भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 348

अ० ८ ] * पञ्चम अंश * ३३७


आठवाँ अध्याय

धेनुकासुर-वध

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
गाः पालयन्तौ च पुनः सहितौ बलकेशवौ।<br>भ्रममाणौ वने तस्मिन् रम्यं तालवनं गतौ ॥ १एक दिन बलराम और कृष्ण साथ-साथ गौ चराते अति रमणीय तालवनमें आये॥ १॥
तत्तु तालवनं दिव्यं धेनुको नाम दानवः।<br>मृगमांसकृताहारः सदाध्यास्ते खराकृतिः ॥ २उस दिव्य तालवनमें धेनुक नामक एक गधेके आकारवाला दैत्य मृगमांसका आहार करता हुआ सदा रहा करता था॥ २॥
तत्तु तालवनं पक्वफलसम्पत्समन्वितम्।<br>दृष्ट्वा स्पृहान्विता गोपाः फलादानेऽब्रुवन्वचः ॥ ३उस तालवनको पके फलोंकी सम्पत्तिसे सम्पन्न देखकर उन्हें तोड़नेकी इच्छासे गोपगण बोले॥ ३॥
गोपा ऊचुःगोपोंने कहा—
हे राम हे कृष्ण सदा धेनुकेनैष रक्ष्यते।<br>भूप्रदेशो यतस्तस्मात्पक्वानीमानि सन्ति वै ॥ ४भैया राम और कृष्ण! इस भूमिप्रदेशकी रक्षा सदा धेनुकासुर करता है, इसीलिये यहाँ ऐसे पके-पके फल लगे हुए हैं॥ ४॥
फलानि पश्य तालानां गन्धामोदितदींशि वै।<br>वयमेतान्यभीप्सामः पात्यन्तां यदि रोचते ॥ ५अपनी गन्धसे सम्पूर्ण दिशाओंको आमोदित करनेवाले ये ताल-फल तो देखो; हमें इन्हें खानेकी इच्छा है; यदि आपको अच्छा लगे तो [थोड़े-से] झाड़ दीजिये॥ ५॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
इति गोपकुमाराणां श्रुत्वा संकर्षणो वचः।<br>एतत्कर्त्तव्यमित्युक्त्वा पातयामास तानि वै।<br>कृष्णश्च पातयामास भुवि तानि फलानि वै ॥ ६गोपकुमारोंके ये वचन सुनकर बलरामजीने 'ऐसा ही करना चाहिये' यह कहकर फल गिरा दिये और पीछे कुछ फल कृष्णचन्द्रने भी पृथिवीपर गिराये॥ ६॥
फलानां पततां शब्दमाकर्ण्य सुदुरासदः।<br>आजगाम स दुष्टात्मा कोपादैतेयगर्दभः ॥ ७गिरते हुए फलोंका शब्द सुनकर वह दुर्धर्ष और दुरात्मा गर्दभासुर क्रोधपूर्वक दौड़ आया
पद्भ्यामुभाभ्यां स तदा पश्चिमाभ्यां बलं बली।<br>जघानोरसि ताभ्यां च स च तेनाभ्यगृह्यत ॥ ८और उस महाबलवान् असुरने अपने पिछले दो पैरोंसे बलरामजीकी छातीमें लात मारी। बलरामजीने उसके उन पैरोंको पकड़ लिया और आकाशमें घुमाने लगे।
गृहीत्वा भ्रामयामास सोऽम्बरे गतजीवितम्।<br>तस्मिन्नेव स चिक्षेप वेगेन तृणराजनि ॥ ९जब वह निर्जीव हो गया तो उसे अत्यन्त वेगसे उस तालवृक्षपर ही दे मारा॥ ७—९॥
ततः फलान्यनेकानि तालाग्रान्निपतन्खरः।<br>पृथिव्यां पातयामास महावातो घनानिव ॥ १०उस गधेने गिरते-गिरते उस तालवृक्षसे बहुत-से फल इस प्रकार गिरा दिये जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको गिरा दे॥ १०॥
अन्यांश्च सजातीयानागतान्र्दैत्यगर्दभान्।<br>कृष्णश्चिक्षेप तालाग्रे बलभद्रश्च लीलया ॥ ११उसके सजातीय अन्य गर्दभासुरोंके आनेपर भी कृष्ण और रामने उन्हें अनायास ही तालवृक्षोंपर पटक दिया॥ ११॥
क्षणेनालङ्कृता पृथ्वी पक्ववैस्तालफलैस्तदा।<br>दैत्यगर्दभदेहैश्र्च मैत्रेय शुशुभेऽधिकम् ॥ १२हे मैत्रेय! इस प्रकार एक क्षणमें ही पके हुए तालफलों और गर्दभासुरोंके देहोंसे विभूषिता होकर पृथिवी अत्यन्त सुशोभित होने लगी॥ १२॥
ततो गावो निराबाधास्तस्मिंस्तालवने द्विज।<br>नवशष्पं सुखं चेरुर्यन्न भुक्तमभूत्पुरा ॥ १३हे द्विज! तबसे उस तालवनमें गौएँ निर्विघ्न होकर सुखपूर्वक नवीन तृण चरने लगीं जो उन्हें पहले कभी चरनेको नसीब नहीं हुआ था॥ १३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥