विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १६
व्यादितास्यमहारन्ध्रस्सोऽसुरः कृष्णबाहुना । निपातितो द्विधा भूमौ वैद्युतेन यथा द्रुमः ॥ १४
द्विपादे पृष्ठपुच्छाद्धे श्रवणैकाक्षिनासिके । केशिनस्ते द्विधाभूते शकले द्वे विरेजतुः ॥ १५
हत्वा तु केशिनं कृष्णो गोपालैर्मुदितैर्वृतः । अनायस्ततनुस्स्वस्थो हसंस्तत्रैव तस्थिवान् ॥ १६
ततो गोप्यश्च गोपाश्च हते केशिनि विस्मिताः । तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षमनुरागमनोरमम् ॥ १७
अथाहान्तर्हितो विप्र नारदो जलदे स्थितः । केशिनं निहतं दृष्ट्वा हर्षनिर्भरमानसः ॥ १८
साधु साधु जगन्नाथ लीलयैव यदच्युत । निहतोऽयं त्वया केशी क्लेशदस्तत्रिदिवौकसाम् ॥ १९
युद्धोत्सुकोऽहमत्यर्थं नरवाजिमहाहवम् । अभूतपूर्वमन्यत्र द्रष्टुं स्वर्गादिहागतः ॥ २०
कर्माण्यत्रावतारे ते कृतानि मधुसूदन । यानि तैर्विस्मितं चेतस्तोषमेतेन मे गतम् ॥ २१
तुरङ्गस्यास्य शक्रोऽपि कृष्ण देवाश्च बिभ्यति । धुतकेसरजालस्य हेषतोऽभ्रावलोकिनः ॥ २२
यस्मात्त्वयैष दुष्टात्मा हतः केशी जनार्दन । तस्मात्केशवनाम्ना त्वं लोके ख्यातो भविष्यसि ॥ २३
स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि कंसयुद्धेऽधुना पुनः । परश्वोऽहं समेष्यामि त्वया केशिनिषूदन ॥ २४
उग्रसेनसुते कंसे सानुगे विनिपातिते । भारावतारकर्ता त्वं पृथिव्याः पृथिवीधर ॥ २५
तत्रानेकप्रकाराणि युद्धानि पृथिवीक्षिताम् । द्रष्टव्यानि मयायुष्मत्प्रणीतानि जनार्दन ॥ २६
सोऽहं यास्यामि गोविन्द देवकार्यं महत्कृतम् । त्वयैव विदितं सर्वं स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ २७
नारदे तु गते कृष्णस्सह गोपैस्सभाजितः । विवेश गोकुलं गोपीनेत्रपानैकभाजनम् ॥ २८
इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रकी भुजासे जिसके मुखका विशाल रन्ध्र फैलाया गया है वह महान् असुर मरकर वज्रपातसे गिरे हुए वृक्षके समान दो खण्ड होकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १४ ॥
केशीके शरीरके वे दोनों खण्ड दो पाँव, आधी पीठ, आधी मूँछ तथा एक-एक कान-आँख और नासिकारन्ध्रके सहित सुशोभित हुए ॥ १५ ॥
इस प्रकार केशीको मारकर प्रसन्नचित्त ग्वालबालोंसे घिरे हुए श्रीकृष्णचन्द्र बिना श्रमके स्वस्थचित्तसे हँसते हुए वहीं खड़े रहे ॥ १६ ॥
केशीके मारे जानेसे विस्मित हुए गोप और गोपियोंने अनुरागवश अत्यन्त मनोहर लगनेवाले कमलनयन श्रीश्यामसुन्दरकी स्तुति की ॥ १७ ॥
हे विप्र ! उसे मरा देख मेघपटलमें छिपे हुए श्रीनारदजी हर्षितचित्तसे कहने लगे— ॥ १८ ॥
‘‘हे जगन्नाथ ! हे अच्युत !! आप धन्य हैं, धन्य हैं। अहा ! आपने देवताओंको दुःख देनेवाले इस केशीको लीलासे ही मार डाला ॥ १९ ॥
मैं मनुष्य और अश्वके इस पहले और कहीं न होनेवाले युद्धको देखनेके लिये ही अत्यन्त उत्कण्ठित होकर स्वर्गसे यहाँ आया था ॥ २० ॥
हे मधुसूदन ! आपने अपने इस अवतारमें जो-जो कर्म किये हैं उनसे मेरा चित्त अत्यन्त विस्मित और सन्तुष्ट हो रहा है ॥ २१ ॥
हे कृष्ण ! जिस समय यह अश्व अपनी सटाओंको हिलाता और हींसता हुआ आकाशकी ओर देखता था तो इससे सम्पूर्ण देवगण और इन्द्र भी डर जाते थे ॥ २२ ॥
हे जनार्दन ! आपने इस दुष्टात्मा केशीको मारा है; इसलिये आप लोकमें ‘केशव’ नामसे विख्यात होंगे ॥ २३ ॥
हे केशिनिषूदन ! आपका कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। परसों कंसके साथ आपका युद्ध होनेके समय मैं फिर आऊँगा ॥ २४ ॥
हे पृथिवीधर ! अनुगामियों सहित उग्रसेनके पुत्र कंसके मारे जानेपर आप पृथिवीका भार उतार देंगे ॥ २५ ॥
हे जनार्दन ! उस समय मैं अनेक राजाओंके साथ आप आयुष्मान् पुरुषके किये हुए अनेक प्रकारके युद्ध देखूँगा ॥ २६ ॥
हे गोविन्द ! अब मैं जाना चाहता हूँ। आपने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य किया है। आप सभी कुछ जानते हैं [मैं अधिक क्या कहूँ?] आपका मंगल हो, मैं जाता हूँ’’ ॥ २७ ॥
तदनन्तर नारदजीके चले जानेपर गोपगणसे सम्मानित गोपियोंके नेत्रोंके एकमात्र दृश्य श्रीकृष्णचन्द्रने ग्वालबालोंके साथ गोकुलमें प्रवेश किया ॥ २८ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
अ० १७ ] * पञ्चम अंश * ३५९
सत्रहवाँ अध्याय
अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा
श्रीपराशर उवाच अक्रूरोऽपि विनिष्क्रम्य स्यन्दनेनाशुगामिना । कृष्णसंदर्शनाकाङ्क्षी प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥ १
चिन्तयामास चाक्रूरो नास्ति धन्यतरो मया । योऽहमंशावतीर्णस्य मुखं द्रक्ष्यामि चक्रिणः ॥ २
अद्य मे सफलं जन्म सुप्रभाताभवन्निशा । यदुन्निद्राभपत्राक्षं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम् ॥ ३
पापं हरति यत्पुंसां स्मृतं सङ्कल्पनामयम् । तत्पुण्डरीकनयनं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम् ॥ ४
विनिर्जग्मुर्यतो वेदा वेदाङ्गानrendered्यखिलानि च । द्रक्ष्यामि तत्परं धाम धाम्नां भगवतो मुखम् ॥ ५
यज्ञेषु यज्ञपुरुषः पुरुषैः पुरुषोत्तमः । इज्यते योऽखिलाधारस्तं द्रक्ष्यामि जगत्पतिम् ॥ ६
इष्ट्वा यमिन्द्रो यज्ञानां शतेनामरराजताम् । अवाप तमनन्तादिमहं द्रक्ष्यामि केशवम् ॥ ७
न ब्रह्मा नेन्द्ररुद्राश्विवस्वादित्यमरुद्गणाः । यस्य स्वरूपं जानन्ति प्रत्यक्षं याति मे हरिः ॥ ८
सर्वात्मा सर्ववित्सर्वस्सर्वभूतेष्ववस्थितः । यो ह्यचिन्त्योऽव्ययो व्यापी स वक्ष्यति मया सह ॥ ९
मत्स्यकूर्मवराहाश्वसिंह्रूपादिभिः स्थितिम् । चकार जगतो योऽजः सोऽद्य मां प्रलपिष्यति ॥ १०
साम्प्रतं च जगत्स्वामी कार्यमात्महृदि स्थितम् । कर्तुं मनुष्यतां प्राप्तस्स्वेच्छादेहधृगव्ययः ॥ ११
योऽनन्तः पृथिवीं धत्ते शेखरस्थितिसंस्थिताम् । सोऽवतीर्णो जगत्यर्थे मामक्रूरेति वक्ष्यति ॥ १२
श्रीपराशरजी बोले— अक्रूरजी भी तुरंत ही मथुरापुरीसे निकलकर श्रीकृष्ण-दर्शनकी लालसासे एक शीघ्रगामी रथद्वारा नन्दजीके गोकुलको चले ॥ १ ॥ अक्रूरजी सोचने लगे 'आज मुझ-जैसा बड़भागी और कोई नहीं है; क्योंकि अपने अंशसे अवतीर्ण चक्रधारी श्रीविष्णुभगवान्का मुख मैं अपने नेत्रोंसे देखूँगा ॥ २ ॥ आज मेरा जन्म सफल हो गया; आजकी रात्रि [अवश्य] सुन्दर प्रभातवाली थी, जिससे कि मैं आज खिले हुए कमलके समान नेत्रवाले श्रीविष्णुभगवान्के मुखका दर्शन करूँगा ॥ ३ ॥ प्रभुका जो संकल्पमय मुखारविन्द स्मरणमात्रसे पुरुषोंके पापोंको दूर कर देता है, आज मैं विष्णुभगवान्के उसी कमलनयन मुखको देखूँगा ॥ ४ ॥ जिससे सम्पूर्ण वेद और वेदांगोंकी उत्पत्ति हुई है, आज मैं सम्पूर्ण तेजस्वियोंके परम आश्रय उसी भगवत्-मुखारविन्दका दर्शन करूँगा ॥ ५ ॥ समस्त पुरुषोंके द्वारा यज्ञोंमें जिन अखिल विश्वके आधारभूत पुरुषोत्तमका यज्ञपुरुषरूपसे यजन (पूजन) किया जाता है, आज मैं उन्हीं जगत्पतिका दर्शन करूँगा ॥ ६ ॥ जिनका सौ यज्ञोंसे यजन करके इन्द्रने देवराज-पदवी प्राप्त की है, आज मैं उन्हीं अनादि और अनन्त केशवका दर्शन करूँगा ॥ ७ ॥ जिनके स्वरूपको ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसुगण, आदित्य और मरुद्गण आदि कोई भी नहीं जानते आज वे ही हरि मेरे नेत्रोंके विषय होंगे ॥ ८ ॥ जो सर्वात्मा, सर्वज्ञ, सर्वस्वरूप और सब भूतोंमें अवस्थित हैं तथा जो अचिन्त्य, अव्यय और सर्वव्यापक हैं, अहो! आज स्वयं वे ही मेरे साथ बातें करेंगे ॥ ९ ॥ जिन अजन्माने मत्स्य, कूर्म, वराह, हयग्रीव और नृसिंह आदि रूप धारणकर जगत्की रक्षा की है, आज वे ही मुझसे वार्तालाप करेंगे ॥ १० ॥
'इस समय उन अव्ययात्मा जगत्प्रभुने अपने मनमें सोचा हुआ कार्य करनेके लिये अपनी ही इच्छासे मनुष्य-देह धारण किया है ॥ ११ ॥ जो अनन्त (शेषजी) अपने मस्तकपर रखी हुई पृथिवीको धारण करते हैं, संसारके हितके लिये अवतीर्ण हुए वे ही आज मुझसे 'अक्रूर' कहकर बोलेंगे ॥ १२ ॥
३६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १७
पितृपुत्रसुहृद्भ्रातृमातृबन्धुमयीमिमाम् । यन्मायां नालमुत्तुर्तुं जगत्तस्मै नमो नमः ॥ १३ तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते । योगमायाममेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः ॥ १४ यज्वभिर्यज्ञपुरुषो वासुदेवश्च सात्वतैः । वेदान्तवेदिभिर्विष्णुः प्रोच्यते यो नतोऽस्मि तम् ॥ १५ यथा यत्र जगद्धाग्नि धातर्येतत्प्रतिष्ठितम् । सदसत्तेन सत्येन मय्यसौ यातु सौम्यताम् ॥ १६ स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते । पुरुषस्तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥ १७ श्रीपराशर उवाच इत्थं सञ्चिन्तयन्विष्णुं भक्तिनम्रात्ममानसः । अक्रूरो गोकुलं प्राप्तः किञ्चित्सूर्ये विराजति ॥ १८ स ददर्श तदा कृष्णमादावादोहने गवाम् । वत्समध्यगतं फुल्लनीलोत्पलदलच्छविम् ॥ १९ प्रफुल्लपद्मपत्राक्षं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् । प्रलम्बबाहुमायामतुङ्गोरःस्थलमुन्नसम् ॥ २० सविलासस्मिताधारं बिभ्राणं मुखपङ्कजम् । तुङ्गरक्तनखं पद्भ्यां धरण्यां सुप्रतिष्ठितम् ॥ २१ बिभ्राणं वाससी पीते वन्यपुष्पविभूषितम् । सेन्दुनीलाचलाभं तं सिताम्भोजावतंसकम् ॥ २२ हंसकुन्देन्दुधवलं नीलाम्बरधरं द्विज । तस्यानु बलभद्रं च ददर्श यदुनन्दनम् ॥ २३ प्रांशुमुत्तुङ्गबाहुंसं विकासिमुखपङ्कजम् । मेघमालापरिवृतं कैलासाद्रिमिवापरम् ॥ २४ तौ दृष्ट्वा विकसद्वक्त्रसरोजः स महामतिः । पुलकाञ्चितसर्वाङ्गस्तदाक्रूरोऽभवन्मुने ॥ २५ तदेतत्परमं धाम तदेतत्परमं पदम् । भगवद्वासुदेवांशो द्विधा योऽयं व्यवस्थितः ॥ २६ साफल्यमक्ष्णोर्युगमेतदत्र दृष्टे जगद्धातरि यातमुच्चैः ।
'जिनकी इस पिता, पुत्र, सुहृद्, भ्राता, माता और बन्धुरूपिणी मायाको पार करनेमें संसार सर्वथा असमर्थ है, उन मायापतिको बारम्बार नमस्कार है॥ १३॥ जिनमें हृदयको लगा देनेसे पुरुष इस योगमायारूप विस्तृत अविद्याको पार कर जाता है, उन विद्यास्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है॥ १४॥ जिन्हें याज्ञिकलोग 'यज्ञपुरुष', सात्वत (यादव अथवा भगवद्भक्त)-गण 'वासुदेव' और वेदान्तवेत्ता 'विष्णु' कहते हैं उन्हें बारम्बार नमस्कार है॥ १५॥ जिस (सत्य)-से यह सदसद्रूप जगत् उस जगदाधार विधातामें ही स्थित है उस सत्यबलसे ही वे प्रभु मुझपर प्रसन्न हों॥ १६॥ जिनके स्मरणमात्रसे पुरुष सर्वथा कल्याणपात्र हो जाता है, मैं सर्वदा उन अजन्मा हरिकी शरणमें प्राप्त होता हूँ' ॥ १७ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय ! भक्तिविनम्रचित्त अक्रूरजी इस प्रकार श्रीविष्णुभगवान्का चिन्तन करते कुछ-कुछ सूर्य रहते ही गोकुलमें पहुँच गये ॥ १८॥ वहाँ पहुँचनेपर पहले उन्होंने खिले हुए नीलकमलकी-सी कान्तिवाले श्रीकृष्णचन्द्रको गौओंके दोहनस्थानमें बछड़ोंके बीच विराजमान देखा ॥ १९॥ जिनके नेत्र खिले हुए कमलके समान थे, वक्षःस्थलमें श्रीवत्स-चिह्न सुशोभित था, भुजाएँ लम्बी-लम्बी थीं, वक्षःस्थल विशाल और ऊँचा था तथा नासिका उन्नत थी ॥ २०॥ जो सविलास हास्ययुक्त मनोहर मुखारविन्दसे सुशोभित थे तथा उन्नत और रक्तनखयुक्त चरणोंसे पृथिवीपर विराजमान थे ॥ २१॥ जो दो पीताम्बर धारण किये थे, वन्यपुष्पोंसे विभूषित थे तथा जिनका श्वेत कमलके आभूषणोंसे युक्त श्याम शरीर सचन्द्र नीलाचलके समान सुशोभित था ॥ २२ ॥
हे द्विज ! श्रीब्रजचन्द्रके पीछे उन्होंने हंस, कुन्द और चन्द्रमाके समान गौरवर्ण नीलाम्बरधारी यदुनन्दन श्रीबलभद्रजीको देखा ॥ २३ ॥ विशाल भुजदण्ड, उन्नत स्कन्ध और विकसित मुखारविन्द श्रीबलभद्रजी मेघमालासे घिरे हुए दूसरे कैलासपर्वतके समान जान पड़ते थे ॥ २४ ॥
हे मुने ! उन दोनों बालकोंको देखकर महामति अक्रूरजीका मुखकमल प्रफुल्लित हो गया तथा उनके सर्वाङ्गमें पुलकावली छा गयी ॥ २५ ॥ [और वे मन-ही-मन कहने लगे-] इन दो रूपोंमें जो यह भगवान् वासुदेवका अंश स्थित है वही परमधाम है और वही परमपद है ॥ २६॥ इन जगद्विधाताके दर्शन पाकर आज मेरे नेत्रयुगल तो सफल हो गये; किंतु क्या अब
| अ० १७ ] | * पञ्चम अंश * | ३६१ |
|---|---|---|
| अप्यङ्गमेतद्भगवत्प्रसादा- | भगवत्कृपासे इनका अंगसंग पाकर मेरा शरीर भी | |
| त्तदङ्गसङ्गे फलवन्मम स्यात्॥ २७ | कृतकृत्य हो सकेगा?॥ २७॥ जिनकी अंगुलीके | |
| अप्येष पृष्ठे मम हस्तपद्मं | स्पर्शमात्रसे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हुए पुरुष | |
| करिष्यति श्रीमदनन्तमूर्तिः। | निर्दोषसिद्धि (कैवल्यमोक्ष) प्राप्त कर लेते हैं क्या | |
| यस्याङ्गुलिस्पर्शहताखिलाघै- | वे अनन्तमूर्ति श्रीमान् हरि मेरी पीठपर अपना | |
| रवाप्यते सिद्धिरपास्तदोषा॥ २८ | करकमल रखेंगे?॥ २८॥ | |
| येनाग्निविद्युद्रविरश्मिमाला- | जिन्होंने अग्नि, विद्युत् और सूर्यकी किरणमालाके | |
| करालमत्युग्रमपेतचक्रम् । | समान अपने उग्र चक्रका प्रहार कर दैत्यपतिकी | |
| चक्रं घ्नता दैत्यपतेर्हतानि | सेनाको नष्ट करते हुए असुर-सुन्दरियोंकी आँखोंके | |
| दैत्याङ्गनानां नयनाञ्जनानि॥ २९ | अंजन धो डाले थे॥ २९॥ जिनको एक जलबिन्दु | |
| यत्राम्बु विन्यस्य बलिर्मनोज्ञा- | प्रदान करनेसे राजा बलिने पृथिवीतलमें अति मनोज्ञ | |
| नवाप भोगान्वसुधातळस्थः। | भोग और एक मन्वन्तरतक देवत्वलाभपूर्वक शत्रुविहीन | |
| तथामरत्वं त्रिदशाधिपत्वं | इन्द्रपद प्राप्त किया था॥ ३०॥ | |
| मन्वन्तरं पूर्णमपेतशत्रुम्॥ ३० | ||
| अप्येष मां कंसपरिग्रहेण | वे ही विष्णुभगवान् मुझ निर्दोषको भी कंसके | |
| दोषास्पदीभूतमदोषदुष्टम् । | संसर्गसे दोषी ठहराकर क्या मेरी अवज्ञा कर | |
| कर्तावमानोपहतं धिगस्तु | देंगे? मेरे ऐसे साधुजनबहिष्कृत पुरुषके जन्मको | |
| तज्जन्म यत्साधुबहिष्कृतस्य॥ ३१ | धिक्कार है॥ ३१॥ अथवा संसारमें ऐसी कौन वस्तु | |
| ज्ञानात्मकस्यामलसत्त्वराशे- | है जो उन ज्ञानस्वरूप, शुद्धसत्त्वराशि, दोषहीन, | |
| रपेतदोषस्य सदा स्फुटस्य। | नित्य-प्रकाश और समस्त भूतोंके हृदयस्थित प्रभुको | |
| किं वा जगत्यत्र समस्तपुंसा- | विदित न हो?॥ ३२॥ | |
| मज्ञातमस्यास्ति हृदि स्थितस्य॥ ३२ | ||
| तस्मादहं भक्तिविनम्रचेता | अतः मैं उन ईश्वरोंके ईश्वर, आदि, | |
| व्रजामि सर्वेश्वरमीश्वराणाम्। | मध्य और अन्तरहित पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुके | |
| अंशावतारं पुरुषोत्तमस्य | अंशावतार श्रीकृष्णचन्द्रके पास भक्ति-विनम्रचित्तसे | |
| ह्यनादिमध्यान्तमजस्य विष्णोः॥ ३३ | जाता हूँ। [मुझे पूर्ण आशा है, वे मेरी कभी अवज्ञा न करेंगे]॥ ३३॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
३६२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १८
अठारहवाँ अध्याय भगवान्का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! यदुवंशी अक्रूरजीने |
|---|---|
| चिन्तयन्निति गोविन्दमुपगम्य स यादवः।<br>अक्रूरोऽस्मीति चरणौ ननाम शिरसा हरेः॥ १ | इस प्रकार चिन्तन करते श्रीगोविन्दके पास पहुँचकर उनके चरणोंमें सिर झुकाते हुए 'मैं अक्रूर हूँ' ऐसा कहकर प्रणाम किया॥ १॥ |
| सोऽप्येनं ध्वजवज्राब्जकृतचिह्नेन पाणिना।<br>संस्पृश्याकृष्य च प्रीत्या सुगाढं परिषस्वजे॥ २ | भगवान्ने भी अपने ध्वजा-वज्र-पद्मांकित करकमलोंसे उन्हें स्पर्शकर और प्रीतिपूर्वक अपनी ओर खींचकर गाढ़ आलिंगन किया॥ २॥ |
| कृतसंवन्दनौ तेन यथावद्दलकेशवौ।<br>ततः प्रविष्टौ संहृष्टौ तमादायात्ममन्दिरम्॥ ३ | तदनन्तर अक्रूरजीके यथायोग्य प्रणामादि कर चुकनेपर श्रीबलरामजी और कृष्णचन्द्र अति आनन्दित हो उन्हें साथ लेकर अपने घर आये॥ ३॥ |
| सह ताभ्यां तदाक्रूरः कृतसंवन्दनादिकः।<br>भुक्तभोज्यो यथान्यायमाचचक्षे ततस्तयोः॥ ४ | फिर उनके द्वारा सत्कृत होकर यथायोग्य भोजनादि कर चुकनेपर अक्रूरने उनसे वह सम्पूर्ण वृत्तान्त कहना आरम्भ किया |
| यथा निर्भर्त्सिस्रस्तेन कंसेनानकदुन्दुभिः।<br>यथा च देवकी देवी दानवेन दुरात्मना॥ ५ | जैसे कि दुरात्मा दानव कंसने आनकदुन्दुभि वसुदेव और देवी देवकीको डाँटा था तथा जिस प्रकार वह दुरात्मा अपने पिता उग्रसेनसे दुर्व्यवहार कर रहा है और जिसलिये उसने उन्हें (अक्रूरजीको) वृन्दावन भेजा है॥ ४-६॥ |
| उग्रसेने यथा कंसस्स दुरात्मा च वर्तते।<br>यं चैवार्थं समुद्दिश्य कंसेन तु विसर्जितः॥ ६ | |
| तत्सर्वं विस्तराच्छ्रुत्वा भगवान्देवकीसुतः।<br>उवाचाखिलमप्येतज्ज्ञातं दानपते मया॥ ७ | भगवान् देवकीनन्दनने यह सम्पूर्ण वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनकर कहा—'हे दानपते! ये सब बातें मुझे मालूम हो गयीं॥ ७॥ |
| करिष्ये तन्महाभाग यदत्रौपयिकं मतम्।<br>विचिन्त्यं नान्यथैतत्ते विद्धि कंसं हतं मया॥ ८ | हे महाभाग! इस विषयमें मुझे जो उपयुक्त जान पड़ेगा वही करूँगा। अब तुम कंसको मेरेद्वारा मरा हुआ ही समझो, इसमें किसी और तरहका विचार न करो॥ ८॥ |
| अहंरामश्च मथुरां श्वो यास्यावस्सह त्वया।<br>गोपवृद्धाश्च यास्यन्ति ह्यादायोपायनं बहु॥ ९ | भैया बलराम और मैं दोनों ही कल तुम्हारे साथ मथुरा चलेंगे, हमारे साथ ही दूसरे बड़े-बूढ़े गोप भी बहुत-सा उपहार लेकर जायँगे॥ ९॥ |
| निशेयं नीयतां वीर न चिन्तां कर्तुमर्हसि।<br>त्रिरात्राभ्यन्तरे कंसं निहनिष्यामि सानुगम्॥ १० | हे वीर! आप यह रात्रि सुखपूर्वक बिताइये, किसी प्रकारकी चिन्ता न कीजिये। तीन रात्रिके भीतर मैं कंसको उसके अनुचरोंसहित अवश्य मार डालूँगा'॥ १०॥ |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर अक्रूरजी, श्रीकृष्णचन्द्र और बलरामजी सम्पूर्ण गोपोंको कंसकी आज्ञा सुना नन्दगोपके घर सो गये॥ ११॥ |
| समादिश्य ततो गोपानक्रूरोऽपि च केशवः।<br>सुष्वाप बलभद्रश्च नन्दगोपगृहे ततः॥ ११ | |
| ततः प्रभाते विमले कृष्णरामौ महाद्युती।<br>अक्रूरेण समं गन्तुमुद्यतौ मथुरां पुरीम्॥ १२ | दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल होते ही महातेजस्वी राम और कृष्णको अक्रूरके साथ मथुरा चलनेकी तैयारी करते देख जिनकी भुजाओंके कंकण ढीले हो गये हैं वे गोपियाँ नेत्रोंमें आँसू भरकर तथा दुःखार्त्त होकर दीर्घ निश्वास छोड़ती हुई परस्पर कहने लगीं—॥ १२-१३॥ |
| दृष्ट्वा गोपीजनस्सास्त्रः श्लथद्वलयबाहुकः।<br>निःश्ववासातिदुःखार्त्तः प्राह चेदं परस्परम्॥ १३ | |
| मथुरां प्राप्य गोविन्दः कथं गोकुलमेष्यति।<br>नगरस्त्रीकलालापमधु श्रोत्रेण पास्यति॥ १४ | "अब मथुरापुरी जाकर श्रीकृष्णचन्द्र फिर गोकुलमें क्यों आने लगे? क्योंकि वहाँ तो ये अपने कानोंसे नगरनारियोंके मधुर आलापरूप मधुका ही पान करेंगे॥ १४॥ |
अ० १८ ] * पञ्चम अंश * ३६३
| विलासवाक्यपानेषु नागरीणां कृतास्पदम् ।<br>चित्तमस्य कथं भूयो ग्राम्यगोपीषु यास्यति ॥ १५<br>सारं समस्तगोष्ठस्य विधिना हरता हरिम् ।<br>प्रहृतं गोपयोषित्सु निर्घृणेन दुरात्मना ॥ १६<br>भावगर्भस्मितं वाक्यं विलासवलिता गतिः ।<br>नागरीणामतीवैतत्कटाक्षेक्षितमेव च ॥ १७<br>ग्राम्यो हरिरयं तासां विलासनिगडैर्युतः ।<br>भवतीनां पुनः पार्श्वं कया युक्त्या समेष्यति ॥ १८<br>एषैष रथमारुह्य मथुरां याति केशवः ।<br>क्रूरेणाक्रूरकेणात्र निर्घृणेन प्रतारितः ॥ १९<br>किं न वेत्ति नृशंसोऽयमनुरागपरं जनम् ।<br>येनैवमक्ष्णोराह्लादं नयत्यन्यत्र नो हरिम् ॥ २०<br>एष रामेण सहितः प्रयातत्यन्तनिर्घृणः ।<br>रथमारुह्य गोविन्दस्त्वर्यतामस्य वारणे ॥ २१<br>गुरूणामग्रतो वक्तुं किं ब्रवीषि न नः क्षमम् ।<br>गुरवः किं करिष्यन्ति दग्धानां विरहाग्निना ॥ २२<br>नन्दगोपमुखा गोपा गन्तुमेते समुद्यताः ।<br>नोद्यमं कुरुते कश्चिद्गोविन्दविनिवर्तने ॥ २३<br>सुप्रभाताद्य रजनी मथुरावासियोषिताम् ।<br>पास्यन्त्यच्युतवक्त्राब्जं यासां नेत्रालिपङ्क्तयः ॥ २४<br>धन्यास्ते पथि ये कृष्णमितो यान्त्यनिवारिताः ।<br>उद्वहिष्यन्ति पश्यन्तस्स्वदेहं पुलकाञ्चितम् ॥ २५<br>मथुरानगरीपौरनयनानां महोत्सवः ।<br>गोविन्दावयवैर्दृष्टैरतीवाद्य भविष्यति ॥ २६<br>को नु स्वप्नस्सभाग्याभिर्दृष्टस्ताभिरधोक्षजम् ।<br>विस्तारिकान्तिनयना या द्रक्ष्यन्त्यनिवारिताः ॥ २७<br>अहो गोपीजनस्यास्य दर्शयित्वा महानिधिम् ।<br>उत्कृत्तान्यद्य नेत्राणि विधिनाकरुणात्मना ॥ २८<br>अनुरागेण शैथिल्यमस्मासु व्रजिते हरौ ।<br>शैथिल्यमुपयान्त्याशु करेषु वलयान्यपि ॥ २९ | नगरकी [ विदग्ध ] वनिताओंके विलासयुक्त वचनोंके रसपानमें आसक्त होकर फिर इनका चित्त गँवारी गोपियोंकी ओर क्यों जाने लगा ? ॥ १५ ॥ आज निर्दयी दुरात्मा विधाताने समस्त व्रजके सारभूत (सर्वस्वस्वरूप) श्रीहरिको हरकर हम गोपनारियोंपर घोर आघात किया है ॥ १६ ॥ नगरकी नारियोंमें भावपूर्ण मुस्कानमयी बोली, विलासवलित गति और कटाक्षपूर्ण चितवनकी स्वभावसे ही अधिकता होती है। उनके विलास-बन्धनोंसे बँधकर यह ग्राम्य हरि फिर किस युक्तिसे तुम्हारे [हमारे] पास आवेगा ? ॥ १७-१८ ॥ देखो, देखो, क्रूर एवं निर्दयी अक्रूरके बहकावेमें आकर ये कृष्णचन्द्र रथपर चढ़े हुए मथुरा जा रहे हैं ॥ १९ ॥ यह नृशंस अक्रूर क्या अनुरागीजनॉके हृदयका भाव तनिक भी नहीं जानता ? जो यह इस प्रकार हमारे नयनानन्दवर्धन नन्दनन्दनको अन्यत्र लिये जाता है ॥ २० ॥ देखो, यह अत्यन्त निष्ठुर गोविन्द रामके साथ रथपर चढ़कर जा रहे हैं; अरी ! इन्हें रोकनेमें शीघ्रता करो'' ॥ २१ ॥<br>[इसपर गुरुजनोंके सामने ऐसा करनेमें असमर्थता प्रकट करनेवाली किसी गोपीको लक्ष्य करके उसने फिर कहा-] “अरी! तू क्या कह रही है कि अपने गुरुजनोंके सामने हम ऐसा नहीं कर सकतीं ?'' भला अब विरहाग्निसे भस्मीभूत हुई हमलोगोंका गुरुजन क्या करेंगे ? ॥ २२ ॥ देखो, यह नन्दगोप आदि गोपगण भी उन्हींके साथ जानेकी तैयारी कर रहे हैं। इनमेंसे भी कोई गोविन्दको लौटानेका प्रयत्न नहीं करता ॥ २३ ॥ आजकी रात्रि मथुरावासिनी स्त्रियोंके लिये सुन्दर प्रभातवाली हुई है; क्योंकि आज उनके नयन-भृंग श्रीअच्युतके मुखारविन्दका मकरन्द पान करेंगे ॥ २४ ॥ जो लोग इधरसे बिना रोक-टोक श्रीकृष्णचन्द्रका अनुगमन कर रहे हैं वे धन्य हैं; क्योंकि वे उनका दर्शन करते हुए अपने रोमांचयुक्त शरीरका वहन करेंगे ॥ २५ ॥ 'आज श्रीगोविन्दके अंग-प्रत्यंगोंको देखकर मथुरावासियोंके नेत्रोंको अत्यन्त महोत्सव होगा ॥ २६ ॥ आज न जाने उन भाग्यशालिनियोंने ऐसा कौन शुभ स्वप्न देखा है जो वे कान्तिमय विशाल नयनोंवाली (मथुरापुरीकी स्त्रियाँ) स्वच्छन्दतापूर्वक श्रीअधोक्षजको निहारेंगी ? ॥ २७ ॥ अहो ! निष्ठुर विधाताने गोपियोंको महानिधि दिखलाकर आज उनके नेत्र निकाल लिये ॥ २८ ॥ देखो ! हमारे प्रति श्रीहरिके अनुरागमें शिथिलता आ जानेसे हमारे हाथोंके कंकण भी तुरंत ही ढीले पड़ गये हैं ॥ २९ ॥ |
३६४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १८
अक्रूरः क्रूरहृदयश्शीघ्रं प्रेरयते हयान्।
एवमार्त्तासु योषित्सु कृपा कस्य न जायते ॥ ३०
एष कृष्णरथस्योच्चैश्चक्ररेणुर्निरीक्ष्यताम्।
दूरीभूतो हरियेन सोऽपि रेणुर्न लक्ष्यते ॥ ३१
श्रीपराशर उवाच
इत्येवमतिहार्द्देन गोपीजननिरीक्षितः।
तत्याज व्रजभूभागं सह रामेण केशवः ॥ ३२
गच्छन्तो जवनाश्वेन रथेन यमुनाटटम्।
प्राप्ता मध्याह्नसमये रामाक्रूरजनार्दनाः ॥ ३३
अथाह कृष्णमक्रूरो भवद्भ्यां तावदास्यताम्।
यावत्करोमि कालिन्द्यां आह्निकार्णमम्भसि ॥ ३४
श्रीपराशर उवाच
तथेत्युक्तस्ततस्स्नातस्स्वाचान्तस्स महामतिः।
दध्यौ ब्रह्म परं विप्र प्रविष्टो यमुनाजले ॥ ३५
फणासहस्रमालाढ्यं बलभद्रं ददर्श सः।
कुन्दमालाङ्गमुन्निद्रपद्मपत्रायतेक्षणम् ॥ ३६
वृतं वासुकिरम्भाद्यैर्महद्भिः पवनाशिभिः।
संस्तूयमानमुद्गन्धिवनमालाविभूषितम् ॥ ३७
दधानमसिते वस्त्रे चारुरूपवतंसकम्।
चारुकुण्डलिनं भान्तमन्तर्जंलतले स्थितम् ॥ ३८
तस्योत्संगे घनश्याममाताम्रायतलोचनम्।
चतुर्बाहुमुदाराङ्गं चक्राद्यायुधभूषणम् ॥ ३९
पीते वसानं वसने चित्रमाल्योपशोभितम्।
शक्रचापत्तडिन्मालाविचित्रमिव तोयदम् ॥ ४०
श्रीवत्सवक्षसं चारु स्फुरन्मकरकुण्डलम्।
ददर्श कृष्णमक्लिष्टं पुण्डरीकावतंसकम् ॥ ४१
सनन्दनाद्यैर्मुनिभिस्सिद्धयोगैरकल्मषैः।
सञ्चिन्त्यमानं तत्रस्थैर्नासाग्रन्यस्तलोचनैः ॥ ४२
भला हम-जैसी दुःखिनी अबलाओंपर किसे दया न आवेगी? परन्तु देखो, यह क्रूर-हृदय अक्रूर तो बड़ी शीघ्रतासे घोड़ोंको हाँक रहा है!॥ ३०॥
देखो, यह कृष्णचन्द्रके रथकी धूलि दिखलायी दे रही है; किन्तु हा! अब तो श्रीहरि इतनी दूर चले गये कि वह धूलि भी नहीं दीखती'॥ ३१॥
श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार गोपियोंके अति अनुरागसहित देखते-देखते श्रीकृष्णचन्द्रने बलरामजीके सहित व्रजभूमिको त्याग दिया॥ ३२॥ तब वे राम, कृष्ण और अक्रूर शीघ्रगामी घोड़ोंवाले रथसे चलते-चलते मध्याह्नके समय यमुना तटपर आ गये॥ ३३॥
वहाँ पहुँचनेपर अक्रूरने श्रीकृष्णचन्द्रसे कहा—"जबतक मैं यमुनाजलमें मध्याह्नकालीन उपासनासे निवृत्त होऊँ तबतक आप दोनों यहीं विराजें"॥ ३४॥
श्रीपराशरजी बोले— हे विप्र ! तब भगवान्के 'बहुत अच्छा' कहनेपर महामति अक्रूरजी यमुनाजलमें घुसकर स्नान और आचमन आदिके अनन्तर परब्रह्मका ध्यान करने लगे॥ ३५॥ उस समय उन्होंने देखा कि बलभद्रजी सहस्रफणावलिसे सुशोभित हैं, उनका शरीर कुन्दमालाओंके समान [शुभ्रवर्ण] है तथा नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल हैं॥ ३६॥ वे वासुकि और रम्भ आदि महासर्पोंसे घिरकर उनसे प्रशंसित हो रहे हैं तथा अत्यन्त सुगन्धित वनमालाओंसे विभूषित हैं॥ ३७॥ वे दो श्याम वस्त्र धारण किये, सुन्दर कर्णभूषण पहने तथा मनोहर कुण्डली (गँडुली) मारे जलके भीतर विराजमान हैं॥ ३८॥
उनकी गोदमें उन्होंने आनन्दमय कमलभूषण श्रीकृष्णचन्द्रको देखा, जो मेघके समान श्यामवर्ण, कुछ लाल-लाल विशाल नयनोंवाले, चतुर्भुज, मनोहर अंगोपांगोंवाले तथा शंख-चक्रादि आयुधोंसे सुशोभित हैं; जो पीताम्बर पहने हुए हैं और विचित्र वनमालासे विभूषित हैं, तथा [उनके कारण] इन्द्रधनुष और विद्युन्मालामण्डित सजल मेघके समान जान पड़ते हैं तथा जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न और कानोंमें देदीप्यमान मकराकृत कुण्डल विराजमान हैं॥ ३९-४१॥ [अक्रूरजीने यह भी देखा कि] सनकादि मुनिजन और निष्पाप सिद्ध तथा योगिजन उस जलमें ही स्थित होकर नासिकाग्र दृष्टिसे उन (श्रीकृष्णचन्द्र)-का ही चिन्तन कर रहे हैं॥ ४२॥
अ० १८ ] * पञ्चम अंश * ३६५
बलकृष्णौ तथाक्रूरः प्रत्यभिज्ञाय विस्मितः।
अचिन्तयद्रथाच्छीघ्रं कथमत्रागताविति ॥ ४३
विवक्षोः स्तम्भयामास वाचं तस्य जनार्दनः।
ततो निष्क्रम्य सलिलाद्रथमभ्यागतः पुनः ॥ ४४
ददर्श तत्र चैवोभौ रथस्योपरि निष्ठितौ।
रामकृष्णौ यथापूर्वं मनुष्यवपुषान्वितौ ॥ ४५
निमग्नश्च पुनस्तोये ददर्श च तथैव तौ।
संस्तूयमानौ गन्धर्वैर्मुनिभिस्सिद्धमहोरगैः ॥ ४६
ततो विज्ञातसद्भावस्स तु दानपतिस्तदा।
तुष्टाव सर्वविज्ञानमयमच्युतमीश्वरम् ॥ ४७
अक्रूर उवाच
सन्मात्ररूपिणेऽचिन्त्यमहिम्ने परमात्मने।
व्यापिने नैकस्वरूपैकस्वरूपाय नमो नमः ॥ ४८
सर्वरूपाय तेऽचिन्त्य हविर्भूताय ते नमः।
नमो विज्ञानपाराय पराय प्रकृतेः प्रभो ॥ ४९
भूतात्मा चेन्द्रियात्मा च प्रधानात्मा तथा भवान्।
आत्मा च परमात्मा च त्वमेकः पञ्चधा स्थितः ॥ ५०
प्रसीद सर्व सर्वात्मन् क्षराक्षरमयेश्वर।
ब्रह्मविष्णुशिवाख्याभिः कल्पनाभिरुदीरितः ॥ ५१
अनाख्येयस्वरूपात्मन्ननाख्येयप्रयोजन।
अनाख्येयाभिधानं त्वां नतोऽस्मि परमेश्वर ॥ ५२
न यत्र नाथ विद्यन्ते नामजात्यादिकल्पनाः।
तद्ब्रह्म परमं नित्यमविकारि भवानजः ॥ ५३
न कल्पनामृतेऽर्थस्य सर्वस्याधिगमो यतः।
ततः कृष्णाच्युतानन्तविष्णुसंज्ञाभिरीयते ॥ ५४
सर्वार्थास्त्वमज विकल्पनाभिरेतै-
र्देवाद्यैर्भवति हि यैरनन्त विश्वम्।
विश्वात्मा त्वमिति विकारहीनमेत-
त्सर्वस्मिन् हि भवतोऽस्ति किञ्चिदन्यत् ॥ ५५
त्वं ब्रह्मा पशुपतिरर्यमा विधाता
धाता त्वं त्रिदशपतिस्समीरणोऽग्निः।
तोयेशो धनपतिरन्तकस्त्वमेको
भिन्नार्थैर्जगदभिपासिशक्तिभेदैः ॥ ५६
इस प्रकार वहाँ राम और कृष्णको पहचानकर अक्रूरजी बड़े ही विस्मित हुए और सोचने लगे कि ये यहाँ इतनी शीघ्रतासे रथसे कैसे आ गये ? ॥ ४३ ॥ जब उन्होंने कुछ कहना चाहा तो भगवान्ने उनकी वाणी रोक दी। तब वे जलसे निकलकर रथके पास आये और देखा कि वहाँ भी राम और कृष्ण दोनों ही मनुष्य-शरीरसे पूर्ववत् रथपर बैठे हुए हैं ॥ ४४-४५ ॥ तदनन्तर, उन्होंने जलमें घुसकर उन्हें फिर गन्धर्व, सिद्ध, मुनि और नागादिकोंसे स्तुति किये जाते देखा ॥ ४६ ॥ तब तो दानपति अक्रूरजी वास्तविक रहस्य जानकर उन सर्वविज्ञानमय अच्युत भगवान्की स्तुति करने लगे ॥ ४७ ॥
अक्रूरजी बोले— जो सन्मात्रस्वरूप, अचिन्त्यमहिम, सर्वव्यापक तथा [कार्यरूपसे] अनेक और [कारणरूपसे] एक रूप हैं उन परमात्माको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४८ ॥ हे अचिन्तनीय प्रभो! आप सर्वरूप एवं हविःस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है। आप बुद्धिसे अतीत और प्रकृतिसे परे हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ ४९ ॥ आप भूतस्वरूप, इन्द्रियस्वरूप और प्रधानस्वरूप हैं तथा आप ही जीवात्मा और परमात्मा हैं। इस प्रकार आप अकेले ही पाँच प्रकारसे स्थित हैं ॥ ५० ॥ हे सर्व! हे सर्वात्मन्! हे क्षराक्षरमय ईश्वर! आप प्रसन्न होइये। एक आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि कल्पनाओंसे वर्णन किये जाते हैं ॥ ५१ ॥ हे परमेश्वर! आपके स्वरूप, प्रयोजन और नाम आदि सभी अनिर्वचनीय हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ५२ ॥
हे नाथ! जहाँ नाम और जाति आदि कल्पनाओंका सर्वथा अभाव है आप वही नित्य अविकारी और अजन्मा परब्रह्म हैं ॥ ५३ ॥ क्योंकि कल्पनाके बिना किसी भी पदार्थका ज्ञान नहीं होता इसीलिये आपका कृष्ण, अच्युत, अनन्त और विष्णु आदि नामोंसे स्तवन किया जाता है [वास्तवमें तो आपका किसी भी नामसे निर्देश नहीं किया जा सकता] ॥ ५४ ॥ हे अज! जिन देवता आदि कल्पनामय पदार्थोंसे अनन्त विश्वकी उत्पत्ति हुई है वे समस्त पदार्थ आप ही हैं तथा आप ही विकारहीन आत्मवस्तु हैं, अतः आप विश्वरूप हैं। हे प्रभो ! इन सम्पूर्ण पदार्थोंमें आपसे भिन्न और कुछ भी नहीं है ॥ ५५ ॥ आप ही ब्रह्मा, महादेव, अर्यमा, विधाता, धाता, इन्द्र, वायु, अग्नि, वरुण, कुबेर और यम हैं। इस प्रकार एक आप ही भिन्न-भिन्न कार्यवाले अपनी शक्तियोंके भेदसे इस सम्पूर्ण जगत्की रक्षा कर रहे हैं ॥ ५६ ॥
३६६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १९
विश्वं भवान्सृजति सूर्यगभस्तिरूपो
विश्वेश ते गुणमयोऽयमतः प्रपञ्चः।
रूपं परं सदिति वाचकमक्षरं य-
ज्ज्ञानात्मने सदसते प्रणतोऽस्मि तस्मै॥ ५७
हे विश्वेश! सूर्यकी किरणरूप होकर आप ही [वृष्टिद्वारा] विश्वकी रचना करते हैं, अतः यह गुणमय प्रपंच आपका ही रूप है। 'सत्' पद ['ॐ तत्, सत्' इस रूपसे] जिसका वाचक है वह 'ॐ' अक्षर आपका परम स्वरूप है, आपके उस ज्ञानात्मा सदसत्स्वरूपको नमस्कार है॥ ५७॥
ॐ नमो वासुदेवाय नमस्संकर्षणाय च।
प्रद्युम्नाय नमस्तुभ्यमनिरुद्धाय ते नमः॥ ५८
हे प्रभो! वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धस्वरूप आपको बारम्बार नमस्कार है॥ ५८॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽशेऽष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
उन्नीसवाँ अध्याय
भगवान्का मथुरा-प्रवेश, रजक-वध तथा मालीपर कृपा
श्रीपराशर उवाच
एवमन्तर्जले विष्णुमभिष्टूय स यादवः।
अर्चयामास सर्वेशं धूपपुष्पैर्मनोमयैः॥ १
परित्यक्तान्यविषयो मनस्तत्र निवेश्य सः।
ब्रह्मभूते चिरं स्थित्वा विरराम समाधितः॥ २
कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यमानो महामतिः।
आजगाम रथं भूयो निर्गम्य यमुनाम्भसः॥ ३
ददर्श रामकृष्णौ च यथापूर्वमवस्थितौ।
विस्मिताक्षस्तदाक्रूरस्तं च कृष्णोऽभ्यभाषत॥ ४
श्रीपराशरजी बोले— यदुकुलोत्पन्न अक्रूरजीने श्रीविष्णुभगवान्का जलके भीतर इस प्रकार स्तवनकर उन सर्वेश्वरका मनःकल्पित धूप, दीप और पुष्पादिसे पूजन किया॥ १॥ उन्होंने अपने मनको अन्य विषयोंसे हटाकर उन्हींमें लगा दिया और चिरकालतक उन ब्रह्मभूतमें ही समाहितभावसे स्थित रहकर फिर समाधिसे विरत हो गये॥ २॥ तदनन्तर महामति अक्रूरजी अपनेको कृतकृत्य-सा मानते हुए यमुनाजलसे निकलकर फिर रथके पास चले आये॥ ३॥ वहाँ आकर उन्होंने आश्चर्ययुक्त नेत्रोंसे राम और कृष्णको पूर्ववत् रथमें बैठे देखा। उस समय श्रीकृष्णचन्द्रने अक्रूरजीसे कहा॥ ४॥
श्रीकृष्ण उवाच
नूनं ते दृष्टमाश्चर्यमक्रूर यमुनाजले।
विस्मयोत्फुल्लनयनो भवान्संलक्ष्यते यतः॥ ५
श्रीकृष्णजी बोले— अक्रूरजी! आपने अवश्य ही यमुना-जलमें कोई आश्चर्यजनक बात देखी है, क्योंकि आपके नेत्र आश्चर्यचकित दीख पड़ते हैं॥ ५॥
अक्रूर उवाच
अन्तर्जले यदाश्चर्यं दृष्टं तत्र मयाच्युत।
तदत्रापि हि पश्यामि मूर्तिमत्पुरतः स्थितम्॥ ६
जगदेतन्महाश्चर्यरूपं यस्य महात्मनः।
तेनाश्चर्यपरेणाहं भवता कृष्ण सङ्गतः॥ ७
तत्किमेतेन मधुरां यास्यामो मधुसूदन।
बिभेमि कंसादद्विग्जन्म परपिण्डोपजीविनाम्॥ ८
अक्रूरजी बोले— हे अच्युत! मैंने यमुनाजलमें जो आश्चर्य देखा है उसे मैं इस समय भी अपने सामने मूर्तिमान् देख रहा हूँ॥ ६॥ हे कृष्ण! यह महान् आश्चर्यमय जगत् जिस महात्माका स्वरूप है उन्हीं परम आश्चर्यस्वरूप आपके साथ मेरा समागम हुआ है॥ ७॥ हे मधुसूदन! अब उस आश्चर्यके विषयमें और अधिक कहनेसे लाभ ही क्या है? चलो, हमें शीघ्र ही मथुरा पहुँचना है; मुझे कंससे बहुत भय लगता है। दूसरेके दिये हुए अन्नसे जीनेवाले पुरुषोंके जीवनको धिक्कार है!॥ ८॥
इत्युक्त्वा चोदयामास स हयान् वातरंहसः।
सम्प्राप्तश्चापि सायाह्ने सोऽक्रूरो मथुरां पुरीम्॥ ९
ऐसा कहकर अक्रूरजीने वायुके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँका और सायंकालके समय मथुरापुरीमें पहुँच गये॥ ९॥
अ० १९ ] * पञ्चम अंश * ३६७
| विलोक्य मथुरां कृष्णं रामं चाह स यादवः ।<br>पद्भ्यां यातं महावीरौ रथेनैको विशाम्यहम् ॥ १०<br>गन्तव्यं वसुदेवस्य नो भवद्भ्यां तथा गृहम् ।<br>युवयोर्र्हि कृते वृद्धस्स कंसेन निरस्यते ॥ ११<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्त्वा प्रविवेशाथ सोऽक्रूरो मथुरां पुरीम् ।<br>प्रविष्टौ रामकृष्णौ च राजमार्गमुपागतौ ॥ १२<br>स्त्रीभिर्न रैश्च सानन्दं लोचनैरभिवीक्षितौ ।<br>जग्मतुर्लीलया वीरौ मत्तौ बालगजाविव ॥ १३<br>भ्रममाणौ ततो दृष्ट्वा रजकं रंगकारकम् ।<br>अयाचेतां सुरूपाणि वासांसि रुचिराणि तौ ॥ १४<br>कंसस्य रजकः सोऽथ प्रसादारूढविस्मयः ।<br>बहून्याक्षेपवाक्यानि प्राहोच्चै रामकेशवौ ॥ १५<br>ततस्तलप्रहारेण कृष्णस्तस्य दुरात्मनः ।<br>पातयामास रोषेण रजकस्य शिरो भुवि ॥ १६<br>हत्वादाय च वस्त्राणि पीतनीलाम्बरौ ततः ।<br>कृष्णरामौ मुदा युक्तौ मालाकारगृहं गतौ ॥ १७<br>विकासिनेत्रयुगलो मालाकारोऽतिविस्मितः ।<br>एतौ कस्य सुतौ यातौ मैत्रेयाचिन्तयत्तदा ॥ १८<br>पीतनीलाम्बरधरौ तौ दृष्ट्वातिमनोंहरौ ।<br>स तर्कयामास तदा भुवं देवावुपागतौ ॥ १९<br>विकासिमुखपद्माभ्यां ताभ्यां पुष्पाणि याचितः ।<br>भुवं विष्टभ्य हस्ताभ्यां पस्पर्श शिरसा महीम् ॥ २०<br>प्रसादपरमौ नाथौ मम गेहमुपागतौ ।<br>धन्योऽहमर्चयिष्यामीत्याह तौ माल्यजीवनः ॥ २१<br>ततः प्रहृष्टवदनस्तयोः पुष्पाणि कामतः ।<br>चारूण्येतान्यथैतानि प्रददौ स प्रलोभयन् ॥ २२<br>पुनः पुनः प्रणम्योभौ मालाकारो नरोत्तमौ ।<br>ददौ पुष्पाणि चारूणि गन्धवन्त्यमलानि च ॥ २३<br>मालाकाराय कृष्णोऽपि प्रसन्नः प्रददौ वरान् ।<br>श्रीस्त्वां मत्संश्रया भद्र न कदाचित्त्यजिष्यति ॥ २४ | मथुरापुरीको देखकर अक्रूरने राम और कृष्णसे कहा—"हे वीरवरो! अब मैं अकेला ही रथसे जाऊँगा, आप दोनों पैदल चले आवें ॥ १०॥ मथुरामें पहुँचकर आप वसुदेवजीके घर न जायँ; क्योंकि आपके कारण ही उन वृद्ध वसुदेवजीका कंस सर्वदा निरादर करता रहता है" ॥ ११॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—ऐसा कह—अक्रूरजी मथुरापुरीमें चले गये। उनके पीछे राम और कृष्ण भी नगरमें प्रवेशकर राजमार्गपर आये ॥ १२ ॥ वहाँके नर-नारियोंसे आनन्दपूर्वक देखे जाते हुए वे दोनों वीर मतवाले तरुण हाथियोंके समान लीलापूर्वक जा रहे थे ॥ १३ ॥<br><br>मार्गमें उन्होंने एक वस्त्र रँगनेवाले रजकको घूमते देख उससे रंग-बिरंगे सुन्दर वस्त्र माँगे ॥ १४ ॥ वह रजक कंसका था और राजाके मुँहलगा होनेसे बड़ा घमण्डी हो गया था, अतः राम और कृष्णके वस्त्र माँगनेपर उसने विस्मित होकर उनसे बड़े जोरोंके साथ अनेक दुर्वाक्य कहे ॥ १५ ॥ तब श्रीकृष्णचन्द्रने क्रुद्ध होकर अपने करतलके प्रहारसे उस दुष्ट रजकका सिर पृथिवीपर गिरा दिया ॥ १६ ॥ इस प्रकार उसे मारकर राम और कृष्णने उसके वस्त्र छीन लिये तथा क्रमशः नील और पीत वस्त्र धारणकर वे प्रसन्नचित्तसे मालीके घर गये ॥ १७ ॥<br><br>हे मैत्रेय ! उन्हें देखते ही उस मालीके नेत्र आनन्दसे खिल गये और वह आश्चर्यचकित होकर सोचने लगा कि 'ये किसके पुत्र हैं और कहाँसे आये हैं?' ॥ १८ ॥ पीले और नीले वस्त्र धारण किये उन अति मनोहर बालकोंको देखकर उसने समझा मानो दो देवगण ही पृथिवीतलपर पधारे हैं ॥ १९ ॥ जब उन विकसितमुखकमल बालकोंने उससे पुष्प माँगे तो उसने अपने दोनों हाथ पृथिवीपर टेककर सिरसे भूमिको स्पर्श किया ॥ २० ॥ फिर उस मालीने कहा—"हे नाथ! आपलोग बड़े ही कृपालु हैं जो मेरे घर पधारे। मैं धन्य हूँ, क्योंकि आज मैं आपका पूजन कर सकूँगा" ॥ २१ ॥ तदनन्तर उसने 'देखिये, ये बहुत सुन्दर हैं, ये बहुत सुन्दर हैं'—इस प्रकार प्रसन्नमुखसे लुभा-लुभाकर उन्हें इच्छानुसार पुष्प दिये ॥ २२ ॥ उसने उन दोनों पुरुषश्रेष्ठोंको पुनः-पुनः प्रणामकर अति निर्मल और सुगन्धित मनोहर पुष्प दिये ॥ २३ ॥<br><br>तब कृष्णचन्द्रने भी प्रसन्न होकर उस मालीको यह वर दिया कि "हे भद्र ! मेरे आश्रित रहनेवाली लक्ष्मी तुझे |
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३६८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २०
| बलहानिर्न ते सौम्य धनहानिरथापि वा।<br>यावद्दिनानि तावच्च न नशिष्यति सन्ततिः॥ २५ | कभी न छोड़ेगी॥ २४॥ हे सौम्य! तेरे बल और धनका ह्रास कभी न होगा और जबतक दिन (सूर्य)-की सत्ता रहेगी तबतक तेरी सन्तानका उच्छेद न होगा॥ २५॥ |
| भुक्त्वा च विपुलाम्भोगांस्त्वमन्ते मत्प्रसादतः।<br>ममानुस्मरणं प्राप्य दिव्यं लोकमवाप्स्यसि॥ २६ | तू भी यावज्जीवन नाना प्रकारके भोग भोगता हुआ अन्तमें मेरी कृपासे मेरा स्मरण करनेके कारण दिव्य लोकको प्राप्त होगा॥ २६॥ |
| धर्मे मनश्च ते भद्र सर्वकालं भविष्यति।<br>युष्मत्सन्ततिजातानां दीर्घमायुर्भविष्यति॥ २७ | हे भद्र! तेरा मन सर्वदा धर्मपरायण रहेगा तथा तेरे वंशमें जन्म लेनेवालोंकी आयु दीर्घ होगी॥ २७॥ |
| नोपसर्गादिकं दोषं युष्मत्सन्ततिसम्भवः।<br>अवाप्स्यति महाभाग यावत्सूर्यो भविष्यति॥ २८ | हे महाभाग! जबतक सूर्य रहेगा तबतक तेरे वंशमें उत्पन्न हुआ कोई भी व्यक्ति उपसर्ग (आकस्मिक रोग) आदि दोषोंको प्राप्त न होगा''॥ २८॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्त्वा तद्गृहात्कृष्णो बलदेवसहायवान्।<br>निर्जगाम मुनिश्रेष्ठ मालाकारेण पूजितः॥ २९ | श्रीपराशरजी बोले— हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा कहकर श्रीकृष्णचन्द्र बलभद्रजीके सहित मालाकारसे पूजित हो उसके घरसे चल दिये॥ २९॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे एकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
बीसवाँ अध्याय
कुब्जापर कृपा, धनुर्भंग, कुवलयापीड और चाणूरादि मल्लोंका नाश तथा कंस-वध
| श्रीपराशर उवाच<br>राजमार्गे ततः कृष्णस्सानुलेपनभाजनाम्।<br>ददर्श कुब्जामायान्तीं नवयौवनगोचराम्॥ १ | श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर श्रीकृष्णचन्द्रने राजमार्गमें एक नवयौवना कुब्जा स्त्रीको अनुलेपनका पात्र लिये आती देखा॥ १॥ |
| तामाह ललितं कृष्णः कस्येदमनुलेपनम्।<br>भवत्या नीयते सत्यं वदेन्दीवरलोचने॥ २ | तब श्रीकृष्णने उससे विलासपूर्वक कहा—‘‘अयि कमललोचने! तू सच-सच बता यह अनुलेपन किसके लिये ले जा रही है?’’॥ २॥ |
| सकामेनेव सा प्रोक्ता सानुरागा हरिं प्रति।<br>प्राह सा ललितं कुब्जा तद्दर्शनबलात्कृता॥ ३ | भगवान् कृष्णके कामुक पुरुषकी भाँति इस प्रकार पूछनेपर अनुरागिणी कुब्जाने उनके दर्शनसे हठात् आकृष्टचित्त हो अति ललितभावसे इस प्रकार कहा—॥ ३॥ |
| कान्त कस्मान्न जानासि कंसेन विनियोजिताम्।<br>नैकवक्रति विख्यातामनुलेपनकर्मणि॥ ४ | ‘‘हे कान्त! क्या आप मुझे नहीं जानते? मैं अनेकवक्रा नामसे विख्यात हूँ, राजा कंसने मुझे अनुलेपन-कार्यमें नियुक्त किया है॥ ४॥ |
| नान्यपिष्टं हि कंसस्य प्रीतये ह्यनुलेपनम्।<br>भवाम्यहमतीवास्य प्रसादधनभाजनम्॥ ५ | राजा कंसको मेरे अतिरिक्त और किसीका पीसा हुआ उबटन पसन्द नहीं है, अतः मैं उनकी अत्यन्त कृपापात्री हूँ’’॥ ५॥ |
| श्रीकृष्ण उवाच<br>सुगन्धमेतद्राजार्हं रुचिरं रुचिरानने।<br>आवयोर्गात्रसदृशं दीयतामनुलेपनम्॥ ६ | श्रीकृष्णजी बोले— हे सुमुखि! यह सुन्दर सुगन्धमय अनुलेपन तो राजाके ही योग्य है, हमारे शरीरके योग्य भी कोई अनुलेपन हो तो दो॥ ६॥ |
अ० २०] * पञ्चम अंश * ३६९
श्रीपराशर उवाच श्रुत्वैतदाह सा कुब्जा गृह्यतामिति सादरम्। अनुलेपनं च प्रददौ गात्रयोग्यमथोभयोः॥ ७ भक्तिच्छेदानुलिप्ताङ्गौ ततस्तौ पुरुषर्षभौ। सेन्द्रचापौ व्यराजेतां सितकृष्णाविवाम्बुदौ॥ ८ ततस्तां चिबुके शौरिरुल्लापनविधानवित्। उत्पाट्य तोलयामास द्व्यङ्गुलेनाग्रपाणिना॥ ९ चकर्ष पद्भ्यां च तदा ऋजुत्वं केशवोऽनयत्। ततस्सा ऋजुतां प्राप्ता योषितामभवद्वरा॥ १० विलासगलितं प्राह प्रेमगर्भभरालसम्। वस्त्रे प्रगृह्य गोविन्दं मम गेहं व्रजेति वै॥ ११ एवमुक्तस्तया शौरी रामस्यालोक्य चाननम्। प्रहस्य कुब्जां तामाह नैकवक्रामनिन्दिताम्॥ १२ आयास्ये भवतीगेहमिति तां प्रहसन्हरिः। विससर्ज जहासोच्चै रामस्यालोक्य चाननम्॥ १३ भक्तिभेदानुलिप्ताङ्गौ नीलपीताम्बरौ तु तौ। धनुश्शालां ततो यातौ चित्रमाल्योपशोभितौ॥ १४ आयागं तद्धनूरत्नं ताभ्यां पृष्टैस्तु रक्षिभिः। आख्याते सहसा कृष्णो गृहीत्वापूरयद्धनुः॥ १५ ततः पूरयता तेन भज्यमानं बलाद्धनुः। चकार सुमहच्छब्दं मथुरा येन पूरिता॥ १६ अनुयुक्तौ ततस्तौ तु भग्ने धनुषि रक्षिभिः। रक्षिसैन्यं निहत्योभौ निष्क्रान्तौ कार्मुकालयात्॥ १७ अक्रूरागमवृत्तान्तमुपलभ्य महद्धनुः। भग्नं श्रुत्वा च कंसोऽपि प्राह चाणूरमुष्टिकौ॥ १८ कंस उवाच गोपालदारकौ प्राप्तौ भवद्भ्यां तु ममाग्रतः। मल्लयुद्धेन हन्तव्यौ मम प्राणहरौ हि तौ॥ १९ नियुद्धे तद्विनांशेन भवद्भ्यां तोषितो ह्यहम्। दास्याम्यभिमतान्कामानान्द्यथैतौ महाबलौ॥ २०
श्रीपराशरजी बोले- यह सुनकर कुब्जाने कहा— 'लीजिये' और फिर उन दोनोंको आदरपूर्वक उनके शरीरयोग्य चन्दनादि दिये॥ ७॥ उस समय वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ [कपोल आदि अंगोंमें] पत्ररचनाविधिसे यथावत् अनुलिप्त होकर इन्द्रधनुषयुक्त श्याम और श्वेत मेघके समान सुशोभित हुए॥ ८॥ तत्पश्चात् उल्लापन (सीधे करनेकी)-विधिके जाननेवाले भगवान् कृष्णचन्द्रने उसकी ठोड़ीमें अपनी आगेकी दो अंगुलियाँ लगा उसे उचकाकर हिलाया तथा उसके पैर अपने पैरोंसे दबा लिये। इस प्रकार श्रीकृष्णने उसे ऋजुकाय (सीधे शरीरवाली) कर दी। तब सीधी हो जानेपर वह सम्पूर्ण स्त्रियोंमें सुन्दरी हो गयी॥ ९-१०॥
तब वह श्रीगोविन्दका पल्ला पकड़कर अन्तर्गर्भित प्रेम-भारसे अलसायी हुई विलासगलित वाणीमें बोली— 'आप मेरे घर चलिये'॥ ११॥ उसके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णचन्द्रने उस कुब्जासे, जो पहले अनेक अंगोंसे टेढ़ी थी, परंतु अब सुन्दरी हो गयी थी, बलरामजीके मुखकी ओर देखकर हँसते हुए कहा—॥ १२॥ 'हाँ, तुम्हारे घर भी आऊँगा'— ऐसा कहकर श्रीहरिने उसे मुसकाते हुए विदा किया और बलभद्रजीके मुखकी ओर देखते हुए जोर-जोरसे हँसने लगे॥ १३॥
तदनन्तर पत्र-रचनादि विधिसे अनुलिप्त तथा चित्र-विचित्र मालाओंसे सुशोभित राम और कृष्ण क्रमशः नीलाम्बर और पीताम्बर धारण किये हुए यज्ञशालातक आये॥ १४॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने यज्ञरक्षकोंसे उस यज्ञके उद्देश्यस्वरूप धनुषके विषयमें पूछा और उनके बतलानेपर श्रीकृष्णचन्द्रने उसे सहसा उठाकर प्रत्यंचा (डोरी) चढ़ा दी॥ १५॥ उसपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह धनुष टूट गया, उस समय उसने ऐसा घोर शब्द किया कि उससे सम्पूर्ण मथुरापुरी गूँज उठी॥ १६॥ तब धनुष टूट जानेपर उसके रक्षकोंके उनपर आक्रमण किया, उस रक्षक सेनाका संहार कर वे दोनों बालक धनुश्शालासे बाहर आये॥ १७॥
तदनन्तर अक्रूरके आनेका समाचार पाकर तथा उस महान् धनुषको भग्न हुआ सुनकर कंसने चाणूर और मुष्टिकसे कहा॥ १८॥
कंस बोला- यहाँ दोनों गोपालबालक आ गये हैं। वे मेरा प्राण-हरण करनेवाले हैं, अतः तुम दोनों मल्लयुद्धसे उन्हें मेरे सामने मार डालो। यदि तुमलोग मल्लयुद्धमें उन दोनोंका विनाश करके मुझे सन्तुष्ट कर
३७० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २०
न्यायतोऽन्यायतो वापि भवद्भ्यां तौ ममाहितौ। हन्तव्यौ तद्वधाद्राज्यं सामान्यं वां भविष्यति ॥ २१ इत्यादिश्य स तौ मल्लौ ततश्चाहूय हस्तिपम्। प्रोवाचोच्चैस्त्वया मल्लसमाजद्वारि कुञ्जरः ॥ २२ स्थाप्यः कुवलयापीडस्तेन तौ गोपदारकौ। घातनीयौ नियुद्धाय रङ्गद्वारमुपागतौ ॥ २३ तमप्याज्ञाप्य दृष्ट्वा च सर्वान्मञ्चानुपार्कतान्। आसन्नमरणः कंसः सूर्योदयमुदैक्षत ॥ २४ ततः समस्तमञ्चेषु नागरस्स तदा जनः। राजमञ्चेषु चारूढास्सह भृत्यैर्नराधिपाः॥ २५ मल्लप्राश्निकवर्गश्च रङ्गमध्यसमीपगः। कृतः कंसेन कंसोऽपि तुङ्गमञ्चे व्यवस्थितः ॥ २६ अन्तःपुराणां मञ्चाश्च तथान्ये परिकल्पिताः। अन्ये च वारमुख्यानामन्थे नागरयोषिताम् ॥ २७ नन्दगोपादयोगोपा मञ्चेष्वन्येष्ववस्थिताः। अक्रूरवसुदेवौ च मञ्चप्रान्ते व्यवस्थितौ ॥ २८ नागरीयोषितां मध्ये देवकीपुत्रगृद्धिनी। अन्तकालेऽपि पुत्रस्य द्रक्ष्यामीति मुखं स्थिता ॥ २९ वाद्यमानेषु तूर्येषु चाणूरे चापि वल्गति। हाहाकारपरे लोके ह्यास्फोटयति मुष्टिके ॥ ३० ईषद्व्रसन्तौ तौ वीरौ बलभद्रजनार्दनौ। गोपवेषधरौ बालौ रङ्गद्वारमुपागतौ ॥ ३१ ततः कुवलयापीडो महामात्रप्रचोदितः। अभ्यधावत वेगेन हन्तुं गोपकुमारकौ ॥ ३२ हाहाकारो महाञ्जज्ञे रङ्गमध्ये द्विजोत्तम। बलदेवोऽनुजं दृष्ट्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३३ हन्तव्यो हि महाभाग नागोऽयं शत्रुचोदितः ॥ ३४ इत्युक्तस्सोऽग्रजेनाथ बलदेवेन वै द्विज। सिंहनादं ततश्चक्रे माधवः परवीरहा॥ ३५ करेण करमाकृष्य तस्य केशिनिषूदनः। भ्रामयामास तं शौरिरैरावतसमं बले ॥ ३६
दोगे तो मैं तुम्हारी समस्त इच्छाएं पूर्ण कर दूँगा; मेरे इस कथनको तुम मिथ्या न समझना। तुम न्यायसे अथवा अन्यायसे मेरे इन महाबलवान् अपकारियोंको अवश्य मार डालो। उनके मारे जानेपर यह सारा राज्य [ हमारा और ] तुम दोनोंका सामान्य होगा ॥ १९-२१ ॥
मल्लोंको इस प्रकार आज्ञा दे कंसने अपने महावतको बुलाया और उसे आज्ञा दी कि तू कुवलयापीड हाथीको मल्लोंकी रंगभूमिके द्वारपर खड़ा रख और जब वे गोपकुमार युद्धके लिये यहाँ आवें तो उन्हें इससे नष्ट करा दे ॥ २२-२३ ॥ इस प्रकार उसे आज्ञा देकर और समस्त सिंहासनोंको यथावत् रखे देखकर, जिसकी मृत्यु पास आ गयी है वह कंस सूर्योदयकी प्रतीक्षा करने लगा ॥ २४ ॥
प्रातःकाल होनेपर समस्त मंचोंपर नागरिक लोग और राजमंचोंपर अपने अनुचरोंके सहित राजालोग बैठे ॥ २५ ॥ तदनन्तर रंगभूमिके मध्यभागके समीप कंसने युद्धपरीक्षकोंको बैठाया और फिर स्वयं आप भी एक ऊँचे सिंहासनपर बैठा ॥ २६ ॥ वहाँ अन्तःपुरकी स्त्रियोंके लिये पृथक् मचान बनाये गये थे तथा मुख्य-मुख्य वारांगनाओं और नगरकी महिलाओंके लिये भी अलग-अलग मंच थे ॥ २७ ॥ कुछ अन्य मंचोंपर नन्दगोप आदि गोपगण बिठाये गये थे और उन मंचोंके पास ही अक्रूर और वसुदेवजी बैठे थे ॥ २८ ॥ नगरकी नारियोंके बीचमें 'चलो, अन्तकालमें ही पुत्रका मुख तो देख लूँगी' ऐसा विचारकर पुत्रके लिये मंगलकामना करती हुई देवकीजी बैठी थीं ॥ २९ ॥
तदनन्तर जिस समय तूर्य आदिके बजने तथा चाणूरके अत्यन्त उछलने और मुष्टिकके ताल ठोंकनेपर दर्शकगण हाहाकार कर रहे थे, गोपवेषधारी वीर बालक बलभद्र और कृष्ण कुछ हँसते हुए रंगभूमिके द्वारपर आये ॥ ३०-३१ ॥ वहाँ आते ही महावतकी प्रेरणासे कुवलयापीड नामक हाथी उन दोनों गोपकुमारोंको मारनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ा ॥ ३२ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! उस समय रंगभूमिमें महान् हाहाकार मच गया तथा बलदेवजीने अपने अनुज कृष्णकी ओर देखकर कहा- "हे महाभाग ! इस हाथीको शत्रुने ही प्रेरित किया है; अतः इसे मार डालना चाहिये" ॥ ३३-३४ ॥
हे द्विज ! ज्येष्ठ भ्राता बलरामजीके ऐसा कहनेपर शत्रुसूदन श्रीश्यामसुन्दरने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ३५ ॥ फिर केशिनिषूदन भगवान् श्रीकृष्णने बलमें ऐरावतके समान उस महाबली हाथीकी सूँड अपने हाथसे पकड़कर उसे घुमाया ॥ ३६ ॥
अ० २०] * पञ्चम अंश * ३७१
ईशोऽपि सर्वजगतां बाललीलानुसारतः । क्रीडित्वा सुचिरं कृष्णः करिदन्तपदान्तरे ॥ ३७ उत्पाट्य वामदन्तं तु दक्षिणेनैव पाणिना । ताडयामास यन्तारं तस्यासीच्छतधा शिरः ॥ ३८ दक्षिणं दन्तमुत्पाट्य बलभद्रोऽपि तत्क्षणात् । सरोषस्तेन पार्श्वस्थान् गजपालानपोथयत् ॥ ३९ ततस्तूत्प्लुत्य वेगेन रौहिणेयो महाबलः । जघान वामपादेन मस्तके हस्तिनं रुषा ॥ ४० स पपात हतस्तेन बलभद्रेण लीलया । सहस्त्राक्षेण वज्रेण ताडितः पर्वतो यथा ॥ ४१ हत्वा कुवलयापीडं हस्त्यारोहप्रचोदितम् । मदासृगनुलिप्ताङ्गौ हस्तिदन्तवरायुधौ ॥ ४२ मृगमध्ये यथा सिंहौ गर्वलीलावलोकनौ । प्रविष्टौ सुमहद्रङ्गं बलभद्रजनार्दनौ ॥ ४३ हाहाकारो महाञ्जज्ञे महारेङ्गे त्वनन्तरम् । कृष्णोऽयं बलभद्रोऽयमिति लोकस्य विस्मयः ॥ ४४ सोऽयं येन हता घोरा पूतना बालघातिनी । क्षिप्तं तु शकटं येन भग्नौ तु यमलार्जुनौ ॥ ४५ सोऽयं यः कालियं नागं ममर्दोरुह्य बालकः । धृतो गोवर्द्धनो येन सप्तरात्रं महागिरिः ॥ ४६ अरिष्टो धेनुकः केशी लीलयैव महात्मना । निहता येन दुर्वृत्ता दृश्यतामेष सोऽच्युतः ॥ ४७ अयं चास्य महाबाहुर्बलभद्रोऽग्रतोऽग्रजः । प्रयाति लीलया योषिन्मनोनयननन्दनः ॥ ४८ अयं स कथ्यते प्राज्ञैः पुराणार्थविशारदैः । गोपालो यादवं वंशं मग्नमभ्युद्धरिष्यति ॥ ४९ अयं हि सर्वलोकस्य विष्णोरखिलजन्मनः । अवतीर्णो महीमंशो नूनं भारहरो भुवः ॥ ५० इत्येवं वर्णिते पौरै रामे कृष्णे च तत्क्षणात् । उरस्तताप देवक्याः स्नेहस्नुतपयोधरम् ॥ ५१ महोत्सवमिवासाद्य पुत्राननविलोकनात् । युवेव वसुदेवोऽभूद्विहायाभ्यागतां जराम् ॥ ५२
भगवान् कृष्ण यद्यपि सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं तथापि उन्होंने बहुत देरतक उस हाथीके दाँत और चरणोंके बीचमें खेलते-खेलते अपने दाएँ हाथसे उसका बायाँ दाँत उखाड़कर उससे महावतपर प्रहार किया। इससे उसके सिरके सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ ३७-३८ ॥ उसी समय बलभद्रजीने भी क्रोधपूर्वक उसका दायाँ दाँत उखाड़कर उससे आस-पास खड़े हुए महावतोंको मार डाला ॥ ३९ ॥ तदनन्तर महाबली रोहिणीनन्दनने रोषपूर्वक अति वेगसे उछलकर उस हाथीके मस्तकपर अपनी बायीं लात मारी ॥ ४० ॥ इस प्रकार वह हाथी बलभद्रजीद्वारा लीलापूर्वक मारा जाकर इन्द्र-वज्रसे आहत पर्वतके समान गिर पड़ा ॥ ४१ ॥
तब महावतसे प्रेरित कुवलयापीडको मारकर उसके मद और रक्तसे लथपथ राम और कृष्ण उसके दाँतोंको लिये हुए गर्वयुक्त लीलामयी चितवनसे निहारते उस महान् रंगभूमिमें इस प्रकार आये जैसे मृगसमूहके बीचमें सिंह चला जाता है ॥ ४२-४३ ॥ उस समय महान् रंगभूमिमें बड़ा कोलाहल होने लगा और सब लोगोंमें 'ये कृष्ण हैं, ये बलभद्र हैं' ऐसा विस्मय छा गया ॥ ४४ ॥
[वे कहने लगे-] “जिसने बालघातिनी घोर राक्षसी पूतनाको मारा था, शकटको उलट दिया था और यमलार्जुनको उखाड़ डाला था वह यही है। जिस बालकने कालियनागके ऊपर चढ़कर उसका मान मर्दन किया था और सात रात्रितक महापर्वत गोवर्द्धनको अपने हाथपर धारण किया था वह यही है ॥ ४५-४६ ॥ जिस महात्माने अरिष्टासुर, धेनुकासुर और केशी आदि दुष्टोंको लीलासे ही मार डाला था; देखो, वह अच्युत यही हैं ॥ ४७ ॥ ये इनके आगे इनके बड़े भाई महाबाहु बलभद्रजी हैं जो बड़े लीलापूर्वक चल रहे हैं। ये स्त्रियोंके मन और नयनोंको बड़ा ही आनन्द देनेवाले हैं? ॥ ४८ ॥ पुराणार्थवेत्ता विद्वान् लोग कहते हैं कि ये गोपालजी डूबे हुए यदुवंशका उद्धार करेंगे ॥ ४९ ॥ ये सर्वलोकमय और सर्वकारण भगवान् विष्णुके ही अंश हैं, इन्होंने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही भूमिपर अवतार लिया है" ॥ ५० ॥
राम और कृष्णके विषयमें पुरवासियोंके इस प्रकार कहते समय देवकीके स्तनोंसे स्नेहके कारण दूध बहने लगा और उनके हृदयमें बड़ा अनुताप हुआ ॥ ५१ ॥ पुत्रोंका मुख देखनेसे अत्यन्त उल्लास-सा प्राप्त होनेके कारण वसुदेवजी भी मानो आयी हुई जराको छोड़कर फिरसे नवयुवक-से हो गये ॥ ५२ ॥
३७२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २०
| विस्तारिताक्षियुगलो राजान्तःपुरयोषिताम्।<br>नागरस्त्रीसमूहश्च द्रष्टुं न विरराम तम्॥ ५३ | राजाके अन्तःपुरकी स्त्रियाँ तथा नगर निवासिनी महिलाएँ भी उन्हें एकटक देखते-देखते उपराम न हुईं॥ ५३॥ [वे परस्पर कहने लगीं—] “अरी सखियो! |
| सख्यः पश्यत कृष्णस्य मुखमत्यरुणेक्षणम्।<br>गजयुद्धकृतायासस्वेदाम्बुकणिकाचितम्॥ ५४ | अरुणनयनसे युक्त श्रीकृष्णचन्द्रका अति सुन्दर मुख तो देखो, जो कुवलयापीडके साथ युद्ध करनेके परिश्रमसे स्वेद बिन्दुपूर्ण होकर हिम-कण-सिंचित शरत्कालीन प्रफुल्ल |
| विकासिशिरदम्भोजमवश्यायजलोक्षितम्।<br>परिभूय स्थितं जन्म सफलं क्रियतां दृशः॥ ५५ | कमलको लज्जित कर रहा है। अरी! इसका दर्शन करके अपने नेत्रोंका होना सफल कर लो'॥ ५४-५५॥ |
| श्रीवत्साङ्कं महद्धाम बालस्यैतद्विलोक्यताम्।<br>विपक्षक्षपणं वक्षो भुजयुग्मं च भामिनि॥ ५६ | [एक स्त्री बोली—] “हे भामिनि! इस बालकका यह लक्ष्मी आदिका आश्रयभूत श्रीवत्सांकयुक्त वक्षःस्थल तथा शत्रुओंको पराजित करनेवाली इसकी दोनों भुजाएँ तो देखो!”॥ ५६॥ |
| किं न पश्यसि दुग्धेन्दुमृणालधवलाकृतिम्।<br>बलभद्रमिमं नीलपरिधानमुपागतम्॥ ५७ | [दूसरी०—] “अरी! क्या तुम नीलाम्बर धारण किये इन दुग्ध, चन्द्र अथवा कमलनालके समान शुभ्रवर्ण बलदेवजीको आते हुए नहीं देखती हो?”॥ ५७॥ |
| वल्गता मुष्टिकेनैव चाणूरेण तथा सखि।<br>क्रीडतो बलभद्रस्य हरेर्हास्यं विलोक्यताम्॥ ५८ | [तीसरी०—] “अरी सखियो! [अखाड़ेमें] चक्कर देकर घूमनेवाले चाणूर और मुष्टिकके साथ क्रीडा करते हुए बलभद्र तथा कृष्णका हँसना देख लो।”॥ ५८॥ |
| सख्यः पश्यत चाणूरं नियुद्धार्थमयं हरिः।<br>समुपैति न सन्त्यत्र किं वृद्धा मुक्तकारिणः॥ ५९ | [चौथी०—] “हाय! सखियो! देखो तो चाणूरसे लड़नेके लिये ये हरि आगे बढ़ रहे हैं; क्या इन्हें छुड़ानेवाले कोई भी बड़े-बूढ़े यहाँ नहीं हैं?”॥ ५९॥ |
| क्व यौवनोन्मुखीभूतसुकुमारतनुर्हरिः।<br>क्व वज्रकठिनाभोगशरीरोऽयं महासुरः॥ ६० | 'कहाँ तो यौवनमें प्रवेश करनेवाले सुकुमार-शरीर श्याम और कहाँ वज्रके समान कठोर शरीरवाला यह महान् असुर!'॥ ६०॥ ये दोनों नवयुवक तो बड़े ही |
| इमौ सुललितैरङ्गैर्वर्तेते नवयौवनौ।<br>दैतेयमल्लाश्चाणूरप्रमुखास्त्वतिदारुणाः॥ ६१ | सुकुमार शरीरवाले हैं, [किंतु इनके प्रतिपक्षी] ये चाणूर आदि दैत्य मल्ल अत्यन्त दारुण हैं॥ ६१॥ |
| नियुद्धप्राश्निकानां तु महानेष व्यतिक्रमः।<br>यद्बालबलिनोर्युद्धं मध्यस्थैस्समुपेक्ष्यते॥ ६२ | मल्लयुद्धके परीक्षकगणोंका यह बहुत बड़ा अन्याय है जो वे मध्यस्थ होकर भी इन बालक और बलवान् मल्लोंके बीच युद्ध करा रहे हैं॥ ६२॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्थं पुरस्त्रीलोकस्य वदतश्चालयन्भुवम्।<br>ववल्ग बद्धकक्ष्योऽन्तर्जनस्य भगवान्हरिः॥ ६३ | श्रीपराशरजी बोले—नगरकी स्त्रियोंके इस प्रकार वार्तालाप करते समय भगवान् कृष्णचन्द्र अपनी कमर कसकर उन समस्त दर्शकोंके बीचमें पृथिवीको |
| बलभद्रोऽपि चास्फोट्य ववल्ग ललितं तथा।<br>पदे पदे तथा भूमिर्यन्न शीर्णा तदद्भुतम्॥ ६४ | कम्पायमान करते हुए रंगभूमिमें कूद पड़े॥ ६३॥ श्रीबलभद्रजी भी अपने भुजदण्डोंको ठोंकते हुए अति मनोहरभावसे उछलने लगे। उस समय उनके पद-पदपर पृथिवी नहीं फटी, यही बड़ा आश्चर्य है॥ ६४॥ |
| चाणूरेण ततः कृष्णो युयुधेऽमितविक्रमः।<br>नियुद्धकुशलो दैत्यो बलभद्रेण मुष्टिकः॥ ६५ | तदनन्तर अमित-विक्रम कृष्णचन्द्र चाणूरके साथ और द्वन्द्वयुद्धकुशल राक्षस मुष्टिक बलभद्रके साथ युद्ध |
| सन्निपातावधूतैस्तु चाणूरेण समं हरिः।<br>प्रक्षेपणैर्मुष्टिभिश्च कीलवज्रनिपातनैः॥ ६६ | करने लगे॥ ६५॥ कृष्णचन्द्र चाणूरके साथ परस्पर भिड़कर, |
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अ० २० ] * पञ्चम अंश * ३७३
पादोद्भूतैः प्रमृष्टैश्च तयोर्युद्धमभून्महत् ॥ ६७
अशस्त्रमतिघोरं तत्तयोर्युद्धं सुदारुणम् ।
बलप्राणविनिष्पाद्यं समाजोत्सवसन्निधौ ॥ ६८
यावद्यावच्च चाणूरो युयुधे हरिणा सह ।
प्राणहानिमवापाग्र्यां तावत्तावल्लवाल्लवम् ॥ ६९
कृष्णोऽपि युयुधे तेन लीलयैव जगन्मयः ।
खेदाच्चालयता कोपान्निजशेखरकेसरम् ॥ ७०
बलक्षयं विवृद्धिं च दृष्ट्वा चाणूरकृष्णयोः ।
वारयामास तूर्याणि कंसः कोपपरायणः ॥ ७१
मृदङ्गादिषु तूर्येषु प्रतिषिद्धेषु तत्क्षणात् ।
खे सङ्गतान्यवादयन्त देवतूर्याण्यनेकशः ॥ ७२
जय गोविन्द चाणूरं जहि केशव दानवम् ।
अन्तर्द्धानगता देवास्तमूचुरतिहर्षिताः ॥ ७३
चाणूरेण चिरं कालं क्रीडित्वा मधुसूदनः ।
उत्थाप्य भ्रामयामास तद्वधाय कृतोद्यमः ॥ ७४
भ्रामयित्वा शतगुणं दैत्यमल्लममित्रजित् ।
भूमावास्फोटयामास गगने गतजीवितम् ॥ ७५
भूमावास्फोटितस्तेन चाणूरः शतधाभवत् ।
रक्तस्रावमहापङ्कां चकार च तदा भुवम् ॥ ७६
बलदेवोऽपि तत्कालं मुष्टिकेन महाबलः ।
युयुधे दैत्यमल्लेन चाणूरेण यथा हरिः ॥ ७७
सोऽप्येनं मुष्टिना मूर्ध्नि वक्षस्याहत्य जानुना ।
पातयित्वा धरापृष्ठे निष्पिपेष गतायुषम् ॥ ७८
कृष्णास्तोशलकं भूयो मल्लराजं महाबलम् ।
वाममुष्टिप्रहारेण पातयामास भूतले ॥ ७९
चाणूरे निहते मल्ले मुष्टिके विनिपातिते ।
नीते क्षयं तोशलके सर्वे मल्लाः प्रदुद्रुवुः ॥ ८०
ववल्गातुस्ततो रङ्गे कृष्णसङ्कर्षणावुभौ ।
समानवयसो गोपान्बलादाकृष्य हर्षितौ ॥ ८१
नीचे गिराकर, उछालकर, घूँसे और वज्रके समान कोहनी मारकर, पैरोंसे ठोकर मारकर तथा एक-दूसरेके अंगोंको रगड़कर लड़ने लगे। उस समय उनमें महान् युद्ध होने लगा ॥ ६६-६७ ॥
इस प्रकार उस समाजोत्सवके समीप केवल बल और प्राणशक्तिसे ही सम्पन्न होनेवाला उनका अति भयंकर और दारुण शस्त्रहीन युद्ध हुआ ॥ ६८ ॥ चाणूर जैसे-जैसे भगवान्से भिड़ता गया वैसे-ही-वैसे उसकी प्राणशक्ति थोड़ी-थोड़ी करके अत्यन्त क्षीण होती गयी ॥ ६९ ॥ जगन्मय भगवान् कृष्ण भी, श्रम और कोपके कारण अपने पुष्पमय शिरोभूषणोंमें लगे हुए केशरको हिलानेवाले उस चाणूरसे लीलापूर्वक लड़ने लगे ॥ ७० ॥ उस समय चाणूरके बलका क्षय और कृष्णचन्द्रके बलका उदय देख कंसने खीझकर तूर्य आदि बाजे बन्द करा दिये ॥ ७१ ॥ रंगभूमिमें मृदंग और तूर्य आदिके बन्द हो जानेपर आकाशमें अनेक दिव्य तूर्य एक साथ बजने लगे ॥ ७२ ॥ और देवगण अत्यन्त हर्षित होकर अलक्षितभावसे कहने लगे—‘‘हे गोविन्द ! आपकी जय हो। हे केशव ! आप शीघ्र ही इस चाणूर दानवको मार डालिये।’’ ॥ ७३ ॥
भगवान् मधुसूदन बहुत देरतक चाणूरके साथ खेल करते रहे, फिर उसका वध करनेके लिये उद्यत होकर उसे उठाकर घुमाया ॥ ७४ ॥ शत्रुविजयी श्रीकृष्णचन्द्रने उस दैत्य मल्लको सैकड़ों बार घुमाकर आकाशमें ही निर्जीव हो जानेपर पृथिवीपर पटक दिया ॥ ७५ ॥ भगवान्के द्वारा पृथिवीपर गिराये जाते ही चाणूरके शरीरके सैकड़ों टुकड़े हो गये और उस समय उसने रक्तस्रावसे पृथिवीको अत्यन्त कीचड़मय कर दिया ॥ ७६ ॥ इधर, जिस प्रकार भगवान् कृष्ण चाणूरसे लड़ रहे थे, उसी प्रकार महाबली बलभद्रजी भी उस समय दैत्य मल्ल मुष्टिकसे भिड़े हुए थे ॥ ७७ ॥ बलरामजीने उसके मस्तकपर घूँसोंसे तथा वक्षःस्थलमें जानुसे प्रहार किया और उस गतायु दैत्यको पृथिवीपर पटककर रौंद डाला ॥ ७८ ॥
तदनन्तर श्रीकृष्णचन्द्रने महाबली मल्लराज तोशलको बायें हाथसे घूँसा मारकर पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ७९ ॥ मल्लश्रेष्ठ चाणूर और मुष्टिकके मारे जानेपर तथा मल्लराज तोशलके नष्ट होनेपर समस्त मल्लगण भाग गये ॥ ८० ॥ तब कृष्ण और संकर्षण अपने समवयस्क गोपोंको बलपूर्वक खींचकर [आलिंगन करते हुए] हर्षसे रंगभूमिमें उछलने लगे ॥ ८१ ॥
| ३७४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० २० |
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कंसोऽपि कोपरक्ताक्षः प्राहोच्चैर्यायतानरान्।
गोपावेतौ समाजाद्धान्निष्क्राम्येतां बलादितः॥ ८२
नन्दोऽपि गृह्यतां पापो निर्गलैरायसैरहि।
अवृद्धार्हेण दण्डेन वसुदेवोऽपि वध्यताम्॥ ८३
वल्गन्ति गोपाः कृष्णेन ये चेमे सहिताः पुरः।
गावो निगृह्यतामेषां यच्चास्ति वसु किञ्चन॥ ८४
एवमाज्ञापयन्तं तु प्रहस्य मधुसूदनः।
उत्प्लुत्यारुह्य तं मञ्चं कंसं जग्राह वेगतः॥ ८५
केशेष्वाकृष्य विगलत्किरीटमवनीतले।
स कंसं पातयामास तस्योपरि पपात च॥ ८६
अशेषजगदाधारगुरुणा पततोपरि।
कृष्णेन त्याजितः प्राणानुग्रसेनात्मजो नृपः॥ ८७
मृतस्य केशेषु तदा गृहीत्वा मधुसूदनः।
चकर्ष देहं कंसस्य रङ्गमध्ये महाबलः॥ ८८
गौरवेणातिमहता परिघा तेन कृष्यता।
कृता कंसस्य देहेन वेगेनेव महाम्भसः॥ ८९
कंसे गृहीते कृष्णेन तद्भ्राताऽभ्यागतो रुषा।
सुमाली बलभद्रेण लीलयैव निपातितः॥ ९०
ततो हाहाकृतं सर्वमासीत्तद्रङ्गमण्डलम्।
अवज्ञया हतं दृष्ट्वा कृष्णेन मथुरेश्वरम्॥ ९१
कृष्णोऽपि वसुदेवस्य पादौ जग्राह सत्वरः।
देवक्याश्च महाबाहुर्बलदेवसहायवान्॥ ९२
उत्थाप्य वसुदेवस्तं देवकी च जनार्दनम्।
स्मृतजन्मोक्तवचनौ तावेव प्रणतौ स्थितौ॥ ९३
श्रीवसुदेव उवाच
प्रसीद सीदतां दत्तो देवानां यो वरः प्रभो।
तथावयोः प्रसादेन कृतोद्धारस्स केशव॥ ९४
आराधितो यद्भगवानवतीर्णो गृहे मम।
दुर्वृत्तनिधनार्थाय तेन नः पावितं कुलम्॥ ९५
त्वमन्तः सर्वभूतानां सर्वभूतमयः स्थितः।
प्रवर्तन्ते समस्तात्मंस्त्वत्तो भूतभविष्यती॥ ९६
तदनन्तर कंसने क्रोधसे नेत्र लाल करके वहाँ एकत्रित हुए पुरुषोंसे कहा—"अरे! इस समाजसे इन ग्वालबालोंको बलपूर्वक निकाल दो॥ ८२॥ पापी नन्दको लोहेकी श्रृंखलामें बाँधकर पकड़ लो तथा वृद्ध पुरुषोंके अयोग्य दण्ड देकर वसुदेवको भी मार डालो॥ ८३॥ मेरे सामने कृष्णके साथ ये जितने गोपबालक उछल रहे हैं इन सबको भी मार डालो तथा इनकी गौएँ और जो कुछ अन्य धन हो वह सब छीन लो"॥ ८४॥ जिस समय कंस इस प्रकार आज्ञा दे रहा था, उसी समय श्रीमधुसूदन हँसते-हँसते उछलकर मंचपर चढ़ गये और शीघ्रतासे उसे पकड़ लिया॥ ८५॥ भगवान् कृष्णने उसके केशोंको खींचकर उसे पृथिवीपर पटक दिया तथा उसके ऊपर आप भी कूद पड़े, इस समय उसका मुकुट सिरसे खिसककर अलग जा पड़ा॥ ८६॥ सम्पूर्ण जगत्के आधार भगवान् कृष्णके ऊपर गिरते ही उग्रसेनात्मज राजा कंसने अपने प्राण छोड़ दिये॥ ८७॥ तब महाबली कृष्णचन्द्रने मृतक कंसके केश पकड़कर उसके देहको रंगभूमिमें घसीटा॥ ८८॥ कंसका देह बहुत भारी था, इसलिये उसे घसीटनेसे जलके महान् वेगसे हुई दरारके समान पृथिवीपर परिघा बन गयी॥ ८९॥
श्रीकृष्णचन्द्रद्वारा कंसके पकड़ लिये जानेपर उसके भाई सुमालीने क्रोधपूर्वक आक्रमण किया। उसे बलरामजीने लीलासे ही मार डाला॥ ९०॥ इस प्रकार मथुरापति कंसको कृष्णचन्द्रद्वारा अवज्ञापूर्वक मरा हुआ देखकर रंगभूमिमें उपस्थित सम्पूर्ण जनता हाहाकार करने लगी॥ ९१॥ उसी समय महाबाहु कृष्णचन्द्र बलदेवजी-सहित वसुदेव और देवकीके चरण पकड़ लिये॥ ९२॥ तब वसुदेव और देवकीको पूर्वजन्ममें कहे हुए भगवद्वाक्योंका स्मरण हो आया और उन्होंने श्रीजनार्दनको पृथिवीपरसे उठा लिया तथा उनके सामने प्रणतभावसे खड़े हो गये॥ ९३॥
श्रीवसुदेवजी बोले—हे प्रभो! अब आप हमपर प्रसन्न होइये। हे केशव! आपने आर्त देवगणोंको जो वर दिया था, वह हम दोनोंपर अनुग्रह करके पूर्ण कर दिया॥ ९४॥ भगवन्! आपने जो मेरी आराधनासे दुष्टजनोंके नाशके लिये मेरे घरमें जन्म लिया, उससे हमारे कुलको पवित्र कर दिया है॥ ९५॥ आप सर्वभूतमय हैं और समस्त भूतोंके भीतर स्थित हैं। हे समस्तात्मन्! भूत और भविष्यत् आपहीसे प्रवृत्त होते हैं॥ ९६॥
अ० २० ]
* पञ्चम अंश *
३७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यज्ञैस्त्वमिज्यसेऽचिन्त्य सर्वदेवमयाच्युत।<br>त्वमेव यज्ञो यष्टा च यज्वनां परमेश्वर॥ ९७ | हे अचिन्त्य! हे सर्वदेवमय! हे अच्युत! समस्त यज्ञोंसे आपहीका यजन किया जाता है तथा हे परमेश्वर! आप ही यज्ञ करनेवालोंके यष्टा और यज्ञस्वरूप हैं॥ ९७॥ |
| समुद्भवस्समस्तस्य जगतस्त्वं जनार्दन॥ ९८<br>सापह्नवं मम मनो यदेतत्त्वयि जायते।<br>देवक्याश्चात्मजप्रीत्या तदत्यन्तविडम्बना॥ ९९ | हे जनार्दन! आप तो सम्पूर्ण जगत्के उत्पत्ति-स्थान हैं, आपके प्रति पुत्रवात्सल्यके कारण जो मेरा और देवकीका चित्त भ्रान्तियुक्त हो रहा है यह बड़ी ही हँसीकी बात है॥ ९८-९९॥ |
| त्वं कर्ता सर्वभूतानामनादिनिधनो भवान्।<br>त्वां मनुष्यस्य कस्यैषा जिह्वा पुत्रेति वक्ष्यति॥ १०० | आप आदि और अन्तसे रहित हैं तथा समस्त प्राणियोंके उत्पत्तिकर्त्ता हैं, ऐसा कौन मनुष्य है जिसकी जिह्वा आपको ‘पुत्र’ कहकर सम्बोधन करेगी?॥ १००॥ |
| जगदेतज्जगन्नाथ सम्भूतनिखिलं यतः।<br>कया युक्त्या विना मायां सोऽस्मत्तः सम्भविष्यति॥ १०१ | हे जगन्नाथ! जिन आपसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है वही आप बिना मायाशक्तिके और किस प्रकार हमसे उत्पन्न हो सकते हैं॥ १०१॥ |
| यस्मिन्प्रतिष्ठितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>स कोष्ठोत्सङ्गशयनो मानुषो जायते कथम्॥ १०२ | जिसमें सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत् स्थित है वह प्रभु कुक्षि (कोख) और गोदमें शयन करनेवाला मनुष्य कैसे हो सकता है?॥ १०२॥ |
| स त्वं प्रसीद परमेश्वर पाहि विश्व-<br> मंशावतारकरणैर्न ममासि पुत्रः।<br>आब्रह्मपादपमिदं जगदेतदीश<br> त्वत्तो विमोहयसि किं पुरुषोत्तमस्मान्॥ १०३ | हे परमेश्वर! वही आप हमपर प्रसन्न होइये और अपने अंशावतारसे विश्वकी रक्षा कीजिये। आप मेरे पुत्र नहीं हैं। हे ईश! ब्रह्मासे लेकर वृक्षादिपर्यन्त यह सम्पूर्ण जगत् आपहीसे उत्पन्न हुआ है, फिर हे पुरुषोत्तम! आप हमें क्यों मोहित कर रहे हैं?॥ १०३॥ |
| मायाविमोहितदृशा तनयो ममेति<br> कंसाद्भयं कृतमपास्तभयातितीव्रम्।<br>नीतोऽसि गोकुलमरातिभयाकुलेन<br> वृद्धिं गतोऽसि मम नास्ति ममत्वमीश॥ १०४ | हे निर्भय! ‘आप मेरे पुत्र हैं’ इस मायासे मोहित होकर मैंने कंससे अत्यन्त भय माना था और उस शत्रुके भयसे ही मैं आपको गोकुल ले गया था। हे ईश! आप वहीं रहकर इतने बड़े हुए हैं, इसलिये अब आपमें मेरी ममता नहीं रही है॥ १०४॥ |
| कर्माणि रुद्रमरुदश्विशतक्रतूनां<br> साध्यानि यस्य न भवन्ति निरीक्षितानि।<br>त्वं विष्णुरीश जगतामुपकारहेतोः<br> प्राप्तोऽसि नः परिगतो विगतो हि मोहः॥ १०५ | अबतक मैंने आपके ऐसे अनेक कर्म देखे हैं जो रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार और इन्द्रके लिये भी साध्य नहीं हैं। अब मेरा मोह दूर हो गया है। हे ईश! [मैंने निश्चयपूर्वक जान लिया है कि] आप साक्षात् श्रीविष्णुभगवान् ही जगत्के उपकारके लिये प्रकट हुए हैं॥ १०५॥ |
<div align="center">
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे विंशोऽध्यायः॥ २०॥
</div>३७६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २१
इक्कीसवाँ अध्याय
उग्रसेनका राज्याभिषेक तथा भगवान्का विद्याध्ययन
<table> <tr> <td width="50%" valign="top">श्रीपराशर उवाच
तौ समुत्पन्नविज्ञानौ भगवत्कर्मदर्शनात्।
देवकीवसुदेवौ तु दृष्ट्वा मायां पुनर्हरिः।
मोहाय यदुचक्रस्य विततान स वैष्णवीम्॥ १
उवाच चाम्ब हे तात चिरादुत्कण्ठितेन मे।
भवन्तौ कंसभीतेन दृष्टौ सङ्कर्षणेन च॥ २
कुर्वतां याति यः कालो मातापित्रोरपूजनम्।
तत्खण्डमायुषो व्यर्थमसाधूनां हि जायते॥ ३
गुरुदेवद्विजातीनां मातापित्रोश्च पूजनम्।
कुर्वतां सफलः कालो देहिनां तात जायते॥ ४
तत्क्षन्तव्यमिदं सर्वमतिक्रमकृतं पितः।
कंसवीर्यप्रतापाभ्यामावयोः परवश्ययोः॥ ५
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वाथ प्रणम्योभौ यदुवृद्धाननुक्रमात्।
यथावदभिपूज्याथ चक्रतुः पौरमाननम्॥ ६
कंसपत्न्यस्ततः कंसं परिवार्य हतं भुवि।
विलेपुर्मातरश्चास्य दुःखशोकपरिप्लुताः॥ ७
बहुप्रकारमत्यर्थं पश्चात्तापातुरो हरिः।
तास्समाशवासयामास स्वयमस्त्राविलेक्षणः॥ ८
उग्रसेनं ततो बन्धान्मुमोच मधुसूदनः।
अभ्यषिञ्चत्तदैवैनं निजराज्ये हतात्मजम्॥ ९
राज्येऽभिषिक्तः कृष्णेन यदुसिंहस्सुतस्य सः।
चकार प्रेतकार्याणि ये चान्ये तत्र घातिताः॥ १०
कृतौर्ध्वदैहिकं चैनं सिंहासनगतं हरिः।
उवाचाज्ञापय विभो यत्कार्यमविशङ्कितः॥ ११
ययातिशापाद्द्यंशोऽयमराज्यार्होऽपि साम्प्रतम्।
मयि भृत्ये स्थिते देवानाज्ञापयतु किं नृपैः॥ १२
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा सोऽस्मरद्वायुमाजगाम च तत्क्षणात्।
उवाच चैनं भगवान्केशवः कार्यमानुषः॥ १३
श्रीपराशरजी बोले— अपने अति अद्भुत कर्मोंको देखनेसे वसुदेव और देवकीको विज्ञान उत्पन्न हुआ देखकर भगवान्ने यदुवंशियोंको मोहित करनेके लिये अपनी वैष्णवी मायाका विस्तार किया॥ १॥ और बोले—'‘हे मात:! हे पिताजी! बलरामजी और मैं बहुत दिनोंसे कंसके भयसे छिपे हुए आपके दर्शनोंके लिये उत्कण्ठित थे, सो आज आपका दर्शन हुआ है॥ २॥ जो समय माता-पिताकी सेवा किये बिना बीतता है वह असाधु पुरुषोंकी ही आयुका भाग व्यर्थ जाता है॥ ३॥ हे तात! गुरु, देव, ब्राह्मण और माता-पिताका पूजन करते रहनेसे देहधारियोंका जीवन सफल हो जाता है॥ ४॥ अतः हे तात! कंसके वीर्य और प्रतापसे भीत हम परवशोंसे जो कुछ अपराध हुआ हो वह क्षमा करें'’॥ ५॥
श्रीपराशरजी बोले— राम और कृष्णने इस प्रकार कह माता-पिताको प्रणाम किया और फिर क्रमशः समस्त यदुवृद्धोंका यथायोग्य अभिवादन कर पुरवासियोंका सम्मान किया॥ ६॥ उस समय कंसकी पत्नियाँ और माताएँ पृथिवीपर पड़े हुए मृतक कंसको घेरकर दुःख-शोकसे पूर्ण हो विलाप करने लगीं॥ ७॥ तब कृष्णचन्द्रने भी अत्यन्त पश्चात्तापसे विह्वल हो स्वयं आँखोंमें आँसू भरकर उन्हें अनेकों प्रकारसे ढाँढ़स बँधाया॥ ८॥
तदनन्तर श्रीमधुसूदनने उग्रसेनको बन्धनसे मुक्त किया और पुत्रके मारे जानेपर उन्हें अपने राज्यपदपर अभिषिक्त किया॥ ९॥ श्रीकृष्णचन्द्रद्वारा राज्याभिषिक्त होकर यदुश्रेष्ठ उग्रसेनने अपने पुत्र तथा और भी जो लोग वहाँ मारे गये थे, उन सबके और्ध्वदैहिक कर्म किये॥ १०॥ और्ध्वदैहिक कर्मोंसे निवृत्त होनेपर सिंहासनारूढ़ उग्रसेनसे श्रीहरि बोले—'‘हे विभो! हमारे योग्य जो सेवा हो उसके लिये हमें निश्शंक होकर आज्ञा दीजिये॥ ११॥ ययातिके शाप होनेसे यद्यपि हमारा वंश राज्यका अधिकारी नहीं है तथापि इस समय मुझ दासके रहते हुए राजाओंको तो क्या, आप देवताओंको भी आज्ञा दे सकते हैं'’॥ १२॥
श्रीपराशरजी बोले— उग्रसेनसे इस प्रकार कह [धर्मसंस्थापनादि] कार्यसिद्धिके लिये मनुष्यरूप धारण करने-वाले भगवान् कृष्णने वायुका स्मरण किया और वह उसी समय वहाँ उपस्थित हो गया। तब भगवान्ने उससे कहा—॥ १३॥
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अ० २१ ] * पञ्चम अंश * ३७७
| गच्छेदं ब्रूहि वायो त्वमलं गर्वेण वासव।<br>दीयतामुग्रसेनाय सुधर्मा भवता सभा॥ १४<br>कृष्णो ब्रवीति राजार्हमेतद्रत्नमनुत्तमम्।<br>सुधर्माख्यसभा युक्तमस्यां यदुभिरासितुम्॥ १५<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तः पवनो गत्वा सर्वमाह शचीपतिम्।<br>ददौ सोऽपि सुधर्माख्यां सभां वायोः पुरन्दरः॥ १६<br>वायुना चाहृतां दिव्यां सभां ते यदुपूङ्गवाः।<br>बुभुजुस्सर्वरत्नाढ्यां गोविन्दभुजसंश्रयाः॥ १७<br>विदिताखिलविज्ञानौ सर्वज्ञानमयावपि।<br>शिष्याचार्यक्रमं वीरौ ख्यापयन्तौ यदूत्तमौ॥ १८<br>ततस्सान्दीपनिं काश्यमवन्तिपुरवासिनम्<br>विद्यार्थं जग्मतुर्बालौ कृतोपनयनक्रमौ॥ १९<br>वेदाभ्यासकृतप्रीती सङ्कर्षणजनार्दनौ।<br>तस्य शिष्यत्वमभ्येत्य गुरुवृत्तिपरौ हि तौ।<br>दर्शयाञ्चक्रतुर्वीरावाचारमखिले जने॥ २०<br>सरहस्यं धनुर्वेदं ससङ्ग्रहमधीयताम्।<br>अहोरात्रचतुष्षष्ट्या तदद्भुतमभूद्द्विज॥ २१<br>सान्दीपनि रसम्भाव्यं तयोः कर्मातिमानुषम्।<br>विचिन्त्य तौ तदा मेने प्राप्तौ चन्द्रदिवाकरौ॥ २२<br>साङ्गांश्च चतुरो वेदान्सर्वशास्त्राणि चैव हि।<br>अस्त्रग्राममशेषं च प्रोक्तमात्रमवाप्य तौ॥ २३<br>ऊचतुर्ब्रियतां या ते दातव्या गुरुदक्षिणा॥ २४<br>सोऽप्यतीन्द्रियमालोक्य तयोः कर्म महामतिः।<br>अयाचत मृतं पुत्रं प्रभासे लवणार्णवे॥ २५<br>गृहीतास्त्रौ ततस्तौ तु सार्घ्यहस्तो महोदधिः।<br>उवाच न मया पुत्रो हतस्सान्दीपनेरिति॥ २६<br>दैत्यः पञ्चजनो नाम शङ्खरूपस्स बालकम्।<br>जग्राह योऽस्ति सलिले ममैवासुरसूदन॥ २७<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तोऽन्तर्जलं गत्वा हत्वा पञ्चजनं च तम्।<br>कृष्णो जग्राह तस्यास्थिप्रभवं शङ्खमुत्तमम्॥ २८ | ‘‘हे वायो! तुम जाओ और इन्द्रसे कहो कि हे वासव! व्यर्थ गर्व छोड़कर तुम उग्रसेनको अपनी सुधर्मा नामकी सभा दो॥ १४॥ कृष्णचन्द्रकी आज्ञा है कि यह सुधर्मा-सभा नामक सर्वोत्तम रत्न राजाके ही योग्य है इसमें यादवोंका विराजमान होना उपयुक्त है’’॥ १५॥<br>**श्रीपराशरजी बोले—**भगवान्की ऐसी आज्ञा होनेपर वायुने यह सारा समाचार इन्द्रसे जाकर कह दिया और इन्द्रने भी तुरन्त ही अपनी सुधर्मा नामकी सभा वायुको दे दी॥ १६॥ वायुद्वारा लायी हुई उस सर्वरत्न-सम्पन्न दिव्य सभाका सम्पूर्ण भोग वे यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णचन्द्रकी भुजाओंके आश्रित रहकर करने लगे॥ १७॥<br>तदनन्तर समस्त विज्ञानोंको जानते हुए और सर्वज्ञान-सम्पन्न होते हुए भी वीरवर कृष्ण और बलराम गुरु-शिष्य-सम्बन्धको प्रकाशित करनेके लिये उपनयन-संस्कारके अनन्तर विद्योपार्जनके लिये काशीमें उत्पन्न हुए अवन्तिपुरवासी सान्दीपनि मुनिके यहाँ गये॥ १८-१९॥ वीर संकर्षण और जनार्दन सान्दीपनिका शिष्यत्व स्वीकार कर वेदाभ्यासपरायण हो यथायोग्य गुरुशुश्रूषादिमें प्रवृत्त रह सम्पूर्ण लोगोंको यथोचित शिष्टाचार प्रदर्शित करने लगे॥ २०॥ हे द्विज! यह बड़े आश्चर्यकी बात हुई कि उन्होंने केवल चौंसठ दिनमें रहस्य (अस्त्र-मन्त्रोपनिषद्) और संग्रह (अस्त्रप्रयोग)-के सहित सम्पूर्ण धनुर्वेद सीख लिया॥ २१॥ सान्दीपनिने जब उनके इस असम्भव और अतिमानुष-कर्मको देखा तो यही समझा कि साक्षात् सूर्य और चन्द्रमा ही मेरे घर आ गये हैं॥ २२॥ उन दोनोंने अंगोंसहित चारों वेद, सम्पूर्ण शास्त्र और सब प्रकारकी अस्त्रविद्या एक बार सुनते ही प्राप्त कर ली और फिर गुरुजीसे कहा—‘‘कहिये, आपको क्या गुरुदक्षिणा दें?’’॥ २३-२४॥ महामति सान्दीपनिने उनके अतीन्द्रिय-कर्म देखकर प्रभासक्षेत्रके खारे समुद्रमें डूबकर मरे हुए अपने पुत्रको माँगा॥ २५॥ तदनन्तर जब वे शस्त्र ग्रहणकर समुद्रके पास पहुँचे तो समुद्र अर्घ्य लेकर उनके सम्मुख उपस्थित हुआ और कहा—‘‘मैंने सान्दीपनिका पुत्र हरण नहीं किया॥ २६॥ हे दैत्यदवन! मेरे जलमें ही पंचजन नामक एक दैत्य शंखरूपसे रहता है; उसीने उस बालकको पकड़ लिया था’’॥ २७॥<br>**श्रीपराशरजी बोले—**समुद्रके इस प्रकार कहनेपर कृष्णचन्द्रने जलके भीतर जाकर पंचजनका वध किया और उसकी अस्थियोंसे उत्पन्न हुए शंखको ले लिया॥ २८॥ |
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