विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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३३४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ७
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर, मधुर मुसकानसे अपने ओष्ठसम्पुटको खोलते हुए श्रीकृष्णचन्द्रने उछलकर अपने शरीरको सर्पके बन्धनसे छुड़ा लिया ॥ ४३ ॥ और फिर अपने दोनों हाथोंसे उसका बीचका फण झुकाकर उस नतमस्तक सर्पके ऊपर चढ़कर बड़े वेगसे नाचने लगे ॥ ४४ ॥ |
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| इति संस्मारितः कृष्णः स्मितभिन्नोष्ठसम्पुटः ।<br>आस्फोट्य मोचयामास स्वदेहं भोगिबन्धनात् ॥ ४३ | |
| आनम्य चापि हस्ताभ्यामुभाभ्यां मध्यमं शिरः ।<br>आरुह्याभुग्नशिरसः प्रननर्त्तोरुविक्रमः ॥ ४४ | |
| प्राणाः फणेऽभवंश्चास्य कृष्णास्याङ्घ्रिनिकुट्टनैः ।<br>यत्रोन्नतिं च कुरुते ननामास्य ततशिरः ॥ ४५ | कृष्णचन्द्रके चरणोंकी धमकसे उसके प्राण मुखमें आ गये, वह अपने जिस मस्तकको उठाता उसीपर कूदकर भगवान् उसे झुका देते ॥ ४५ ॥ श्रीकृष्णचन्द्रजीकी भ्रान्ति (भ्रम), रेचक तथा दण्डपात नामकी [नृत्यसम्बन्धिनी] गतियोंके ताडनसे वह महासर्प मूर्च्छित हो गया और उसने बहुत-सा रुधिर वमन किया ॥ ४६ ॥ इस प्रकार उसके सिर और ग्रीवाओंको झुके हुए तथा मुखोंसे रुधिर बहता देख उसकी पत्नियाँ करुणासे भरकर श्रीकृष्णचन्द्रके पास आयीं ॥ ४७ ॥ |
| मूर्च्छांमुपाययौ भ्रान्त्या नागः कृष्णस्य रेचकैः ।<br>दण्डपातनिपातेन ववाम रुधिरं बहु ॥ ४६ | |
| तं विभुग्नशिरोग्रीवमास्येभ्यःस्रुतशोणितम् ।<br>विलोक्यं करुणं जग्मुस्तत्पत्न्यो मधुसूदनम् ॥ ४७ | |
| नागपत्न्य ऊचुः | नागपत्नयाँ बोलीं—हे देवदेवेश्वर ! हमने आपको पहचान लिया; आप सर्वज्ञ और सर्वश्रेष्ठ हैं, जो अचिन्त्य और परम ज्योति है आप उसीके अंश परमेश्वर हैं ॥ ४८ ॥ जिन स्वयम्भू और व्यापक प्रभुकी स्तुति करनेमें देवगण भी समर्थ नहीं हैं उन्हीं आपके स्वरूपका हम स्त्रियाँ किस प्रकार वर्णन कर सकती हैं ? ॥ ४९ ॥ पृथिवी, आकाश, जल, अग्नि और वायुस्वरूप यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनका छोटे-से-छोटा अंश है, उसकी स्तुति हम किस प्रकार कर सकेंगी ॥ ५० ॥ योगिजन जिनके नित्यस्वरूपको यत्न करनेपर भी नहीं जान पाते तथा जो परमार्थरूप अणुसे भी अणु और स्थूलसे भी स्थूल है उसे हम नमस्कार करती हैं ॥ ५१ ॥ जिनके जन्ममें विधाता और अन्तमें काल हेतु नहीं हैं तथा जिनका स्थितिकर्ता भी कोई अन्य नहीं है उन्हें सर्वदा नमस्कार करती हैं ॥ ५२ ॥ इस कालियनागके दमनमें आपको थोड़ा-सा भी क्रोध नहीं है, केवल लोकरक्षा ही इसका हेतु है; अतः हमारा निवेदन सुनिये ॥ ५३ ॥ हे क्षमाशीलोंमें श्रेष्ठ ! साधु पुरुषोंको स्त्रियों तथा मूढ़ और दीन जन्तुओंपर सदा ही कृपा करनी चाहिये; अतः आप इस दीनका अपराध क्षमा कीजिये ॥ ५४ ॥ प्रभो ! आप सम्पूर्ण संसारके अधिष्ठान हैं और यह सर्प तो [आपकी अपेक्षा] अत्यन्त बलहीन है। आपके चरणोंसे पीड़ित होकर तो यह आधे मुहूर्तमें ही अपने प्राण छोड़ देगा ॥ ५५ ॥<br>हे अव्यय ! प्रीति समानसे और द्वेष उत्कृष्टसे देखे जाते हैं; फिर कहाँ तो यह अल्पवीर्य सर्प और कहाँ |
| ज्ञातोऽसि देवदेवेश सर्वज्ञस्त्वमनुत्तमः ।<br>परं ज्योतिरचिन्त्यं यत्तदंशः परमेश्वरः ॥ ४८ | |
| न समर्थाः सुरास्तोतुं यमनन्यभवं विभुम् ।<br>स्वरूपवर्णनं तस्य कथं योषित्करिष्यति ॥ ४९ | |
| यस्याखिलमहीव्योमजलाग्निपवनात्मकम् ।<br>ब्रह्माण्डमल्पकाल्पांशः स्तोष्यामस्तं कथं वयम् ॥ ५० | |
| यतन्तो न विदुर्न्नित्यं यत्स्वरूपं हि योगिनः ।<br>परमार्थमणोरल्पं स्थूलात्स्थूलं नताः स्म तम् ॥ ५१ | |
| न यस्य जन्मने धाता यस्य चान्ताय नान्तकः ।<br>स्थितिकर्त्ता न चान्योऽस्ति यस्य तस्मै नमस्सदा ॥ ५२ | |
| कोपः स्वल्पोऽपि ते नास्ति स्थितिपालनमेव ते ।<br>कारणं कालियस्यास्य दमने श्रूयतां वचः ॥ ५३ | |
| स्त्रियोऽनुकम्प्यास्साधूनां मूढा दीनाश्च जन्तवः ।<br>यतस्ततोऽस्य दीनस्य क्षम्यतां क्षमतां वर ॥ ५४ | |
| समस्तजगदाधारो भवानल्पबलः फणी ।<br>त्वत्पादपीडितो जह्यान्मुहूर्त्ताद्र्द्धेन जीवितम् ॥ ५५ | |
| क्व पन्नगोऽल्पवीर्योऽयं क्व भवान्भुवनाश्रयः ।<br>प्रीतिद्वेषौ समोत्कृष्टगोचरौ भवतोऽव्यय ॥ ५६ |