विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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३३८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ९
नवाँ अध्याय प्रलम्ब-वध
| श्रीपराशर उवाच | |
|---|---|
| तस्मिन् रासभदैतेये सानुगे विनिपातिते।<br>सौम्यं तद्गोपगोपीनां रम्यं तालवनं बभौ॥ १ | **श्रीपराशरजी बोले—**अपने अनुचरोंसहित उस गर्दभासुरके मारे जानेपर वह सुरम्य तालवन गोप और गोपियोंके लिये सुखदायक हो गया॥ १॥ |
| ततस्तौ जातहर्षौ तु वसुदेवसुतावुभौ।<br>हत्वा धेनुकदैतेयं भाण्डीरवटमागतौ॥ २ | तदनन्तर धेनुकासुरको मारकर वे दोनों वसुदेवपुत्र प्रसन्नमनसे भाण्डीर नामक वटवृक्षके तले आये॥ २॥ |
| क्ष्वेलमानौ प्रगायन्तौ विचिन्वन्तौ च पादपान्।<br>चारयन्तौ च गा दूरे व्याहरन्तौ च नामभिः॥ ३ | कन्धेपर गौ बाँधनेकी रस्सी डाले और वनमालासे विभूषित हुए वे दोनों महात्मा बालक सिंहनाद करते, गाते, वृक्षोंपर चढ़ते, दूरतक गौएँ चराते तथा उनका नाम ले-लेकर पुकारते हुए नये सींगोंवाले बछड़ोंके समान सुशोभित हो रहे थे॥ ३-४॥ |
| निर्योंगपाशस्कन्धौ तौ वनमालाविभूषितौ।<br>शुशुभाते महात्मानौ बालशृङ्गाविवर्षभौ॥ ४ | उन दोनोंके वस्त्र [क्रमशः] सुनहरी और श्याम रंगसे रँगे हुए थे अतः वे इन्द्रधनुषयुक्त श्वेत और श्याम मेघके समान जान पड़ते थे॥ ५॥ |
| सुवर्णाञ्जनचूर्णाभ्यां तौ तदा रूषिताम्बरौ।<br>महेन्द्रायुधसंयुक्तौ श्वेतकृष्णाविवाम्बुदौ॥ ५ | वे समस्त लोकपालोंके प्रभु पृथिवीपर अवतीर्ण होकर नाना प्रकारकी लौकिक लीलाओंसे परस्पर खेल रहे थे॥ ६॥ |
| चेरतुर्लोकसिद्धाभिः क्रीडाभिरितरेतरम्।<br>समस्तलोकनाथानां नाथभूतौ भुवं गतौ॥ ६ | मनुष्यधर्ममें तत्पर रहकर मनुष्यताका सम्मान करते हुए वे मनुष्यजातिके गुणोंकी क्रीडाएँ करते हुए वनमें विचर रहे थे॥ ७॥ |
| मनुष्यधर्माभिरतौ मानयन्तौ मनुष्यताम्।<br>तज्जातिगुणयुक्ताभिः क्रीडाभिश्चेरतुर्वनम्॥ ७ | वे दोनों महाबली बालक कभी झूलामें झूलकर, कभी परस्पर मल्लयुद्धकर और कभी पत्थर फेंककर नाना प्रकारसे व्यायाम कर रहे थे॥ ८॥ |
| ततस्वान्दोलिकाभिश्च नियुद्धैश्च महाबलौ।<br>व्यायामं चक्रतुस्तत्र क्षेपणीयैस्तथाश्मभिः॥ ८ | इसी समय उन दोनों खेलते हुए बालकोंको उठा ले जानेकी इच्छासे प्रलम्ब नामक दैत्य गोपवेषमें अपनेको छिपाकर वहाँ आया॥ ९॥ |
| तल्लिप्सुरसुरस्तत्र ह्युभयो रममाणयोः।<br>आजगाम प्रलम्बाख्यो गोपवेषतिरोहितः॥ ९ | दानवश्रेष्ठ प्रलम्ब मनुष्य न होनेपर भी मनुष्यरूप धारणकर निश्शंकभावसे उन बालकोंके बीच घुस गया॥ १०॥ |
| सोऽवगाहत निश्शंकस्तेषां मध्यममानुषः।<br>मानुषं वपुरास्थाय प्रलम्बो दानवोत्तमः॥ १० | उन दोनोंकी असावधानताका अवसर देखनेवाले उस दैत्यने कृष्णको तो सर्वथा अजेय समझा; अतः उसने बलरामजीको मारनेका निश्चय किया॥ ११॥ |
| तयोश्छिद्रान्तरप्रेप्सुर्विषह्यममन्यत।<br>कृष्णं ततो रौहिणेयं हन्तुं चक्रे मनोरथम्॥ ११ | तदनन्तर वे समस्त ग्वालबाल हरिणाक्रीडन* नामक खेल खेलते हुए आपसमें एक साथ दो-दो बालक उठे॥ १२॥ |
| हरिणाक्रीडनं नाम बालक्रीडनकं ततः।<br>प्रकुर्वन्तो हि ते सर्वे द्वौ द्वौ युगपदुत्थितौ॥ १२ |
* एक निश्चित लक्ष्यके पास दो-दो बालक एक-एक साथ हिरनकी भाँति उछलते हुए जाते हैं। जो दोनोंमें पहले पहुँच जाता है वह विजयी होता है, हारा हुआ बालक जीते हुएको अपनी पीठपर चढ़ाकर मुख्य स्थानतक ले आता है। यही हरिणाक्रीडन है।