विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ७ ] * पञ्चम अंश * ३३३
विनाकृता न यास्यामः कृष्णेनानेन गोकुलम्।
अरम्यं नातिसेव्यं च वारिहीनं यथा सरः॥ २८
यत्र नेन्दीवरदलश्यामकान्तिरयं हरिः।
तेनापि मातृर्वासेन रतिरस्तीति विस्मयः॥ २९
उत्फुल्लपङ्कजदलस्पष्टकान्तिविलोचनम्।
अपश्यन्त्यो हरिं दीनाः कथं गोष्ठे भविष्यथ॥ ३०
अत्यन्तमधुरालापहृताशेषमनोरथम् ।
न विना पुण्डरीकाक्षं यास्यामो नन्दगोकुलम्॥ ३१
भोगेनावेष्टितस्यापि सर्पराजस्य पश्यत ।
स्मितशोभि मुखं गोप्यः कृष्णस्यास्मद्विलोकने॥ ३२
श्रीपराशर उवाच
इति गोपीवचः श्रुत्वा रौहिणेयो महाबलः।
गोपांश्च त्रासविधुरान्विलोक्य स्तिमितेक्षणान्॥ ३३
नन्दं च दीनमत्यर्थं न्यस्तदृष्टिं सुतानने।
मूर्च्छाकुलां यशोदां च कृष्णामाहात्मसंज्ञया॥ ३४
किमिदं देवदेवेश भावोऽयं मानुषस्त्वया।
व्यज्यतेऽत्यन्तमात्मानं किमनन्तं न वेत्सि यत्॥ ३५
त्वमेव जगतो नाभिरराणामिव संश्रयः।
कर्त्तापहर्त्ता पाता च त्रैलोक्यं त्वं त्रयीमयः॥ ३६
सेन्द्रै रुद्राग्निवसुभिरादित्यैर्मरुदश्विभिः।
चिन्त्यसे त्वमचिन्त्यात्मन् समस्तैश्चैव योगिभिः॥ ३७
जगत्यर्थं जगन्नाथ भारावतरणेच्छया।
अवतीर्णोऽसि मर्त्येषु तवांशश्चाहमग्रजः॥ ३८
मनुष्यलीलां भगवन् भजता भवता सुराः।
विडम्बयन्तस्तवलीलां सर्व एव सहासते॥ ३९
अवतार्य भवान्पूर्वं गोकुले तु सुराङ्गनाः।
क्रीडार्थमात्मनः पश्चादवतीर्णोऽसि शाश्वत॥ ४०
अत्रावतीर्णयोः कृष्ण गोपा एव हि बान्धवाः।
गोप्यश्च सीदतः कस्मादेतान्बन्धूनुपेक्षसे॥ ४१
दर्शितो मानुषो भावो दर्शितं बालचापलम्।
तदयं दम्यतां कृष्ण दुष्टात्मा दशनायुधः॥ ४२
कृष्णके बिना साथ लिये अब हम गोकुल नहीं जायँगी; क्योंकि इनके बिना वह जलहीन सरोवरके समान अत्यन्त अभव्य और असेव्य है॥ २८॥ जहाँ नीलकमलदलकी-सी आभावाले ये श्यामसुन्दर हरि नहीं हैं उस मातृ-मन्दिरसे भी प्रीति होना अत्यन्त आश्चर्य ही है॥ २९॥ अरी! खिले हुए कमलदलके सदृश कान्तियुक्त नेत्रोंवाले श्रीहरिको देखे बिना अत्यन्त दीन हुई तुम किस प्रकार व्रजमें रह सकोगी? ॥ ३०॥ जिन्होंने अपनी अत्यन्त मनोहर बोलीसे हमारे सम्पूर्ण मनोरथोंको अपने वशीभूत कर लिया है, उन कमलनयन कृष्णचन्द्रके बिना हम नन्दजीके गोकुलको नहीं जायँगी॥ ३१॥ अरी गोपियो! देखो, सर्पराजके फणसे आवृत होकर भी श्रीकृष्णका मुख हमें देखकर मधुर मुसकानसे सुशोभित हो रहा है॥ ३२॥
श्रीपराशरजी बोले— गोपियोंके ऐसे वचन सुनकर तथा त्रासविह्वल चकितनेत्र गोपोंको, पुत्रके मुखपर दृष्टि लगाये अत्यन्त दीन नन्दजीको और मूर्च्छाकुल यशोदाको देखकर महाबली रोहिणीनन्दन बलरामजीने अपने संकेतमें कृष्णजीसे कहा—॥ ३३-३४॥ "हे देवदेवेश्वर! क्या आप अपनेको अनन्त नहीं जानते? फिर किसलिये यह अत्यन्त मानव भाव व्यक्त कर रहे हैं॥ ३५॥ पहियोंकी नाभि जिस प्रकार अरोंका आश्रय होती है उसी प्रकार आप ही जगत्के आश्रय, कर्त्ता, हर्ता और रक्षक हैं तथा आप ही त्रैलोक्यस्वरूप और वेदत्रयीमय हैं॥ ३६॥ हे अचिन्त्यात्मन्! इन्द्र, रुद्र, अग्नि, वसु, आदित्य, मरुद्गण और अश्विनीकुमार तथा समस्त योगिजन आपहीका चिन्तन करते हैं॥ ३७॥ हे जगन्नाथ ! संसारके हितके लिये पृथिवीका भार उतारनेकी इच्छासे ही आपने मर्त्यलोकमें अवतार लिया है; आपका अग्रज मैं भी आपहीका अंश हूँ॥ ३८॥ हे भगवन्! आपके मनुष्य-लीला करनेपर ये गोपवेषधारी समस्त देवगण भी आपकी लीलाओंका अनुकरण करते हुए आपहीके साथ रहते हैं॥ ३९॥ हे शाश्वत ! पहले अपने विहारार्थ देवांगनाओंको गोपीरूपसे गोकुलमें अवतीर्णकर पीछे आपने अवतार लिया है॥ ४०॥ हे कृष्ण! यहाँ अवतीर्ण होनेपर हम दोनोंके तो ये गोप और गोपियाँ ही बान्धव हैं; फिर अपने इन दुःखी बान्धवोंकी आप क्यों उपेक्षा करते हैं॥ ४१॥ हे कृष्ण! यह मनुष्यभाव और बालचापल्य तो आप बहुत दिखा चुके, अब तो शीघ्र ही इस दुष्टात्माका जिसके शस्त्र दाँत ही हैं, दमन कीजिये"॥ ४२॥