विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 342, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 342
अ० ७] * पञ्चम अंश * ३३१
सातवाँ अध्याय
कालिय-दमन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| एकदा तु विना रामं कृष्णो वृन्दावनं ययौ।<br>विचचार वृतो गोपैर्वन्यपुष्पस्रगुज्ज्वलः॥ १ | एक दिन रामको बिना साथ लिये कृष्ण अकेले ही वृन्दावनको गये और वहाँ वन्य पुष्पोंकी मालाओंसे सुशोभित हो गोपगणसे घिरे हुए विचरने लगे॥१॥ |
| स जगामाथ कालिन्दीं लोलकल्लोलशालिनीम्।<br>तीरसंलग्नफेनौघैर्हसन्तीमिव सर्वतः॥ २ | घूमते-घूमते वे चंचल तरंगोंसे शोभित यमुनाके तटपर जा पहुँचे जो किनारोंपर फेनके इकट्ठे हो जानेसे मानो सब ओरसे हँस रही थी॥२॥ |
| तस्याञ्चातिमहाभीमं विषाग्निश्रितवारिकम्।<br>ह्रदं कालियनागस्य ददर्शातिविभीषणम्॥ ३ | यमुनाजीमें उन्होंने विषाग्निसे सन्तप्त जलवाला कालियनागका महाभयंकर कुण्ड देखा॥३॥ |
| विषाग्निना प्रसरता दग्धतीरमहीरुहम्।<br>वाताहताम्बुविक्षेपस्पर्शदग्धविहङ्गमम्॥ ४ | उसकी विषाग्तिके प्रसारसे किनारेके वृक्ष जल गये थे और वायुके थपेड़ोंसे उछलते हुए जलकणोंका स्पर्श होनेसे पक्षिगण दग्ध हो जाते थे॥४॥ |
| तमतीव महारौद्रं मृत्युवक्त्रमिवापरम्।<br>विलोक्य चिन्तयामास भगवान्मधुसूदनः॥ ५ | मृत्युके अपर मुखके समान उस महाभयंकर कुण्डको देखकर भगवान् मधुसूदनने विचार किया—॥५॥ |
| अस्मिन्वसति दुष्टात्मा कालियोऽसौ विषायुधः।<br>यो मया निर्जितस्त्यक्त्वा दुष्टो नष्टः पयोनिधिम्॥ ६ | 'इसमें दुष्टात्मा कालियनाग रहता है जिसका विष ही शस्त्र है और जो दुष्ट मुझ [अर्थात् मेरी विभूति गरुड]-से पराजित हो समुद्रको छोड़कर भाग आया है॥६॥ |
| तेनेयं दूषिता सर्वा यमुना सागरङ्गमा।<br>न नैरैर्गोधनैश्चापि तृषार्तैरुपभुज्यते॥ ७ | इसने इस समुद्रगामिनी सम्पूर्ण यमुनाको दूषित कर दिया है, अब इसका जल प्यासे मनुष्यों और गौओंके भी काममें नहीं आता है॥७॥ |
| तदस्य नागराजस्य कर्तव्यो निग्रहो मया।<br>निस्त्रासास्तु सुखं येन चरेयुर्व्रजवासिनः॥ ८ | अतः मुझे इस नागराजका दमन करना चाहिये, जिससे ब्रजवासी लोग निर्भय होकर सुखपूर्वक रह सकें॥८॥ |
| एतदर्थं तु लोकेऽस्मिन्नवतारः कृतो मया।<br>यदेषामुत्पथस्थानां कार्या शान्तिर्दुरात्मनाम्॥ ९ | 'इन कुमार्गगामी दुरात्माओंको शान्त करना चाहिये, इसलिये ही तो मैंने इस लोकमें अवतार लिया है॥९॥ |
| तदेतं नातिदूरस्थं कदम्बमुरुशाखिनम्।<br>अधिरुह्य पतिष्यामि ह्रदेऽस्मिन्ननिलाशिनः॥ १० | अतः अब मैं इस ऊँची-ऊँची शाखाओंवाले पासहीके कदम्बवृक्षपर चढ़कर वायुभक्षी नागराजके कुण्डमें कूदता हूँ'॥१०॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| इत्थं विचिन्त्य बद्ध्वा च गाढं परिकरं ततः।<br>निपपात ह्रदे तत्र नागराजस्य वेगतः॥ ११ | हे मैत्रेय! ऐसा विचारकर भगवान् अपनी कमर कसकर वेगपूर्वक नागराजके कुण्डमें कूद पड़े॥११॥ |
| तेनातिपतता तत्र क्षोभितस्स महाह्रदः।<br>अत्यर्थं दूरजातांस्तु समसिञ्चन्महीरुहान्॥ १२ | उनके कूदनेसे उस महाह्रदने अत्यन्त क्षोभित होकर दूरस्थित वृक्षोंको भी भिगो दिया॥१२॥ |