विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 361, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें३५० * श्रीविष्णुपुराण * अ० १३ ]
नाहं देवो न गन्धर्वो न यक्षो न च दानवः।
अहं वो बान्धवो जातो नैतच्चिन्त्यमितोऽन्यथा॥ १२
श्रीपराशर उवाच
इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं बद्धमौनास्ततो वनम्।
ययुर्गोपा महाभाग तस्मिन्प्रणयकोपिनि॥ १३
कृष्णस्तु विमलं व्योम शरच्चन्द्रस्य चन्द्रिकाम्।
तदा कुमुदिनीं फुल्लामामोदितदिगन्तराम्॥ १४
वनराजिं तथा कूजद्भृङ्गमालाममनोहराम्।
विलोक्य सह गोपीभीर्मनश्चक्रे रतिं प्रति॥ १५
विना रामेण मधुरमतीव वनिताप्रियम्।
जगाै कलपदं शौरिस्तारमन्द्रकृतक्रमम्॥ १६
रम्यं गीतध्वनिं श्रुत्वा सन्त्यज्यावसथांस्तदा।
आजग्मुस्त्वरिता गोप्यो यत्रास्ते मधुसूदनः॥ १७
शनैश्शनैर्जगौ गोपी काचित्तस्य लयानुगम्।
दत्तावधाना काचिच्च तमेव मनसास्मरत्॥ १८
काचित्कृष्णेति कृष्णेति प्रोच्य लज्जामुपाययौ।
ययौ च काचित्प्रेमान्धा तत्पार्श्वमविलम्बितम्॥ १९
काचिच्चावसथस्यान्ते स्थित्वा दृष्ट्वा बहिर्गुरूम्।
तन्मयत्वेन गोविन्दं दध्यौ मीलितलोचना॥ २०
तच्चित्तविमलाह्लादक्षीणपुण्यचया तथा।
तदप्राप्तिमहादुःखविलीनाशेषपातका ॥ २१
चिन्तयन्ती जगत्सूतिं परब्रह्मस्वरूपिणम्।
निरुच्छ्वासतया मुक्तिं गतान्या गोपकन्यका॥ २२
गोपीपरिवृतो रात्रिं शरच्चन्द्रमनोरमाम्।
मानयामास गोविन्दो रासारम्भरसोत्सुकः॥ २३
गोप्यश्च वृन्दशः कृष्णचेष्टास्वायत्त मूर्तयः।
अन्यदेशं गते कृष्णे चेरूर्वृन्दावनन्तरम्॥ २४
कृष्णे निबद्धहृदया इदमूचुः परस्परम्॥ २५
मैं न देव हूँ, न गन्धर्व हूँ, न यक्ष हूँ और न दानव हूँ। मैं तो आपके बान्धवरूपसे ही उत्पन्न हुआ हूँ; आपलोगोंको इस विषयमें और कुछ विचार न करना चाहिये ॥ १२ ॥
**श्रीपराशरजी बोले—**हे महाभाग! श्रीहरिके प्रणयकोपयुक्त होकर कहे हुए इन वाक्योंको सुनकर वे समस्त गोपगण चुपचाप वनको चले गये ॥ १३॥
तब श्रीकृष्णचन्द्रने निर्मल आकाश, शरच्चन्द्रकी चन्द्रिका और दिशाओंको सुरभित करनेवाली विकसित कुमुदिनी तथा वन-खण्डको मुखर मधुकरोंसे मनोहर देखकर गोपियोंके साथ रमण करनेकी इच्छा की ॥ १४-१५ ॥ उस समय बलरामजीके बिना ही श्रीमुरलीमनोहर स्त्रियोंको प्रिय लगनेवाला अत्यन्त मधुर, अस्फुट एवं मृदुल पद ऊँचे और धीमे स्वरसे गाने लगे ॥ १६ ॥ उनकी उस सुरम्य गीतध्वनिको सुनकर गोपियाँ अपने-अपने घरोंको छोड़कर तत्काल जहाँ श्रीमधुसूदन थे वहाँ चली आयीं ॥ १७॥
वहाँ आकर कोई गोपी तो उनके स्वर-में-स्वर मिलाकर धीरे-धीरे गाने लगी और कोई मन-ही-मन उन्हींका स्मरण करने लगी ॥ १८ ॥ कोई 'हे कृष्ण, हे कृष्ण' ऐसा कहती हुई लज्जावश संकुचित हो गयी और कोई प्रेमोन्मादिनी होकर तुरन्त उनके पास जा खड़ी हुई ॥ १९ ॥ कोई गोपी बाहर गुरुजनोंको देखकर अपने घरमें ही रहकर आँख मूँदकर तन्मयभावसे श्रीगोविन्दका ध्यान करने लगी ॥ २० ॥ तथा कोई गोपकुमारी जगत्के कारण परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रका चिन्तन करते-करते [मूर्च्छावस्थामें] प्राणापानके रुक जानेसे मुक्त हो गयी, क्योंकि भगवद्ध्यानके विमल आह्लादसे उसकी समस्त पुण्यराशि क्षीण हो गयी और भगवान्की अप्राप्तिके महान् दुःखसे उसके समस्त पाप लीन हो गये थे ॥ २१-२२ ॥ गोपियोंसे घिरे हुए रासारम्भरूप रसके लिये उत्कण्ठित श्रीगोविन्दने उस शरच्चन्द्रसुशोभिता रात्रिको [रास करके] सम्मानित किया ॥ २३ ॥
उस समय भगवान् कृष्णके अन्यत्र चले जानेपर कृष्णचेष्टाके अधीन हुईं गोपियाँ यूथ बनाकर वृन्दावनके अन्दर विचरने लगीं ॥ २४ ॥ कृष्णमें निबद्धचित्त हुई वे व्रजाङ्गनाएँ परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगीं—[उसमेंसे एक गोपी कहती थी—] “मैं ही कृष्ण हूँ; देखो, कैसी सुन्दर चालसे चलता हूँ; तनिक मेरी