विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें३५२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १३
नूनमुक्ता त्वरामीति पुनरेष्यामि तेऽन्तिकम्। तेन कृष्णेन येनैषा त्वरिता पदपद्धतिः ॥ ४०
प्रविष्टो गहनं कृष्णः पदमत्र न लक्ष्यते। निवर्तध्वं शशाङ्कस्य नैतद्दीधितिगोचरे ॥ ४१
निवृत्तास्तास्तदा गोप्यो निराशाः कृष्णदर्शने। यमुनातीरमासाद्य जगुस्तच्चरितं तथा॥ ४२
ततो ददृशुरायान्तं विकासिमुखपंकजम्। गोप्यस्त्रैलोक्यगोप्तारं कृष्णमक्लिष्टचेष्टितम्॥ ४३
काचिदालोक्य गोविन्दमायान्तमतिहर्षिता। कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति प्राह नान्यदुदीरयत्॥ ४४
काचिद्भ्रूभङ्गुरं कृत्वा ललाटफलकं हरिम्। विलोक्य नेत्रभृङ्गाभ्यां पपौ तन्मुखपंकजम्॥ ४५
काचिदालोक्य गोविन्दं निमीलितविलोचना। तस्यैव रूपं ध्यायन्ती योगारूढेव सा बभौ॥ ४६
ततः काश्चित्प्रियालापैः काश्चिद्भ्रूभङ्गवीक्षितैः। निन्येऽनुनयमन्यां च करस्पर्शेन माधवः॥ ४७
ताभिः प्रसन्नचित्ताभिर्गोपीभिस्सह सादरम्। ररास रासगोष्ठीभिरुदारचरितो हरिः॥ ४८
रासमण्डलबन्धोऽपि कृष्णपार्श्वमनुज्झता। गोपीजनेन नैवाभूदेकस्थानस्थिरात्मना॥ ४९
हस्तेन गृह्य चैकैकां गोपीनां रासमण्डलम्। चकार तत्करस्पर्शानिमीलितदृशं हरिः॥ ५०
ततः प्रवृत्ते रासश्चलद्वलयनिस्वनः। अनुयातशरत्काव्यगेयगीतिरनुक्रमात् ॥५१
कृष्णश्शरच्चन्द्रमसं कौमुदीं कुमुदाकरम्। जगौ गोपीजनस्त्वेकं कृष्णनाम पुनः पुनः॥ ५२
परिवृत्तिश्रमेणैका चलद्वलयलापिनीम्। ददौ बाहुलतां स्कन्धे गोपी मधुनिघातिनः॥ ५३
यहाँ कृष्णने अवश्य उस गोपीसे कहा है '[तू यहाँ बैठ] मैं शीघ्र ही जाता हूँ [इस वनमें रहनेवाले राक्षसको मारकर] पुनः तेरे पास लौट आऊँगा। इसीलिये यहाँ उनके चरणोंके चिह्न शीघ्र गतिके-से दीख रहे हैं'॥ ४०॥ यहाँसे कृष्णचन्द्र गहन वनमें चले गये हैं, इसीसे उनके चरण-चिह्न दिखलायी नहीं देते; अब सब लौट चलो; इस स्थानपर चन्द्रमाकी किरणें नहीं पहुँच सकतीं॥ ४१॥
तदनन्तर वे गोपियाँ कृष्ण-दर्शनसे निराश होकर लौट आयीं और यमुनातटपर आकर उनके चरितोंको गाने लगीं॥ ४२॥ तब गोपियोंने प्रसन्नमुखारविन्द त्रिभुवनरक्षक लीलाविहारी श्रीकृष्णचन्द्रको वहाँ आते देखा॥ ४३॥ उस समय कोई गोपी तो श्रीगोविन्दको आते देखकर अति हर्षित हो केवल 'कृष्ण! कृष्ण!! कृष्ण!!!' इतना ही कहती रह गयी और कुछ न बोल सकी॥ ४४॥ कोई [प्रणयकोपवश] अपनी भ्रूभंगीसे ललाट सिकोड़कर श्रीहरिको देखते हुए अपने नेत्ररूप भ्रमरोंद्वारा उनके मुखकमलका मकरन्द पान करने लगी॥ ४५॥ कोई गोपी गोविन्दको देख नेत्र मूंदकर उन्हींके रूपका ध्यान करती हुई योगारूढ-सी भासित होने लगी॥ ४६॥
तब श्रीमाधव किसीसे प्रिय भाषण करके, किसीकी ओर भ्रूभंगीसे देखकर और किसीका हाथ पकड़कर उन्हें मनाने लगे॥ ४७॥ फिर उदारचरित श्रीहरिने उन प्रसन्नचित्त गोपियोंके साथ रासमण्डल बनाकर आदरपूर्वक रमण किया॥ ४८॥ किन्तु उस समय कोई भी गोपी कृष्णचन्द्रकी सन्निधिको न छोड़ना चाहती थी; इसलिये एक ही स्थानपर स्थिर रहनेके कारण रासोचित मण्डल न बन सका॥ ४९॥ तब उन गोपियोंमेंसे एक-एकका हाथ पकड़कर श्रीहरिने रासमण्डलकी रचना की। उस समय उनके करस्पर्शसे प्रत्येक गोपीकी आँखें आनन्दसे मुँद जाती थीं॥ ५०॥
तदनन्तर रासक्रीडा आरम्भ हुई। उसमें गोपियोंके चंचल कंकणोंकी झनकार होने लगी और फिर क्रमशः शरद्वर्णन-सम्बन्धी गीत होने लगे॥ ५१॥ उस समय कृष्णचन्द्र चन्द्रमा, चन्द्रिका और कुमुदवन-सम्बन्धी गान करने लगे; किन्तु गोपियोंने तो बारम्बार केवल कृष्णनामका ही गान किया॥ ५२॥ फिर एक गोपीने नृत्य करते-करते थककर चंचल कंकणकी झनकारसे युक्त अपनी बाहुलता श्रीमधुसूदनके गलेमें डाल दी॥ ५३॥