भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 369

३५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १६

व्यादितास्यमहारन्ध्रस्सोऽसुरः कृष्णबाहुना । निपातितो द्विधा भूमौ वैद्युतेन यथा द्रुमः ॥ १४

द्विपादे पृष्ठपुच्छाद्धे श्रवणैकाक्षिनासिके । केशिनस्ते द्विधाभूते शकले द्वे विरेजतुः ॥ १५

हत्वा तु केशिनं कृष्णो गोपालैर्मुदितैर्वृतः । अनायस्ततनुस्स्वस्थो हसंस्तत्रैव तस्थिवान् ॥ १६

ततो गोप्यश्च गोपाश्च हते केशिनि विस्मिताः । तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षमनुरागमनोरमम् ॥ १७

अथाहान्तर्हितो विप्र नारदो जलदे स्थितः । केशिनं निहतं दृष्ट्वा हर्षनिर्भरमानसः ॥ १८

साधु साधु जगन्नाथ लीलयैव यदच्युत । निहतोऽयं त्वया केशी क्लेशदस्तत्रिदिवौकसाम् ॥ १९

युद्धोत्सुकोऽहमत्यर्थं नरवाजिमहाहवम् । अभूतपूर्वमन्यत्र द्रष्टुं स्वर्गादिहागतः ॥ २०

कर्माण्यत्रावतारे ते कृतानि मधुसूदन । यानि तैर्विस्मितं चेतस्तोषमेतेन मे गतम् ॥ २१

तुरङ्गस्यास्य शक्रोऽपि कृष्ण देवाश्च बिभ्यति । धुतकेसरजालस्य हेषतोऽभ्रावलोकिनः ॥ २२

यस्मात्त्वयैष दुष्टात्मा हतः केशी जनार्दन । तस्मात्केशवनाम्ना त्वं लोके ख्यातो भविष्यसि ॥ २३

स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि कंसयुद्धेऽधुना पुनः । परश्वोऽहं समेष्यामि त्वया केशिनिषूदन ॥ २४

उग्रसेनसुते कंसे सानुगे विनिपातिते । भारावतारकर्ता त्वं पृथिव्याः पृथिवीधर ॥ २५

तत्रानेकप्रकाराणि युद्धानि पृथिवीक्षिताम् । द्रष्टव्यानि मयायुष्मत्प्रणीतानि जनार्दन ॥ २६

सोऽहं यास्यामि गोविन्द देवकार्यं महत्कृतम् । त्वयैव विदितं सर्वं स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ २७

नारदे तु गते कृष्णस्सह गोपैस्सभाजितः । विवेश गोकुलं गोपीनेत्रपानैकभाजनम् ॥ २८


इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रकी भुजासे जिसके मुखका विशाल रन्ध्र फैलाया गया है वह महान् असुर मरकर वज्रपातसे गिरे हुए वृक्षके समान दो खण्ड होकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १४ ॥

केशीके शरीरके वे दोनों खण्ड दो पाँव, आधी पीठ, आधी मूँछ तथा एक-एक कान-आँख और नासिकारन्ध्रके सहित सुशोभित हुए ॥ १५ ॥

इस प्रकार केशीको मारकर प्रसन्नचित्त ग्वालबालोंसे घिरे हुए श्रीकृष्णचन्द्र बिना श्रमके स्वस्थचित्तसे हँसते हुए वहीं खड़े रहे ॥ १६ ॥

केशीके मारे जानेसे विस्मित हुए गोप और गोपियोंने अनुरागवश अत्यन्त मनोहर लगनेवाले कमलनयन श्रीश्यामसुन्दरकी स्तुति की ॥ १७ ॥

हे विप्र ! उसे मरा देख मेघपटलमें छिपे हुए श्रीनारदजी हर्षितचित्तसे कहने लगे— ॥ १८ ॥

‘‘हे जगन्नाथ ! हे अच्युत !! आप धन्य हैं, धन्य हैं। अहा ! आपने देवताओंको दुःख देनेवाले इस केशीको लीलासे ही मार डाला ॥ १९ ॥

मैं मनुष्य और अश्वके इस पहले और कहीं न होनेवाले युद्धको देखनेके लिये ही अत्यन्त उत्कण्ठित होकर स्वर्गसे यहाँ आया था ॥ २० ॥

हे मधुसूदन ! आपने अपने इस अवतारमें जो-जो कर्म किये हैं उनसे मेरा चित्त अत्यन्त विस्मित और सन्तुष्ट हो रहा है ॥ २१ ॥

हे कृष्ण ! जिस समय यह अश्व अपनी सटाओंको हिलाता और हींसता हुआ आकाशकी ओर देखता था तो इससे सम्पूर्ण देवगण और इन्द्र भी डर जाते थे ॥ २२ ॥

हे जनार्दन ! आपने इस दुष्टात्मा केशीको मारा है; इसलिये आप लोकमें ‘केशव’ नामसे विख्यात होंगे ॥ २३ ॥

हे केशिनिषूदन ! आपका कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। परसों कंसके साथ आपका युद्ध होनेके समय मैं फिर आऊँगा ॥ २४ ॥

हे पृथिवीधर ! अनुगामियों सहित उग्रसेनके पुत्र कंसके मारे जानेपर आप पृथिवीका भार उतार देंगे ॥ २५ ॥

हे जनार्दन ! उस समय मैं अनेक राजाओंके साथ आप आयुष्मान् पुरुषके किये हुए अनेक प्रकारके युद्ध देखूँगा ॥ २६ ॥

हे गोविन्द ! अब मैं जाना चाहता हूँ। आपने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य किया है। आप सभी कुछ जानते हैं [मैं अधिक क्या कहूँ?] आपका मंगल हो, मैं जाता हूँ’’ ॥ २७ ॥

तदनन्तर नारदजीके चले जानेपर गोपगणसे सम्मानित गोपियोंके नेत्रोंके एकमात्र दृश्य श्रीकृष्णचन्द्रने ग्वालबालोंके साथ गोकुलमें प्रवेश किया ॥ २८ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥