भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 360

अ० १३ ] * पञ्चम अंश * ३४९

तेरहवाँ अध्याय

गोपोंद्वारा भगवान्‌का प्रभाववर्णन तथा भगवान्‌का गोपियोंके साथ रासक्रीडा करना

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—इन्द्रके चले जानेपर लीलाविहारी श्रीकृष्णचन्द्रको बिना प्रयास ही गोवर्धन-पर्वत धारण करते देख गोपगण उनसे प्रीतिपूर्वक बोले—॥ १॥ हे भगवन्! हे महाभाग! आपने गिरिराजको धारण कर हमारी और गौओंकी इस महान् भयसे रक्षा की है॥ २॥ हे तात! कहाँ आपकी यह अनुपम बाललीला, कहाँ निन्दित गोपजाति और कहाँ ये दिव्य कर्म? यह सब क्या है, कृपया हमें बतलाइये॥ ३॥ आपने यमुनाजलमें कालियनागका दमन किया, धेनुकासुरको मारा और फिर यह गोवर्धनपर्वत धारण किया; आपके इन अद्भुत कर्मोंसे हमारे चित्तमें बड़ी शंका हो रही है॥ ४॥ हे अमितविक्रम! हम भगवान् हरिके चरणोंकी शपथ करके आपसे सच-सच कहते हैं कि आपके ऐसे बल-वीर्यको देखकर हम आपको मनुष्य नहीं मान सकते॥ ५॥ हे केशव! स्त्री और बालकोंके सहित सभी व्रजवासियोंकी आपपर अत्यन्त प्रीति है। आपका यह कर्म तो देवताओंके लिये भी दुष्कर है॥ ६॥ हे कृष्ण! आपकी यह बाल्यावस्था, विचित्र बल-वीर्य और हम-जैसे नीच पुरुषोंमें जन्म लेना—हे अमेयात्मन्! ये सब बातें विचार करनेपर हमें शंकामें डाल देती हैं॥ ७॥ आप देवता हों, दानव हों, यक्ष हों अथवा गन्धर्व हों; इन बातोंका विचार करनेसे हमें क्या प्रयोजन है? हमारे तो आप बन्धु ही हैं, अतः आपको नमस्कार है॥ ८॥
गते शक्रे तु गोपालाः कृष्णमक्लिष्टकारिणम्।<br>ऊचुः प्रीत्या धृतं दृष्ट्वा तेन गोवर्धनाचलम्॥ १
वयम्स्मान्महाभाग भगवन्महतो भयात्।<br>गावश्च भवता त्राता गिरिधारणकर्मणा॥ २
बालक्रीडेयमतुला गोपालत्वं जुगुप्सितम्।<br>दिव्यं च भवतः कर्म किमेतत्तात कथ्यताम्॥ ३
कालियो दमितस्तोये धेनुको विनिपातितः।<br>धृतो गोवर्धनश्चायं शङ्कितानि मनांसि नः॥ ४
सत्यं सत्यं हरेः पादौ शपामोऽमितविक्रम।<br>यथावद्वीर्यमालोक्य न त्वां मन्यामहे नरम्॥ ५
प्रीतिः सस्त्रीकुमारस्य व्रजस्य त्वयि केशव।<br>कर्म चेदमशक्यं यत्समस्तैस्त्रिदशैरपि॥ ६
बालत्वं चातिवीर्यत्वं जन्म चास्मास्वशोभनम्।<br>चिन्त्यमानममेयात्मञ्छङ्कां कृष्ण प्रयच्छति॥ ७
देवो वा दानवो वा त्वं यक्षो गन्धर्व एव वा।<br>किमस्माकं विचारेण बान्धवोऽसि नमोऽस्तु ते॥ ८
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—गोपगणके ऐसा कहनेपर महामति कृष्णचन्द्र कुछ देरतक चुप रहे और फिर कुछ प्रणयजन्य कोपपूर्वक इस प्रकार कहने लगे— ॥ ९॥
क्षणं भूत्वा त्वसौ तूष्णीं किञ्चित्प्रणयकोपवान्।<br>इत्येवमुक्तस्तैर्गोपैः कृष्णोऽप्याह महामतिः॥ ९
श्रीभगवानुवाचश्रीभगवान्‌ने कहा—हे गोपगण! यदि आपलोगोंको मेरे सम्बन्धसे किसी प्रकारकी लज्जा न हो तो मैं आपलोगोंसे प्रशंसनीय हूँ इस बातका विचार करनेकी भी क्या आवश्यकता है?॥ १०॥ यदि मुझमें आपकी प्रीति है और यदि मैं आपकी प्रशंसाका पात्र हूँ तो आपलोग मुझमें बान्धव-बुद्धि ही करें॥ ११॥
मत्सम्बन्धेन वो गोपा यदि लज्जा न जायते।<br>श्लाघ्यो वाहं ततः किं वो विचारेण प्रयोजनम्॥ १०
यदि वोऽस्ति मयि प्रीतिः श्लाघ्योऽहं भवतां यदि।<br>तदात्मबन्धुसदृशी बुद्धिर्वः क्रियतां मयि॥ ११