विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 343, कुल 558 में से
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* श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० ७
तेऽहिदुष्टविषज्वालातप्ताम्बुपवनोक्षिताः। जज्वलुः पादपास्सद्यो ज्वालाव्याप्तदिगन्तराः॥ १३ आस्फोटयामास तदा कृष्णो नागह्रदे भुजम्। तच्छब्दश्रवणाच्चाशु नागराजोऽभ्युपागमत्॥ १४ आताम्रनयनः कोपाद्विषज्वालाकुलैर्मुखैः। वृतो महाविषैश्चान्यैरुरगैरनिलाशनैः॥ १५ नागपत्न्यश्च शतशो हारिहारोपशोभिताः। प्रकम्पिततनुक्षेपचलत्कुण्डलकान्तयः॥ १६ ततः प्रवेष्टितस्सपैस्स कृष्णो भोगबन्धनैः। ददंशुस्तेऽपि तं कृष्णं विषज्वालाकुलैर्मुखैः॥ १७ तं तत्र पतितं दृष्ट्वा सर्पभोगैर्निपीडितम्। गोपा व्रजमुपागम्य चुक्रुशुः शोकलालसाः॥ १८
गोपा ऊचुः
एष मोहं गतः कृष्णो मग्नो वै कालियह्रदे। भक्ष्यते नागराजेन तमागच्छत पश्यत॥ १९ तच्छ्रुत्वा तत्र ते गोपा वज्रपातोपमं वचः। गोप्यश्च त्वरिता जग्मुर्यशोदाप्रमुखा ह्रदम्॥ २० हा हा क्वासौविति जनो गोपीनामतिविह्वलः। यशोदया समं भ्रान्तो द्रुतप्रस्खलितं ययौ॥ २१ नन्दगोपश्श्च गोपाश्च रामश्चाद्भुतविक्रमः। त्वरितं यमुनां जग्मुः कृष्णदर्शनलालसाः॥ २२ ददृशुश्चापि ते तत्र सर्पराजवशंगतम्। निष्प्रयत्नीकृतं कृष्णं सर्पभोगविवेष्टितम्॥ २३ नन्दगोपोऽपि निश्चेष्टो न्यस्य पुत्रमुखे दृशम्। यशोदा च महाभागा बभूव मुनिसत्तम॥ २४ गोप्यस्त्वन्या रुदन्त्यश्च ददृशुः शोककातराः। प्रोचुश्च केशवं प्रीत्या भयकातर्यगद्गदम्॥ २५
गोप्य ऊचुः
सर्वा यशोदया सार्धं विशामोऽत्र महाह्रदम्। सर्पराजस्य नो गन्तुमस्माभिर्युज्यते व्रजम्॥ २६ दिवसः को विना सूर्यं विना चन्द्रेण का निशा। विना वृषेण का गावो विना कृष्णेन को व्रजः॥ २७
उस सर्पके विषम विषकी ज्वालासे तपे हुए जलसे भीगनेके कारण वे वृक्ष तुरन्त ही जल उठे और उनकी ज्वालाओंसे सम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हो गयीं ॥ १३॥
तब कृष्णचन्द्रने उस नागकुण्डमें अपनी भुजाओंको ठोंका; उनका शब्द सुनते ही वह नागराज तुरंत उनके सम्मुख आ गया॥ १४॥ उसके नेत्र क्रोधसे कुछ ताम्रवर्ण हो रहे थे, मुखोंसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं और वह महाविषैले अन्य वायुभक्षी सर्पोंसे घिरा हुआ था॥ १५॥ उसके साथमें मनोहर हारोंसे भूषिता और शरीर-कम्पनसे हिलते हुए कुण्डलोंकी कान्तिसे सुशोभिता सैकड़ों नागपत्नयाँ थीं॥ १६॥ तब सर्पोंने कुण्डलाकार होकर कृष्णचन्द्रको अपने शरीरसे बाँध लिया और अपने विषाग्नि-सन्तप्त मुखोंसे काटने लगे॥ १७॥
तदनन्तर गोपगण कृष्णचन्द्रको नागकुण्डमें गिरा हुआ और सर्पोंके फणोंसे पीडित होता देख व्रजमें चले आये और शोकसे व्याकुल होकर रोने लगे॥ १८॥
**गोपगण बोले—**आओ, आओ, देखो! यह कृष्ण कालीदहमें डूबकर मूर्च्छित हो गया है, देखो इसे नागराज खाये जाता है॥ १९॥ वज्रपातके समान उनके इन अमंगल वाक्योंको सुनकर गोपगण और यशोदा आदि गोपियाँ तुरंत ही कालीदहपर दौड़ आयीं॥ २०॥ 'हाय! हाय! वे कृष्ण कहाँ गये?' इस प्रकार अत्यन्त व्याकुलतापूर्वक रोती हुई गोपियाँ यशोदाके साथ शीघ्रतासे गिरती-पड़ती चलीं॥ २१॥ नन्दजी तथा अन्यान्य गोपगण और अद्भुत-विक्रमशाली बलरामजी भी कृष्णदर्शनकी लालसासे शीघ्रतापूर्वक यमुना-तटपर आये॥ २२॥
वहाँ आकर उन्होंने देखा कि कृष्णचन्द्र सर्पराजके चंगुलमें फँसे हुए हैं और उसने उन्हें अपने शरीरसे लपेटकर निरुपाय कर दिया है॥ २३॥ हे मुनिसत्तम! महाभागा यशोदा और नन्दगोप भी पुत्रके मुखपर टकटकी लगाकर चेष्टाशून्य हो गये॥ २४॥ अन्य गोपियोंने भी जब कृष्णचन्द्रको इस दशामें देखा तो वे शोकाकुल होकर रोने लगीं और भय तथा व्याकुलताके कारण गद्गदवाणीसे उनसे प्रीतिपूर्वक कहने लगीं॥ २५॥
**गोपियाँ बोलीं—**अब हम सब भी यशोदाके साथ इस सर्पराजके महाकुण्डमें ही डूबी जाती हैं, अब हमें व्रजमें जाना उचित नहीं है॥ २६॥ सूर्यके बिना दिन कैसा? चन्द्रमाके बिना रात्रि कैसी? साँड़के बिना गौएँ क्या? ऐसे ही कृष्णके बिना व्रजमें भी क्या रखा है?॥ २७॥