भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 346

अ० ७ ] * पञ्चम अंश * ३३५


ततः कुरु जगत्स्वामिन्प्रसादमवसीदतः । प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षा प्रदीयताम् ॥ ५७

भुवनेश जगन्नाथ महापुरुष पूर्वज । प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षां प्रयच्छ नः ॥ ५८

वेदान्तवेद्य देवेश दुष्टदैत्यनिबर्हण । प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षा प्रदीयताम् ॥ ५९

श्रीपराशर उवाच

इत्युक्ते ताभिराश्वस्य क्लान्तदेहोऽपि पन्नगः । प्रसीद देवदेवेति प्राह वाक्यं शनैः शनैः ॥ ६०

कालिय उवाच

तवाष्टगुणमैश्वर्यं नाथ स्वाभाविकं परम् । निरस्तातिशयं यस्य तस्य स्तोष्यामि किन्वहम् ॥ ६१

त्वं परस्त्वं परस्याद्यः परं त्वत्तः परात्मक । परस्मात्परमो यस्त्वं तस्य स्तोष्यामि किन्वहम् ॥ ६२

यस्माद्ब्रह्मा च रुद्रश्च चन्द्रेन्द्रमरुदश्विनः । वसवश्च सहादित्यैस्तस्य स्तोष्यामि किन्वहम् ॥ ६३

एकावयवसूक्ष्मांशो यस्यैतदखिलं जगत् । कल्पनावयवश्यांशस्तस्य स्तोष्यामि किन्वहम् ॥ ६४

सदसद्रूपिणो यस्य ब्रह्माद्यास्त्रिदशेश्वराः । परमार्थं न जानन्ति तस्य स्तोष्यामि किन्वहम् ॥ ६५

ब्रह्माद्यैरर्चितो यस्तु गन्धपुष्पानुलेपनैः । नन्दनादिसमुद्भूतैस्सोऽर्च्यते वा कथं मया ॥ ६६

यस्यावताररूपाणि देवराजस्सदार्चति । न वेत्ति परमं रूपं सोऽर्च्यते वा कथं मया ॥ ६७

विषयेभ्यस्समावृत्य सर्वाक्षाणि च योगिनः । यमर्चयन्ति ध्यानेन सोऽर्च्यते वा कथं मया ॥ ६८

हृदि संकल्प्य यद्रूपं ध्यानेनार्चन्ति योगिनः । भावपुष्पादिना नाथः सोऽर्च्यते वा कथं मया ॥ ६९

सोऽहं ते देवदेवेश नार्चनादौ स्तुतौ न च । सामर्थ्यवान् कृपामात्रमनोवृत्तिः प्रसीद मे ॥ ७०


अखिलभुवनाश्रय आप? [इसके साथ आपका द्वेष कैसा ?] ॥ ५६ ॥ अतः हे जगत्स्वामिन्! इस दीनपर दया कीजिये। हे प्रभो! अब यह नाग अपने प्राण छोड़ने ही चाहता है; कृपया हमें पतिकी भिक्षा दीजिये ॥ ५७ ॥ हे भुवनेश्वर ! हे जगन्नाथ ! हे महापुरुष ! हे पूर्वज ! यह नाग अब अपने प्राण छोड़ना ही चाहता है; कृपया आप हमें पतिकी भिक्षा दीजिये ॥ ५८ ॥ हे वेदान्तवेद्यदेवेश्वर ! हे दुष्ट-दैत्य-दलन !! अब यह नाग अपने प्राण छोड़ना ही चाहता है; आप हमें पतिकी भिक्षा दीजिये ॥ ५९ ॥

श्रीपराशरजी बोले— नागपत्नियोंके ऐसा कहनेपर थका-मांदा होनेपर भी नागराज कुछ ढाँढस बाँधकर धीरे-धीरे कहने लगा "हे देवदेव! प्रसन्न होइये" ॥ ६० ॥

कालियनाग बोला— हे नाथ! आपका स्वाभाविक अष्टगुण विशिष्ट परम ऐश्वर्य निरतिशय है [अर्थात् आपसे बढ़कर किसीका भी ऐश्वर्य नहीं है], अतः मैं किस प्रकार आपकी स्तुति कर सकूँगा ? ॥ ६१ ॥ आप पर हैं, आप पर (मूलप्रकृति)-के भी आदिकारण हैं, हे परात्मक! परकी प्रवृत्ति भी आपहीसे हुई है, अतः आप परसे भी पर हैं फिर मैं किस प्रकार आपकी स्तुति कर सकूँगा ? ॥ ६२ ॥ जिनसे ब्रह्मा, रुद्र, चन्द्र, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, वसुगण और आदित्य आदि सभी उत्पन्न हुए हैं उन आपकी मैं किस प्रकार स्तुति कर सकूँगा ? ॥ ६३ ॥ यह सम्पूर्ण जगत् जिनके काल्पनिक अवयवका एक सूक्ष्म अवयवांशमात्र है, उन आपकी मैं किस प्रकार स्तुति कर सकूँगा ? ॥ ६४ ॥ जिन सदसत् (कार्य-कारण) स्वरूपके वास्तविक रूपको ब्रह्मा आदि देवेश्वरगण भी नहीं जानते उन आपकी मैं किस प्रकार स्तुति कर सकूँगा ? ॥ ६५ ॥ जिनकी पूजा ब्रह्मा आदि देवगण नन्दनवनके पुष्प, गन्ध और अनुलेपन आदिसे करते हैं उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर सकता हूँ ॥ ६६ ॥ देवराज इन्द्र जिनके अवताररूपोंकी सर्वदा पूजा करते हैं तथापि यथार्थ रूपको नहीं जान पाते, उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर सकता हूँ ? ॥ ६७ ॥ योगिगण अपनी समस्त इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे खींचकर जिनका ध्यानद्वारा पूजन करते हैं, उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर सकता हूँ ॥ ६८ ॥ जिन प्रभुके स्वरूपकी चित्तमें भावना करके योगिजन भावमय पुष्प आदिसे ध्यानद्वारा उपासना करते हैं उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर सकता हूँ ? ॥ ६९ ॥

हे देवेश्वर ! आपकी पूजा अथवा स्तुति करनेमें मैं