विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 362, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १३] * पञ्चम अंश * ३५१
कृष्णोऽहमेष ललितं व्रजाम्यालोक्यतां गतिः।
अन्या ब्रवीति कृष्णस्य मम गीतिर्निशम्यताम्॥ २६
गति तो देखो।'' दूसरी कहती—''कृष्ण तो मैं हूँ, अहा! मेरा गाना तो सुनो''॥ २५-२६॥
दुष्टकालिय तिष्ठात्र कृष्णोऽहमिति चापरा।
बाहुमास्फोट्य कृष्णस्य लीलया सर्वमाददे॥ २७
कोई अन्य गोपी भुजाएँ ठोंककर बोल उठती—''अरे दुष्ट कालिय! मैं कृष्ण हूँ, तनिक ठहर तो जा'' ऐसा कहकर वह कृष्णके सारे चरित्रोंका लीलापूर्वक अनुकरण करने लगती॥ २७॥
अन्या ब्रवीति भो गोपा निश्शंकैः स्थीयतामिति।
अलं वृष्टिभयेनात्र धृतो गोवर्धनो मया॥ २८
कोई और गोपी कहने लगती—''अरे गोपगण! मैंने गोवर्धन धारण कर लिया है, तुम वर्षासे मत डरो, निश्शंक होकर इसके नीचे आकर बैठ जाओ''॥ २८॥
धेनुकोऽयं मया क्षिप्तो विचरन्तु यथेच्छया।
गावो ब्रवीति चैवान्या कृष्णलीलानुसारिणी॥ २९
कोई दूसरी गोपी कृष्णलीलाओंका अनुकरण करती हुई बोलने लगती—''मैंने धेनुकासुरको मार दिया है, अब यहाँ गौएँ स्वच्छन्द होकर विचरें''॥ २९॥
एवं नानाप्रकारासु कृष्णचेष्टासु तास्तदा।
गोप्यो व्यग्राः समं चेरू रम्यं वृन्दावनान्तरम्॥ ३०
इस प्रकार समस्त गोपियाँ श्रीकृष्णचन्द्रकी नाना प्रकारकी चेष्टाओंमें व्यग्र होकर साथ-साथ अति सुरम्य वृन्दावनके अन्दर विचरने लगीं॥ ३०॥
विलोक्यैका भुवं प्राह गोपी गोपवराङ्गना।
पुलकाञ्चितसर्वाङ्गी विकासिनयनोत्पला॥ ३१
खिले हुए कमल-जैसे नेत्रोंवाली एक सुन्दरी गोपांगना सर्वांग पुलकित हो पृथिवीकी ओर देखकर कहने लगी—॥ ३१॥
ध्वजवज्राङ्कुशाब्जाङ्करेखावन्त्यालि पश्यत।
पदान्येतानि कृष्णस्य लीलाललितगामिनः॥ ३२
अरी आली! ये लीलाललितगामी कृष्णचन्द्रके ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल आदिकी रेखाओंसे सुशोभित पदचिह्न तो देखो॥ ३२॥
कापि तेन समायाता कृतपुण्या मदालसा।
पदानि तस्याश्चैतानि घनान्यल्पतनूनि च॥ ३३
और देखो, उनके साथ कोई पुण्यवती मदमाती युवती भी आ गयी है, उसके ये घने छोटे-छोटे और पतले चरणचिह्न दिखायी दे रहे हैं॥ ३३॥
पुष्पापचयमत्रोच्चैश्चक्रे दामोदरो ध्रुवम्।
येनाग्राक्रान्तमात्राणि पदान्यत्र महात्मनः॥ ३४
यहाँ निश्चय ही दामोदरने ऊँचे होकर पुष्पचयन किये हैं; इसी कारण यहाँ उन महात्माके चरणोंके केवल अग्रभाग ही अंकित हुए हैं॥ ३४॥
अत्रोपविश्य वै तेन काचित्पुष्पैरलंकृता।
अन्यजन्मनि सर्वात्मा विष्णुरभ्यर्चितस्तया॥ ३५
यहाँ बैठकर उन्होंने निश्चय ही किसी बड़भागिनीका पुष्पोंसे श्रृंगार किया है; अवश्य ही उसने अपने पूर्वजन्ममें सर्वात्मा श्रीविष्णुभगवान्की उपासना की होगी॥ ३५॥
पुष्पबन्धनसम्मानकृतमानामपास्य ताम्।
नन्दगोपसुतो यातो मार्गेणानेन पश्यत॥ ३६
और यह देखो, पुष्पबन्धनके सम्मानसे गर्विता होकर उसके मान करनेपर श्रीनन्दनन्दन उसे छोड़कर इस मार्गसे चले गये हैं॥ ३६॥
अनुयातैनमत्रान्या नितम्बभरमन्थरा।
या गन्तव्ये द्रुतं याति निम्नपादाग्रसंस्थितिः॥ ३७
अरी सखियो! देखो,यहाँ कोई नितम्बभारके कारण मन्दगामिनी गोपी कृष्णचन्द्रके पीछे-पीछे गयी है। वह अपने गन्तव्य स्थानको तीव्रगतिसे गयी है, इसीसे उसके चरणचिह्नोंके अग्रभाग कुछ नीचे दिखायी देते हैं॥ ३७॥
हस्तन्यस्ताग्रहस्तेयं तेन याति तथा सखी।
अनायत्तपदन्यासा लक्ष्यते पदपद्धतिः॥ ३८
यहाँ वह सखी उनके हाथमें अपना पाणिपल्लव देकर चली है, इसीसे उसके चरणचिह्न पराधीन-से दिखलायी देते हैं॥ ३८॥
हस्तसंस्पर्शमात्रेण धूर्तेनैषा विमानिता।
नैराश्यान्मन्दगामिन्या निवृत्तं लक्ष्यते पदम्॥ ३९
देखो, यहाँसे उस मन्दगामिनीके निराश होकर लौटनेके चरणचिह्न दीख रहे हैं, मालूम होता है उस धूर्तने [उसकी अन्य आन्तरिक अभिलाषाओंको पूर्ण किये बिना ही] केवल कर-स्पर्श करके उसका अपमान किया है॥ ३९॥