ॥ ६५
ब्रह्माद्यैरर्चितो यस्तु गन्धपुष्पानुलेपनैः । नन्दनादिसमुद्भूतैस्सोऽर्च्यते वा कथं मया ॥ ६६
यस्यावताररूपाणि देवराजस्सदार्चति । न वेत्ति परमं रूपं सोऽर्च्यते वा कथं मया ॥ ६७
विषयेभ्यस्समावृत्य सर्वाक्षाणि च योगिनः । यमर्चयन्ति ध्यानेन सोऽर्च्यते वा कथं मया ॥ ६८
हृदि संकल्प्य यद्रूपं ध्यानेनार्चन्ति योगिनः । भावपुष्पादिना नाथः सोऽर्च्यते वा कथं मया ॥ ६९
सोऽहं ते देवदेवेश नार्चनादौ स्तुतौ न च । सामर्थ्यवान् कृपामात्रमनोवृत्तिः प्रसीद मे ॥ ७०
अखिलभुवनाश्रय आप? [इसके साथ आपका द्वेष कैसा ?] ॥ ५६ ॥ अतः हे जगत्स्वामिन्! इस दीनपर दया कीजिये। हे प्रभो! अब यह नाग अपने प्राण छोड़ने ही चाहता है; कृपया हमें पतिकी भिक्षा दीजिये ॥ ५७ ॥ हे भुवनेश्वर ! हे जगन्नाथ ! हे महापुरुष ! हे पूर्वज ! यह नाग अब अपने प्राण छोड़ना ही चाहता है; कृपया आप हमें पतिकी भिक्षा दीजिये ॥ ५८ ॥ हे वेदान्तवेद्यदेवेश्वर ! हे दुष्ट-दैत्य-दलन !! अब यह नाग अपने प्राण छोड़ना ही चाहता है; आप हमें पतिकी भिक्षा दीजिये ॥ ५९ ॥
श्रीपराशरजी बोले— नागपत्नियोंके ऐसा कहनेपर थका-मांदा होनेपर भी नागराज कुछ ढाँढस बाँधकर धीरे-धीरे कहने लगा "हे देवदेव! प्रसन्न होइये" ॥ ६० ॥
कालियनाग बोला— हे नाथ! आपका स्वाभाविक अष्टगुण विशिष्ट परम ऐश्वर्य निरतिशय है [अर्थात् आपसे बढ़कर किसीका भी ऐश्वर्य नहीं है], अतः मैं किस प्रकार आपकी स्तुति कर सकूँगा ? ॥ ६१ ॥ आप पर हैं, आप पर (मूलप्रकृति)-के भी आदिकारण हैं, हे परात्मक! परकी प्रवृत्ति भी आपहीसे हुई है, अतः आप परसे भी पर हैं फिर मैं किस प्रकार आपकी स्तुति कर सकूँगा ? ॥ ६२ ॥ जिनसे ब्रह्मा, रुद्र, चन्द्र, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, वसुगण और आदित्य आदि सभी उत्पन्न हुए हैं उन आपकी मैं किस प्रकार स्तुति कर सकूँगा ? ॥ ६३ ॥ यह सम्पूर्ण जगत् जिनके काल्पनिक अवयवका एक सूक्ष्म अवयवांशमात्र है, उन आपकी मैं किस प्रकार स्तुति कर सकूँगा ? ॥ ६४ ॥ जिन सदसत् (कार्य-कारण) स्वरूपके वास्तविक रूपको ब्रह्मा आदि देवेश्वरगण भी नहीं जानते उन आपकी मैं किस प्रकार स्तुति कर सकूँगा ? ॥ ६५ ॥ जिनकी पूजा ब्रह्मा आदि देवगण नन्दनवनके पुष्प, गन्ध और अनुलेपन आदिसे करते हैं उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर सकता हूँ ॥ ६६ ॥ देवराज इन्द्र जिनके अवताररूपोंकी सर्वदा पूजा करते हैं तथापि यथार्थ रूपको नहीं जान पाते, उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर सकता हूँ ? ॥ ६७ ॥ योगिगण अपनी समस्त इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे खींचकर जिनका ध्यानद्वारा पूजन करते हैं, उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर सकता हूँ ॥ ६८ ॥ जिन प्रभुके स्वरूपकी चित्तमें भावना करके योगिजन भावमय पुष्प आदिसे ध्यानद्वारा उपासना करते हैं उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर सकता हूँ ? ॥ ६९ ॥
हे देवेश्वर ! आपकी पूजा अथवा स्तुति करनेमें मैं
| ३३६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ७ |
|---|
सर्पजातिरियं क्रूरा यस्यां जातोऽस्मि केशव।
तत्स्वभावोऽयमत्रास्ति नापराधो ममाच्युत ॥ ७१
सृज्यते भवता सर्वं तथा संह्रियते जगत्।
जातिरूपस्वभावाश्च सृज्यन्ते सृजता त्वया ॥ ७२
यथाहं भवता सृष्टो जात्या रूपेण चेश्वर।
स्वभावेन च संयुक्तस्तथेदं चेष्टितं मया ॥ ७३
यद्यन्यथा प्रवर्तेयं देवदेव ततो मयि।
न्याय्यो दण्डनिपातो वै तवैव वचनं यथा ॥ ७४
तथाप्यज्ञे जगत्स्वामिन्दण्डं पातितवान्मयि।
स श्लाघ्योऽयं परो दण्डस्त्वत्तो मे नान्यतो वरः ॥ ७५
हतवीर्यो हतविषो दमितोऽहं त्वयाच्युत।
जीवितं दीयतामेकमाज्ञापय करोमि किम् ॥ ७६
श्रीभगवानुवाच
नात्र स्थेयं त्वया सर्प कदाचिद्यमुनाजले।
सपुत्रपरिवारस्त्वं समुद्रसलिलं व्रज ॥ ७७
मत्पदानि च ते सर्प दृष्ट्वा मूर्द्धनि सागरे।
गरुडः पन्नगरिपुस्त्वयि न प्रहरिष्यति ॥ ७८
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा सर्पराजं तं मुमोच भगवान्हरिः।
प्रणम्य सोऽपि कृष्णाय जगाम पयसां निधिम् ॥ ७९
पश्यतां सर्वभूतानां सभृत्यसुतबान्धवः।
समस्तभार्यासहितः परित्यज्य स्वकं ह्रदम् ॥ ८०
गते सर्पे परिष्वज्य मृतं पुनरिवागतम्।
गोपा मूर्द्धनि हार्देन सिषिचुर्नेत्रजैर्जलैः ॥ ८१
कृष्णमक्लिष्टकर्माणमन्ये विस्मितचेतसः।
तुष्टुवुर्मुदिता गोपा दृष्ट्वा शिवजलां नदीम् ॥ ८२
गीयमानः स गोपीभिश्चरितैस्साधुचेष्टितैः।
संस्तूयमानो गोपैश्च कृष्णो व्रजमुपागमत् ॥ ८३
सर्वथा असमर्थ हूँ, मेरी चित्तवृत्ति तो केवल आपकी कृपाकी ओर ही लगी हुई है, अतः आप मुझपर प्रसन्न होइये ॥ ७० ॥ हे केशव ! मेरा जिसमें जन्म हुआ है वह सर्पजाति अत्यन्त क्रूर होती है, यह मेरा जातीय स्वभाव है। हे अच्युत ! इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है ॥ ७१ ॥ इस सम्पूर्ण जगत्की रचना और संहार आप ही करते हैं। संसारकी रचनाके साथ उसके जाति, रूप और स्वभावोंको भी आप ही बनाते हैं ॥ ७२ ॥
हे ईश्वर ! आपने मुझे जाति, रूप और स्वभावसे युक्त करके जैसा बनाया है उसीके अनुसार मैंने यह चेष्टा भी की है ॥ ७३ ॥ हे देवदेव ! यदि मेरा आचरण विपरीत हो तब तो अवश्य आपके कथनानुसार मुझे दण्ड देना उचित है ॥ ७४ ॥ तथापि हे जगत्स्वामिन् ! आपने मुझ अज्ञको जो दण्ड दिया है वह आपसे मिला हुआ दण्ड मेरे लिये कहीं अच्छा है, किन्तु दूसरेका वर भी अच्छा नहीं ॥ ७५ ॥ हे अच्युत ! आपने मेरे पुरुषार्थ और विषको नष्ट करके मेरा भली प्रकार मानमर्दन कर दिया है। अब केवल मुझे प्राणदान दीजिये और आज्ञा कीजिये कि मैं क्या करूँ ? ॥ ७६ ॥
श्रीभगवान् बोले— हे सर्प ! अब तुझे इस यमुनाजलमें नहीं रहना चाहिये। तू शीघ्र ही अपने पुत्र और परिवारके सहित समुद्रके जलमें चला जा ॥ ७७ ॥ तेरे मस्तकपर मेरे चरण-चिह्नोंको देखकर समुद्रमें रहते हुए भी सर्पोंका शत्रु गरुड तुझपर प्रहार नहीं करेगा ॥ ७८ ॥
श्रीपराशरजी बोले— सर्पराज कालियसे ऐसा कह भगवान् हरिने उसे छोड़ दिया और वह उन्हें प्रणाम करके समस्त प्राणियोंके देखते-देखते अपने सेवक, पुत्र, बन्धु और स्त्रियोंके सहित अपने उस कुण्डको छोड़कर समुद्रको चला गया ॥ ७९-८० ॥ सर्पके चले जानेपर गोपगण, लौटे हुए मृत पुरुषके समान कृष्णचन्द्रको आलिंगनकर प्रीतिपूर्वक उनके मस्तकको नेत्रजलसे भिगोने लगे ॥ ८१ ॥ कुछ अन्य गोपगण यमुनाको स्वच्छ जलवाली देख प्रसन्न होकर लीलाविहारी कृष्णचन्द्रकी विस्मितचित्तसे स्तुति करने लगे ॥ ८२ ॥ तदनन्तर अपने उत्तम चरित्रोंके कारण गोपियोंसे गीयमान और गोपोंसे प्रशंसित होते हुए कृष्णचन्द्र व्रजमें चले आये ॥ ८३ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अ० ८ ] * पञ्चम अंश * ३३७
आठवाँ अध्याय
धेनुकासुर-वध
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| गाः पालयन्तौ च पुनः सहितौ बलकेशवौ।<br>भ्रममाणौ वने तस्मिन् रम्यं तालवनं गतौ ॥ १ | एक दिन बलराम और कृष्ण साथ-साथ गौ चराते अति रमणीय तालवनमें आये॥ १॥ |
| तत्तु तालवनं दिव्यं धेनुको नाम दानवः।<br>मृगमांसकृताहारः सदाध्यास्ते खराकृतिः ॥ २ | उस दिव्य तालवनमें धेनुक नामक एक गधेके आकारवाला दैत्य मृगमांसका आहार करता हुआ सदा रहा करता था॥ २॥ |
| तत्तु तालवनं पक्वफलसम्पत्समन्वितम्।<br>दृष्ट्वा स्पृहान्विता गोपाः फलादानेऽब्रुवन्वचः ॥ ३ | उस तालवनको पके फलोंकी सम्पत्तिसे सम्पन्न देखकर उन्हें तोड़नेकी इच्छासे गोपगण बोले॥ ३॥ |
| गोपा ऊचुः | गोपोंने कहा— |
| हे राम हे कृष्ण सदा धेनुकेनैष रक्ष्यते।<br>भूप्रदेशो यतस्तस्मात्पक्वानीमानि सन्ति वै ॥ ४ | भैया राम और कृष्ण! इस भूमिप्रदेशकी रक्षा सदा धेनुकासुर करता है, इसीलिये यहाँ ऐसे पके-पके फल लगे हुए हैं॥ ४॥ |
| फलानि पश्य तालानां गन्धामोदितदींशि वै।<br>वयमेतान्यभीप्सामः पात्यन्तां यदि रोचते ॥ ५ | अपनी गन्धसे सम्पूर्ण दिशाओंको आमोदित करनेवाले ये ताल-फल तो देखो; हमें इन्हें खानेकी इच्छा है; यदि आपको अच्छा लगे तो [थोड़े-से] झाड़ दीजिये॥ ५॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| इति गोपकुमाराणां श्रुत्वा संकर्षणो वचः।<br>एतत्कर्त्तव्यमित्युक्त्वा पातयामास तानि वै।<br>कृष्णश्च पातयामास भुवि तानि फलानि वै ॥ ६ | गोपकुमारोंके ये वचन सुनकर बलरामजीने 'ऐसा ही करना चाहिये' यह कहकर फल गिरा दिये और पीछे कुछ फल कृष्णचन्द्रने भी पृथिवीपर गिराये॥ ६॥ |
| फलानां पततां शब्दमाकर्ण्य सुदुरासदः।<br>आजगाम स दुष्टात्मा कोपादैतेयगर्दभः ॥ ७ | गिरते हुए फलोंका शब्द सुनकर वह दुर्धर्ष और दुरात्मा गर्दभासुर क्रोधपूर्वक दौड़ आया |
| पद्भ्यामुभाभ्यां स तदा पश्चिमाभ्यां बलं बली।<br>जघानोरसि ताभ्यां च स च तेनाभ्यगृह्यत ॥ ८ | और उस महाबलवान् असुरने अपने पिछले दो पैरोंसे बलरामजीकी छातीमें लात मारी। बलरामजीने उसके उन पैरोंको पकड़ लिया और आकाशमें घुमाने लगे। |
| गृहीत्वा भ्रामयामास सोऽम्बरे गतजीवितम्।<br>तस्मिन्नेव स चिक्षेप वेगेन तृणराजनि ॥ ९ | जब वह निर्जीव हो गया तो उसे अत्यन्त वेगसे उस तालवृक्षपर ही दे मारा॥ ७—९॥ |
| ततः फलान्यनेकानि तालाग्रान्निपतन्खरः।<br>पृथिव्यां पातयामास महावातो घनानिव ॥ १० | उस गधेने गिरते-गिरते उस तालवृक्षसे बहुत-से फल इस प्रकार गिरा दिये जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको गिरा दे॥ १०॥ |
| अन्यांश्च सजातीयानागतान्र्दैत्यगर्दभान्।<br>कृष्णश्चिक्षेप तालाग्रे बलभद्रश्च लीलया ॥ ११ | उसके सजातीय अन्य गर्दभासुरोंके आनेपर भी कृष्ण और रामने उन्हें अनायास ही तालवृक्षोंपर पटक दिया॥ ११॥ |
| क्षणेनालङ्कृता पृथ्वी पक्ववैस्तालफलैस्तदा।<br>दैत्यगर्दभदेहैश्र्च मैत्रेय शुशुभेऽधिकम् ॥ १२ | हे मैत्रेय! इस प्रकार एक क्षणमें ही पके हुए तालफलों और गर्दभासुरोंके देहोंसे विभूषिता होकर पृथिवी अत्यन्त सुशोभित होने लगी॥ १२॥ |
| ततो गावो निराबाधास्तस्मिंस्तालवने द्विज।<br>नवशष्पं सुखं चेरुर्यन्न भुक्तमभूत्पुरा ॥ १३ | हे द्विज! तबसे उस तालवनमें गौएँ निर्विघ्न होकर सुखपूर्वक नवीन तृण चरने लगीं जो उन्हें पहले कभी चरनेको नसीब नहीं हुआ था॥ १३॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
३३८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ९
नवाँ अध्याय प्रलम्ब-वध
| श्रीपराशर उवाच | |
|---|---|
| तस्मिन् रासभदैतेये सानुगे विनिपातिते।<br>सौम्यं तद्गोपगोपीनां रम्यं तालवनं बभौ॥ १ | **श्रीपराशरजी बोले—**अपने अनुचरोंसहित उस गर्दभासुरके मारे जानेपर वह सुरम्य तालवन गोप और गोपियोंके लिये सुखदायक हो गया॥ १॥ |
| ततस्तौ जातहर्षौ तु वसुदेवसुतावुभौ।<br>हत्वा धेनुकदैतेयं भाण्डीरवटमागतौ॥ २ | तदनन्तर धेनुकासुरको मारकर वे दोनों वसुदेवपुत्र प्रसन्नमनसे भाण्डीर नामक वटवृक्षके तले आये॥ २॥ |
| क्ष्वेलमानौ प्रगायन्तौ विचिन्वन्तौ च पादपान्।<br>चारयन्तौ च गा दूरे व्याहरन्तौ च नामभिः॥ ३ | कन्धेपर गौ बाँधनेकी रस्सी डाले और वनमालासे विभूषित हुए वे दोनों महात्मा बालक सिंहनाद करते, गाते, वृक्षोंपर चढ़ते, दूरतक गौएँ चराते तथा उनका नाम ले-लेकर पुकारते हुए नये सींगोंवाले बछड़ोंके समान सुशोभित हो रहे थे॥ ३-४॥ |
| निर्योंगपाशस्कन्धौ तौ वनमालाविभूषितौ।<br>शुशुभाते महात्मानौ बालशृङ्गाविवर्षभौ॥ ४ | उन दोनोंके वस्त्र [क्रमशः] सुनहरी और श्याम रंगसे रँगे हुए थे अतः वे इन्द्रधनुषयुक्त श्वेत और श्याम मेघके समान जान पड़ते थे॥ ५॥ |
| सुवर्णाञ्जनचूर्णाभ्यां तौ तदा रूषिताम्बरौ।<br>महेन्द्रायुधसंयुक्तौ श्वेतकृष्णाविवाम्बुदौ॥ ५ | वे समस्त लोकपालोंके प्रभु पृथिवीपर अवतीर्ण होकर नाना प्रकारकी लौकिक लीलाओंसे परस्पर खेल रहे थे॥ ६॥ |
| चेरतुर्लोकसिद्धाभिः क्रीडाभिरितरेतरम्।<br>समस्तलोकनाथानां नाथभूतौ भुवं गतौ॥ ६ | मनुष्यधर्ममें तत्पर रहकर मनुष्यताका सम्मान करते हुए वे मनुष्यजातिके गुणोंकी क्रीडाएँ करते हुए वनमें विचर रहे थे॥ ७॥ |
| मनुष्यधर्माभिरतौ मानयन्तौ मनुष्यताम्।<br>तज्जातिगुणयुक्ताभिः क्रीडाभिश्चेरतुर्वनम्॥ ७ | वे दोनों महाबली बालक कभी झूलामें झूलकर, कभी परस्पर मल्लयुद्धकर और कभी पत्थर फेंककर नाना प्रकारसे व्यायाम कर रहे थे॥ ८॥ |
| ततस्वान्दोलिकाभिश्च नियुद्धैश्च महाबलौ।<br>व्यायामं चक्रतुस्तत्र क्षेपणीयैस्तथाश्मभिः॥ ८ | इसी समय उन दोनों खेलते हुए बालकोंको उठा ले जानेकी इच्छासे प्रलम्ब नामक दैत्य गोपवेषमें अपनेको छिपाकर वहाँ आया॥ ९॥ |
| तल्लिप्सुरसुरस्तत्र ह्युभयो रममाणयोः।<br>आजगाम प्रलम्बाख्यो गोपवेषतिरोहितः॥ ९ | दानवश्रेष्ठ प्रलम्ब मनुष्य न होनेपर भी मनुष्यरूप धारणकर निश्शंकभावसे उन बालकोंके बीच घुस गया॥ १०॥ |
| सोऽवगाहत निश्शंकस्तेषां मध्यममानुषः।<br>मानुषं वपुरास्थाय प्रलम्बो दानवोत्तमः॥ १० | उन दोनोंकी असावधानताका अवसर देखनेवाले उस दैत्यने कृष्णको तो सर्वथा अजेय समझा; अतः उसने बलरामजीको मारनेका निश्चय किया॥ ११॥ |
| तयोश्छिद्रान्तरप्रेप्सुर्विषह्यममन्यत।<br>कृष्णं ततो रौहिणेयं हन्तुं चक्रे मनोरथम्॥ ११ | तदनन्तर वे समस्त ग्वालबाल हरिणाक्रीडन* नामक खेल खेलते हुए आपसमें एक साथ दो-दो बालक उठे॥ १२॥ |
| हरिणाक्रीडनं नाम बालक्रीडनकं ततः।<br>प्रकुर्वन्तो हि ते सर्वे द्वौ द्वौ युगपदुत्थितौ॥ १२ |
* एक निश्चित लक्ष्यके पास दो-दो बालक एक-एक साथ हिरनकी भाँति उछलते हुए जाते हैं। जो दोनोंमें पहले पहुँच जाता है वह विजयी होता है, हारा हुआ बालक जीते हुएको अपनी पीठपर चढ़ाकर मुख्य स्थानतक ले आता है। यही हरिणाक्रीडन है।
अ० ९ ] * पञ्चम अंश * ३३९
श्रीदाम्ना सह गोविन्दः प्रलम्बेन तथा बलः।
गोपालैरपरैश्चान्ये गोपालाः पुप्लुवुस्ततः ॥ १३
श्रीदामानं ततः कृष्णः प्रलम्बं रोहिणीसुतः।
जितवान्कृष्णपक्षीयैर्गोपैरन्ये पराजिताः ॥ १४
ते वाहयन्तस्त्वन्योन्यं भाण्डीरं वटमेत्य वै।
पुनर्निववृतुस्सर्वे ये ये तत्र पराजिताः ॥ १५
सङ्कर्षणं तु स्कन्धेन शीघ्रमुत्क्षिप्य दानवः।
नभःस्थलं जगामाशु सचन्द्र इव वारिदः ॥ १६
असहन् रौहिणेयस्य स भारं दानवोत्तमः।
ववृधे स महाकायः प्रावृषीव बलाहकः ॥ १७
सङ्कर्षणस्तु तं दृष्ट्वा दग्धशैलोपमाकृतिम्।
स्रग्दामलम्बाभरणं मुकुटाटोपमस्तकम् ॥ १८
रौद्रं शकटचक्राक्षं पादन्यासचलक्षितिम्।
अभीतमनसा तेन रक्षसा रोहिणीसुतः।
ह्रियमाणस्ततः कृष्णमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १९
कृष्ण कृष्ण हिये ह्येष पर्वतोदग्रमूर्त्तिना।
केनापि पश्य दैत्येन गोपालच्छद्मरूपिणा ॥ २०
यदत्र साम्प्रतं कार्यं मया मधुनिषूदन।
तत्कथ्यतां प्रयात्येष दुरात्मातित्वरान्वितः ॥ २१
श्रीपराशर उवाच
तमाह रामं गोविन्दः स्मितभिन्नोष्ठसम्पुटः।
महात्मा रौहिणेयस्य बलवीर्य्यप्रमाणवित् ॥ २२
श्रीकृष्ण उवाच
किमयं मानुषो भावो व्यक्तमेवावलम्ब्यते।
सर्वात्मन् सर्वगुह्यानां गुह्यगुह्यात्मना त्वया ॥ २३
स्मराशेषजगद्बीजकारणं कारणाग्रजम्।
आत्मानमेकं तद्वच्च जगत्येकार्णवे च यत् ॥ २४
किं न वेत्सि यथाहं च त्वं चैकं कारणं भुवः।
भारावतारणार्थाय मर्त्यलोकमुपागतौ ॥ २५
नभश्शिरस्तेऽम्बुवहाश्च केशाः
पादौ क्षितिर्वक्त्रमनन्त वह्निः।
तब श्रीदामाके साथ कृष्णचन्द्र, प्रलम्बके साथ बलराम और इसी प्रकार अन्यान्य गोपोंके साथ और-और ग्वालबाल [होड़ बदकर] उछलते हुए चलने लगे॥ १३॥ अन्तमें, कृष्णचन्द्रने श्रीदामाको, बलरामजीने प्रलम्बको तथा अन्यान्य कृष्णपक्षीय गोपोंने अपने प्रतिपक्षियोंको हरा दिया॥ १४॥
उस खेलमें जो-जो बालक हारे थे, वे सब जीतनेवालोंको अपने-अपने कन्धोंपर चढ़ाकर भाण्डीरवटतक ले जाकर वहाँसे फिर लौट आये॥ १५॥ किन्तु प्रलम्बासुर अपने कन्धेपर बलरामजीको चढ़ाकर चन्द्रमाके सहित मेघके समान अत्यन्त वेगसे आकाशमण्डलको चल दिया॥ १६॥ वह दानवश्रेष्ठ रोहिणीनन्दन श्रीबलभद्रजीके भारको सहन न कर सकनेके कारण वर्षाकालीन मेघके समान बढ़कर अत्यन्त स्थूल शरीरवाला हो गया॥ १७॥ तब माला और आभूषण धारण किये, सिरपर मुकुट पहने, गाड़ीके पहियोंके समान भयानक नेत्रोंवाले, अपने पादप्रहारसे पृथिवीको कम्पायमान करते हुए तथा दग्धपर्वतके समान आकारवाले उस दैत्यको देखकर उस निर्भय राक्षसके द्वारा ले जाये जाते हुए बलभद्रजीने कृष्णचन्द्रसे कहा—॥ १८-१९॥
"भैया कृष्ण! देखो, छद्मपूर्वक गोपवेष धारण करनेवाला कोई पर्वतके समान महाकाय दैत्य मुझे हरे लिये जाता है॥ २०॥ हे मधुसूदन! अब मुझे क्या करना चाहिये, यह बतलाओ। देखो, यह दुरात्मा बड़ी शीघ्रतासे दौड़ा जा रहा है"॥ २१॥
श्रीपराशरजी बोले—तब रोहिणीनन्दनके बलवीर्यको जाननेवाले महात्मा श्रीकृष्णचन्द्रने मधुर-मुसकानसे अपने ओष्ठसम्पुटको खोलते हुए उन बलरामजीसे कहा॥ २२॥
श्रीकृष्णचन्द्र बोले—हे सर्वात्मन्! आप सम्पूर्ण गुह्य पदार्थोंमें अत्यन्त गुह्यस्वरूप होकर भी यह स्पष्ट मानवभाव क्यों अवलम्बन कर रहे हैं?॥ २३॥ आप अपने उस स्वरूपका स्मरण कीजिये जो समस्त संसारका कारण तथा कारणका भी पूर्ववर्ती है और प्रलयकालमें भी स्थित रहनेवाला है॥ २४॥ क्या आपको मालूम नहीं है कि आप और मैं दोनों ही इस संसारके एकमात्र कारण हैं और पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही मर्त्यलोकमें आये हैं॥ २५॥
हे अनन्त! आकाश आपका सिर है, मेघ केश
| ३४० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ९ |
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| सोमो मनस्ते श्वसितं समीरणो<br> दिशश्चतस्रोऽव्यय बाहवस्ते ॥ २६<br><br>सहस्रवक्त्रो भगवन्महात्मा<br> सहस्रहस्ताङ्घ्रिशरीरभेदः ।<br>सहस्रपद्मोद्भवयोनिराद्य-<br> स्सहस्रशस्त्वां मुनयो गृणन्ति ॥ २७<br><br>दिव्यं हि रूपं तव वेत्ति नान्यो<br> देवैरशेषैरवताररूपम् ।<br>तदर्च्यते वेत्सि न किं यदन्ते<br> त्वय्येव विश्वं लयमभ्युपैति ॥ २८<br><br>त्वया धृतेयं धरणी बिभर्ति<br> चराचरं विश्वमनन्तमूर्ते ।<br>कृतादिभेदैरज कालरूपो<br> निमेषपूर्वो जगदेतदत्सि ॥ २९<br><br>अत्तं यथा बाडववह्निनाम्बु<br> हिमस्वरूपं परिगृह्य कास्तम्* ।<br>हिमाचले भानुमतोऽंशुसंगा-<br> ज्जलत्वमभ्येति पुनस्तदेव ॥ ३०<br><br>एवं त्वया संहरणेऽत्तमेत-<br> ज्जगत्समस्तं त्वदधीनकं पुनः ।<br>तवैव सर्गाय समुद्यतस्य<br> जगत्त्वमभ्येत्यनुकल्पमीश ॥ ३१<br><br>भवानहं च विश्वात्मन्नेकमेव च कारणम् ।<br>जगतोऽस्य जगत्यर्थे भेदेनावां व्यवस्थितौ ॥ ३२<br><br>तत्स्मर्यताममेयात्मंस्त्वयात्मा जहि दानवम् ।<br>मानुष्यमेवावलम्ब्य बन्धूनां क्रियतां हितम् ॥ ३३<br><br> श्रीपराशर उवाच<br>इति संस्मारितो विप्र कृष्णेन सुमहात्मना ।<br>विहस्य पीडयामास प्रलम्बं बलवान्बलः ॥ ३४<br><br>मुष्टिना सोऽहनन्मूर्ध्नि कोपसंरक्तलोचनः ।<br>तेन चास्य प्रहारेण बहिर्याते विलोचने ॥ ३५ | हैं, पृथिवी चरण हैं, अग्नि मुख है, चन्द्रमा मन है, वायु श्वास-प्रश्वास हैं और चारों दिशाएँ बाहु हैं॥ २६॥ हे भगवन्! आप महाकाय हैं, आपके सहस्र मुख हैं तथा सहस्रों हाथ, पाँव आदि शरीरके भेद हैं। आप सहस्रों ब्रह्माओंके आदिकारण हैं, मुनिजन आपका सहस्रों प्रकार वर्णन करते हैं॥ २७॥ आपके दिव्य रूपको [आपके अतिरिक्त] और कोई नहीं जानता, अतः समस्त देवगण आपके अवताररूपकी ही उपासना करते हैं। क्या आपको विदित नहीं है कि अन्तमें यह सम्पूर्ण विश्व आपहीमें लीन हो जाता है॥ २८॥ हे अनन्तमूर्ते! आपहीसे धारण की हुई यह पृथिवी सम्पूर्ण चराचर विश्वको धारण करती है। हे अज! निमेषादि कालरूप आप ही कृतयुग आदि भेदोंसे इस जगत्का ग्रास करते हैं॥ २९॥ जिस प्रकार बडवानलसे पीया हुआ जल वायुद्वारा हिमालयतक पहुँचाये जानेपर हिमका रूप धारण कर लेता है और फिर सूर्यकिरणोंका संयोग होनेसे जलरूप हो जाता है, उसी प्रकार हे ईश! यह समस्त जगत् [रुद्रादिरूपसे] आपहीके द्वारा विनष्ट होकर आप [परमेश्वर]-के ही अधीन रहता है और फिर प्रत्येक कल्पमें आपके [हिरण्यगर्भरूपसे] सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त होनेपर यह [विराट्रूपसे] स्थूल जगद्रूप हो जाता है॥ ३०-३१॥ हे विश्वात्मन्! आप और मैं दोनों ही इस जगत्के एकमात्र कारण हैं। संसारके हितके लिये ही हमने भिन्न-भिन्न रूप धारण किये हैं॥ ३२॥ अतः हे अमेयात्मन्! आप अपने स्वरूपको स्मरण कीजिये और मनुष्यभावका ही अवलम्बन कर इस दैत्यको मारकर बन्धुजनोंका हित-साधन कीजिये॥ ३३॥<br><br> श्रीपराशरजी बोले— हे विप्र! महात्मा कृष्णचन्द्रद्वारा इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर महाबलवान् बलरामजी हँसते हुए प्रलम्बासुरको पीडित करने लगे॥ ३४॥ उन्होंने क्रोधसे नेत्र लाल करके उसके मस्तकपर एक घूँसा मारा, जिसकी चोटसे उस दैत्यके दोनों नेत्र बाहर निकल आये॥ ३५॥ |
* कम् अस्तम्=प्रक्षिप्तम्।
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अ० १० ] * पञ्चम अंश * ३४१
स निष्कासितमस्तिष्को मुखाच्छोणितमुद्वमन्। निपपात महीपृष्ठे दैत्यवर्यो ममार च॥ ३६
प्रलम्बं निहतं दृष्ट्वा बलेनाद्भुतकर्मणा। प्रहृष्टास्तुष्टुवुर्गोपास्साधुसाध्विति चाब्रुवन्॥ ३७
संस्तूयमानो गोपैस्तु रामो दैत्ये निपातिते। प्रलम्बे सह कृष्णेन पुनर्गोकुलमाययौ॥ ३८
तदनन्तर वह दैत्यश्रेष्ठ मगज (मस्तिष्क) फट जानेपर मुखसे रक्त वमन करता हुआ पृथिवीपर गिर पड़ा और मर गया॥ ३६॥ अद्भुतकर्मा बलरामजीद्वारा प्रलम्बासुरको मरा हुआ देखकर गोपगण प्रसन्न होकर 'साधु, साधु' कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे॥ ३७॥ प्रलम्बासुरके मारे जानेपर बलरामजी गोपोंद्वारा प्रशंसित होते हुए कृष्णचन्द्रके साथ गोकुलमें लौट आये॥ ३८॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे नवमोऽध्यायः॥ ९॥
दसवाँ अध्याय
शरद्वर्णन तथा गोवर्धनकी पूजा
श्रीपराशर उवाच
तयोर्विहरतोरेवं रामकेशवयोजें। प्रावृड् व्यतीता विकसत्सरोजा चाभवच्छरत्॥ १
अवापुस्तापमत्यर्थं शफर्यः पल्वलोदके। पुत्रक्षेत्रादिसक्तेन ममत्वेन यथा गृही॥ २
मयूरा मौनमातस्थुः परित्यक्तमदा वने। असारतां परिज्ञाय संसारस्येव योगिनः॥ ३
उत्सृज्य जलसर्वस्वं विमलास्सितमूर्त्तयः। तत्यजुश्चाम्बरं मेघा गृहं विज्ञानिनो यथा॥ ४
शरत्सूर्यांशुतप्तानि ययुश्शोषं सरांसि च। बह्वालम्बममत्वेन हृदयानीव देहिनाम्॥ ५
कुमुदैश्शरदम्भांसि योग्यतालक्षणं ययुः। अवबोधैर्मनांसीव समत्वममलात्मनाम्॥ ६
तारकाविमले व्योम्नि रराजाखण्डमण्डलः। चन्द्रश्चरमदेहात्मा योगी साधुकुले यथा॥ ७
शनकैश्शनकैस्तीरं तत्यजुश्च जलाशयाः। ममत्वं क्षेत्रपुत्रादिरूढमुच्चैर्यथा बुधाः॥ ८
पूर्वं त्यक्तैस्सरोऽम्भोभिर्हंसा योगं पुनर्ययुः। क्लेशैः कुयोगिनोऽशेषैरन्तरायहता इव॥ ९
श्रीपराशरजी बोले- इस प्रकार उन राम और कृष्णके व्रजमें विहार करते-करते वर्षाकाल बीत गया और प्रफुल्लित कमलोंसे युक्त शरद्-ऋतु आ गयी॥ १॥ जैसे गृहस्थ पुरुष पुत्र और क्षेत्र आदिमें लगी हुई ममतासे सन्ताप पाते हैं, उसी प्रकार मछलियाँ गड्ढोंके जलमें अत्यन्त ताप पाने लगीं॥ २॥ संसारकी असारताको जानकर जिस प्रकार योगिजन शान्त हो जाते हैं, उसी प्रकार मयूरगण मदहीन होकर मौन हो गये॥ ३॥ ज्ञानिगण [सब प्रकारकी ममता छोड़कर] जैसे घरका त्याग कर देते हैं, वैसे ही निर्मल श्वेत मेघोंने अपना जलरूप सर्वस्व छोड़कर आकाशमण्डलका परित्याग कर दिया॥ ४॥ विविध पदार्थोंमें ममता करनेसे जैसे देहधारियोंके हृदय सारहीन हो जाते हैं वैसे ही शरत्कालीन सूर्यके तापसे सरोवर सूख गये॥ ५॥ निर्मलचित्त पुरुषोंके मन जिस प्रकार ज्ञानद्वारा समता प्राप्त कर लेते हैं, उसी प्रकार शरत्कालीन जलोंको [स्वच्छताके कारण] कुमुदोंसे योग्य सम्बन्ध प्राप्त हो गया॥ ६॥ जिस प्रकार साधु-कुलमें चरम-देह-धारी योगी सुशोभित होता है, उसी प्रकार तारका-मण्डल-मण्डित निर्मल आकाशमें पूर्णचन्द्र विराजमान हुआ॥ ७॥
जिस प्रकार क्षेत्र और पुत्र आदिमें बढ़ी हुई ममताको विवेकीजन शनैः-शनैः त्याग देते हैं, वैसे ही जलाशयोंका जल धीरे-धीरे अपने तटको छोड़ने लगा॥ ८॥ जिस प्रकार अन्तरायों* (विघ्नों)-से विचलित हुए कुयोगियोंका
* अन्तराय नौ हैं- 'व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः। (यो० द० १। ३०)
३४२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १०
निभृतोऽभवदत्यर्थं समुद्रः स्तिमितोदकः। क्रमावाप्तमहायोगो निश्चलात्मा यथा यतिः॥ १०
सर्वत्रातिप्रसन्नानि सलिलानि तथाभवन्। ज्ञाते सर्वगते विष्णौ मनांसीव सुमेधसाम्॥ ११
बभूव निर्मलं व्योम शरदा ध्वस्ततोयदम्। योगाग्निदग्धक्लेशौघं योगिनामिव मानसम्॥ १२
सूर्यांशुजनितं तापं निन्ये तारापतिः शमम्। अहंमानोद्भवं दुःखं विवेकः सुमहानीव॥ १३
नभसोऽब्दं भुवः पङ्कं कालुष्यं चाम्भसश्शरत्। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः प्रत्याहार इवाहरत्॥ १४
प्राणायाम इवाम्भोभिस्सरसां कृतपूरकैः। अभ्यस्यतेऽनुदिवसं रेचकाकुम्भकादिभिः॥ १५
विमलाम्बरनक्षत्रे काले चाभ्यागते व्रजे। ददर्शेन्द्रमहारम्भायोद्यतांस्तान्व्रजौकसः॥ १६
कृष्णस्तानत्सुकान्दृष्ट्वा गोपानुत्सवलालसान्। कौतूहलादिदं वाक्यं प्राह वृद्धान्महामतिः॥ १७
कोऽयं शक्रमखो नाम येन वो हर्ष आगतः। प्राह तं नन्दगोपश्च पृच्छन्तमतिसादरम्॥ १८
नन्दगोप उवाच मेघानां पयसां चेशो देवराजश्शतक्रतुः। तेन सञ्चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बुमयं रसम्॥ १९
तद्वृष्टिजनितं सस्यं वयमन्ये च देहिनः। वर्त्तयामोपयुञ्जानास्तर्पयामश्च देवताः॥ २०
क्षीरवत्य इमा गावो वत्सवत्यश्च निर्वृताः। तेन संवर्द्धितैस्सस्यैस्तुष्टाः पुष्टा भवन्ति वै॥ २१
क्लेशों से पुनः संयोग हो* जाता है उसी प्रकार पहले छोड़े हुए सरोवरके जलसे हंसका पुनः संयोग हो गया॥ ९॥ क्रमशः महायोग (सम्प्रज्ञातसमाधि) प्राप्त कर लेनेपर जैसे यति निश्चलात्मा हो जाता है, वैसे ही जलके स्थिर हो जानेसे समुद्र निश्चल हो गया॥ १०॥ जिस प्रकार सर्वगत भगवान् विष्णुको जान लेनेपर मेधावी पुरुषोंके चित्त शान्त हो जाते हैं वैसे ही समस्त जलाशयोंका जल स्वच्छ हो गया॥ ११॥
योगाग्निद्वारा क्लेशसमूहके नष्ट हो जानेपर जैसे योगियोंके चित्त स्वच्छ हो जाते हैं उसी प्रकार शीतके कारण मेघोंके लीन हो जानेसे आकाश निर्मल हो गया॥ १२॥ जिस प्रकार अहंकारजनित महान् दुःखको विवेक शान्त कर देता है, उसी प्रकार सूर्यकिरणोंसे उत्पन्न हुए तापको चन्द्रमाने शान्त कर दिया॥ १३॥ प्रत्याहार जैसे इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे खींच लेता है वैसे ही शरत्कालने आकाशसे मेघोंको, पृथिवीसे धूलिको और जलसे मलको दूर कर दिया॥ १४॥ [पानीसे भर जानेके कारण] मानो तालाबोंके जल पूरक कर चुकनेपर अब [स्थिर रहने और सूखनेसे] रात-दिन कुम्भक एवं रेचक क्रियाद्वारा प्राणायामका अभ्यास कर रहे हैं॥ १५॥
इस प्रकार व्रजमण्डलमें निर्मल आकाश और नक्षत्रमय शरत्कालके आनेपर श्रीकृष्णचन्द्रने समस्त व्रजवासियोंको इन्द्रका उत्सव मनानेके लिये तैयारी करते देखा॥ १६॥ महामति कृष्णने उन गोपोंको उत्सवकी उमंगसे अत्यन्त उत्साहपूर्ण देखकर कुतूहलवश अपने बड़े-बूढ़ोंसे पूछा-॥ १७॥ "आपलोग जिसके लिये फूले नहीं समाते वह इन्द्रयज्ञ क्या है?" इस प्रकार अत्यन्त आदरपूर्वक पूछनेपर उनसे नन्दगोपने कहा-॥ १८॥
नन्दगोप बोले- मेघ और जलका स्वामी देवराज इन्द्र है। उसकी प्रेरणासे ही मेघगण जलरूप रसकी वर्षा करते हैं॥ १९॥ हम और अन्य समस्त देहधारी उस वर्षासे उत्पन्न हुए अन्नको ही बर्तते हैं तथा उसीको उपयोगमें लाते हुए देवताओंको भी तृप्त करते हैं॥ २०॥ उस (वर्षा)-से बढ़े हुए अन्नसे ही तृप्त होकर ये गौएँ तुष्ट और
अर्थात् व्याधि, स्त्यान (साधनमें अप्रवृत्ति), संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति (वैराग्यहीनता), भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व (लक्ष्यकी उपलब्धि न होना) और अनवस्थितत्व (लक्ष्यमें स्थिर न होना) ये नौ अन्तराय हैं।
* क्लेश पाँच हैं; जैसे— अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः। (यो० द० २।३) अर्थात् अविद्या, अस्मिता (अहंकार) राग, द्वेष और अभिनिवेश (मरणत्रास) ये पाँच क्लेश हैं।
अ० १० ] * पञ्चम अंश * ३४३
नासस्या नातृणा भूमिर्न बुभुक्षार्दितो जनः।
दृश्यते यत्र दृश्यन्ते वृष्टिमन्तो बलाहकाः ॥ २२
भौममेतत्पयो दुग्धं गोभिः सूर्यस्य वारिदैः।
पर्जन्यस्सर्वलोकस्योद्भवाय भुवि वर्षति ॥ २३
तस्मात्प्रावृषि राजानस्सर्वे शक्रं मुदा युताः।
मखैस्सुरेशमर्चन्ति वयमन्ये च मानवाः ॥ २४
श्रीपराशर उवाच
नन्दगोपस्य वचनं श्रुत्वेत्थं शक्रपूजने।
रोषाय त्रिदशेन्द्रस्य प्राह दामोदरस्तदा ॥ २५
न वयं कृषिकर्त्तारो वाणिज्याजीविनो न च।
गावोऽस्मद्दैवतं तात वयं वनचरा यतः ॥ २६
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्डनीतिस्तथा परा।
विद्या चतुष्टयं चैतद्वार्त्तामात्रं शृणुष्व मे ॥ २७
कृषिर्वणिज्या तद्वच्च तृतीयं पशुपालनम्।
विद्या ह्येका महाभाग वार्त्ता वृत्तित्रयाश्रया ॥ २८
कर्षकाणां कृषिवृत्तिः पण्यं विपणिजीविनाम्।
अस्माकं गौः परा वृत्तिर्वार्त्ताभेदैरियं त्रिभिः ॥ २९
विद्यया यो यया युक्तस्तस्य सा दैवतं महत्।
सैव पूज्यार्चनीया च सैव तस्योपकारिका ॥ ३०
यो यस्य फलमश्नन्वै पूजयत्यपरं नरः।
इह च प्रेत्य चैवासौ न तदाप्नोति शोभनम् ॥ ३१
कृष्यान्ता प्रथिता सीमा सीमान्तं च पुनर्व्वनम्।
वनान्ता गिरयस्सर्वे ते चास्माकं परा गतिः ॥ ३२
न द्वारबन्धावरणा न गृहक्षेत्रिणस्तथा।
सुखिनस्त्वखिले लोके यथा वै चक्रचारिणः ॥ ३३
श्रूयन्ते गिरयश्चैव वनेऽस्मिन्कामरूपिणः।
तत्तद्रूपं समास्थाय रमन्ते स्वेषु सानुषु ॥ ३४
पुष्ट होकर वत्सवती एवं दूध देनेवाली होती हैं॥ २१॥ जिस भूमिपर बरसनेवाले मेघ दिखायी देते हैं, उसपर कभी अन्न और तृणका अभाव नहीं होता और न कभी वहाँके लोग भूखे रहते ही देखे जाते हैं॥ २२॥ यह पर्जन्यदेव (इन्द्र) पृथिवीके जलको सूर्यकिरणोंद्वारा खींचकर सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धिके लिये उसे मेघोंद्वारा पृथिवीपर बरसा देते हैं। इसलिये वर्षा ऋतुमें समस्त राजालोग, हम और अन्य मनुष्यगण देवराज इन्द्रकी यज्ञोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक पूजा किया करते हैं॥ २३-२४॥
श्रीपराशरजी बोले— इन्द्रकी पूजाके विषयमें नन्दजीके ऐसे वचन सुनकर श्रीदामोदर देवराजको कुपित करनेके लिये ही इस प्रकार कहने लगे—॥ २५॥ ‘‘हे तात! हम न तो कृषक हैं और न व्यापारी, हमारे देवता तो गौएँ ही हैं; क्योंकि हमलोग वनचर हैं॥ २६॥ आन्वीक्षिकी (तर्कशास्त्र), त्रयी (कर्मकाण्ड), दण्डनीति और वार्ता—ये चार विद्याएँ हैं, इनमेंसे केवल वार्ताका विवरण सुनो॥ २७॥ हे महाभाग! वार्ता नामकी विद्या कृषि, वाणिज्य और पशुपालन इन तीन वृत्तियोंकी आश्रयभूता है॥ २८॥ वार्ताके इन तीनों भेदोंमेंसे कृषि किसानोंकी, वाणिज्य व्यापारियोंकी और गोपालन हमलोगोंकी उत्तम वृत्ति है॥ २९॥ जो व्यक्ति जिस विद्यासे युक्त है उसकी वही इष्टदेवता है, वही पूजा-अर्चाके योग्य है और वही परम उपकारिणी है॥ ३०॥ जो पुरुष एक व्यक्तिसे फल-लाभ करके अन्यकी पूजा करता है, उसका इहलोक अथवा परलोकमें कहीं भी शुभ नहीं होता॥ ३१॥ खेतोंके अन्तमें सीमा है तथा सीमाके अन्तमें वन हैं और वनोंके अन्तमें समस्त पर्वत हैं; वे पर्वत ही हमारी परमगति हैं॥ ३२॥ हमलोग न तो किंवाड़ें तथा भित्तिके अन्दर रहनेवाले हैं और न निश्चित गृह अथवा खेतवाले किसान ही हैं, बल्कि [वन-पर्वतादिमें स्वच्छन्द विचरनेवाले] हमलोग चक्रचारी* मुनियोंकी भाँति समस्त जनसमुदायमें सुखी हैं [अतः गृहस्थ किसानोंकी भाँति हमें इन्द्रकी पूजा करनेका कोई काम नहीं]’’॥ ३३॥
‘‘सुना जाता है कि इस वनके पर्वतगण कामरूपी (इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले) हैं। वे मनोवांछित रूप धारण करके अपने-अपने शिखरोंपर विहार किया करते हैं॥ ३४॥
* चक्रचारी मुनि वे हैं जो शकट आदिसे सर्वत्र भ्रमण किया करते हैं और जिनका कोई खास निवास नहीं होता। जहाँ शाम हो जाती है वहीं रह जाते हैं। अतः उन्हें ‘सायंगृह’ भी कहते हैं।
३४४ * श्रीविष्णुपुराण * अ० १० ]
यदा चैतैः प्रबाध्यन्ते तेषां ये काननौकसः ।
तदा सिंहादिरूपैस्तान्घातयन्ति महीधराः ॥ ३५
गिरियज्ञस्त्वयं तस्माद्गोयज्ञश्च प्रवर्त्यताम् ।
किमस्माकं महेन्द्रेण गावश्शैलाश्र्च देवताः ॥ ३६
मन्त्रयज्ञपरा विप्रास्सीरयज्ञाश्च कर्षकाः ।
गिरिगोयज्ञशीलाश्च वयमद्रिवनाश्रयाः ॥ ३७
तस्माद्गोवर्धनशैलो भवद्भिर्विविधार्हणैः ।
अर्च्यतां पूज्यतां मेध्यान्यशून्हत्वा विधानतः ॥ ३८
सर्वघोषस्य सन्दोहो गृह्यतां मा विचार्यताम् ।
भोज्यन्तां तेन वै विप्रास्तथा ये चाभिवाञ्छकाः ॥ ३९
तत्रार्चिते कृते होमे भोजितेषु द्विजातिषु ।
शरत्पुष्पकृतापीड़ाः परिगच्छन्तु गोगणाः ॥ ४०
एतन्मम मतं गोपास्सम्प्रीत्या क्रियते यदि ।
ततः कृता भवेत्प्रीतिर्गवामद्रेस्तथा मम ॥ ४१
श्रीपराशर उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा नन्दाद्यास्ते व्रजौकसः ।
प्रीत्युत्फुल्लमुखा गोपास्साधुसाध्वित्यथाब्रुवन् ॥ ४२
शोभनं ते मतं वत्स यदेतद्भवतोदितम् ।
तत्करिष्यामहे सर्वं गिरियज्ञः प्रवर्त्यताम् ॥ ४३
तथा च कृतवन्तस्ते गिरियज्ञं व्रजौकसः ।
दधिपायसमांसाद्यैर्ददुश्शैलवलिं ततः ॥ ४४
द्विजांश्च भोजयामासुश्शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४५
गावश्शैलं ततश्चक्रुरर्चितास्ताः प्रदक्षिणम् ।
वृषभाश्चातिनर्दन्तस्तोया जलदा इव ॥ ४६
गिरिमूर्द्धनि कृष्णोऽपि शैलोऽहमिति मूर्तिमान् ।
बुभुजेऽन्नं बहुतरं गोपवर्य्याहृतं द्विज ॥ ४७
स्वेनैव कृष्णो रूपेण गोपैस्सह गिरेश्शिरः ।
अधिरुह्यार्चयामास द्वितीयामात्मनस्तनुम् ॥ ४८
अन्तर्द्धानं गते तस्मिन्रोपा लब्ध्वा ततो वरान् ।
कृत्वा गिरिमखं गोष्ठं निजमभ्याययुः पुनः ॥ ४९
जब कभी वनवासीगण इन गिरिदेवोंको किसी तरहकी बाधा पहुँचाते हैं तो वे सिंहादि रूप धारणकर उन्हें मार डालते हैं॥ ३५॥ अतः आजसे [इस इन्द्रयज्ञके स्थानमें] गिरियज्ञ अथवा गोयज्ञका प्रचार होना चाहिये। हमें इन्द्रसे क्या प्रयोजन है? हमारे देवता तो गौएँ और पर्वत ही हैं॥ ३६॥ ब्राह्मणलोग मन्त्र यज्ञ तथा कृषकगण सीरयज्ञ (हलका पूजन) करते हैं, अतः पर्वत और वनोंमें रहनेवाले हमलोगोंको गिरियज्ञ और गोयज्ञ करने चाहिये॥ ३७॥
“अतएव आपलोग विधिपूर्वक मेध्य पशुओंकी बलि देकर विविध सामग्रियोंसे गोवर्धनपर्वतकी अर्चा पूजा करें॥ ३८॥ आज सम्पूर्ण व्रजका दूध एकत्रित कर लो और उससे ब्राह्मणों तथा अन्यान्य याचकोंको भोजन कराओ; इस विषयमें और अधिक सोच-विचार मत करो॥ ३९॥ गोवर्धनकी पूजा, होम और ब्राह्मण-भोजन समाप्त होनेपर शरद्-ऋतुके पुष्पोंसे सजे हुए मस्तकवाली गौएँ गिरिराजकी प्रदक्षिणा करें॥ ४०॥ हे गोपगण! आपलोग यदि प्रीतिपूर्वक मेरी इस सम्मतिके अनुसार कार्य करेंगे तो इससे गौओंको, गिरिराज और मुझको अत्यन्त प्रसन्नता होगी”॥ ४१॥
श्रीपराशरजी बोले—कृष्णचन्द्रके इन वाक्योंको सुनकर नन्द आदि व्रजवासी गोपोंने प्रसन्नतासे खिले हुए मुखसे ‘साधु, साधु' कहा॥ ४२॥ और बोले—हे वत्स! तुमने अपना जो विचार प्रकट किया है वह बड़ा ही सुन्दर है; हम सब ऐसा ही करेंगे; आज गिरियज्ञ किया जाय॥ ४३॥
तदनन्तर उन व्रजवासियोंने गिरियज्ञका अनुष्ठान किया तथा दही, खीर और मांस आदिसे पर्वतराजको बलि दी॥ ४४॥ सैकड़ों, हजारों ब्राह्मणोंको भोजन कराया तथा पुष्पार्चित गौओं और सजल जलधरके समान गर्जनेवाले साँड़ोंने गोवर्धनकी परिक्रमा की॥ ४५-४६॥ हे द्विज! उस समय कृष्णचन्द्रने पर्वतके शिखरपर अन्यरूपसे प्रकट होकर यह दिखलाते हुए कि मैं मूर्तिमान् गिरिराज हूँ, उन गोपश्रेष्ठोंके चढ़ाये हुए विविध व्यंजनोंको ग्रहण किया॥ ४७॥ कृष्णचन्द्रने अपने निजरूपसे गोपोंके साथ पर्वतराजके शिखरपर चढ़कर अपने ही दूसरे स्वरूपका पूजन किया॥ ४८॥ तदनन्तर उनके अन्तर्धान होनेपर गोपगण अपने अभीष्ट वर पाकर गिरियज्ञ समाप्त करके फिर अपने-अपने गोष्ठोंमें चले आये॥ ४९॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
अ० ११] * पञ्चम अंश * ३४५
ग्यारहवाँ अध्याय
इन्द्रका कोप और श्रीकृष्णका गोवर्धन-धारण
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! अपने यज्ञके रुक जानेसे इन्द्रने अत्यन्त रोषपूर्वक संवर्तक नामक मेघोंके दलसे इस प्रकार कहा—॥ १॥ “अरे मेघो! मेरा यह वचन सुनो और मैं जो कुछ कहूँ उसे मेरी आज्ञा सुनते ही, बिना कुछ सोचे-विचारे तुरन्त पूरा करो॥ २॥ देखो अन्य गोपोंके सहित दुर्बुद्धि नन्दगोपने कृष्णकी सहायताके बलसे अन्धा होकर मेरा यज्ञ भंग कर दिया है॥ ३॥ अतः जो उनकी परम जीविका और उनके गोपत्वका कारण है, उन गौओंको तुम मेरी आज्ञासे वर्षा और वायुके द्वारा पीडित कर दो॥ ४॥ मैं भी पर्वत शिखरके समान अत्यन्त ऊँचे अपने ऐरावत हाथीपर चढ़कर वायु और जल छोड़नेके समय तुम्हारी सहायता करूँगा”॥ ५॥ |
|---|---|
| मखे प्रतिहते शक्रो मैत्रेयातिरुषान्वितः।<br>संवर्तकं नाम गणं तोयदानामथाब्रवीत्॥ १ | |
| भो भो मेघा निशम्यैतद्वचनं गदतो मम।<br>आज्ञानन्तरमेवाशु क्रियतामविचारितम्॥ २ | |
| नन्दगोपस्सुदुर्बुद्धिर्गोपैरन्यैस्सहायवान्।<br>कृष्णाश्रयबलाध्मातो मखभङ्गमचीकरत्॥ ३ | |
| आजीवो याः परस्तेषां गावस्तस्य च कारणम्।<br>ता गावो वृष्टिवातेन पीड्यन्तां वचनान्मम॥ ४ | |
| अहमप्यद्रिशृङ्गाभं तुङ्गमारुह्य वारणम्।<br>साहाय्यं वः करिष्यामि वाय्वम्बूत्सर्गयोजितम्॥ ५ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— हे द्विज! इन्द्रकी ऐसी आज्ञा होनेपर गौओंको नष्ट करनेके लिये मेघोंने अति प्रचण्ड वायु और वर्षा छोड़ दी॥ ६॥ हे मुने! उस समय एक क्षणमें ही मेघोंकी छोड़ी हुई महान् जलधाराओंसे पृथिवी, दिशाएँ और आकाश एकरूप हो गये॥ ७॥ मेघगण मानो विद्युल्लतारूप दण्डाघातसे भयभीत होकर महान् शब्दसे दिशाओंको व्याप्त करते हुए मूसलाधार पानी बरसाने लगे॥ ८॥ इस प्रकार मेघोंके अहर्निश बरसनेसे संसारके अन्धकारपूर्ण हो जानेपर ऊपर-नीचे और सब ओरसे समस्त लोक जलमय-सा हो गया॥ ९॥ |
| इत्याज्ञप्तास्ततस्तेन मुमुचुस्ते बलाहकाः।<br>वातवर्षं महाभीममभावाय गवां द्विज॥ ६ | |
| ततः क्षणेन पृथिवी ककुभोऽम्बरमेव च।<br>एकं धारामहासारपूरणेनाभवन्मुने॥ ७ | |
| विद्युल्लताकशाघातत्रस्तैरिव घनैर्घनम्।<br>नादापूरितदिक्चक्रैर्धारासारमपात्यत॥ ८ | |
| अन्धकारीकृते लोके वर्षद्भिरनिशं घनैः।<br>अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च जगदाप्यमिवाभवत्॥ ९ | |
| गावस्तु तेन पतता वर्षवातेन वेगिना।<br>धूताः प्राणाञ्जहुस्सन्नत्रिकसक्थिशिरोधराः॥ १० | वर्षा और वायुके वेगपूर्वक चलते रहनेसे गौओंके कटि, जंघा और ग्रीवा आदि सुन्न हो गये और काँपते-काँपते अपने प्राण छोड़ने लगीं [अर्थात् मूर्च्छित हो गयीं]॥ १०॥ हे महामुने! कोई गौएँ तो अपने बछड़ोंको अपने नीचे छिपाये खड़ी रहीं और कोई जलके वेगसे वत्सहीना हो गयीं॥ ११॥ वायुसे काँपते हुए दीनवदन बछड़े मानो व्याकुल होकर मन्द-स्वरसे कृष्णचन्द्रसे 'रक्षा करो, रक्षा करो' ऐसा कहने लगे॥ १२॥ |
| क्रोडेन वत्सानाक्रम्य तस्थुरन्या महामुने।<br>गावो विवत्साश्च कृता वारिपूरेण चापराः॥ ११ | |
| वत्साश्च दीनवदना वातकम्पितकन्धराः।<br>त्राहि त्राहीत्यल्पशब्दाः कृष्णमूचुरिवातुराः॥ १२ |
| ३४६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ११ |
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ततस्तद्गोकुलं सर्वं गोगोपीगोपसङ्कुलम्।
अतीवार्त्तं हरिर्दृष्ट्वा मैत्रेयाचिन्तयत्तदा॥ १३
एतत्कृतं महेन्द्रेण मखभंगविरोधिना।
तदेतदखिलं गोष्ठं त्रातव्यमधुना मया॥ १४
इममद्रिमहं धैर्यादुत्पाट्योरुशिलाघनम्।
धारयिष्यामि गोष्ठस्य पृथुच्छत्रमिवोपरि॥ १५
श्रीपराशर उवाच
इति कृत्वा मतिं कृष्णो गोवर्धनमहीधरम्।
उत्पाट्यैककरेणैव धारयामास लीलया॥ १६
गोपांश्चाह हसञ्छौरिस्समुत्पाटितभूधरः।
विशध्वमत्र त्वरिताः कृतं वर्षनिवारणम्॥ १७
सुनिवातेषु देशेषु यथा जोषमिहास्यताम्।
प्रविश्यतां न भेतव्यं गिरिपाताच्च निर्भयैः॥ १८
इत्युक्तास्तेन ते गोपा विविशुर्गोधनैस्सह।
शकटारोपितैर्भाण्डैर्गोप्यश्चासारपीडिताः॥ १९
कृष्णोऽपि तं दधारैव शैलमत्यन्तनिश्चलम्।
व्रजैकवासिभिर्हर्षविस्मिताक्षैर्निरीक्षितः॥ २०
गोपगोपीजनैर्हृष्टैः प्रीतिविस्तारितेक्षणैः।
संस्तूयमानचरितः कृष्णश्शैलमधारयत्॥ २१
सप्तरात्रं महामेघा ववर्षुर्नन्दगोकुले।
इन्द्रेण चोदिता विप्र गोपानां नाशकारिणा॥ २२
ततो धृते महाशैले परित्राते च गोकुले।
मिथ्याप्रतिज्ञो बलभिद्वारयामास तान्घनान्॥ २३
व्यभ्रे नभसि देवेन्द्रे वितथात्मवचस्यथ।
निष्क्रम्य गोकुलं हृष्टं स्वस्थानं पुनरागमत्॥ २४
मुमोच कृष्णोऽपि तदा गोवर्धनमहाचलम्।
स्वस्थाने विस्मितमुखैर्दृष्टस्तैस्तु व्रजौकसैः॥ २५
हे मैत्रेय! उस समय गो, गोपी और गोपगणके सहित सम्पूर्ण गोकुलको अत्यन्त व्याकुल देखकर श्रीहरिने विचारा॥ १३॥ यज्ञ-भंगके कारण विरोध मानकर यह सब करतूत इन्द्र ही कर रहा है; अतः अब मुझे सम्पूर्ण व्रजकी रक्षा करनी चाहिये॥ १४॥ अब मैं धैर्यपूर्वक बड़ी-बड़ी शिलाओंसे घनीभूत इस पर्वतको उखाड़कर इसे एक बड़े छत्रके समान व्रजके ऊपर धारण करूँगा॥ १५॥
**श्रीपराशरजी बोले—**श्रीकृष्णचन्द्रने ऐसा विचारकर गोवर्धनपर्वतको उखाड़ लिया और उसे लीलासे ही अपने एक हाथपर उठा लिया॥ १६॥ पर्वतको उखाड़ लेनेपर शूरनन्दन श्रीश्यामसुन्दरने गोपोंसे हँसकर कहा—
"आओ, शीघ्र ही इस पर्वतके नीचे आ जाओ, मैंने वर्षासे बचनेका प्रबन्ध कर दिया है॥ १७॥ यहाँ वायुहीन स्थानोंमें आकर सुखपूर्वक बैठ जाओ; निर्भय होकर प्रवेश करो, पर्वतके गिरने आदिका भय मत करो"॥ १८॥
श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर जलकी धाराओंसे पीडित गोप और गोपी अपने बर्तन-भाँड़ोंको छकड़ोंमें रखकर गौओंके साथ पर्वतके नीचे चले गये॥ १९॥ व्रज वासियोंद्वारा हर्ष और विस्मयपूर्वक टकटकी लगाकर देखे जाते हुए श्रीकृष्णचन्द्र भी गिरिराजको अत्यन्त निश्चलतापूर्वक धारण किये रहे॥ २०॥ जो प्रीतिपूर्वक आँखें फाड़कर देख रहे थे उन हर्षितचित्त गोप और गोपियोंसे अपने चरितोंका स्तवन होते हुए श्रीकृष्णचन्द्र पर्वतको धारण किये रहे॥ २१॥
हे विप्र! गोपोंके नाशकर्ता इन्द्रकी प्रेरणासे नन्दजीके गोकुलमें सात रात्रितक महाभयंकर मेघ बरसते रहे॥ २२॥ किंतु जब श्रीकृष्णचन्द्रने पर्वत धारणकर गोकुलकी रक्षा की तो अपनी प्रतिज्ञा व्यर्थ हो जानेसे इन्द्रने मेघोंको रोक दिया॥ २३॥ आकाशके मेघहीन हो जानेसे इन्द्रकी प्रतिज्ञा भंग हो जानेपर समस्त गोकुलवासी वहाँसे निकलकर प्रसन्नतापूर्वक फिर अपने-अपने स्थानोंपर आ गये॥ २४॥ और कृष्णचन्द्रने भी उन व्रजवासियोंके विस्मयपूर्वक देखते-देखते गिरिराज गोवर्धनको अपने स्थानपर रख दिया॥ २५॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे एकादशोऽध्यायः॥ ११॥
अ० १२] * पञ्चम अंश * ३४७
बारहवाँ अध्याय
शक्र-कृष्ण-संवाद, कृष्ण-स्तुति
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार गोवर्धनपर्वतका धारण और गोकुलकी रक्षा हो जानेपर देवराज इन्द्रको श्रीकृष्णचन्द्रका दर्शन करनेकी इच्छा हुई॥ १॥ अतः शत्रुजित् देवराज गजराज ऐरावतपर चढ़कर गोवर्धनपर्वतपर आये और वहाँ सम्पूर्ण जगत्के रक्षक गोपवेषधारी महाबलवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ग्वालबालोंके साथ गौएँ चराते देखा॥ २-३॥ हे द्विज! उन्होंने यह भी देखा कि पक्षिश्रेष्ठ गरुड अदृश्यभावसे उनके ऊपर रहकर अपने पंखोंसे उनकी छाया कर रहे हैं॥ ४॥ तब वे ऐरावतसे उतर पड़े और एकान्तमें श्रीमधुसूदनकी ओर प्रीतिपूर्वक दृष्टि फैलाते हुए मुसकाकर बोले॥ ५॥ |
|---|---|
| धृते गोवर्धने शैले परित्राते च गोकुले।<br>रोचयामास कृष्णस्य दर्शनं पाकशासनः॥ १<br>सोऽधिरुह्य महानागमैरावतममित्रजित्।<br>गोवर्धनगिरौ कृष्णं ददर्श त्रिदशेश्वरः॥ २<br>चारयन्तं महावीर्यं गास्तु गोपवपुर्धरम्।<br>कृत्स्नस्य जगतो गोपं वृतं गोपकुमारकैः॥ ३<br>गरुडं च ददर्शोच्चैरन्तर्द्धानगतं द्विज।<br>कृतच्छायं हरेर्मूर्ध्नि पक्षाभ्यां पक्षिपुङ्गवम्॥ ४<br>अवरुह्य स नागेन्द्रादेकान्ते मधुसूदनम्।<br>शक्रस्सस्मितमाहेदं प्रीतिविस्तारितेक्षणः॥ ५ |
| इन्द्र उवाच | इन्द्रने कहा— हे श्रीकृष्णचन्द्र! मैं जिसलिये आपके पास आया हूँ, वह सुनिये—हे महाबाहो! आप इसे अन्यथा न समझें॥ ६॥ हे अखिलाधार परमेश्वर! आपने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही पृथिवीपर अवतार लिया है॥ ७॥ यज्ञभंगसे विरोध मानकर ही मैंने गोकुलको नष्ट करनेके लिये महामेघोंको आज्ञा दी थी, उन्होंने यह संहार मचाया था॥ ८॥ किन्तु आपने पर्वतको उखाड़कर गौओंको बचा लिया। हे वीर! आपके इस अद्भुत कर्मसे मैं अति प्रसन्न हूँ॥ ९॥ |
|---|---|
| कृष्ण कृष्ण शृणुष्वेदं यदर्थमहमागतः।<br>त्वत्समीपं महाबाहो नैतच्चिन्त्यं त्वयान्यथा॥ ६<br>भारावतारणार्थाय पृथिव्याः पृथिवीतले।<br>अवतीर्णोऽखिलाधार त्वमेव परमेश्वर॥ ७<br>मखभंगविरोधेन मया गोकुलनाशकाः।<br>समादिष्टा महामेघास्तैश्चेदं कदनं कृतम्॥ ८ |
| हे कृष्ण! आपने जो अपने एक हाथपर गोवर्धन धारण किया है, इससे मैं देवताओंका प्रयोजन [आपके द्वारा] सिद्ध हुआ ही समझता हूँ॥ १०॥ [गोवंशकी रक्षाद्वारा] आपसे रक्षित [कामधेनु आदि] गौओंसे प्रेरित होकर ही मैं आपका विशेष सत्कार करनेके लिये यहाँ आपके पास आया हूँ॥ ११॥ हे कृष्ण! अब मैं गौओंके वक्यानुसार ही आपका उपेन्द्र-पदपर अभिषेक करूँगा तथा आप गौओंके इन्द्र (स्वामी) हैं इसलिये आपका नाम 'गोविन्द' भी होगा॥ १२॥ | |
|---|---|
| त्रातास्ताश्च त्वया गावस्समुत्पाट्य महीधरम्।<br>तेनाहं तोषितो वीरकर्मणात्यद्भुतेन ते॥ ९<br>साधितं कृष्ण देवानामहं मन्ये प्रयोजनम्।<br>त्वयायमद्रिप्रवरः करेणैकेन यद्धृतः॥ १०<br>गोभिश्च चोदितः कृष्ण त्वत्सकाशमिहागतः।<br>त्वया त्राताभिरत्यर्थं युष्मत्सत्कारकारणात्॥ ११<br>स त्वां कृष्णाभिषेक्ष्यामि गवां वाक्यप्रचोदितः।<br>उपेन्द्रत्वे गवामिन्द्रो गोविन्दस्त्वं भविष्यसि॥ १२ |
३४८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर इन्द्रने अपने वाहन गजराज ऐरावतका घण्टा लिया और उसमें पवित्र जल भरकर उससे कृष्णचन्द्रका अभिषेक किया॥ १३॥ श्रीकृष्णचन्द्रका अभिषेक होते समय गौओंने तुरन्त ही अपने स्तनोंसे टपकते हुए दुग्धसे पृथिवीको भिगो दिया॥ १४॥ |
| अथोपवाह्यादादाथ घण्टामैरावताद्गजात्।<br>अभिषेकं तया चक्रे पवित्रजलपूर्णया॥ १३ | |
| क्रियमाणेऽभिषेके तु गावः कृष्णस्य तत्क्षणात्।<br>प्रस्रवोद्भूतदुग्धाद्रां सद्यश्चक्रुर्वसुन्धराम्॥ १४ | |
| अभिषिच्य गवां वाक्यादुपेन्द्रं वै जनार्दनम्।<br>प्रीत्या सप्रश्रयं वाक्यं पुनराह शचीपतिः॥ १५ | इस प्रकार गौओंके कथनानुसार श्रीजनार्दनको उपेन्द्र-पदपर अभिषिक्त कर शचीपति इन्द्रने पुनः प्रीति और विनयपूर्वक कहा—॥ १५॥ “हे महाभाग! यह तो मैंने गौओंका वचन पूरा किया, अब पृथिवीके भार उतारनेकी इच्छासे मैं आपसे जो कुछ और निवेदन करता हूँ वह भी सुनिये॥ १६॥ हे पृथिवीधर! हे पुरुषसिंह! अर्जुन नामक मेरे अंशने पृथिवीपर अवतार लिया है; आप कृपा करके उसकी सर्वदा रक्षा करें॥ १७॥ हे मधुसूदन! वह वीर पृथिवीका भार उतारनेमें आपका साथ देगा, अतः आप उसकी अपने शरीरके समान ही रक्षा करें”॥ १८॥ |
| गवामेतत्कृतं वाक्यं तथान्यदपि मे शृणु।<br>यद्ब्रवीमि महाभाग भारावतरणेच्छया॥ १६ | |
| ममांशः पुरुषव्याघ्र पृथिव्यां पृथिवीधर।<br>अवतीर्णोऽर्जुनो नाम संरक्ष्यो भवता सदा॥ १७ | |
| भारावतरणे साह्यं स ते वीरः करिष्यति।<br>संरक्षणीयो भवता यथात्मा मधुसूदन॥ १८ | |
| श्रीभगवानुवाच | **श्रीभगवान् बोले—**भरतवंशमें पृथाके पुत्र अर्जुनने तुम्हारे अंशसे अवतार लिया है—यह मैं जानता हूँ। मैं जबतक पृथिवीपर रहूँगा, उसकी रक्षा करूँगा॥ १९॥ हे शत्रुसूदन देवेन्द्र! मैं जबतक महीतलपर रहूँगा तबतक अर्जुनको युद्धमें कोई भी न जीत सकेगा॥ २०॥ हे देवेन्द्र! विशाल भुजाओंवाला कंस नामक दैत्य, अरिष्टासुर, केशी, कुवलयापीड और नरकासुर आदि अन्यान्य दैत्योंका नाश होनेपर यहाँ महाभारत-युद्ध होगा। हे सहस्राक्ष! उसी समय पृथिवीका भार उतरा हुआ समझना॥ २१-२२॥ अब तुम प्रसन्नतापूर्वक जाओ, अपने पुत्र अर्जुनके लिये तुम किसी प्रकारकी चिन्ता मत करो; मेरे रहते हुए अर्जुनका कोई भी शत्रु सफल न हो सकेगा॥ २३॥ अर्जुनके लिये ही मैं महाभारतके अन्तमें युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डवोंको अक्षत-शरीरसे कुन्तीको दूँगा॥ २४॥ |
| जानामि भारते वंशे जातं पार्थं तवांशतः।<br>तमहं पालयिष्यामि यावत्स्थास्यामि भूतले॥ १९ | |
| यावन्महीतले शक्र स्थास्याम्यहमरिन्दम।<br>न तावदर्जुनं कश्चिद्देवेन्द्र युधि जेष्यति॥ २० | |
| कंसो नाम महाबाहुर्दैत्योऽरिष्टस्तथासुरः।<br>केशी कुवलयापीडो नरकाद्यास्तथा परे॥ २१ | |
| हतेषु तेषु देवेन्द्र भविष्यति महाहवः।<br>तत्र विद्धि सहस्राक्ष भारावतरणं कृतम्॥ २२ | |
| स त्वं गच्छ न सन्तापं पुत्रार्थे कर्तुमर्हसि।<br>नार्जुनस्य रिपुः कश्चिन्ममाग्रे प्रबविष्यति॥ २३ | |
| अर्जुनार्थे त्वहं सर्वान्युधिष्ठिरपुरोगमान्।<br>निवृत्ते भारते युद्धे कुन्त्यै दास्याम्यविक्षतान्॥ २४ | |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**कृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर देवराज इन्द्र उनका आलिंगन कर ऐरावत हाथीपर आरूढ हो स्वर्गको चले गये॥ २५॥ तदनन्तर कृष्णचन्द्र भी गोपियोंके दृष्टिपातसे पवित्र हुए मार्गद्वारा गोपकुमारों और गौओंके साथ व्रजको लौट आये॥ २६॥ |
| इत्युक्तः सम्परिष्वज्य देवराजो जनार्दनम्।<br>आरुह्यैरावतं नागं पुनरेव दिवं ययौ॥ २५ | |
| कृष्णो हि सहितो गोभिर्गोपालैश्च पुनर्व्रजम्।<br>आजगामाथ गोपीनां दृष्टिपूतेन वर्त्मना॥ २६ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥