विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३३६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ७ |
|---|
सर्पजातिरियं क्रूरा यस्यां जातोऽस्मि केशव।
तत्स्वभावोऽयमत्रास्ति नापराधो ममाच्युत ॥ ७१
सृज्यते भवता सर्वं तथा संह्रियते जगत्।
जातिरूपस्वभावाश्च सृज्यन्ते सृजता त्वया ॥ ७२
यथाहं भवता सृष्टो जात्या रूपेण चेश्वर।
स्वभावेन च संयुक्तस्तथेदं चेष्टितं मया ॥ ७३
यद्यन्यथा प्रवर्तेयं देवदेव ततो मयि।
न्याय्यो दण्डनिपातो वै तवैव वचनं यथा ॥ ७४
तथाप्यज्ञे जगत्स्वामिन्दण्डं पातितवान्मयि।
स श्लाघ्योऽयं परो दण्डस्त्वत्तो मे नान्यतो वरः ॥ ७५
हतवीर्यो हतविषो दमितोऽहं त्वयाच्युत।
जीवितं दीयतामेकमाज्ञापय करोमि किम् ॥ ७६
श्रीभगवानुवाच
नात्र स्थेयं त्वया सर्प कदाचिद्यमुनाजले।
सपुत्रपरिवारस्त्वं समुद्रसलिलं व्रज ॥ ७७
मत्पदानि च ते सर्प दृष्ट्वा मूर्द्धनि सागरे।
गरुडः पन्नगरिपुस्त्वयि न प्रहरिष्यति ॥ ७८
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा सर्पराजं तं मुमोच भगवान्हरिः।
प्रणम्य सोऽपि कृष्णाय जगाम पयसां निधिम् ॥ ७९
पश्यतां सर्वभूतानां सभृत्यसुतबान्धवः।
समस्तभार्यासहितः परित्यज्य स्वकं ह्रदम् ॥ ८०
गते सर्पे परिष्वज्य मृतं पुनरिवागतम्।
गोपा मूर्द्धनि हार्देन सिषिचुर्नेत्रजैर्जलैः ॥ ८१
कृष्णमक्लिष्टकर्माणमन्ये विस्मितचेतसः।
तुष्टुवुर्मुदिता गोपा दृष्ट्वा शिवजलां नदीम् ॥ ८२
गीयमानः स गोपीभिश्चरितैस्साधुचेष्टितैः।
संस्तूयमानो गोपैश्च कृष्णो व्रजमुपागमत् ॥ ८३
सर्वथा असमर्थ हूँ, मेरी चित्तवृत्ति तो केवल आपकी कृपाकी ओर ही लगी हुई है, अतः आप मुझपर प्रसन्न होइये ॥ ७० ॥ हे केशव ! मेरा जिसमें जन्म हुआ है वह सर्पजाति अत्यन्त क्रूर होती है, यह मेरा जातीय स्वभाव है। हे अच्युत ! इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है ॥ ७१ ॥ इस सम्पूर्ण जगत्की रचना और संहार आप ही करते हैं। संसारकी रचनाके साथ उसके जाति, रूप और स्वभावोंको भी आप ही बनाते हैं ॥ ७२ ॥
हे ईश्वर ! आपने मुझे जाति, रूप और स्वभावसे युक्त करके जैसा बनाया है उसीके अनुसार मैंने यह चेष्टा भी की है ॥ ७३ ॥ हे देवदेव ! यदि मेरा आचरण विपरीत हो तब तो अवश्य आपके कथनानुसार मुझे दण्ड देना उचित है ॥ ७४ ॥ तथापि हे जगत्स्वामिन् ! आपने मुझ अज्ञको जो दण्ड दिया है वह आपसे मिला हुआ दण्ड मेरे लिये कहीं अच्छा है, किन्तु दूसरेका वर भी अच्छा नहीं ॥ ७५ ॥ हे अच्युत ! आपने मेरे पुरुषार्थ और विषको नष्ट करके मेरा भली प्रकार मानमर्दन कर दिया है। अब केवल मुझे प्राणदान दीजिये और आज्ञा कीजिये कि मैं क्या करूँ ? ॥ ७६ ॥
श्रीभगवान् बोले— हे सर्प ! अब तुझे इस यमुनाजलमें नहीं रहना चाहिये। तू शीघ्र ही अपने पुत्र और परिवारके सहित समुद्रके जलमें चला जा ॥ ७७ ॥ तेरे मस्तकपर मेरे चरण-चिह्नोंको देखकर समुद्रमें रहते हुए भी सर्पोंका शत्रु गरुड तुझपर प्रहार नहीं करेगा ॥ ७८ ॥
श्रीपराशरजी बोले— सर्पराज कालियसे ऐसा कह भगवान् हरिने उसे छोड़ दिया और वह उन्हें प्रणाम करके समस्त प्राणियोंके देखते-देखते अपने सेवक, पुत्र, बन्धु और स्त्रियोंके सहित अपने उस कुण्डको छोड़कर समुद्रको चला गया ॥ ७९-८० ॥ सर्पके चले जानेपर गोपगण, लौटे हुए मृत पुरुषके समान कृष्णचन्द्रको आलिंगनकर प्रीतिपूर्वक उनके मस्तकको नेत्रजलसे भिगोने लगे ॥ ८१ ॥ कुछ अन्य गोपगण यमुनाको स्वच्छ जलवाली देख प्रसन्न होकर लीलाविहारी कृष्णचन्द्रकी विस्मितचित्तसे स्तुति करने लगे ॥ ८२ ॥ तदनन्तर अपने उत्तम चरित्रोंके कारण गोपियोंसे गीयमान और गोपोंसे प्रशंसित होते हुए कृष्णचन्द्र व्रजमें चले आये ॥ ८३ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥