भारतकोश
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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
३४०* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ९
सोमो मनस्ते श्वसितं समीरणो<br>  दिशश्चतस्रोऽव्यय बाहवस्ते ॥ २६<br><br>सहस्रवक्त्रो भगवन्महात्मा<br>  सहस्रहस्ताङ्‌घ्रिशरीरभेदः ।<br>सहस्रपद्मोद्भवयोनिराद्य-<br>  स्सहस्रशस्त्वां मुनयो गृणन्ति ॥ २७<br><br>दिव्यं हि रूपं तव वेत्ति नान्यो<br>  देवैरशेषैरवताररूपम् ।<br>तदर्च्यते वेत्सि न किं यदन्ते<br>  त्वय्येव विश्वं लयमभ्युपैति ॥ २८<br><br>त्वया धृतेयं धरणी बिभर्ति<br>  चराचरं विश्वमनन्तमूर्ते ।<br>कृतादिभेदैरज कालरूपो<br>  निमेषपूर्वो जगदेतदत्सि ॥ २९<br><br>अत्तं यथा बाडववह्निनाम्बु<br>  हिमस्वरूपं परिगृह्य कास्तम्* ।<br>हिमाचले भानुमतोऽंशुसंगा-<br>  ज्जलत्वमभ्येति पुनस्तदेव ॥ ३०<br><br>एवं त्वया संहरणेऽत्तमेत-<br>  ज्जगत्समस्तं त्वदधीनकं पुनः ।<br>तवैव सर्गाय समुद्यतस्य<br>  जगत्त्वमभ्येत्यनुकल्पमीश ॥ ३१<br><br>भवानहं च विश्वात्मन्नेकमेव च कारणम् ।<br>जगतोऽस्य जगत्यर्थे भेदेनावां व्यवस्थितौ ॥ ३२<br><br>तत्स्मर्यताममेयात्मंस्त्वयात्मा जहि दानवम् ।<br>मानुष्यमेवावलम्ब्य बन्धूनां क्रियतां हितम् ॥ ३३<br><br>    श्रीपराशर उवाच<br>इति संस्मारितो विप्र कृष्णेन सुमहात्मना ।<br>विहस्य पीडयामास प्रलम्बं बलवान्बलः ॥ ३४<br><br>मुष्टिना सोऽहनन्मूर्ध्नि कोपसंरक्तलोचनः ।<br>तेन चास्य प्रहारेण बहिर्याते विलोचने ॥ ३५हैं, पृथिवी चरण हैं, अग्नि मुख है, चन्द्रमा मन है, वायु श्वास-प्रश्वास हैं और चारों दिशाएँ बाहु हैं॥ २६॥ हे भगवन्! आप महाकाय हैं, आपके सहस्र मुख हैं तथा सहस्रों हाथ, पाँव आदि शरीरके भेद हैं। आप सहस्रों ब्रह्माओंके आदिकारण हैं, मुनिजन आपका सहस्रों प्रकार वर्णन करते हैं॥ २७॥ आपके दिव्य रूपको [आपके अतिरिक्त] और कोई नहीं जानता, अतः समस्त देवगण आपके अवताररूपकी ही उपासना करते हैं। क्या आपको विदित नहीं है कि अन्तमें यह सम्पूर्ण विश्व आपहीमें लीन हो जाता है॥ २८॥ हे अनन्तमूर्ते! आपहीसे धारण की हुई यह पृथिवी सम्पूर्ण चराचर विश्वको धारण करती है। हे अज! निमेषादि कालरूप आप ही कृतयुग आदि भेदोंसे इस जगत्‌का ग्रास करते हैं॥ २९॥ जिस प्रकार बडवानलसे पीया हुआ जल वायुद्वारा हिमालयतक पहुँचाये जानेपर हिमका रूप धारण कर लेता है और फिर सूर्यकिरणोंका संयोग होनेसे जलरूप हो जाता है, उसी प्रकार हे ईश! यह समस्त जगत् [रुद्रादिरूपसे] आपहीके द्वारा विनष्ट होकर आप [परमेश्वर]-के ही अधीन रहता है और फिर प्रत्येक कल्पमें आपके [हिरण्यगर्भरूपसे] सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त होनेपर यह [विराट्रूपसे] स्थूल जगद्रूप हो जाता है॥ ३०-३१॥ हे विश्वात्मन्! आप और मैं दोनों ही इस जगत्‌के एकमात्र कारण हैं। संसारके हितके लिये ही हमने भिन्न-भिन्न रूप धारण किये हैं॥ ३२॥ अतः हे अमेयात्मन्! आप अपने स्वरूपको स्मरण कीजिये और मनुष्यभावका ही अवलम्बन कर इस दैत्यको मारकर बन्धुजनोंका हित-साधन कीजिये॥ ३३॥<br><br>  श्रीपराशरजी बोले— हे विप्र! महात्मा कृष्णचन्द्रद्वारा इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर महाबलवान् बलरामजी हँसते हुए प्रलम्बासुरको पीडित करने लगे॥ ३४॥ उन्होंने क्रोधसे नेत्र लाल करके उसके मस्तकपर एक घूँसा मारा, जिसकी चोटसे उस दैत्यके दोनों नेत्र बाहर निकल आये॥ ३५॥

* कम् अस्तम्=प्रक्षिप्तम्।

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अ० १० ] * पञ्चम अंश * ३४१


स निष्कासितमस्तिष्को मुखाच्छोणितमुद्वमन्। निपपात महीपृष्ठे दैत्यवर्यो ममार च॥ ३६

प्रलम्बं निहतं दृष्ट्वा बलेनाद्भुतकर्मणा। प्रहृष्टास्तुष्टुवुर्गोपास्साधुसाध्विति चाब्रुवन्॥ ३७

संस्तूयमानो गोपैस्तु रामो दैत्ये निपातिते। प्रलम्बे सह कृष्णेन पुनर्गोकुलमाययौ॥ ३८

तदनन्तर वह दैत्यश्रेष्ठ मगज (मस्तिष्क) फट जानेपर मुखसे रक्त वमन करता हुआ पृथिवीपर गिर पड़ा और मर गया॥ ३६॥ अद्भुतकर्मा बलरामजीद्वारा प्रलम्बासुरको मरा हुआ देखकर गोपगण प्रसन्न होकर 'साधु, साधु' कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे॥ ३७॥ प्रलम्बासुरके मारे जानेपर बलरामजी गोपोंद्वारा प्रशंसित होते हुए कृष्णचन्द्रके साथ गोकुलमें लौट आये॥ ३८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे नवमोऽध्यायः॥ ९॥


दसवाँ अध्याय

शरद्वर्णन तथा गोवर्धनकी पूजा

श्रीपराशर उवाच

तयोर्विहरतोरेवं रामकेशवयोजें। प्रावृड् व्यतीता विकसत्सरोजा चाभवच्छरत्॥ १

अवापुस्तापमत्यर्थं शफर्यः पल्वलोदके। पुत्रक्षेत्रादिसक्तेन ममत्वेन यथा गृही॥ २

मयूरा मौनमातस्थुः परित्यक्तमदा वने। असारतां परिज्ञाय संसारस्येव योगिनः॥ ३

उत्सृज्य जलसर्वस्वं विमलास्सितमूर्त्तयः। तत्यजुश्चाम्बरं मेघा गृहं विज्ञानिनो यथा॥ ४

शरत्सूर्यांशुतप्तानि ययुश्शोषं सरांसि च। बह्वालम्बममत्वेन हृदयानीव देहिनाम्॥ ५

कुमुदैश्शरदम्भांसि योग्यतालक्षणं ययुः। अवबोधैर्मनांसीव समत्वममलात्मनाम्॥ ६

तारकाविमले व्योम्नि रराजाखण्डमण्डलः। चन्द्रश्चरमदेहात्मा योगी साधुकुले यथा॥ ७

शनकैश्शनकैस्तीरं तत्यजुश्च जलाशयाः। ममत्वं क्षेत्रपुत्रादिरूढमुच्चैर्यथा बुधाः॥ ८

पूर्वं त्यक्तैस्सरोऽम्भोभिर्हंसा योगं पुनर्ययुः। क्लेशैः कुयोगिनोऽशेषैरन्तरायहता इव॥ ९

श्रीपराशरजी बोले- इस प्रकार उन राम और कृष्णके व्रजमें विहार करते-करते वर्षाकाल बीत गया और प्रफुल्लित कमलोंसे युक्त शरद्-ऋतु आ गयी॥ १॥ जैसे गृहस्थ पुरुष पुत्र और क्षेत्र आदिमें लगी हुई ममतासे सन्ताप पाते हैं, उसी प्रकार मछलियाँ गड्ढोंके जलमें अत्यन्त ताप पाने लगीं॥ २॥ संसारकी असारताको जानकर जिस प्रकार योगिजन शान्त हो जाते हैं, उसी प्रकार मयूरगण मदहीन होकर मौन हो गये॥ ३॥ ज्ञानिगण [सब प्रकारकी ममता छोड़कर] जैसे घरका त्याग कर देते हैं, वैसे ही निर्मल श्वेत मेघोंने अपना जलरूप सर्वस्व छोड़कर आकाशमण्डलका परित्याग कर दिया॥ ४॥ विविध पदार्थोंमें ममता करनेसे जैसे देहधारियोंके हृदय सारहीन हो जाते हैं वैसे ही शरत्कालीन सूर्यके तापसे सरोवर सूख गये॥ ५॥ निर्मलचित्त पुरुषोंके मन जिस प्रकार ज्ञानद्वारा समता प्राप्त कर लेते हैं, उसी प्रकार शरत्कालीन जलोंको [स्वच्छताके कारण] कुमुदोंसे योग्य सम्बन्ध प्राप्त हो गया॥ ६॥ जिस प्रकार साधु-कुलमें चरम-देह-धारी योगी सुशोभित होता है, उसी प्रकार तारका-मण्डल-मण्डित निर्मल आकाशमें पूर्णचन्द्र विराजमान हुआ॥ ७॥

जिस प्रकार क्षेत्र और पुत्र आदिमें बढ़ी हुई ममताको विवेकीजन शनैः-शनैः त्याग देते हैं, वैसे ही जलाशयोंका जल धीरे-धीरे अपने तटको छोड़ने लगा॥ ८॥ जिस प्रकार अन्तरायों* (विघ्नों)-से विचलित हुए कुयोगियोंका


* अन्तराय नौ हैं- 'व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः। (यो० द० १। ३०)

३४२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १०

निभृतोऽभवदत्यर्थं समुद्रः स्तिमितोदकः। क्रमावाप्तमहायोगो निश्चलात्मा यथा यतिः॥ १०

सर्वत्रातिप्रसन्नानि सलिलानि तथाभवन्। ज्ञाते सर्वगते विष्णौ मनांसीव सुमेधसाम्॥ ११

बभूव निर्मलं व्योम शरदा ध्वस्ततोयदम्। योगाग्निदग्धक्लेशौघं योगिनामिव मानसम्॥ १२

सूर्यांशुजनितं तापं निन्ये तारापतिः शमम्। अहंमानोद्भवं दुःखं विवेकः सुमहानीव॥ १३

नभसोऽब्दं भुवः पङ्कं कालुष्यं चाम्भसश्शरत्। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः प्रत्याहार इवाहरत्॥ १४

प्राणायाम इवाम्भोभिस्सरसां कृतपूरकैः। अभ्यस्यतेऽनुदिवसं रेचकाकुम्भकादिभिः॥ १५

विमलाम्बरनक्षत्रे काले चाभ्यागते व्रजे। ददर्शेन्द्रमहारम्भायोद्यतांस्तान्व्रजौकसः॥ १६

कृष्णस्तानत्सुकान्दृष्ट्वा गोपानुत्सवलालसान्। कौतूहलादिदं वाक्यं प्राह वृद्धान्महामतिः॥ १७

कोऽयं शक्रमखो नाम येन वो हर्ष आगतः। प्राह तं नन्दगोपश्च पृच्छन्तमतिसादरम्॥ १८

नन्दगोप उवाच मेघानां पयसां चेशो देवराजश्शतक्रतुः। तेन सञ्चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बुमयं रसम्॥ १९

तद्वृष्टिजनितं सस्यं वयमन्ये च देहिनः। वर्त्तयामोपयुञ्जानास्तर्पयामश्च देवताः॥ २०

क्षीरवत्य इमा गावो वत्सवत्यश्च निर्वृताः। तेन संवर्द्धितैस्सस्यैस्तुष्टाः पुष्टा भवन्ति वै॥ २१

क्लेशों से पुनः संयोग हो* जाता है उसी प्रकार पहले छोड़े हुए सरोवरके जलसे हंसका पुनः संयोग हो गया॥ ९॥ क्रमशः महायोग (सम्प्रज्ञातसमाधि) प्राप्त कर लेनेपर जैसे यति निश्चलात्मा हो जाता है, वैसे ही जलके स्थिर हो जानेसे समुद्र निश्चल हो गया॥ १०॥ जिस प्रकार सर्वगत भगवान् विष्णुको जान लेनेपर मेधावी पुरुषोंके चित्त शान्त हो जाते हैं वैसे ही समस्त जलाशयोंका जल स्वच्छ हो गया॥ ११॥

योगाग्निद्वारा क्लेशसमूहके नष्ट हो जानेपर जैसे योगियोंके चित्त स्वच्छ हो जाते हैं उसी प्रकार शीतके कारण मेघोंके लीन हो जानेसे आकाश निर्मल हो गया॥ १२॥ जिस प्रकार अहंकारजनित महान् दुःखको विवेक शान्त कर देता है, उसी प्रकार सूर्यकिरणोंसे उत्पन्न हुए तापको चन्द्रमाने शान्त कर दिया॥ १३॥ प्रत्याहार जैसे इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे खींच लेता है वैसे ही शरत्कालने आकाशसे मेघोंको, पृथिवीसे धूलिको और जलसे मलको दूर कर दिया॥ १४॥ [पानीसे भर जानेके कारण] मानो तालाबोंके जल पूरक कर चुकनेपर अब [स्थिर रहने और सूखनेसे] रात-दिन कुम्भक एवं रेचक क्रियाद्वारा प्राणायामका अभ्यास कर रहे हैं॥ १५॥

इस प्रकार व्रजमण्डलमें निर्मल आकाश और नक्षत्रमय शरत्कालके आनेपर श्रीकृष्णचन्द्रने समस्त व्रजवासियोंको इन्द्रका उत्सव मनानेके लिये तैयारी करते देखा॥ १६॥ महामति कृष्णने उन गोपोंको उत्सवकी उमंगसे अत्यन्त उत्साहपूर्ण देखकर कुतूहलवश अपने बड़े-बूढ़ोंसे पूछा-॥ १७॥ "आपलोग जिसके लिये फूले नहीं समाते वह इन्द्रयज्ञ क्या है?" इस प्रकार अत्यन्त आदरपूर्वक पूछनेपर उनसे नन्दगोपने कहा-॥ १८॥

नन्दगोप बोले- मेघ और जलका स्वामी देवराज इन्द्र है। उसकी प्रेरणासे ही मेघगण जलरूप रसकी वर्षा करते हैं॥ १९॥ हम और अन्य समस्त देहधारी उस वर्षासे उत्पन्न हुए अन्नको ही बर्तते हैं तथा उसीको उपयोगमें लाते हुए देवताओंको भी तृप्त करते हैं॥ २०॥ उस (वर्षा)-से बढ़े हुए अन्नसे ही तृप्त होकर ये गौएँ तुष्ट और


अर्थात् व्याधि, स्त्यान (साधनमें अप्रवृत्ति), संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति (वैराग्यहीनता), भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व (लक्ष्यकी उपलब्धि न होना) और अनवस्थितत्व (लक्ष्यमें स्थिर न होना) ये नौ अन्तराय हैं।

* क्लेश पाँच हैं; जैसे— अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः। (यो० द० २।३) अर्थात् अविद्या, अस्मिता (अहंकार) राग, द्वेष और अभिनिवेश (मरणत्रास) ये पाँच क्लेश हैं।

अ० १० ] * पञ्चम अंश * ३४३


नासस्या नातृणा भूमिर्न बुभुक्षार्दितो जनः।
दृश्यते यत्र दृश्यन्ते वृष्टिमन्तो बलाहकाः ॥ २२

भौममेतत्पयो दुग्धं गोभिः सूर्यस्य वारिदैः।
पर्जन्यस्सर्वलोकस्योद्भवाय भुवि वर्षति ॥ २३

तस्मात्प्रावृषि राजानस्सर्वे शक्रं मुदा युताः।
मखैस्सुरेशमर्चन्ति वयमन्ये च मानवाः ॥ २४

श्रीपराशर उवाच
नन्दगोपस्य वचनं श्रुत्वेत्थं शक्रपूजने।
रोषाय त्रिदशेन्द्रस्य प्राह दामोदरस्तदा ॥ २५

न वयं कृषिकर्त्तारो वाणिज्याजीविनो न च।
गावोऽस्मद्दैवतं तात वयं वनचरा यतः ॥ २६

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्डनीतिस्तथा परा।
विद्या चतुष्टयं चैतद्वार्त्तामात्रं शृणुष्व मे ॥ २७

कृषिर्वणिज्या तद्वच्च तृतीयं पशुपालनम्।
विद्या ह्येका महाभाग वार्त्ता वृत्तित्रयाश्रया ॥ २८

कर्षकाणां कृषिवृत्तिः पण्यं विपणिजीविनाम्।
अस्माकं गौः परा वृत्तिर्वार्त्ताभेदैरियं त्रिभिः ॥ २९

विद्यया यो यया युक्तस्तस्य सा दैवतं महत्।
सैव पूज्यार्चनीया च सैव तस्योपकारिका ॥ ३०

यो यस्य फलमश्नन्वै पूजयत्यपरं नरः।
इह च प्रेत्य चैवासौ न तदाप्नोति शोभनम् ॥ ३१

कृष्यान्ता प्रथिता सीमा सीमान्तं च पुनर्व्वनम्।
वनान्ता गिरयस्सर्वे ते चास्माकं परा गतिः ॥ ३२

न द्वारबन्धावरणा न गृहक्षेत्रिणस्तथा।
सुखिनस्त्वखिले लोके यथा वै चक्रचारिणः ॥ ३३

श्रूयन्ते गिरयश्चैव वनेऽस्मिन्कामरूपिणः।
तत्तद्रूपं समास्थाय रमन्ते स्वेषु सानुषु ॥ ३४


पुष्ट होकर वत्सवती एवं दूध देनेवाली होती हैं॥ २१॥ जिस भूमिपर बरसनेवाले मेघ दिखायी देते हैं, उसपर कभी अन्न और तृणका अभाव नहीं होता और न कभी वहाँके लोग भूखे रहते ही देखे जाते हैं॥ २२॥ यह पर्जन्यदेव (इन्द्र) पृथिवीके जलको सूर्यकिरणोंद्वारा खींचकर सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धिके लिये उसे मेघोंद्वारा पृथिवीपर बरसा देते हैं। इसलिये वर्षा ऋतुमें समस्त राजालोग, हम और अन्य मनुष्यगण देवराज इन्द्रकी यज्ञोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक पूजा किया करते हैं॥ २३-२४॥

श्रीपराशरजी बोले— इन्द्रकी पूजाके विषयमें नन्दजीके ऐसे वचन सुनकर श्रीदामोदर देवराजको कुपित करनेके लिये ही इस प्रकार कहने लगे—॥ २५॥ ‘‘हे तात! हम न तो कृषक हैं और न व्यापारी, हमारे देवता तो गौएँ ही हैं; क्योंकि हमलोग वनचर हैं॥ २६॥ आन्वीक्षिकी (तर्कशास्त्र), त्रयी (कर्मकाण्ड), दण्डनीति और वार्ता—ये चार विद्याएँ हैं, इनमेंसे केवल वार्ताका विवरण सुनो॥ २७॥ हे महाभाग! वार्ता नामकी विद्या कृषि, वाणिज्य और पशुपालन इन तीन वृत्तियोंकी आश्रयभूता है॥ २८॥ वार्ताके इन तीनों भेदोंमेंसे कृषि किसानोंकी, वाणिज्य व्यापारियोंकी और गोपालन हमलोगोंकी उत्तम वृत्ति है॥ २९॥ जो व्यक्ति जिस विद्यासे युक्त है उसकी वही इष्टदेवता है, वही पूजा-अर्चाके योग्य है और वही परम उपकारिणी है॥ ३०॥ जो पुरुष एक व्यक्तिसे फल-लाभ करके अन्यकी पूजा करता है, उसका इहलोक अथवा परलोकमें कहीं भी शुभ नहीं होता॥ ३१॥ खेतोंके अन्तमें सीमा है तथा सीमाके अन्तमें वन हैं और वनोंके अन्तमें समस्त पर्वत हैं; वे पर्वत ही हमारी परमगति हैं॥ ३२॥ हमलोग न तो किंवाड़ें तथा भित्तिके अन्दर रहनेवाले हैं और न निश्चित गृह अथवा खेतवाले किसान ही हैं, बल्कि [वन-पर्वतादिमें स्वच्छन्द विचरनेवाले] हमलोग चक्रचारी* मुनियोंकी भाँति समस्त जनसमुदायमें सुखी हैं [अतः गृहस्थ किसानोंकी भाँति हमें इन्द्रकी पूजा करनेका कोई काम नहीं]’’॥ ३३॥

‘‘सुना जाता है कि इस वनके पर्वतगण कामरूपी (इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले) हैं। वे मनोवांछित रूप धारण करके अपने-अपने शिखरोंपर विहार किया करते हैं॥ ३४॥


* चक्रचारी मुनि वे हैं जो शकट आदिसे सर्वत्र भ्रमण किया करते हैं और जिनका कोई खास निवास नहीं होता। जहाँ शाम हो जाती है वहीं रह जाते हैं। अतः उन्हें ‘सायंगृह’ भी कहते हैं।

३४४ * श्रीविष्णुपुराण * अ० १० ]


यदा चैतैः प्रबाध्यन्ते तेषां ये काननौकसः ।
तदा सिंहादिरूपैस्तान्घातयन्ति महीधराः ॥ ३५
गिरियज्ञस्त्वयं तस्माद्गोयज्ञश्च प्रवर्त्यताम् ।
किमस्माकं महेन्द्रेण गावश्शैलाश्र्च देवताः ॥ ३६
मन्त्रयज्ञपरा विप्रास्सीरयज्ञाश्च कर्षकाः ।
गिरिगोयज्ञशीलाश्च वयमद्रिवनाश्रयाः ॥ ३७
तस्माद्गोवर्धनशैलो भवद्भिर्विविधार्हणैः ।
अर्च्यतां पूज्यतां मेध्यान्यशून्हत्वा विधानतः ॥ ३८
सर्वघोषस्य सन्दोहो गृह्यतां मा विचार्यताम् ।
भोज्यन्तां तेन वै विप्रास्तथा ये चाभिवाञ्छकाः ॥ ३९
तत्रार्चिते कृते होमे भोजितेषु द्विजातिषु ।
शरत्पुष्पकृतापीड़ाः परिगच्छन्तु गोगणाः ॥ ४०
एतन्मम मतं गोपास्सम्प्रीत्या क्रियते यदि ।
ततः कृता भवेत्प्रीतिर्गवामद्रेस्तथा मम ॥ ४१

श्रीपराशर उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा नन्दाद्यास्ते व्रजौकसः ।
प्रीत्युत्फुल्लमुखा गोपास्साधुसाध्वित्यथाब्रुवन् ॥ ४२
शोभनं ते मतं वत्स यदेतद्भवतोदितम् ।
तत्करिष्यामहे सर्वं गिरियज्ञः प्रवर्त्यताम् ॥ ४३
तथा च कृतवन्तस्ते गिरियज्ञं व्रजौकसः ।
दधिपायसमांसाद्यैर्ददुश्शैलवलिं ततः ॥ ४४
द्विजांश्च भोजयामासुश्शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४५
गावश्शैलं ततश्चक्रुरर्चितास्ताः प्रदक्षिणम् ।
वृषभाश्चातिनर्दन्तस्तोया जलदा इव ॥ ४६
गिरिमूर्द्धनि कृष्णोऽपि शैलोऽहमिति मूर्तिमान् ।
बुभुजेऽन्नं बहुतरं गोपवर्य्याहृतं द्विज ॥ ४७
स्वेनैव कृष्णो रूपेण गोपैस्सह गिरेश्शिरः ।
अधिरुह्यार्चयामास द्वितीयामात्मनस्तनुम् ॥ ४८
अन्तर्द्धानं गते तस्मिन्रोपा लब्ध्वा ततो वरान् ।
कृत्वा गिरिमखं गोष्ठं निजमभ्याययुः पुनः ॥ ४९


जब कभी वनवासीगण इन गिरिदेवोंको किसी तरहकी बाधा पहुँचाते हैं तो वे सिंहादि रूप धारणकर उन्हें मार डालते हैं॥ ३५॥ अतः आजसे [इस इन्द्रयज्ञके स्थानमें] गिरियज्ञ अथवा गोयज्ञका प्रचार होना चाहिये। हमें इन्द्रसे क्या प्रयोजन है? हमारे देवता तो गौएँ और पर्वत ही हैं॥ ३६॥ ब्राह्मणलोग मन्त्र यज्ञ तथा कृषकगण सीरयज्ञ (हलका पूजन) करते हैं, अतः पर्वत और वनोंमें रहनेवाले हमलोगोंको गिरियज्ञ और गोयज्ञ करने चाहिये॥ ३७॥

“अतएव आपलोग विधिपूर्वक मेध्य पशुओंकी बलि देकर विविध सामग्रियोंसे गोवर्धनपर्वतकी अर्चा पूजा करें॥ ३८॥ आज सम्पूर्ण व्रजका दूध एकत्रित कर लो और उससे ब्राह्मणों तथा अन्यान्य याचकोंको भोजन कराओ; इस विषयमें और अधिक सोच-विचार मत करो॥ ३९॥ गोवर्धनकी पूजा, होम और ब्राह्मण-भोजन समाप्त होनेपर शरद्-ऋतुके पुष्पोंसे सजे हुए मस्तकवाली गौएँ गिरिराजकी प्रदक्षिणा करें॥ ४०॥ हे गोपगण! आपलोग यदि प्रीतिपूर्वक मेरी इस सम्मतिके अनुसार कार्य करेंगे तो इससे गौओंको, गिरिराज और मुझको अत्यन्त प्रसन्नता होगी”॥ ४१॥

श्रीपराशरजी बोले—कृष्णचन्द्रके इन वाक्योंको सुनकर नन्द आदि व्रजवासी गोपोंने प्रसन्नतासे खिले हुए मुखसे ‘साधु, साधु' कहा॥ ४२॥ और बोले—हे वत्स! तुमने अपना जो विचार प्रकट किया है वह बड़ा ही सुन्दर है; हम सब ऐसा ही करेंगे; आज गिरियज्ञ किया जाय॥ ४३॥

तदनन्तर उन व्रजवासियोंने गिरियज्ञका अनुष्ठान किया तथा दही, खीर और मांस आदिसे पर्वतराजको बलि दी॥ ४४॥ सैकड़ों, हजारों ब्राह्मणोंको भोजन कराया तथा पुष्पार्चित गौओं और सजल जलधरके समान गर्जनेवाले साँड़ोंने गोवर्धनकी परिक्रमा की॥ ४५-४६॥ हे द्विज! उस समय कृष्णचन्द्रने पर्वतके शिखरपर अन्यरूपसे प्रकट होकर यह दिखलाते हुए कि मैं मूर्तिमान् गिरिराज हूँ, उन गोपश्रेष्ठोंके चढ़ाये हुए विविध व्यंजनोंको ग्रहण किया॥ ४७॥ कृष्णचन्द्रने अपने निजरूपसे गोपोंके साथ पर्वतराजके शिखरपर चढ़कर अपने ही दूसरे स्वरूपका पूजन किया॥ ४८॥ तदनन्तर उनके अन्तर्धान होनेपर गोपगण अपने अभीष्ट वर पाकर गिरियज्ञ समाप्त करके फिर अपने-अपने गोष्ठोंमें चले आये॥ ४९॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

अ० ११] * पञ्चम अंश * ३४५

ग्यारहवाँ अध्याय

इन्द्रका कोप और श्रीकृष्णका गोवर्धन-धारण

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! अपने यज्ञके रुक जानेसे इन्द्रने अत्यन्त रोषपूर्वक संवर्तक नामक मेघोंके दलसे इस प्रकार कहा—॥ १॥ “अरे मेघो! मेरा यह वचन सुनो और मैं जो कुछ कहूँ उसे मेरी आज्ञा सुनते ही, बिना कुछ सोचे-विचारे तुरन्त पूरा करो॥ २॥ देखो अन्य गोपोंके सहित दुर्बुद्धि नन्दगोपने कृष्णकी सहायताके बलसे अन्धा होकर मेरा यज्ञ भंग कर दिया है॥ ३॥ अतः जो उनकी परम जीविका और उनके गोपत्वका कारण है, उन गौओंको तुम मेरी आज्ञासे वर्षा और वायुके द्वारा पीडित कर दो॥ ४॥ मैं भी पर्वत शिखरके समान अत्यन्त ऊँचे अपने ऐरावत हाथीपर चढ़कर वायु और जल छोड़नेके समय तुम्हारी सहायता करूँगा”॥ ५॥
मखे प्रतिहते शक्रो मैत्रेयातिरुषान्वितः।<br>संवर्तकं नाम गणं तोयदानामथाब्रवीत्॥ १
भो भो मेघा निशम्यैतद्वचनं गदतो मम।<br>आज्ञानन्तरमेवाशु क्रियतामविचारितम्॥ २
नन्दगोपस्सुदुर्बुद्धिर्गोपैरन्यैस्सहायवान्।<br>कृष्णाश्रयबलाध्मातो मखभङ्गमचीकरत्॥ ३
आजीवो याः परस्तेषां गावस्तस्य च कारणम्।<br>ता गावो वृष्टिवातेन पीड्यन्तां वचनान्मम॥ ४
अहमप्यद्रिशृङ्गाभं तुङ्गमारुह्य वारणम्।<br>साहाय्यं वः करिष्यामि वाय्वम्बूत्सर्गयोजितम्॥ ५
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— हे द्विज! इन्द्रकी ऐसी आज्ञा होनेपर गौओंको नष्ट करनेके लिये मेघोंने अति प्रचण्ड वायु और वर्षा छोड़ दी॥ ६॥ हे मुने! उस समय एक क्षणमें ही मेघोंकी छोड़ी हुई महान् जलधाराओंसे पृथिवी, दिशाएँ और आकाश एकरूप हो गये॥ ७॥ मेघगण मानो विद्युल्लतारूप दण्डाघातसे भयभीत होकर महान् शब्दसे दिशाओंको व्याप्त करते हुए मूसलाधार पानी बरसाने लगे॥ ८॥ इस प्रकार मेघोंके अहर्निश बरसनेसे संसारके अन्धकारपूर्ण हो जानेपर ऊपर-नीचे और सब ओरसे समस्त लोक जलमय-सा हो गया॥ ९॥
इत्याज्ञप्तास्ततस्तेन मुमुचुस्ते बलाहकाः।<br>वातवर्षं महाभीममभावाय गवां द्विज॥ ६
ततः क्षणेन पृथिवी ककुभोऽम्बरमेव च।<br>एकं धारामहासारपूरणेनाभवन्मुने॥ ७
विद्युल्लताकशाघातत्रस्तैरिव घनैर्घनम्।<br>नादापूरितदिक्चक्रैर्धारासारमपात्यत॥ ८
अन्धकारीकृते लोके वर्षद्भिरनिशं घनैः।<br>अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च जगदाप्यमिवाभवत्॥ ९
गावस्तु तेन पतता वर्षवातेन वेगिना।<br>धूताः प्राणाञ्जहुस्सन्नत्रिकसक्थिशिरोधराः॥ १०वर्षा और वायुके वेगपूर्वक चलते रहनेसे गौओंके कटि, जंघा और ग्रीवा आदि सुन्न हो गये और काँपते-काँपते अपने प्राण छोड़ने लगीं [अर्थात् मूर्च्छित हो गयीं]॥ १०॥ हे महामुने! कोई गौएँ तो अपने बछड़ोंको अपने नीचे छिपाये खड़ी रहीं और कोई जलके वेगसे वत्सहीना हो गयीं॥ ११॥ वायुसे काँपते हुए दीनवदन बछड़े मानो व्याकुल होकर मन्द-स्वरसे कृष्णचन्द्रसे 'रक्षा करो, रक्षा करो' ऐसा कहने लगे॥ १२॥
क्रोडेन वत्सानाक्रम्य तस्थुरन्या महामुने।<br>गावो विवत्साश्च कृता वारिपूरेण चापराः॥ ११
वत्साश्च दीनवदना वातकम्पितकन्धराः।<br>त्राहि त्राहीत्यल्पशब्दाः कृष्णमूचुरिवातुराः॥ १२
३४६* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ११

ततस्तद्गोकुलं सर्वं गोगोपीगोपसङ्कुलम्।
अतीवार्त्तं हरिर्दृष्ट्वा मैत्रेयाचिन्तयत्तदा॥ १३

एतत्कृतं महेन्द्रेण मखभंगविरोधिना।
तदेतदखिलं गोष्ठं त्रातव्यमधुना मया॥ १४

इममद्रिमहं धैर्यादुत्पाट्योरुशिलाघनम्।
धारयिष्यामि गोष्ठस्य पृथुच्छत्रमिवोपरि॥ १५

श्रीपराशर उवाच
इति कृत्वा मतिं कृष्णो गोवर्धनमहीधरम्।
उत्पाट्यैककरेणैव धारयामास लीलया॥ १६

गोपांश्चाह हसञ्छौरिस्समुत्पाटितभूधरः।
विशध्वमत्र त्वरिताः कृतं वर्षनिवारणम्॥ १७

सुनिवातेषु देशेषु यथा जोषमिहास्यताम्।
प्रविश्यतां न भेतव्यं गिरिपाताच्च निर्भयैः॥ १८

इत्युक्तास्तेन ते गोपा विविशुर्गोधनैस्सह।
शकटारोपितैर्भाण्डैर्गोप्यश्चासारपीडिताः॥ १९

कृष्णोऽपि तं दधारैव शैलमत्यन्तनिश्चलम्।
व्रजैकवासिभिर्हर्षविस्मिताक्षैर्निरीक्षितः॥ २०

गोपगोपीजनैर्हृष्टैः प्रीतिविस्तारितेक्षणैः।
संस्तूयमानचरितः कृष्णश्शैलमधारयत्॥ २१

सप्तरात्रं महामेघा ववर्षुर्नन्दगोकुले।
इन्द्रेण चोदिता विप्र गोपानां नाशकारिणा॥ २२

ततो धृते महाशैले परित्राते च गोकुले।
मिथ्याप्रतिज्ञो बलभिद्वारयामास तान्घनान्॥ २३

व्यभ्रे नभसि देवेन्द्रे वितथात्मवचस्यथ।
निष्क्रम्य गोकुलं हृष्टं स्वस्थानं पुनरागमत्॥ २४

मुमोच कृष्णोऽपि तदा गोवर्धनमहाचलम्।
स्वस्थाने विस्मितमुखैर्दृष्टस्तैस्तु व्रजौकसैः॥ २५

हे मैत्रेय! उस समय गो, गोपी और गोपगणके सहित सम्पूर्ण गोकुलको अत्यन्त व्याकुल देखकर श्रीहरिने विचारा॥ १३॥ यज्ञ-भंगके कारण विरोध मानकर यह सब करतूत इन्द्र ही कर रहा है; अतः अब मुझे सम्पूर्ण व्रजकी रक्षा करनी चाहिये॥ १४॥ अब मैं धैर्यपूर्वक बड़ी-बड़ी शिलाओंसे घनीभूत इस पर्वतको उखाड़कर इसे एक बड़े छत्रके समान व्रजके ऊपर धारण करूँगा॥ १५॥

**श्रीपराशरजी बोले—**श्रीकृष्णचन्द्रने ऐसा विचारकर गोवर्धनपर्वतको उखाड़ लिया और उसे लीलासे ही अपने एक हाथपर उठा लिया॥ १६॥ पर्वतको उखाड़ लेनेपर शूरनन्दन श्रीश्यामसुन्दरने गोपोंसे हँसकर कहा—
"आओ, शीघ्र ही इस पर्वतके नीचे आ जाओ, मैंने वर्षासे बचनेका प्रबन्ध कर दिया है॥ १७॥ यहाँ वायुहीन स्थानोंमें आकर सुखपूर्वक बैठ जाओ; निर्भय होकर प्रवेश करो, पर्वतके गिरने आदिका भय मत करो"॥ १८॥

श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर जलकी धाराओंसे पीडित गोप और गोपी अपने बर्तन-भाँड़ोंको छकड़ोंमें रखकर गौओंके साथ पर्वतके नीचे चले गये॥ १९॥ व्रज वासियोंद्वारा हर्ष और विस्मयपूर्वक टकटकी लगाकर देखे जाते हुए श्रीकृष्णचन्द्र भी गिरिराजको अत्यन्त निश्चलतापूर्वक धारण किये रहे॥ २०॥ जो प्रीतिपूर्वक आँखें फाड़कर देख रहे थे उन हर्षितचित्त गोप और गोपियोंसे अपने चरितोंका स्तवन होते हुए श्रीकृष्णचन्द्र पर्वतको धारण किये रहे॥ २१॥

हे विप्र! गोपोंके नाशकर्ता इन्द्रकी प्रेरणासे नन्दजीके गोकुलमें सात रात्रितक महाभयंकर मेघ बरसते रहे॥ २२॥ किंतु जब श्रीकृष्णचन्द्रने पर्वत धारणकर गोकुलकी रक्षा की तो अपनी प्रतिज्ञा व्यर्थ हो जानेसे इन्द्रने मेघोंको रोक दिया॥ २३॥ आकाशके मेघहीन हो जानेसे इन्द्रकी प्रतिज्ञा भंग हो जानेपर समस्त गोकुलवासी वहाँसे निकलकर प्रसन्नतापूर्वक फिर अपने-अपने स्थानोंपर आ गये॥ २४॥ और कृष्णचन्द्रने भी उन व्रजवासियोंके विस्मयपूर्वक देखते-देखते गिरिराज गोवर्धनको अपने स्थानपर रख दिया॥ २५॥


इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे एकादशोऽध्यायः॥ ११॥

अ० १२] * पञ्चम अंश * ३४७


बारहवाँ अध्याय

शक्र-कृष्ण-संवाद, कृष्ण-स्तुति

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार गोवर्धनपर्वतका धारण और गोकुलकी रक्षा हो जानेपर देवराज इन्द्रको श्रीकृष्णचन्द्रका दर्शन करनेकी इच्छा हुई॥ १॥ अतः शत्रुजित् देवराज गजराज ऐरावतपर चढ़कर गोवर्धनपर्वतपर आये और वहाँ सम्पूर्ण जगत्के रक्षक गोपवेषधारी महाबलवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ग्वालबालोंके साथ गौएँ चराते देखा॥ २-३॥ हे द्विज! उन्होंने यह भी देखा कि पक्षिश्रेष्ठ गरुड अदृश्यभावसे उनके ऊपर रहकर अपने पंखोंसे उनकी छाया कर रहे हैं॥ ४॥ तब वे ऐरावतसे उतर पड़े और एकान्तमें श्रीमधुसूदनकी ओर प्रीतिपूर्वक दृष्टि फैलाते हुए मुसकाकर बोले॥ ५॥
धृते गोवर्धने शैले परित्राते च गोकुले।<br>रोचयामास कृष्णस्य दर्शनं पाकशासनः॥ १<br>सोऽधिरुह्य महानागमैरावतममित्रजित्।<br>गोवर्धनगिरौ कृष्णं ददर्श त्रिदशेश्वरः॥ २<br>चारयन्तं महावीर्यं गास्तु गोपवपुर्धरम्।<br>कृत्स्नस्य जगतो गोपं वृतं गोपकुमारकैः॥ ३<br>गरुडं च ददर्शोच्चैरन्तर्द्धानगतं द्विज।<br>कृतच्छायं हरेर्मूर्ध्नि पक्षाभ्यां पक्षिपुङ्गवम्॥ ४<br>अवरुह्य स नागेन्द्रादेकान्ते मधुसूदनम्।<br>शक्रस्सस्मितमाहेदं प्रीतिविस्तारितेक्षणः॥ ५
इन्द्र उवाचइन्द्रने कहा— हे श्रीकृष्णचन्द्र! मैं जिसलिये आपके पास आया हूँ, वह सुनिये—हे महाबाहो! आप इसे अन्यथा न समझें॥ ६॥ हे अखिलाधार परमेश्वर! आपने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही पृथिवीपर अवतार लिया है॥ ७॥ यज्ञभंगसे विरोध मानकर ही मैंने गोकुलको नष्ट करनेके लिये महामेघोंको आज्ञा दी थी, उन्होंने यह संहार मचाया था॥ ८॥ किन्तु आपने पर्वतको उखाड़कर गौओंको बचा लिया। हे वीर! आपके इस अद्भुत कर्मसे मैं अति प्रसन्न हूँ॥ ९॥
कृष्ण कृष्ण शृणुष्वेदं यदर्थमहमागतः।<br>त्वत्समीपं महाबाहो नैतच्चिन्त्यं त्वयान्यथा॥ ६<br>भारावतारणार्थाय पृथिव्याः पृथिवीतले।<br>अवतीर्णोऽखिलाधार त्वमेव परमेश्वर॥ ७<br>मखभंगविरोधेन मया गोकुलनाशकाः।<br>समादिष्टा महामेघास्तैश्चेदं कदनं कृतम्॥ ८
हे कृष्ण! आपने जो अपने एक हाथपर गोवर्धन धारण किया है, इससे मैं देवताओंका प्रयोजन [आपके द्वारा] सिद्ध हुआ ही समझता हूँ॥ १०॥ [गोवंशकी रक्षाद्वारा] आपसे रक्षित [कामधेनु आदि] गौओंसे प्रेरित होकर ही मैं आपका विशेष सत्कार करनेके लिये यहाँ आपके पास आया हूँ॥ ११॥ हे कृष्ण! अब मैं गौओंके वक्यानुसार ही आपका उपेन्द्र-पदपर अभिषेक करूँगा तथा आप गौओंके इन्द्र (स्वामी) हैं इसलिये आपका नाम 'गोविन्द' भी होगा॥ १२॥
त्रातास्ताश्च त्वया गावस्समुत्पाट्य महीधरम्।<br>तेनाहं तोषितो वीरकर्मणात्यद्भुतेन ते॥ ९<br>साधितं कृष्ण देवानामहं मन्ये प्रयोजनम्।<br>त्वयायमद्रिप्रवरः करेणैकेन यद्धृतः॥ १०<br>गोभिश्च चोदितः कृष्ण त्वत्सकाशमिहागतः।<br>त्वया त्राताभिरत्यर्थं युष्मत्सत्कारकारणात्॥ ११<br>स त्वां कृष्णाभिषेक्ष्यामि गवां वाक्यप्रचोदितः।<br>उपेन्द्रत्वे गवामिन्द्रो गोविन्दस्त्वं भविष्यसि॥ १२

३४८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२

श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर इन्द्रने अपने वाहन गजराज ऐरावतका घण्टा लिया और उसमें पवित्र जल भरकर उससे कृष्णचन्द्रका अभिषेक किया॥ १३॥ श्रीकृष्णचन्द्रका अभिषेक होते समय गौओंने तुरन्त ही अपने स्तनोंसे टपकते हुए दुग्धसे पृथिवीको भिगो दिया॥ १४॥
अथोपवाह्यादादाथ घण्टामैरावताद्गजात्।<br>अभिषेकं तया चक्रे पवित्रजलपूर्णया॥ १३
क्रियमाणेऽभिषेके तु गावः कृष्णस्य तत्क्षणात्।<br>प्रस्रवोद्भूतदुग्धाद्रां सद्यश्चक्रुर्वसुन्धराम्॥ १४
अभिषिच्य गवां वाक्यादुपेन्द्रं वै जनार्दनम्।<br>प्रीत्या सप्रश्रयं वाक्यं पुनराह शचीपतिः॥ १५इस प्रकार गौओंके कथनानुसार श्रीजनार्दनको उपेन्द्र-पदपर अभिषिक्त कर शचीपति इन्द्रने पुनः प्रीति और विनयपूर्वक कहा—॥ १५॥ “हे महाभाग! यह तो मैंने गौओंका वचन पूरा किया, अब पृथिवीके भार उतारनेकी इच्छासे मैं आपसे जो कुछ और निवेदन करता हूँ वह भी सुनिये॥ १६॥ हे पृथिवीधर! हे पुरुषसिंह! अर्जुन नामक मेरे अंशने पृथिवीपर अवतार लिया है; आप कृपा करके उसकी सर्वदा रक्षा करें॥ १७॥ हे मधुसूदन! वह वीर पृथिवीका भार उतारनेमें आपका साथ देगा, अतः आप उसकी अपने शरीरके समान ही रक्षा करें”॥ १८॥
गवामेतत्कृतं वाक्यं तथान्यदपि मे शृणु।<br>यद्ब्रवीमि महाभाग भारावतरणेच्छया॥ १६
ममांशः पुरुषव्याघ्र पृथिव्यां पृथिवीधर।<br>अवतीर्णोऽर्जुनो नाम संरक्ष्यो भवता सदा॥ १७
भारावतरणे साह्यं स ते वीरः करिष्यति।<br>संरक्षणीयो भवता यथात्मा मधुसूदन॥ १८
श्रीभगवानुवाच**श्रीभगवान् बोले—**भरतवंशमें पृथाके पुत्र अर्जुनने तुम्हारे अंशसे अवतार लिया है—यह मैं जानता हूँ। मैं जबतक पृथिवीपर रहूँगा, उसकी रक्षा करूँगा॥ १९॥ हे शत्रुसूदन देवेन्द्र! मैं जबतक महीतलपर रहूँगा तबतक अर्जुनको युद्धमें कोई भी न जीत सकेगा॥ २०॥ हे देवेन्द्र! विशाल भुजाओंवाला कंस नामक दैत्य, अरिष्टासुर, केशी, कुवलयापीड और नरकासुर आदि अन्यान्य दैत्योंका नाश होनेपर यहाँ महाभारत-युद्ध होगा। हे सहस्राक्ष! उसी समय पृथिवीका भार उतरा हुआ समझना॥ २१-२२॥ अब तुम प्रसन्नतापूर्वक जाओ, अपने पुत्र अर्जुनके लिये तुम किसी प्रकारकी चिन्ता मत करो; मेरे रहते हुए अर्जुनका कोई भी शत्रु सफल न हो सकेगा॥ २३॥ अर्जुनके लिये ही मैं महाभारतके अन्तमें युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डवोंको अक्षत-शरीरसे कुन्तीको दूँगा॥ २४॥
जानामि भारते वंशे जातं पार्थं तवांशतः।<br>तमहं पालयिष्यामि यावत्स्थास्यामि भूतले॥ १९
यावन्महीतले शक्र स्थास्याम्यहमरिन्दम।<br>न तावदर्जुनं कश्चिद्देवेन्द्र युधि जेष्यति॥ २०
कंसो नाम महाबाहुर्दैत्योऽरिष्टस्तथासुरः।<br>केशी कुवलयापीडो नरकाद्यास्तथा परे॥ २१
हतेषु तेषु देवेन्द्र भविष्यति महाहवः।<br>तत्र विद्धि सहस्राक्ष भारावतरणं कृतम्॥ २२
स त्वं गच्छ न सन्तापं पुत्रार्थे कर्तुमर्हसि।<br>नार्जुनस्य रिपुः कश्चिन्ममाग्रे प्रबविष्यति॥ २३
अर्जुनार्थे त्वहं सर्वान्युधिष्ठिरपुरोगमान्।<br>निवृत्ते भारते युद्धे कुन्त्यै दास्याम्यविक्षतान्॥ २४
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**कृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर देवराज इन्द्र उनका आलिंगन कर ऐरावत हाथीपर आरूढ हो स्वर्गको चले गये॥ २५॥ तदनन्तर कृष्णचन्द्र भी गोपियोंके दृष्टिपातसे पवित्र हुए मार्गद्वारा गोपकुमारों और गौओंके साथ व्रजको लौट आये॥ २६॥
इत्युक्तः सम्परिष्वज्य देवराजो जनार्दनम्।<br>आरुह्यैरावतं नागं पुनरेव दिवं ययौ॥ २५
कृष्णो हि सहितो गोभिर्गोपालैश्च पुनर्व्रजम्।<br>आजगामाथ गोपीनां दृष्टिपूतेन वर्त्मना॥ २६

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


अ० १३ ] * पञ्चम अंश * ३४९

तेरहवाँ अध्याय

गोपोंद्वारा भगवान्‌का प्रभाववर्णन तथा भगवान्‌का गोपियोंके साथ रासक्रीडा करना

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—इन्द्रके चले जानेपर लीलाविहारी श्रीकृष्णचन्द्रको बिना प्रयास ही गोवर्धन-पर्वत धारण करते देख गोपगण उनसे प्रीतिपूर्वक बोले—॥ १॥ हे भगवन्! हे महाभाग! आपने गिरिराजको धारण कर हमारी और गौओंकी इस महान् भयसे रक्षा की है॥ २॥ हे तात! कहाँ आपकी यह अनुपम बाललीला, कहाँ निन्दित गोपजाति और कहाँ ये दिव्य कर्म? यह सब क्या है, कृपया हमें बतलाइये॥ ३॥ आपने यमुनाजलमें कालियनागका दमन किया, धेनुकासुरको मारा और फिर यह गोवर्धनपर्वत धारण किया; आपके इन अद्भुत कर्मोंसे हमारे चित्तमें बड़ी शंका हो रही है॥ ४॥ हे अमितविक्रम! हम भगवान् हरिके चरणोंकी शपथ करके आपसे सच-सच कहते हैं कि आपके ऐसे बल-वीर्यको देखकर हम आपको मनुष्य नहीं मान सकते॥ ५॥ हे केशव! स्त्री और बालकोंके सहित सभी व्रजवासियोंकी आपपर अत्यन्त प्रीति है। आपका यह कर्म तो देवताओंके लिये भी दुष्कर है॥ ६॥ हे कृष्ण! आपकी यह बाल्यावस्था, विचित्र बल-वीर्य और हम-जैसे नीच पुरुषोंमें जन्म लेना—हे अमेयात्मन्! ये सब बातें विचार करनेपर हमें शंकामें डाल देती हैं॥ ७॥ आप देवता हों, दानव हों, यक्ष हों अथवा गन्धर्व हों; इन बातोंका विचार करनेसे हमें क्या प्रयोजन है? हमारे तो आप बन्धु ही हैं, अतः आपको नमस्कार है॥ ८॥
गते शक्रे तु गोपालाः कृष्णमक्लिष्टकारिणम्।<br>ऊचुः प्रीत्या धृतं दृष्ट्वा तेन गोवर्धनाचलम्॥ १
वयम्स्मान्महाभाग भगवन्महतो भयात्।<br>गावश्च भवता त्राता गिरिधारणकर्मणा॥ २
बालक्रीडेयमतुला गोपालत्वं जुगुप्सितम्।<br>दिव्यं च भवतः कर्म किमेतत्तात कथ्यताम्॥ ३
कालियो दमितस्तोये धेनुको विनिपातितः।<br>धृतो गोवर्धनश्चायं शङ्कितानि मनांसि नः॥ ४
सत्यं सत्यं हरेः पादौ शपामोऽमितविक्रम।<br>यथावद्वीर्यमालोक्य न त्वां मन्यामहे नरम्॥ ५
प्रीतिः सस्त्रीकुमारस्य व्रजस्य त्वयि केशव।<br>कर्म चेदमशक्यं यत्समस्तैस्त्रिदशैरपि॥ ६
बालत्वं चातिवीर्यत्वं जन्म चास्मास्वशोभनम्।<br>चिन्त्यमानममेयात्मञ्छङ्कां कृष्ण प्रयच्छति॥ ७
देवो वा दानवो वा त्वं यक्षो गन्धर्व एव वा।<br>किमस्माकं विचारेण बान्धवोऽसि नमोऽस्तु ते॥ ८
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—गोपगणके ऐसा कहनेपर महामति कृष्णचन्द्र कुछ देरतक चुप रहे और फिर कुछ प्रणयजन्य कोपपूर्वक इस प्रकार कहने लगे— ॥ ९॥
क्षणं भूत्वा त्वसौ तूष्णीं किञ्चित्प्रणयकोपवान्।<br>इत्येवमुक्तस्तैर्गोपैः कृष्णोऽप्याह महामतिः॥ ९
श्रीभगवानुवाचश्रीभगवान्‌ने कहा—हे गोपगण! यदि आपलोगोंको मेरे सम्बन्धसे किसी प्रकारकी लज्जा न हो तो मैं आपलोगोंसे प्रशंसनीय हूँ इस बातका विचार करनेकी भी क्या आवश्यकता है?॥ १०॥ यदि मुझमें आपकी प्रीति है और यदि मैं आपकी प्रशंसाका पात्र हूँ तो आपलोग मुझमें बान्धव-बुद्धि ही करें॥ ११॥
मत्सम्बन्धेन वो गोपा यदि लज्जा न जायते।<br>श्लाघ्यो वाहं ततः किं वो विचारेण प्रयोजनम्॥ १०
यदि वोऽस्ति मयि प्रीतिः श्लाघ्योऽहं भवतां यदि।<br>तदात्मबन्धुसदृशी बुद्धिर्वः क्रियतां मयि॥ ११

३५० * श्रीविष्णुपुराण * अ० १३ ]


नाहं देवो न गन्धर्वो न यक्षो न च दानवः।
अहं वो बान्धवो जातो नैतच्चिन्त्यमितोऽन्यथा॥ १२

श्रीपराशर उवाच
इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं बद्धमौनास्ततो वनम्।
ययुर्गोपा महाभाग तस्मिन्प्रणयकोपिनि॥ १३

कृष्णस्तु विमलं व्योम शरच्चन्द्रस्य चन्द्रिकाम्।
तदा कुमुदिनीं फुल्लामामोदितदिगन्तराम्॥ १४

वनराजिं तथा कूजद्भृङ्गमालाममनोहराम्।
विलोक्य सह गोपीभीर्मनश्चक्रे रतिं प्रति॥ १५

विना रामेण मधुरमतीव वनिताप्रियम्।
जगाै कलपदं शौरिस्तारमन्द्रकृतक्रमम्॥ १६

रम्यं गीतध्वनिं श्रुत्वा सन्त्यज्यावसथांस्तदा।
आजग्मुस्त्वरिता गोप्यो यत्रास्ते मधुसूदनः॥ १७

शनैश्शनैर्जगौ गोपी काचित्तस्य लयानुगम्।
दत्तावधाना काचिच्च तमेव मनसास्मरत्॥ १८

काचित्कृष्णेति कृष्णेति प्रोच्य लज्जामुपाययौ।
ययौ च काचित्प्रेमान्धा तत्पार्श्वमविलम्बितम्॥ १९

काचिच्चावसथस्यान्ते स्थित्वा दृष्ट्वा बहिर्गुरूम्।
तन्मयत्वेन गोविन्दं दध्यौ मीलितलोचना॥ २०

तच्चित्तविमलाह्लादक्षीणपुण्यचया तथा।
तदप्राप्तिमहादुःखविलीनाशेषपातका ॥ २१

चिन्तयन्ती जगत्सूतिं परब्रह्मस्वरूपिणम्।
निरुच्छ्वासतया मुक्तिं गतान्या गोपकन्यका॥ २२

गोपीपरिवृतो रात्रिं शरच्चन्द्रमनोरमाम्।
मानयामास गोविन्दो रासारम्भरसोत्सुकः॥ २३

गोप्यश्च वृन्दशः कृष्णचेष्टास्वायत्त मूर्तयः।
अन्यदेशं गते कृष्णे चेरूर्वृन्दावनन्तरम्॥ २४

कृष्णे निबद्धहृदया इदमूचुः परस्परम्॥ २५


मैं न देव हूँ, न गन्धर्व हूँ, न यक्ष हूँ और न दानव हूँ। मैं तो आपके बान्धवरूपसे ही उत्पन्न हुआ हूँ; आपलोगोंको इस विषयमें और कुछ विचार न करना चाहिये ॥ १२ ॥

**श्रीपराशरजी बोले—**हे महाभाग! श्रीहरिके प्रणयकोपयुक्त होकर कहे हुए इन वाक्योंको सुनकर वे समस्त गोपगण चुपचाप वनको चले गये ॥ १३॥

तब श्रीकृष्णचन्द्रने निर्मल आकाश, शरच्चन्द्रकी चन्द्रिका और दिशाओंको सुरभित करनेवाली विकसित कुमुदिनी तथा वन-खण्डको मुखर मधुकरोंसे मनोहर देखकर गोपियोंके साथ रमण करनेकी इच्छा की ॥ १४-१५ ॥ उस समय बलरामजीके बिना ही श्रीमुरलीमनोहर स्त्रियोंको प्रिय लगनेवाला अत्यन्त मधुर, अस्फुट एवं मृदुल पद ऊँचे और धीमे स्वरसे गाने लगे ॥ १६ ॥ उनकी उस सुरम्य गीतध्वनिको सुनकर गोपियाँ अपने-अपने घरोंको छोड़कर तत्काल जहाँ श्रीमधुसूदन थे वहाँ चली आयीं ॥ १७॥

वहाँ आकर कोई गोपी तो उनके स्वर-में-स्वर मिलाकर धीरे-धीरे गाने लगी और कोई मन-ही-मन उन्हींका स्मरण करने लगी ॥ १८ ॥ कोई 'हे कृष्ण, हे कृष्ण' ऐसा कहती हुई लज्जावश संकुचित हो गयी और कोई प्रेमोन्मादिनी होकर तुरन्त उनके पास जा खड़ी हुई ॥ १९ ॥ कोई गोपी बाहर गुरुजनोंको देखकर अपने घरमें ही रहकर आँख मूँदकर तन्मयभावसे श्रीगोविन्दका ध्यान करने लगी ॥ २० ॥ तथा कोई गोपकुमारी जगत्के कारण परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रका चिन्तन करते-करते [मूर्च्छावस्थामें] प्राणापानके रुक जानेसे मुक्त हो गयी, क्योंकि भगवद्ध्यानके विमल आह्लादसे उसकी समस्त पुण्यराशि क्षीण हो गयी और भगवान्‌की अप्राप्तिके महान् दुःखसे उसके समस्त पाप लीन हो गये थे ॥ २१-२२ ॥ गोपियोंसे घिरे हुए रासारम्भरूप रसके लिये उत्कण्ठित श्रीगोविन्दने उस शरच्चन्द्रसुशोभिता रात्रिको [रास करके] सम्मानित किया ॥ २३ ॥

उस समय भगवान् कृष्णके अन्यत्र चले जानेपर कृष्णचेष्टाके अधीन हुईं गोपियाँ यूथ बनाकर वृन्दावनके अन्दर विचरने लगीं ॥ २४ ॥ कृष्णमें निबद्धचित्त हुई वे व्रजाङ्गनाएँ परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगीं—[उसमेंसे एक गोपी कहती थी—] “मैं ही कृष्ण हूँ; देखो, कैसी सुन्दर चालसे चलता हूँ; तनिक मेरी

अ० १३] * पञ्चम अंश * ३५१


कृष्णोऽहमेष ललितं व्रजाम्यालोक्यतां गतिः।
अन्या ब्रवीति कृष्णस्य मम गीतिर्निशम्यताम्॥ २६
गति तो देखो।'' दूसरी कहती—''कृष्ण तो मैं हूँ, अहा! मेरा गाना तो सुनो''॥ २५-२६॥

दुष्टकालिय तिष्ठात्र कृष्णोऽहमिति चापरा।
बाहुमास्फोट्य कृष्णस्य लीलया सर्वमाददे॥ २७
कोई अन्य गोपी भुजाएँ ठोंककर बोल उठती—''अरे दुष्ट कालिय! मैं कृष्ण हूँ, तनिक ठहर तो जा'' ऐसा कहकर वह कृष्णके सारे चरित्रोंका लीलापूर्वक अनुकरण करने लगती॥ २७॥

अन्या ब्रवीति भो गोपा निश्शंकैः स्थीयतामिति।
अलं वृष्टिभयेनात्र धृतो गोवर्धनो मया॥ २८
कोई और गोपी कहने लगती—''अरे गोपगण! मैंने गोवर्धन धारण कर लिया है, तुम वर्षासे मत डरो, निश्शंक होकर इसके नीचे आकर बैठ जाओ''॥ २८॥

धेनुकोऽयं मया क्षिप्तो विचरन्तु यथेच्छया।
गावो ब्रवीति चैवान्या कृष्णलीलानुसारिणी॥ २९
कोई दूसरी गोपी कृष्णलीलाओंका अनुकरण करती हुई बोलने लगती—''मैंने धेनुकासुरको मार दिया है, अब यहाँ गौएँ स्वच्छन्द होकर विचरें''॥ २९॥

एवं नानाप्रकारासु कृष्णचेष्टासु तास्तदा।
गोप्यो व्यग्राः समं चेरू रम्यं वृन्दावनान्तरम्॥ ३०
इस प्रकार समस्त गोपियाँ श्रीकृष्णचन्द्रकी नाना प्रकारकी चेष्टाओंमें व्यग्र होकर साथ-साथ अति सुरम्य वृन्दावनके अन्दर विचरने लगीं॥ ३०॥

विलोक्यैका भुवं प्राह गोपी गोपवराङ्गना।
पुलकाञ्चितसर्वाङ्गी विकासिनयनोत्पला॥ ३१
खिले हुए कमल-जैसे नेत्रोंवाली एक सुन्दरी गोपांगना सर्वांग पुलकित हो पृथिवीकी ओर देखकर कहने लगी—॥ ३१॥

ध्वजवज्राङ्कुशाब्जाङ्करेखावन्त्यालि पश्यत।
पदान्येतानि कृष्णस्य लीलाललितगामिनः॥ ३२
अरी आली! ये लीलाललितगामी कृष्णचन्द्रके ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल आदिकी रेखाओंसे सुशोभित पदचिह्न तो देखो॥ ३२॥

कापि तेन समायाता कृतपुण्या मदालसा।
पदानि तस्याश्चैतानि घनान्यल्पतनूनि च॥ ३३
और देखो, उनके साथ कोई पुण्यवती मदमाती युवती भी आ गयी है, उसके ये घने छोटे-छोटे और पतले चरणचिह्न दिखायी दे रहे हैं॥ ३३॥

पुष्पापचयमत्रोच्चैश्चक्रे दामोदरो ध्रुवम्।
येनाग्राक्रान्तमात्राणि पदान्यत्र महात्मनः॥ ३४
यहाँ निश्चय ही दामोदरने ऊँचे होकर पुष्पचयन किये हैं; इसी कारण यहाँ उन महात्माके चरणोंके केवल अग्रभाग ही अंकित हुए हैं॥ ३४॥

अत्रोपविश्य वै तेन काचित्पुष्पैरलंकृता।
अन्यजन्मनि सर्वात्मा विष्णुरभ्यर्चितस्तया॥ ३५
यहाँ बैठकर उन्होंने निश्चय ही किसी बड़भागिनीका पुष्पोंसे श्रृंगार किया है; अवश्य ही उसने अपने पूर्वजन्ममें सर्वात्मा श्रीविष्णुभगवान्‌की उपासना की होगी॥ ३५॥

पुष्पबन्धनसम्मानकृतमानामपास्य ताम्।
नन्दगोपसुतो यातो मार्गेणानेन पश्यत॥ ३६
और यह देखो, पुष्पबन्धनके सम्मानसे गर्विता होकर उसके मान करनेपर श्रीनन्दनन्दन उसे छोड़कर इस मार्गसे चले गये हैं॥ ३६॥

अनुयातैनमत्रान्या नितम्बभरमन्थरा।
या गन्तव्ये द्रुतं याति निम्नपादाग्रसंस्थितिः॥ ३७
अरी सखियो! देखो,यहाँ कोई नितम्बभारके कारण मन्दगामिनी गोपी कृष्णचन्द्रके पीछे-पीछे गयी है। वह अपने गन्तव्य स्थानको तीव्रगतिसे गयी है, इसीसे उसके चरणचिह्नोंके अग्रभाग कुछ नीचे दिखायी देते हैं॥ ३७॥

हस्तन्यस्ताग्रहस्तेयं तेन याति तथा सखी।
अनायत्तपदन्यासा लक्ष्यते पदपद्धतिः॥ ३८
यहाँ वह सखी उनके हाथमें अपना पाणिपल्लव देकर चली है, इसीसे उसके चरणचिह्न पराधीन-से दिखलायी देते हैं॥ ३८॥

हस्तसंस्पर्शमात्रेण धूर्तेनैषा विमानिता।
नैराश्यान्मन्दगामिन्या निवृत्तं लक्ष्यते पदम्॥ ३९
देखो, यहाँसे उस मन्दगामिनीके निराश होकर लौटनेके चरणचिह्न दीख रहे हैं, मालूम होता है उस धूर्तने [उसकी अन्य आन्तरिक अभिलाषाओंको पूर्ण किये बिना ही] केवल कर-स्पर्श करके उसका अपमान किया है॥ ३९॥

३५२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १३


नूनमुक्ता त्वरामीति पुनरेष्यामि तेऽन्तिकम्। तेन कृष्णेन येनैषा त्वरिता पदपद्धतिः ॥ ४०

प्रविष्टो गहनं कृष्णः पदमत्र न लक्ष्यते। निवर्तध्वं शशाङ्कस्य नैतद्दीधितिगोचरे ॥ ४१

निवृत्तास्तास्तदा गोप्यो निराशाः कृष्णदर्शने। यमुनातीरमासाद्य जगुस्तच्चरितं तथा॥ ४२

ततो ददृशुरायान्तं विकासिमुखपंकजम्। गोप्यस्त्रैलोक्यगोप्तारं कृष्णमक्लिष्टचेष्टितम्॥ ४३

काचिदालोक्य गोविन्दमायान्तमतिहर्षिता। कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति प्राह नान्यदुदीरयत्॥ ४४

काचिद्भ्रूभङ्गुरं कृत्वा ललाटफलकं हरिम्। विलोक्य नेत्रभृङ्गाभ्यां पपौ तन्मुखपंकजम्॥ ४५

काचिदालोक्य गोविन्दं निमीलितविलोचना। तस्यैव रूपं ध्यायन्ती योगारूढेव सा बभौ॥ ४६

ततः काश्चित्प्रियालापैः काश्चिद्भ्रूभङ्गवीक्षितैः। निन्येऽनुनयमन्यां च करस्पर्शेन माधवः॥ ४७

ताभिः प्रसन्नचित्ताभिर्गोपीभिस्सह सादरम्। ररास रासगोष्ठीभिरुदारचरितो हरिः॥ ४८

रासमण्डलबन्धोऽपि कृष्णपार्श्वमनुज्झता। गोपीजनेन नैवाभूदेकस्थानस्थिरात्मना॥ ४९

हस्तेन गृह्य चैकैकां गोपीनां रासमण्डलम्। चकार तत्करस्पर्शानिमीलितदृशं हरिः॥ ५०

ततः प्रवृत्ते रासश्चलद्वलयनिस्वनः। अनुयातशरत्काव्यगेयगीतिरनुक्रमात् ॥५१

कृष्णश्शरच्चन्द्रमसं कौमुदीं कुमुदाकरम्। जगौ गोपीजनस्त्वेकं कृष्णनाम पुनः पुनः॥ ५२

परिवृत्तिश्रमेणैका चलद्वलयलापिनीम्। ददौ बाहुलतां स्कन्धे गोपी मधुनिघातिनः॥ ५३


यहाँ कृष्णने अवश्य उस गोपीसे कहा है '[तू यहाँ बैठ] मैं शीघ्र ही जाता हूँ [इस वनमें रहनेवाले राक्षसको मारकर] पुनः तेरे पास लौट आऊँगा। इसीलिये यहाँ उनके चरणोंके चिह्न शीघ्र गतिके-से दीख रहे हैं'॥ ४०॥ यहाँसे कृष्णचन्द्र गहन वनमें चले गये हैं, इसीसे उनके चरण-चिह्न दिखलायी नहीं देते; अब सब लौट चलो; इस स्थानपर चन्द्रमाकी किरणें नहीं पहुँच सकतीं॥ ४१॥

तदनन्तर वे गोपियाँ कृष्ण-दर्शनसे निराश होकर लौट आयीं और यमुनातटपर आकर उनके चरितोंको गाने लगीं॥ ४२॥ तब गोपियोंने प्रसन्नमुखारविन्द त्रिभुवनरक्षक लीलाविहारी श्रीकृष्णचन्द्रको वहाँ आते देखा॥ ४३॥ उस समय कोई गोपी तो श्रीगोविन्दको आते देखकर अति हर्षित हो केवल 'कृष्ण! कृष्ण!! कृष्ण!!!' इतना ही कहती रह गयी और कुछ न बोल सकी॥ ४४॥ कोई [प्रणयकोपवश] अपनी भ्रूभंगीसे ललाट सिकोड़कर श्रीहरिको देखते हुए अपने नेत्ररूप भ्रमरोंद्वारा उनके मुखकमलका मकरन्द पान करने लगी॥ ४५॥ कोई गोपी गोविन्दको देख नेत्र मूंदकर उन्हींके रूपका ध्यान करती हुई योगारूढ-सी भासित होने लगी॥ ४६॥

तब श्रीमाधव किसीसे प्रिय भाषण करके, किसीकी ओर भ्रूभंगीसे देखकर और किसीका हाथ पकड़कर उन्हें मनाने लगे॥ ४७॥ फिर उदारचरित श्रीहरिने उन प्रसन्नचित्त गोपियोंके साथ रासमण्डल बनाकर आदरपूर्वक रमण किया॥ ४८॥ किन्तु उस समय कोई भी गोपी कृष्णचन्द्रकी सन्निधिको न छोड़ना चाहती थी; इसलिये एक ही स्थानपर स्थिर रहनेके कारण रासोचित मण्डल न बन सका॥ ४९॥ तब उन गोपियोंमेंसे एक-एकका हाथ पकड़कर श्रीहरिने रासमण्डलकी रचना की। उस समय उनके करस्पर्शसे प्रत्येक गोपीकी आँखें आनन्दसे मुँद जाती थीं॥ ५०॥

तदनन्तर रासक्रीडा आरम्भ हुई। उसमें गोपियोंके चंचल कंकणोंकी झनकार होने लगी और फिर क्रमशः शरद्वर्णन-सम्बन्धी गीत होने लगे॥ ५१॥ उस समय कृष्णचन्द्र चन्द्रमा, चन्द्रिका और कुमुदवन-सम्बन्धी गान करने लगे; किन्तु गोपियोंने तो बारम्बार केवल कृष्णनामका ही गान किया॥ ५२॥ फिर एक गोपीने नृत्य करते-करते थककर चंचल कंकणकी झनकारसे युक्त अपनी बाहुलता श्रीमधुसूदनके गलेमें डाल दी॥ ५३॥

अ० १४ ] * पञ्चम अंश * ३५३

काचित्प्रविलसद्बाहुः परिरभ्य चुचुम्ब तम्।<br>गोपी गीतस्तुतिव्याजान्निपुणा मधुसूदनम् ॥ ५४किसी निपुण गोपीने भगवान्के गानकी प्रशंसा करनेके बहाने भुजा फैलाकर श्रीमधुसूदनको आलिंगन करके चूम लिया॥ ५४॥
गोपीकपोलसंश्लेषमभिगम्य हरेर्भुजौ।<br>पुलकोद्गमसस्याय स्वेदाम्बुघनतां गतौ ॥ ५५श्रीहरिकी भुजाएँ गोपियोंके कपोलोंका चुम्बन पाकर उन (कपोलों)-में पुलकावलिरूप धान्यकी उत्पत्तिके लिये स्वेदरूप जलके मेघ बन गयीं॥ ५५ ॥
रासगेयं जगौ कृष्णो यावत्तारतरध्वनिः।<br>साधु कृष्णेति कृष्णेति तावत्ता द्विगुणं जगुः ॥ ५६कृष्णचन्द्र जितने उच्चस्वरसे रासोचित गान गाते थे उससे दूने शब्दसे गोपियाँ "धन्य कृष्ण! धन्य कृष्ण!!" की ही ध्वनि लगा रही थीं॥ ५६ ॥
गतेऽनुगमनं चक्रुर्वलने सम्मुखं ययुः।<br>प्रतिलोमानुलोमाभ्यां भेजुर्गोपाङ्गना हरिम् ॥ ५७भगवान्के आगे जानेपर गोपियाँ उनके पीछे जातीं और लौटनेपर सामने चलतीं, इस प्रकार वे अनुलोम और प्रतिलोम-गतिसे श्रीहरिका साथ देती थीं॥ ५७॥
स तथा सह गोपीभी ररास मधुसूदनः।<br>यथाब्दकोटिप्रतिमः क्षणस्तेन विनाभवत् ॥ ५८श्रीमधुसूदन भी गोपियोंके साथ इस प्रकार रासक्रीडा कर रहे थे कि उनके बिना एक क्षण भी गोपियोंको करोड़ों वर्षोंके समान बीतता था॥ ५८॥
ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृभिस्तथा।<br>कृष्णं गोपाङ्गना रात्रौ रमयन्ति रतिप्रियाः ॥ ५९वे रास-रसिक गोपांगनाएँ पति, माता-पिता और भ्राता आदिके रोकनेपर भी रात्रिमें श्रीश्यामसुन्दरके साथ विहार करती थीं॥ ५९ ॥
सोऽपि कैशोरकवयो मानयन्मधुसूदनः।<br>रेमे ताभिरमेयात्मा क्षपासु क्षपिताहितः ॥ ६०शत्रुहन्ता अमेयात्मा श्रीमधुसूदन भी अपनी किशोरावस्थाका मान करते हुए रात्रिके समय उनके साथ रमण करते थे॥ ६०॥
तद्भर्तृषु तथा तासु सर्वभूतेषु चेश्वरः।<br>आत्मस्वरूपरूपोऽसौ व्यापी वायुरिव स्थितः ॥ ६१वे सर्वव्यापी ईश्वर श्रीकृष्णचन्द्र गोपियोंमें, उनके पतियोंमें तथा समस्त प्राणियोंमें आत्मस्वरूपसे वायुके समान व्याप्त थे॥ ६१॥
यथा समस्तभूतेषु नभोऽग्निः पृथिवी जलम्।<br>वायुश्चात्मा तथैवासौ व्याप्य सर्वमवस्थितः ॥ ६२जिस प्रकार आकाश, अग्नि, पृथिवी, जल, वायु और आत्मा समस्त प्राणियोंमें व्याप्त हैं उसी प्रकार वे भी सब पदार्थोंमें व्यापक हैं॥ ६२॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥


चौदहवाँ अध्याय

वृषाभासुर-वध

श्रीपराशर उवाच<br>प्रदोषाग्रे कदाचित्तु रासासक्ते जनार्दने।<br>त्रासयन्समदो गोष्ठमरिष्टस्समुपागमत् ॥ १**श्रीपराशरजी बोले—**एक दिन सायंकालके समय जब श्रीकृष्णचन्द्र रासक्रीडामें आसक्त थे, अरिष्ट नामक एक मदोन्मत्त असुर [वृषभरूप धारणकर] सबको भयभीत करता ब्रजमें आया ॥ १ ॥
सतोयतोयदच्छायास्तीक्ष्णशृङ्गोऽर्कलोचनः।<br>खुराग्रपातैरत्यर्थं दारयन्धरणीतलम् ॥ २इस अरिष्टासुरकी कान्ति सजल जलधरके समान कृष्णवर्ण थी, सींग अत्यन्त तीक्ष्ण थे, नेत्र सूर्यके समान तेजस्वी थे और अपने खुरोंकी चोटसे वह मानो पृथिवीको फाड़े डालता था ॥ २ ॥
लेलिहानस्सनिष्पेषं जिह्वयोष्ठौ पुनः पुनः।<br>संरम्भाविद्धलाङ्गूलः कठिनस्कन्धबन्धनः ॥ ३वह दाँत पीसता हुआ पुनः-पुनः अपनी जिह्वासे ओठोंको चाट रहा था, उसने क्रोधवश अपनी पूँछ उठा रखी थी तथा उसके स्कन्धबन्धन कठोर थे ॥ ३ ॥

३५४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १४


उदग्रककुदाभोगप्रमाणो दुरतिक्रमः।<br>विण्मूत्रलिप्तपृष्ठाङ्गो गवामुद्वेगकारकः॥ ४उसके ककुद (कुहान) और शरीरका प्रमाण अत्यन्त ऊँचा एवं दुर्लङ्घ्य था, पृष्ठभाग गोबर और मूत्रसे लिथड़ा हुआ था। तथा वह समस्त गौओंको भयभीत कर रहा था॥ ४॥
प्रलम्बकण्ठोऽतिमुखस्तरुखाताङ्किताननः।<br>पातयन्स गवां गर्भान्दैत्यो वृषभरूपधृक्॥ ५<br>सूदयंस्तापसानुग्रो वनानटति यस्सदा॥ ६उसकी ग्रीवा अत्यन्त लम्बी और मुख वृक्षके खोंखलेके समान अति गम्भीर था। वह वृषभरूपधारी दैत्य गौओंके गर्भोंको गिराता हुआ और तपस्वियोंको मारता हुआ सदा वनमें विचरा करता था॥ ५-६॥
ततस्तमतिघोराक्षमवेक्ष्यातिभयातुराः ।<br>गोपा गोपस्त्रियश्चैव कृष्ण कृष्णेति चुक्रुशुः॥ ७तब उस अति भयानक नेत्रोंवाले दैत्यको देखकर गोप और गोपांगनाएँ भयभीत होकर 'कृष्ण, कृष्ण' पुकारने लगीं॥ ७॥
सिंहनादं ततश्चक्रे तलशब्दं च केशवः।<br>तच्छब्दश्रवणाच्चासौ दामोदरमुपाययौ॥ ८उनका शब्द सुनकर श्रीकेशवने घोर सिंहनाद किया और ताली बजायी। उसे सुनते ही वह श्रीदामोदरकी ओर फिरा॥ ८॥
अग्रन्यस्तविषाणाग्रः कृष्णकुक्षिकृतेक्षणः।<br>अभ्यधावत दुष्टात्मा कृष्णं वृषभदानवः॥ ९दुरात्मा वृषभासुर आगेको सींग करके तथा कृष्णचन्द्रकी कुक्षिमं दृष्टि लगाकर उनकी ओर दौड़ा॥ ९॥
आयान्तं दैत्यवृषभं दृष्ट्वा कृष्णो महाबलः।<br>न चचाल तदा स्थानादवज्ञास्मितलीलया॥ १०किन्तु महाबली कृष्ण वृषाभासुरको अपनी ओर आता देख अवहेलनासे लीलापूर्वक मुसकराते हुए उस स्थानसे विचलित न हुए॥ १०॥
आसन्नं चैव जग्राह ग्राहवन्मधुसूदनः।<br>जघान जानुना कुक्षौ विषाणग्रहणाचलम्॥ ११निकट आनेपर श्रीमधुसूदनने उसे इस प्रकार पकड़ लिया जैसे ग्राह किसी क्षुद्र जीवको पकड़ लेता है; तथा सींग पकड़नेसे अचल हुए उस दैत्यकी कोखमें घुटनेसे प्रहार किया॥ ११॥
तस्य दर्पबलं भङ्क्त्वा गृहीतस्य विषाणयोः।<br>अपीडयदरिष्टस्य कण्ठं क्लिन्नमिवाम्बरम्॥ १२इस प्रकार सींग पकड़े हुए उस दैत्यका दर्प भंगकर भगवान्ने अरिष्टासुरकी ग्रीवाको गीले वस्त्रके समान मरोड़ दिया॥ १२॥
उत्पाट्य शृङ्गमेकं तु तेनैवाताडयत्ततः।<br>ममार स महादैत्यो मुखाच्छोणितमुद्वमन्॥ १३तदनन्तर उसका एक सींग उखाड़कर उसीसे उसपर आघात किया, जिससे वह महादैत्य मुखसे रक्त वमन करता हुआ मर गया॥ १३॥
तुष्टुवुर्निहते तस्मिन्दैत्ये गोपा जनार्दनम्।<br>जम्भे हते सहस्राक्षं पुरा देवगणा यथा॥ १४जम्भके मरनेपर जैसे देवताओंने इन्द्रकी स्तुति की थी उसी प्रकार अरिष्टासुरके मरनेपर गोपगण श्रीजनार्दनकी प्रशंसा करने लगे॥ १४॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥

अ० १५ ] * पञ्चम अंश * ३५५

पन्द्रहवाँ अध्याय

कंसका श्रीकृष्णको बुलानेके लिये अक्रूरको भेजना

श्रीपराशर उवाच

ककुद्मति हतेऽरिष्टे धेनुके विनिपातिते।
प्रलम्बे निधनं नीते धृते गोवर्धनाचले॥ १
दमिते कालिये नागे भग्ने तुङ्गद्रुमद्वये।
हतायां पूतनायां च शकटे परिवर्तिते॥ २
कंसाय नारदः प्राह यथावृत्तमनुक्रमात्।
यशोदादेवकीगर्भपरिवृत्त्याद्यशेषतः ॥ ३

श्रीपराशरजी बोले— वृषभरूपधारी अरिष्टासुर, धेनुक और प्रलम्ब आदिका वध, गोवर्धनपर्वतका धारण करना, कालियनागका दमन, दो विशाल वृक्षोंका उखाड़ना, पूतनावध तथा शकटका उलट देना आदि अनेक लीलाएँ हो जानेपर एक दिन नारदजीने कंसको, यशोदा और देवकीके गर्भ-परिवर्तनसे लेकर जैसा-जैसा हुआ था, वह सब वृत्तान्त क्रमशः सुना दिया॥ १—३॥


श्रुत्वा तत्सकलं कंसो नारदाद्देवदर्शनात्।
वसुदेवं प्रति तदा कोपं चक्रे सुदुर्मतिः॥ ४
सोऽतिकोपादुपालभ्य सर्वयादवसंसदि।
जगर्ह यादवांश्चैव कार्यं चैतदचिन्तयत्॥ ५

देवदर्शन नारदजीसे ये सब बातें सुनकर दुर्बुद्धि कंसने वसुदेवजीके प्रति अत्यन्त क्रोध प्रकट किया॥ ४॥ उसने अत्यन्त कोपसे वसुदेवजीको सम्पूर्ण यादवोंकी सभामें डाँटा तथा समस्त यादवोंकी भी निन्दा की और यह कार्य विचारने लगा—


यावन्न बलमारूढौ रामकृष्णौ सुबालकौ।
तावदेव मया वध्यावसाध्यौ रूढयौवनौ॥ ६

'ये अत्यन्त बालक राम और कृष्ण जबतक पूर्ण बल प्राप्त नहीं करते हैं तभीतक मुझे इन्हें मार देना चाहिये; क्योंकि युवावस्था प्राप्त होनेपर तो ये अजेय हो जायँगे॥ ५-६॥


चाणूरोऽत्र महावीर्यो मुष्टिकश्च महाबलः।
एताभ्यां मल्लयुद्धेन मारयिष्यामि दुर्मती॥ ७

मेरे यहाँ महावीर्यशाली चाणूर और महाबली मुष्टिक-जैसे मल्ल हैं। मैं इनके साथ मल्लयुद्ध कराकर उन दोनों दुर्बुद्धियोंको मरवा डालूँगा॥ ७॥


धनुर्महमहायोगव्याजेनानीय तौ व्रजात्।
तथा तथा यतिष्यामि यास्येते सङ्क्षयं यथा॥ ८

उन्हें महान् धनुर्यज्ञके मिससे व्रजसे बुलाकर ऐसे-ऐसे उपाय करूँगा, जिससे वे नष्ट हो जायँ॥ ८॥


श्वफल्कतनयं शूरमक्रूरं यदुपुङ्गवम्।
तयोरानयनार्थाय प्रेषयिष्यामि गोकुलम्॥ ९

उन्हें लानेके लिये मैं श्वफल्कके पुत्र यादवश्रेष्ठ शूरवीर अक्रूरको गोकुल भेजूँगा॥ ९॥


वृन्दावनचरं घोरमादेश्यामि च केशिनम्।
तत्रैवासावतिबलस्तावभौ घातयिष्यति॥ १०

साथ ही वृन्दावनमें विचरनेवाले घोर असुर केशीको भी आज्ञा दूँगा, जिससे वह महाबली दैत्य उन्हें वहीं नष्ट कर देगा॥ १०॥


गजः कुवलयापीडो मत्सकाशमिहागतौ।
घातयिष्यति वा गोपौ वसुदेवसुतावुभौ॥ ११

अथवा [यदि किसी प्रकार बचकर] वे दोनों वसुदेवपुत्र गोप मेरे पास आ भी गये तो उन्हें मेरा कुवलयापीड हाथी मार डालेगा'॥ ११॥


श्रीपराशर उवाच

इत्यालोच्य स दुष्टात्मा कंसो रामजनार्दनौ।
हन्तुं कृतमतिर्वीरावक्रूरं वाक्यमब्रवीत्॥ १२

श्रीपराशरजी बोले— ऐसा सोचकर उस दुष्टात्मा कंसने वीरवर राम और कृष्णको मारनेका निश्चय कर अक्रूरजीसे कहा॥ १२॥


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In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

३५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


कंस उवाचकंस बोला—हे दानपते! मेरी प्रसन्नताके लिये आप मेरी एक बात स्वीकार कर लीजिये। यहाँसे रथपर चढ़कर आप नन्दके गोकुलको जाइये॥ १३॥ वहाँ वसुदेवके विष्णुअंशसे उत्पन्न दो पुत्र हैं। मेरे नाशके लिये उत्पन्न हुए वे दुष्ट बालक वहाँ पोषित हो रहे हैं॥ १४॥ मेरे यहाँ चतुर्दशीको धनुषयज्ञ होनेवाला है; अतः आप वहाँ जाकर उन्हें मल्लयुद्धके लिये ले आइये॥ १५॥ मेरे चाणूर और मुष्टिक नामक मल्ल युग्म-युद्धमें अति कुशल हैं, [उस धनुर्यज्ञके दिन] उन दोनोंके साथ मेरे इन पहलवानोंका द्वन्द्वयुद्ध यहाँ सब लोग देखें॥ १६॥ अथवा महावतसे प्रेरित हुआ कुवलयापीड नामक गजराज उन दोनों दुष्ट वसुदेव-पुत्र बालकोंको नष्ट कर देगा॥ १७॥ इस प्रकार उन्हें मारकर मैं दुर्मति वसुदेव, नन्दगोप और इस अपने मन्दमति पिता उग्रसेनको भी मार डालूँगा॥ १८॥ तदनन्तर, मेरे वधकी इच्छावाले इन समस्त दुष्ट गोपोंके सम्पूर्ण गोधन तथा धनको मैं छीन लूँगा॥ १९॥ हे दानपते! आपके अतिरिक्त ये सभी यादवगण मुझसे द्वेष करते हैं, अतः मैं क्रमशः इन सभीको नष्ट करनेका प्रयत्न करूँगा॥ २०॥ फिर मैं आपके साथ मिलकर इस यादवहीन राज्यको निर्विघ्नतापूर्वक भोगूँगा, अतः हे वीर! मेरी प्रसन्नताके लिये आप शीघ्र ही जाइये॥ २१॥ आप गोकुलमें पहुँचकर गोपगणोंसे इस प्रकार कहें जिससे वे माहिष्य (भैंसके) घृत और दधि आदि उपहारोंके सहित शीघ्र ही यहाँ आ जायँ॥ २२॥
भो भो दानपते वाक्यं क्रियतां प्रीतये मम।<br>इतः स्यन्दनमारुह्य गम्यतां नन्दगोकुलम्॥ १३<br>वसुदेवसुतौ तत्र विष्णोरंशसमुद्भवौ।<br>नाशाय किल सम्भूतौ मम दुष्टौ प्रवर्द्धतः॥ १४<br>धनुर्महो ममाप्यत्र चतुर्दश्यां भविष्यति।<br>आनेयौ भवता गत्वा मल्लयुद्धाय तत्र तौ॥ १५<br>चाणूरमुष्टिकौ मल्लौ नियुद्धकुशलौ मम।<br>ताभ्यां सहानयोर्युद्धं सर्वलोकोऽत्र पश्यतु॥ १६<br>गजः कुवलयापीडो महामात्रप्रचोदितः।<br>स वा हनिष्यते पापौ वसुदेवात्मजौ शिशू॥ १७<br>तौ हत्वा वसुदेवं च नन्दगोपं च दुर्मतिम्।<br>हनिष्ये पितरं चैनमुग्रसेनं सुदुर्मतिम्॥ १८<br>ततस्समस्तगोपानां गोधनान्यखिलान्यहम्।<br>वित्तं चापहरिष्यामि दुष्टानां मद्बधैषिणाम्॥ १९<br>त्वामृते यादवाश्चैते द्विषो दानपते मम।<br>एतेषां च वधायाहं यतिष्येऽनुक्रमात्ततः॥ २०<br>तदा निष्कण्टकं सर्वं राज्यमेतदयादवम्।<br>प्रसाधिष्ये त्वया तस्मान्मत्प्रीतयै वीर गम्यताम्॥ २१<br>यथा च माहिषं सर्पिर्दधि चाप्युपहार्य वै।<br>गोपास्समानयन्त्वाशु तथा वाच्यास्त्वया च ते॥ २२
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—हे द्विज! कंससे ऐसी आज्ञा पा महाभागवत अक्रूरजी 'कल मैं शीघ्र ही श्रीकृष्णचन्द्रको देखूँगा'—यह सोचकर अति प्रसन्न हुए॥ २३॥ माधव-प्रिय अक्रूरजी राजा कंससे 'जो आज्ञा' कह एक अति सुन्दर रथपर चढ़े और मथुरापुरीसे बाहर निकल आये॥ २४॥
इत्याज्ञप्तस्तदाक्रूरो महाभागवतो द्विज।<br>प्रीतिमानभवत्कृष्णं श्वो द्रक्ष्यामीति सत्वरः॥ २३<br>तथेत्युक्त्वा च राजानं रथमारुह्य शोभनम्।<br>निश्चक्राम ततः पुर्या मथुराया मधुप्रियः॥ २४

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥

अ० १६ ] * पञ्चम अंश * ३५७

सोलहवाँ अध्याय

केशि-वध

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय ! इधर कंसके दूतद्वारा भेजा हुआ महाबली केशी भी कृष्णचन्द्रके वधकी इच्छासे [घोड़ेका रूप धारण कर] वृन्दावनमें आया ॥ १ ॥ वह अपने खुरोंसे पृथ्वीतलको खोदता, ग्रीवाके बालोंसे बादलोंको छिन्न-भिन्न करता तथा वेगसे चन्द्रमा और सूर्यके मार्गको भी पार करता गोपोंकी ओर दौड़ा ॥ २ ॥ उस अश्वरूप दैत्यके हिनहिनानेके शब्दसे भयभीत होकर समस्त गोप और गोपियाँ श्रीगोविन्दकी शरणमें आये ॥ ३ ॥ तब उनके त्राहि-त्राहि शब्दको सुनकर भगवान् कृष्णचन्द्र सजल मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर वाणीसे बोले— ॥ ४ ॥ “हे गोपालगण ! आपलोग केशी (केशधारी अश्व)-से न डरें, आप तो गोप-जातिके हैं, फिर इस प्रकार भयभीत होकर आप अपने वीरोचित पुरुषार्थका लोप क्यों करते हैं? ॥ ५ ॥ यह अल्पवीर्य, हिनहिनानेसे आतंक फैलानेवाला और नाचनेवाला दुष्ट अश्व जिसपर राक्षसगण बलपूर्वक चढ़ा करते हैं, आपलोगोंका क्या बिगाड़ सकता है?” ॥ ६ ॥
केशी चापि बलोदग्रः कंसदूतप्रचोदितः ।<br>कृष्णस्य निधनाकाङ्क्षी वृन्दावनमुपागमत् ॥ १<br>स खुरक्षतभूपृष्ठस्सटाक्षेपधुताम्बुदः ।<br>द्रुतविक्रान्तचन्द्रार्कमार्गो गोपानुपाद्रवत् ॥ २<br>तस्य हेषितशब्देन गोपाला दैत्यवाजिनः ।<br>गोप्यश्च भयसंविग्ना गोविन्दं शरणं ययुः ॥ ३<br>त्राहि त्राहीति गोविन्दः श्रुत्वा तेषां ततो वचः ।<br>सतोयजलदध्वानगम्भीरमिदमुक्तवान् ॥ ४<br>अलं त्रासेन गोपालाः केशिनः किं भयातुरैः ।<br>भवद्भिर्गोपजातीयैर्वीरवीर्यं विलोप्यते ॥ ५<br>किमनेनाल्पसारेण हेषिताटोपकारिणा ।<br>दैतेयबलवाह्येन वल्गता दुष्टवाजिना ॥ ६
एह्येहि दुष्ट कृष्णोऽहं पूष्णस्तिव्व पिनाकधृक् ।<br>पातयिष्यामि दशनान्वदनादखिलांस्तव ॥ ७<br>इत्युक्त्वास्फोट्य गोविन्दः केशिनस्समुखं ययौ ।<br>विवृतास्यश्च सोऽप्येनं दैतेयाश्व उपाद्रवत् ॥ ८<br>बाहुमाभोगिनं कृत्वा मुखे तस्य जनार्दनः ।<br>प्रवेशयामास तदा केशिनो दुष्टवाजिनः ॥ ९<br>केशिनो वदने तेन विशता कृष्णबाहुना ।<br>शातिता दशनाः पेतुः सिताभ्रावयवा इव ॥ १०<br>कृष्णस्य ववृधे बाहुः केशिदेहगतो द्विज ।<br>विनाशाय यथा व्याधिरासम्भूतैरुपेक्षितः ॥ ११<br>विपाटितोष्ठो बहुलं सफेनं रुधिरं वमन् ।<br>सोऽक्षिणी विवृते चक्रे विशिष्टे मुक्तबन्धने ॥ १२<br>जघान धरणीं पादैश्शकृन्मूत्रं समुत्सृजन् ।<br>स्वेदार्द्रगात्रश्शान्तश्च निर्यत्नस्सोऽभवत्तदा ॥ १३[इस प्रकार गोपोंको धैर्य बाँधकर वे केशीसे कहने लगे—] “अरे दुष्ट ! इधर आ, पिनाकधारी वीरभद्रने जिस प्रकार पूषाके दाँत उखाड़े थे, उसी प्रकार मैं कृष्ण तेरे मुखसे सारे दाँत गिरा दूँगा” ॥ ७ ॥ ऐसा कहकर श्रीगोविन्द उछलकर केशीके सामने आये और वह अश्वरूपधारी दैत्य भी मुँह खोलकर उनकी ओर दौड़ा ॥ ८ ॥ तब जनार्दनने अपनी बाँह फैलाकर उस अश्वरूपधारी दुष्ट दैत्यके मुखमें डाल दी ॥ ९ ॥ केशीके मुखमें घुसी हुई भगवान् कृष्णकी बाहुसे टकराकर उसके समस्त दाँत शुभ्र मेघखण्डोंके समान टूटकर बाहर गिर पड़े ॥ १० ॥<br><br>हे द्विज! उत्पत्तिके समयसे ही उपेक्षा की गयी व्याधि जिस प्रकार नाश करनेके लिये बढ़ने लगती है, उसी प्रकार केशीके देहमें प्रविष्ट हुई कृष्णचन्द्रकी भुजा बढ़ने लगी ॥ ११ ॥ अन्तमें ओठोंके फट जानेसे वह फेनसहित रुधिर वमन करने लगा और उसकी आँखें स्नायुबन्धनके ढीले हो जानेसे फूट गयीं ॥ १२ ॥ तब वह मल-मूत्र छोड़ता हुआ पृथ्वीपर पैर पटकने लगा, उसका शरीर पसीनेसे भरकर ठण्डा पड़ गया और वह निश्चेष्ट हो गया ॥ १३ ॥

३५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १६

व्यादितास्यमहारन्ध्रस्सोऽसुरः कृष्णबाहुना । निपातितो द्विधा भूमौ वैद्युतेन यथा द्रुमः ॥ १४

द्विपादे पृष्ठपुच्छाद्धे श्रवणैकाक्षिनासिके । केशिनस्ते द्विधाभूते शकले द्वे विरेजतुः ॥ १५

हत्वा तु केशिनं कृष्णो गोपालैर्मुदितैर्वृतः । अनायस्ततनुस्स्वस्थो हसंस्तत्रैव तस्थिवान् ॥ १६

ततो गोप्यश्च गोपाश्च हते केशिनि विस्मिताः । तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षमनुरागमनोरमम् ॥ १७

अथाहान्तर्हितो विप्र नारदो जलदे स्थितः । केशिनं निहतं दृष्ट्वा हर्षनिर्भरमानसः ॥ १८

साधु साधु जगन्नाथ लीलयैव यदच्युत । निहतोऽयं त्वया केशी क्लेशदस्तत्रिदिवौकसाम् ॥ १९

युद्धोत्सुकोऽहमत्यर्थं नरवाजिमहाहवम् । अभूतपूर्वमन्यत्र द्रष्टुं स्वर्गादिहागतः ॥ २०

कर्माण्यत्रावतारे ते कृतानि मधुसूदन । यानि तैर्विस्मितं चेतस्तोषमेतेन मे गतम् ॥ २१

तुरङ्गस्यास्य शक्रोऽपि कृष्ण देवाश्च बिभ्यति । धुतकेसरजालस्य हेषतोऽभ्रावलोकिनः ॥ २२

यस्मात्त्वयैष दुष्टात्मा हतः केशी जनार्दन । तस्मात्केशवनाम्ना त्वं लोके ख्यातो भविष्यसि ॥ २३

स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि कंसयुद्धेऽधुना पुनः । परश्वोऽहं समेष्यामि त्वया केशिनिषूदन ॥ २४

उग्रसेनसुते कंसे सानुगे विनिपातिते । भारावतारकर्ता त्वं पृथिव्याः पृथिवीधर ॥ २५

तत्रानेकप्रकाराणि युद्धानि पृथिवीक्षिताम् । द्रष्टव्यानि मयायुष्मत्प्रणीतानि जनार्दन ॥ २६

सोऽहं यास्यामि गोविन्द देवकार्यं महत्कृतम् । त्वयैव विदितं सर्वं स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ २७

नारदे तु गते कृष्णस्सह गोपैस्सभाजितः । विवेश गोकुलं गोपीनेत्रपानैकभाजनम् ॥ २८


इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रकी भुजासे जिसके मुखका विशाल रन्ध्र फैलाया गया है वह महान् असुर मरकर वज्रपातसे गिरे हुए वृक्षके समान दो खण्ड होकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १४ ॥

केशीके शरीरके वे दोनों खण्ड दो पाँव, आधी पीठ, आधी मूँछ तथा एक-एक कान-आँख और नासिकारन्ध्रके सहित सुशोभित हुए ॥ १५ ॥

इस प्रकार केशीको मारकर प्रसन्नचित्त ग्वालबालोंसे घिरे हुए श्रीकृष्णचन्द्र बिना श्रमके स्वस्थचित्तसे हँसते हुए वहीं खड़े रहे ॥ १६ ॥

केशीके मारे जानेसे विस्मित हुए गोप और गोपियोंने अनुरागवश अत्यन्त मनोहर लगनेवाले कमलनयन श्रीश्यामसुन्दरकी स्तुति की ॥ १७ ॥

हे विप्र ! उसे मरा देख मेघपटलमें छिपे हुए श्रीनारदजी हर्षितचित्तसे कहने लगे— ॥ १८ ॥

‘‘हे जगन्नाथ ! हे अच्युत !! आप धन्य हैं, धन्य हैं। अहा ! आपने देवताओंको दुःख देनेवाले इस केशीको लीलासे ही मार डाला ॥ १९ ॥

मैं मनुष्य और अश्वके इस पहले और कहीं न होनेवाले युद्धको देखनेके लिये ही अत्यन्त उत्कण्ठित होकर स्वर्गसे यहाँ आया था ॥ २० ॥

हे मधुसूदन ! आपने अपने इस अवतारमें जो-जो कर्म किये हैं उनसे मेरा चित्त अत्यन्त विस्मित और सन्तुष्ट हो रहा है ॥ २१ ॥

हे कृष्ण ! जिस समय यह अश्व अपनी सटाओंको हिलाता और हींसता हुआ आकाशकी ओर देखता था तो इससे सम्पूर्ण देवगण और इन्द्र भी डर जाते थे ॥ २२ ॥

हे जनार्दन ! आपने इस दुष्टात्मा केशीको मारा है; इसलिये आप लोकमें ‘केशव’ नामसे विख्यात होंगे ॥ २३ ॥

हे केशिनिषूदन ! आपका कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। परसों कंसके साथ आपका युद्ध होनेके समय मैं फिर आऊँगा ॥ २४ ॥

हे पृथिवीधर ! अनुगामियों सहित उग्रसेनके पुत्र कंसके मारे जानेपर आप पृथिवीका भार उतार देंगे ॥ २५ ॥

हे जनार्दन ! उस समय मैं अनेक राजाओंके साथ आप आयुष्मान् पुरुषके किये हुए अनेक प्रकारके युद्ध देखूँगा ॥ २६ ॥

हे गोविन्द ! अब मैं जाना चाहता हूँ। आपने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य किया है। आप सभी कुछ जानते हैं [मैं अधिक क्या कहूँ?] आपका मंगल हो, मैं जाता हूँ’’ ॥ २७ ॥

तदनन्तर नारदजीके चले जानेपर गोपगणसे सम्मानित गोपियोंके नेत्रोंके एकमात्र दृश्य श्रीकृष्णचन्द्रने ग्वालबालोंके साथ गोकुलमें प्रवेश किया ॥ २८ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

अ० १७ ] * पञ्चम अंश * ३५९


सत्रहवाँ अध्याय

अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा

श्रीपराशर उवाच अक्रूरोऽपि विनिष्क्रम्य स्यन्दनेनाशुगामिना । कृष्णसंदर्शनाकाङ्क्षी प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥ १

चिन्तयामास चाक्रूरो नास्ति धन्यतरो मया । योऽहमंशावतीर्णस्य मुखं द्रक्ष्यामि चक्रिणः ॥ २

अद्य मे सफलं जन्म सुप्रभाताभवन्निशा । यदुन्निद्राभपत्राक्षं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम् ॥ ३

पापं हरति यत्पुंसां स्मृतं सङ्कल्पनामयम् । तत्पुण्डरीकनयनं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम् ॥ ४

विनिर्जग्मुर्यतो वेदा वेदाङ्गानrendered्यखिलानि च । द्रक्ष्यामि तत्परं धाम धाम्नां भगवतो मुखम् ॥ ५

यज्ञेषु यज्ञपुरुषः पुरुषैः पुरुषोत्तमः । इज्यते योऽखिलाधारस्तं द्रक्ष्यामि जगत्पतिम् ॥ ६

इष्ट्वा यमिन्द्रो यज्ञानां शतेनामरराजताम् । अवाप तमनन्तादिमहं द्रक्ष्यामि केशवम् ॥ ७

न ब्रह्मा नेन्द्ररुद्राश्विवस्वादित्यमरुद्गणाः । यस्य स्वरूपं जानन्ति प्रत्यक्षं याति मे हरिः ॥ ८

सर्वात्मा सर्ववित्सर्वस्सर्वभूतेष्ववस्थितः । यो ह्यचिन्त्योऽव्ययो व्यापी स वक्ष्यति मया सह ॥ ९

मत्स्यकूर्मवराहाश्वसिंह्रूपादिभिः स्थितिम् । चकार जगतो योऽजः सोऽद्य मां प्रलपिष्यति ॥ १०

साम्प्रतं च जगत्स्वामी कार्यमात्महृदि स्थितम् । कर्तुं मनुष्यतां प्राप्तस्स्वेच्छादेहधृगव्ययः ॥ ११

योऽनन्तः पृथिवीं धत्ते शेखरस्थितिसंस्थिताम् । सोऽवतीर्णो जगत्यर्थे मामक्रूरेति वक्ष्यति ॥ १२


श्रीपराशरजी बोले— अक्रूरजी भी तुरंत ही मथुरापुरीसे निकलकर श्रीकृष्ण-दर्शनकी लालसासे एक शीघ्रगामी रथद्वारा नन्दजीके गोकुलको चले ॥ १ ॥ अक्रूरजी सोचने लगे 'आज मुझ-जैसा बड़भागी और कोई नहीं है; क्योंकि अपने अंशसे अवतीर्ण चक्रधारी श्रीविष्णुभगवान्‌का मुख मैं अपने नेत्रोंसे देखूँगा ॥ २ ॥ आज मेरा जन्म सफल हो गया; आजकी रात्रि [अवश्य] सुन्दर प्रभातवाली थी, जिससे कि मैं आज खिले हुए कमलके समान नेत्रवाले श्रीविष्णुभगवान्‌के मुखका दर्शन करूँगा ॥ ३ ॥ प्रभुका जो संकल्पमय मुखारविन्द स्मरणमात्रसे पुरुषोंके पापोंको दूर कर देता है, आज मैं विष्णुभगवान्‌के उसी कमलनयन मुखको देखूँगा ॥ ४ ॥ जिससे सम्पूर्ण वेद और वेदांगोंकी उत्पत्ति हुई है, आज मैं सम्पूर्ण तेजस्वियोंके परम आश्रय उसी भगवत्-मुखारविन्दका दर्शन करूँगा ॥ ५ ॥ समस्त पुरुषोंके द्वारा यज्ञोंमें जिन अखिल विश्वके आधारभूत पुरुषोत्तमका यज्ञपुरुषरूपसे यजन (पूजन) किया जाता है, आज मैं उन्हीं जगत्पतिका दर्शन करूँगा ॥ ६ ॥ जिनका सौ यज्ञोंसे यजन करके इन्द्रने देवराज-पदवी प्राप्त की है, आज मैं उन्हीं अनादि और अनन्त केशवका दर्शन करूँगा ॥ ७ ॥ जिनके स्वरूपको ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसुगण, आदित्य और मरुद्गण आदि कोई भी नहीं जानते आज वे ही हरि मेरे नेत्रोंके विषय होंगे ॥ ८ ॥ जो सर्वात्मा, सर्वज्ञ, सर्वस्वरूप और सब भूतोंमें अवस्थित हैं तथा जो अचिन्त्य, अव्यय और सर्वव्यापक हैं, अहो! आज स्वयं वे ही मेरे साथ बातें करेंगे ॥ ९ ॥ जिन अजन्माने मत्स्य, कूर्म, वराह, हयग्रीव और नृसिंह आदि रूप धारणकर जगत्‌की रक्षा की है, आज वे ही मुझसे वार्तालाप करेंगे ॥ १० ॥

'इस समय उन अव्ययात्मा जगत्प्रभुने अपने मनमें सोचा हुआ कार्य करनेके लिये अपनी ही इच्छासे मनुष्य-देह धारण किया है ॥ ११ ॥ जो अनन्त (शेषजी) अपने मस्तकपर रखी हुई पृथिवीको धारण करते हैं, संसारके हितके लिये अवतीर्ण हुए वे ही आज मुझसे 'अक्रूर' कहकर बोलेंगे ॥ १२ ॥