भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 341

३३० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
निर्गुणेनापि चापेन शक्रस्य गगने पदम्।<br>अवाप्यताविवेकस्य नृपस्येव परिग्रहे॥ ४०<br><br>मेघपृष्ठे बलाकानां रराज विमला ततिः।<br>दुर्वृत्ते वृत्तचेष्टेव कुलीनस्यातिशोभना ॥ ४१<br><br>न बबन्धाम्बरे स्थैर्यं विद्युदत्यन्तचञ्चला।<br>मैत्रीव प्रवरे पुंसि दुर्जनेन प्रयोजिता ॥ ४२<br><br>मार्गा बभूवुरस्पष्टास्तृणशष्पचयावृताः।<br>अर्थान्तरमनुप्राप्ताः प्रजडानामिवोक्तयः ॥ ४३<br><br>उन्मत्तशिखिसारङ्गे तस्मिन्काले महावने।<br>कृष्णरामौ मुदा युक्तौ गोपालैश्चेरतुस्सह ॥ ४४<br><br>क्वचिद्गोभिस्समं रम्यं गेयतानरतावुभौ।<br>चेरतुः क्वचिदत्यर्थं शीतवृक्षतलाश्रितौ ॥ ४५<br><br>क्वचित्कदम्बस्रक्चित्रौ मयूरस्रग्विराजितौ।<br>विलिप्तौ क्वचिदासातां विविधैर्गिरिधातुभिः ॥ ४६<br><br>पर्णशय्यासु संसुप्तौ क्वचिन्निद्रान्तरैषिणौ।<br>क्वचिद्गर्जति जीमूते हाहाकाररवाकुलौ ॥ ४७<br><br>गायतामन्यगोपानां प्रशंसापरमौ क्वचित्।<br>मयूरकेकानुगतौ गोपवेणुप्रवादकौ ॥ ४८<br><br>इति नानाविधैर्भावैरुत्तमप्रीतिसंयुतौ।<br>क्रीडन्तौ तौ वने तस्मिंश्चेरतुस्तुष्टमानसौ ॥ ४९<br><br>विकाले च समं गोभिर्गोपवृन्दसमन्वितौ।<br>विहृत्याथ यथायोगं व्रजमेत्य महाबलौ ॥ ५०<br><br>गोपैस्समानैस्सहितौ क्रीडन्तावमराविव।<br>एवं तावूषतुस्तत्र रामकृष्णौ महाद्युती ॥ ५१जिस प्रकार विवेकहीन राजाके संगमें गुणहीन मनुष्य भी प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार आकाशमण्डलमें गुणरहित इन्द्र-धनुष स्थित हो गया ॥ ४० ॥ दुराचारी पुरुषमें कुलीन पुरुषकी निष्कपट शुभ चेष्टाके समान मेघमण्डलमें बगुलोंकी निर्मल पंक्ति सुशोभित होने लगी ॥ ४१ ॥ श्रेष्ठ पुरुषके साथ दुर्जनकी मित्रताके समान अत्यन्त चंचला विद्युत् आकाशमें स्थिर न रह सकी ॥ ४२ ॥ महामूर्ख मनुष्योंकी अन्यार्थिका उक्तियोंके समान मार्ग तृण और दूबसमूहसे आच्छादित होकर अस्पष्ट हो गये ॥ ४३ ॥<br><br>उस समय उन्मत्त मयूर और चातकगणसे सुशोभित महावनमें कृष्ण और राम प्रसन्नतापूर्वक गोपकुमारोंके साथ विचरने लगे ॥ ४४ ॥ वे दोनों कभी गौओंके साथ मनोहर गान और तान छेड़ते तथा कभी अत्यन्त शीतल वृक्षतलका आश्रय लेते हुए विचरते रहते थे ॥ ४५ ॥ वे कभी तो कदम्बपुष्पोंके हारसे विचित्र वेष बना लेते, कभी मयूरपिच्छकी मालासे सुशोभित होते और कभी नाना प्रकारकी पर्वतीय धातुओंसे अपने शरीरको लिप्त कर लेते ॥ ४६ ॥ कभी कुछ झपकी लेनेकी इच्छासे पत्तोंकी शय्यापर लेट जाते और कभी मेघके गर्जनेपर ‘हा-हा’ करके कोलाहल मचाने लगते ॥ ४७ ॥ कभी दूसरे गोपोंके गानेपर आप दोनों उसकी प्रशंसा करते और कभी ग्वालोंकी-सी बाँसुरी बजाते हुए मयूरकी बोलीका अनुकरण करने लगते ॥ ४८ ॥<br><br>इस प्रकार वे दोनों अत्यन्त प्रीतिके साथ नाना प्रकारके भावोंसे परस्पर खेलते हुए प्रसन्नचित्तसे उस वनमें विचरने लगे ॥ ४९ ॥ सायंकालके समय वे महाबली बालक वनमें यथायोग्य विहार करनेके अनन्तर गौ और ग्वाल-बालोंके साथ व्रजमें लौट आते थे ॥ ५० ॥ इस तरह अपने समवयस्क गोपगणके साथ देवताओंके समान क्रीडा करते हुए वे महातेजस्वी राम और कृष्ण वहाँ रहने लगे ॥ ५१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥