विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 364, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 364
अ० १४ ] * पञ्चम अंश * ३५३
| काचित्प्रविलसद्बाहुः परिरभ्य चुचुम्ब तम्।<br>गोपी गीतस्तुतिव्याजान्निपुणा मधुसूदनम् ॥ ५४ | किसी निपुण गोपीने भगवान्के गानकी प्रशंसा करनेके बहाने भुजा फैलाकर श्रीमधुसूदनको आलिंगन करके चूम लिया॥ ५४॥ |
| गोपीकपोलसंश्लेषमभिगम्य हरेर्भुजौ।<br>पुलकोद्गमसस्याय स्वेदाम्बुघनतां गतौ ॥ ५५ | श्रीहरिकी भुजाएँ गोपियोंके कपोलोंका चुम्बन पाकर उन (कपोलों)-में पुलकावलिरूप धान्यकी उत्पत्तिके लिये स्वेदरूप जलके मेघ बन गयीं॥ ५५ ॥ |
| रासगेयं जगौ कृष्णो यावत्तारतरध्वनिः।<br>साधु कृष्णेति कृष्णेति तावत्ता द्विगुणं जगुः ॥ ५६ | कृष्णचन्द्र जितने उच्चस्वरसे रासोचित गान गाते थे उससे दूने शब्दसे गोपियाँ "धन्य कृष्ण! धन्य कृष्ण!!" की ही ध्वनि लगा रही थीं॥ ५६ ॥ |
| गतेऽनुगमनं चक्रुर्वलने सम्मुखं ययुः।<br>प्रतिलोमानुलोमाभ्यां भेजुर्गोपाङ्गना हरिम् ॥ ५७ | भगवान्के आगे जानेपर गोपियाँ उनके पीछे जातीं और लौटनेपर सामने चलतीं, इस प्रकार वे अनुलोम और प्रतिलोम-गतिसे श्रीहरिका साथ देती थीं॥ ५७॥ |
| स तथा सह गोपीभी ररास मधुसूदनः।<br>यथाब्दकोटिप्रतिमः क्षणस्तेन विनाभवत् ॥ ५८ | श्रीमधुसूदन भी गोपियोंके साथ इस प्रकार रासक्रीडा कर रहे थे कि उनके बिना एक क्षण भी गोपियोंको करोड़ों वर्षोंके समान बीतता था॥ ५८॥ |
| ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृभिस्तथा।<br>कृष्णं गोपाङ्गना रात्रौ रमयन्ति रतिप्रियाः ॥ ५९ | वे रास-रसिक गोपांगनाएँ पति, माता-पिता और भ्राता आदिके रोकनेपर भी रात्रिमें श्रीश्यामसुन्दरके साथ विहार करती थीं॥ ५९ ॥ |
| सोऽपि कैशोरकवयो मानयन्मधुसूदनः।<br>रेमे ताभिरमेयात्मा क्षपासु क्षपिताहितः ॥ ६० | शत्रुहन्ता अमेयात्मा श्रीमधुसूदन भी अपनी किशोरावस्थाका मान करते हुए रात्रिके समय उनके साथ रमण करते थे॥ ६०॥ |
| तद्भर्तृषु तथा तासु सर्वभूतेषु चेश्वरः।<br>आत्मस्वरूपरूपोऽसौ व्यापी वायुरिव स्थितः ॥ ६१ | वे सर्वव्यापी ईश्वर श्रीकृष्णचन्द्र गोपियोंमें, उनके पतियोंमें तथा समस्त प्राणियोंमें आत्मस्वरूपसे वायुके समान व्याप्त थे॥ ६१॥ |
| यथा समस्तभूतेषु नभोऽग्निः पृथिवी जलम्।<br>वायुश्चात्मा तथैवासौ व्याप्य सर्वमवस्थितः ॥ ६२ | जिस प्रकार आकाश, अग्नि, पृथिवी, जल, वायु और आत्मा समस्त प्राणियोंमें व्याप्त हैं उसी प्रकार वे भी सब पदार्थोंमें व्यापक हैं॥ ६२॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय
वृषाभासुर-वध
| श्रीपराशर उवाच<br>प्रदोषाग्रे कदाचित्तु रासासक्ते जनार्दने।<br>त्रासयन्समदो गोष्ठमरिष्टस्समुपागमत् ॥ १ | **श्रीपराशरजी बोले—**एक दिन सायंकालके समय जब श्रीकृष्णचन्द्र रासक्रीडामें आसक्त थे, अरिष्ट नामक एक मदोन्मत्त असुर [वृषभरूप धारणकर] सबको भयभीत करता ब्रजमें आया ॥ १ ॥ |
| सतोयतोयदच्छायास्तीक्ष्णशृङ्गोऽर्कलोचनः।<br>खुराग्रपातैरत्यर्थं दारयन्धरणीतलम् ॥ २ | इस अरिष्टासुरकी कान्ति सजल जलधरके समान कृष्णवर्ण थी, सींग अत्यन्त तीक्ष्ण थे, नेत्र सूर्यके समान तेजस्वी थे और अपने खुरोंकी चोटसे वह मानो पृथिवीको फाड़े डालता था ॥ २ ॥ |
| लेलिहानस्सनिष्पेषं जिह्वयोष्ठौ पुनः पुनः।<br>संरम्भाविद्धलाङ्गूलः कठिनस्कन्धबन्धनः ॥ ३ | वह दाँत पीसता हुआ पुनः-पुनः अपनी जिह्वासे ओठोंको चाट रहा था, उसने क्रोधवश अपनी पूँछ उठा रखी थी तथा उसके स्कन्धबन्धन कठोर थे ॥ ३ ॥ |