विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 351, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 351
| ३४० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ९ |
|---|
| सोमो मनस्ते श्वसितं समीरणो<br> दिशश्चतस्रोऽव्यय बाहवस्ते ॥ २६<br><br>सहस्रवक्त्रो भगवन्महात्मा<br> सहस्रहस्ताङ्घ्रिशरीरभेदः ।<br>सहस्रपद्मोद्भवयोनिराद्य-<br> स्सहस्रशस्त्वां मुनयो गृणन्ति ॥ २७<br><br>दिव्यं हि रूपं तव वेत्ति नान्यो<br> देवैरशेषैरवताररूपम् ।<br>तदर्च्यते वेत्सि न किं यदन्ते<br> त्वय्येव विश्वं लयमभ्युपैति ॥ २८<br><br>त्वया धृतेयं धरणी बिभर्ति<br> चराचरं विश्वमनन्तमूर्ते ।<br>कृतादिभेदैरज कालरूपो<br> निमेषपूर्वो जगदेतदत्सि ॥ २९<br><br>अत्तं यथा बाडववह्निनाम्बु<br> हिमस्वरूपं परिगृह्य कास्तम्* ।<br>हिमाचले भानुमतोऽंशुसंगा-<br> ज्जलत्वमभ्येति पुनस्तदेव ॥ ३०<br><br>एवं त्वया संहरणेऽत्तमेत-<br> ज्जगत्समस्तं त्वदधीनकं पुनः ।<br>तवैव सर्गाय समुद्यतस्य<br> जगत्त्वमभ्येत्यनुकल्पमीश ॥ ३१<br><br>भवानहं च विश्वात्मन्नेकमेव च कारणम् ।<br>जगतोऽस्य जगत्यर्थे भेदेनावां व्यवस्थितौ ॥ ३२<br><br>तत्स्मर्यताममेयात्मंस्त्वयात्मा जहि दानवम् ।<br>मानुष्यमेवावलम्ब्य बन्धूनां क्रियतां हितम् ॥ ३३<br><br> श्रीपराशर उवाच<br>इति संस्मारितो विप्र कृष्णेन सुमहात्मना ।<br>विहस्य पीडयामास प्रलम्बं बलवान्बलः ॥ ३४<br><br>मुष्टिना सोऽहनन्मूर्ध्नि कोपसंरक्तलोचनः ।<br>तेन चास्य प्रहारेण बहिर्याते विलोचने ॥ ३५ | हैं, पृथिवी चरण हैं, अग्नि मुख है, चन्द्रमा मन है, वायु श्वास-प्रश्वास हैं और चारों दिशाएँ बाहु हैं॥ २६॥ हे भगवन्! आप महाकाय हैं, आपके सहस्र मुख हैं तथा सहस्रों हाथ, पाँव आदि शरीरके भेद हैं। आप सहस्रों ब्रह्माओंके आदिकारण हैं, मुनिजन आपका सहस्रों प्रकार वर्णन करते हैं॥ २७॥ आपके दिव्य रूपको [आपके अतिरिक्त] और कोई नहीं जानता, अतः समस्त देवगण आपके अवताररूपकी ही उपासना करते हैं। क्या आपको विदित नहीं है कि अन्तमें यह सम्पूर्ण विश्व आपहीमें लीन हो जाता है॥ २८॥ हे अनन्तमूर्ते! आपहीसे धारण की हुई यह पृथिवी सम्पूर्ण चराचर विश्वको धारण करती है। हे अज! निमेषादि कालरूप आप ही कृतयुग आदि भेदोंसे इस जगत्का ग्रास करते हैं॥ २९॥ जिस प्रकार बडवानलसे पीया हुआ जल वायुद्वारा हिमालयतक पहुँचाये जानेपर हिमका रूप धारण कर लेता है और फिर सूर्यकिरणोंका संयोग होनेसे जलरूप हो जाता है, उसी प्रकार हे ईश! यह समस्त जगत् [रुद्रादिरूपसे] आपहीके द्वारा विनष्ट होकर आप [परमेश्वर]-के ही अधीन रहता है और फिर प्रत्येक कल्पमें आपके [हिरण्यगर्भरूपसे] सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त होनेपर यह [विराट्रूपसे] स्थूल जगद्रूप हो जाता है॥ ३०-३१॥ हे विश्वात्मन्! आप और मैं दोनों ही इस जगत्के एकमात्र कारण हैं। संसारके हितके लिये ही हमने भिन्न-भिन्न रूप धारण किये हैं॥ ३२॥ अतः हे अमेयात्मन्! आप अपने स्वरूपको स्मरण कीजिये और मनुष्यभावका ही अवलम्बन कर इस दैत्यको मारकर बन्धुजनोंका हित-साधन कीजिये॥ ३३॥<br><br> श्रीपराशरजी बोले— हे विप्र! महात्मा कृष्णचन्द्रद्वारा इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर महाबलवान् बलरामजी हँसते हुए प्रलम्बासुरको पीडित करने लगे॥ ३४॥ उन्होंने क्रोधसे नेत्र लाल करके उसके मस्तकपर एक घूँसा मारा, जिसकी चोटसे उस दैत्यके दोनों नेत्र बाहर निकल आये॥ ३५॥ |
* कम् अस्तम्=प्रक्षिप्तम्।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth