विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ९ ] * पञ्चम अंश * ३३९
श्रीदाम्ना सह गोविन्दः प्रलम्बेन तथा बलः।
गोपालैरपरैश्चान्ये गोपालाः पुप्लुवुस्ततः ॥ १३
श्रीदामानं ततः कृष्णः प्रलम्बं रोहिणीसुतः।
जितवान्कृष्णपक्षीयैर्गोपैरन्ये पराजिताः ॥ १४
ते वाहयन्तस्त्वन्योन्यं भाण्डीरं वटमेत्य वै।
पुनर्निववृतुस्सर्वे ये ये तत्र पराजिताः ॥ १५
सङ्कर्षणं तु स्कन्धेन शीघ्रमुत्क्षिप्य दानवः।
नभःस्थलं जगामाशु सचन्द्र इव वारिदः ॥ १६
असहन् रौहिणेयस्य स भारं दानवोत्तमः।
ववृधे स महाकायः प्रावृषीव बलाहकः ॥ १७
सङ्कर्षणस्तु तं दृष्ट्वा दग्धशैलोपमाकृतिम्।
स्रग्दामलम्बाभरणं मुकुटाटोपमस्तकम् ॥ १८
रौद्रं शकटचक्राक्षं पादन्यासचलक्षितिम्।
अभीतमनसा तेन रक्षसा रोहिणीसुतः।
ह्रियमाणस्ततः कृष्णमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १९
कृष्ण कृष्ण हिये ह्येष पर्वतोदग्रमूर्त्तिना।
केनापि पश्य दैत्येन गोपालच्छद्मरूपिणा ॥ २०
यदत्र साम्प्रतं कार्यं मया मधुनिषूदन।
तत्कथ्यतां प्रयात्येष दुरात्मातित्वरान्वितः ॥ २१
श्रीपराशर उवाच
तमाह रामं गोविन्दः स्मितभिन्नोष्ठसम्पुटः।
महात्मा रौहिणेयस्य बलवीर्य्यप्रमाणवित् ॥ २२
श्रीकृष्ण उवाच
किमयं मानुषो भावो व्यक्तमेवावलम्ब्यते।
सर्वात्मन् सर्वगुह्यानां गुह्यगुह्यात्मना त्वया ॥ २३
स्मराशेषजगद्बीजकारणं कारणाग्रजम्।
आत्मानमेकं तद्वच्च जगत्येकार्णवे च यत् ॥ २४
किं न वेत्सि यथाहं च त्वं चैकं कारणं भुवः।
भारावतारणार्थाय मर्त्यलोकमुपागतौ ॥ २५
नभश्शिरस्तेऽम्बुवहाश्च केशाः
पादौ क्षितिर्वक्त्रमनन्त वह्निः।
तब श्रीदामाके साथ कृष्णचन्द्र, प्रलम्बके साथ बलराम और इसी प्रकार अन्यान्य गोपोंके साथ और-और ग्वालबाल [होड़ बदकर] उछलते हुए चलने लगे॥ १३॥ अन्तमें, कृष्णचन्द्रने श्रीदामाको, बलरामजीने प्रलम्बको तथा अन्यान्य कृष्णपक्षीय गोपोंने अपने प्रतिपक्षियोंको हरा दिया॥ १४॥
उस खेलमें जो-जो बालक हारे थे, वे सब जीतनेवालोंको अपने-अपने कन्धोंपर चढ़ाकर भाण्डीरवटतक ले जाकर वहाँसे फिर लौट आये॥ १५॥ किन्तु प्रलम्बासुर अपने कन्धेपर बलरामजीको चढ़ाकर चन्द्रमाके सहित मेघके समान अत्यन्त वेगसे आकाशमण्डलको चल दिया॥ १६॥ वह दानवश्रेष्ठ रोहिणीनन्दन श्रीबलभद्रजीके भारको सहन न कर सकनेके कारण वर्षाकालीन मेघके समान बढ़कर अत्यन्त स्थूल शरीरवाला हो गया॥ १७॥ तब माला और आभूषण धारण किये, सिरपर मुकुट पहने, गाड़ीके पहियोंके समान भयानक नेत्रोंवाले, अपने पादप्रहारसे पृथिवीको कम्पायमान करते हुए तथा दग्धपर्वतके समान आकारवाले उस दैत्यको देखकर उस निर्भय राक्षसके द्वारा ले जाये जाते हुए बलभद्रजीने कृष्णचन्द्रसे कहा—॥ १८-१९॥
"भैया कृष्ण! देखो, छद्मपूर्वक गोपवेष धारण करनेवाला कोई पर्वतके समान महाकाय दैत्य मुझे हरे लिये जाता है॥ २०॥ हे मधुसूदन! अब मुझे क्या करना चाहिये, यह बतलाओ। देखो, यह दुरात्मा बड़ी शीघ्रतासे दौड़ा जा रहा है"॥ २१॥
श्रीपराशरजी बोले—तब रोहिणीनन्दनके बलवीर्यको जाननेवाले महात्मा श्रीकृष्णचन्द्रने मधुर-मुसकानसे अपने ओष्ठसम्पुटको खोलते हुए उन बलरामजीसे कहा॥ २२॥
श्रीकृष्णचन्द्र बोले—हे सर्वात्मन्! आप सम्पूर्ण गुह्य पदार्थोंमें अत्यन्त गुह्यस्वरूप होकर भी यह स्पष्ट मानवभाव क्यों अवलम्बन कर रहे हैं?॥ २३॥ आप अपने उस स्वरूपका स्मरण कीजिये जो समस्त संसारका कारण तथा कारणका भी पूर्ववर्ती है और प्रलयकालमें भी स्थित रहनेवाला है॥ २४॥ क्या आपको मालूम नहीं है कि आप और मैं दोनों ही इस संसारके एकमात्र कारण हैं और पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही मर्त्यलोकमें आये हैं॥ २५॥
हे अनन्त! आकाश आपका सिर है, मेघ केश