विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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३५४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १४
| उदग्रककुदाभोगप्रमाणो दुरतिक्रमः।<br>विण्मूत्रलिप्तपृष्ठाङ्गो गवामुद्वेगकारकः॥ ४ | उसके ककुद (कुहान) और शरीरका प्रमाण अत्यन्त ऊँचा एवं दुर्लङ्घ्य था, पृष्ठभाग गोबर और मूत्रसे लिथड़ा हुआ था। तथा वह समस्त गौओंको भयभीत कर रहा था॥ ४॥ |
| प्रलम्बकण्ठोऽतिमुखस्तरुखाताङ्किताननः।<br>पातयन्स गवां गर्भान्दैत्यो वृषभरूपधृक्॥ ५<br>सूदयंस्तापसानुग्रो वनानटति यस्सदा॥ ६ | उसकी ग्रीवा अत्यन्त लम्बी और मुख वृक्षके खोंखलेके समान अति गम्भीर था। वह वृषभरूपधारी दैत्य गौओंके गर्भोंको गिराता हुआ और तपस्वियोंको मारता हुआ सदा वनमें विचरा करता था॥ ५-६॥ |
| ततस्तमतिघोराक्षमवेक्ष्यातिभयातुराः ।<br>गोपा गोपस्त्रियश्चैव कृष्ण कृष्णेति चुक्रुशुः॥ ७ | तब उस अति भयानक नेत्रोंवाले दैत्यको देखकर गोप और गोपांगनाएँ भयभीत होकर 'कृष्ण, कृष्ण' पुकारने लगीं॥ ७॥ |
| सिंहनादं ततश्चक्रे तलशब्दं च केशवः।<br>तच्छब्दश्रवणाच्चासौ दामोदरमुपाययौ॥ ८ | उनका शब्द सुनकर श्रीकेशवने घोर सिंहनाद किया और ताली बजायी। उसे सुनते ही वह श्रीदामोदरकी ओर फिरा॥ ८॥ |
| अग्रन्यस्तविषाणाग्रः कृष्णकुक्षिकृतेक्षणः।<br>अभ्यधावत दुष्टात्मा कृष्णं वृषभदानवः॥ ९ | दुरात्मा वृषभासुर आगेको सींग करके तथा कृष्णचन्द्रकी कुक्षिमं दृष्टि लगाकर उनकी ओर दौड़ा॥ ९॥ |
| आयान्तं दैत्यवृषभं दृष्ट्वा कृष्णो महाबलः।<br>न चचाल तदा स्थानादवज्ञास्मितलीलया॥ १० | किन्तु महाबली कृष्ण वृषाभासुरको अपनी ओर आता देख अवहेलनासे लीलापूर्वक मुसकराते हुए उस स्थानसे विचलित न हुए॥ १०॥ |
| आसन्नं चैव जग्राह ग्राहवन्मधुसूदनः।<br>जघान जानुना कुक्षौ विषाणग्रहणाचलम्॥ ११ | निकट आनेपर श्रीमधुसूदनने उसे इस प्रकार पकड़ लिया जैसे ग्राह किसी क्षुद्र जीवको पकड़ लेता है; तथा सींग पकड़नेसे अचल हुए उस दैत्यकी कोखमें घुटनेसे प्रहार किया॥ ११॥ |
| तस्य दर्पबलं भङ्क्त्वा गृहीतस्य विषाणयोः।<br>अपीडयदरिष्टस्य कण्ठं क्लिन्नमिवाम्बरम्॥ १२ | इस प्रकार सींग पकड़े हुए उस दैत्यका दर्प भंगकर भगवान्ने अरिष्टासुरकी ग्रीवाको गीले वस्त्रके समान मरोड़ दिया॥ १२॥ |
| उत्पाट्य शृङ्गमेकं तु तेनैवाताडयत्ततः।<br>ममार स महादैत्यो मुखाच्छोणितमुद्वमन्॥ १३ | तदनन्तर उसका एक सींग उखाड़कर उसीसे उसपर आघात किया, जिससे वह महादैत्य मुखसे रक्त वमन करता हुआ मर गया॥ १३॥ |
| तुष्टुवुर्निहते तस्मिन्दैत्ये गोपा जनार्दनम्।<br>जम्भे हते सहस्राक्षं पुरा देवगणा यथा॥ १४ | जम्भके मरनेपर जैसे देवताओंने इन्द्रकी स्तुति की थी उसी प्रकार अरिष्टासुरके मरनेपर गोपगण श्रीजनार्दनकी प्रशंसा करने लगे॥ १४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥