विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 379, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 379
३६८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २०
| बलहानिर्न ते सौम्य धनहानिरथापि वा।<br>यावद्दिनानि तावच्च न नशिष्यति सन्ततिः॥ २५ | कभी न छोड़ेगी॥ २४॥ हे सौम्य! तेरे बल और धनका ह्रास कभी न होगा और जबतक दिन (सूर्य)-की सत्ता रहेगी तबतक तेरी सन्तानका उच्छेद न होगा॥ २५॥ |
| भुक्त्वा च विपुलाम्भोगांस्त्वमन्ते मत्प्रसादतः।<br>ममानुस्मरणं प्राप्य दिव्यं लोकमवाप्स्यसि॥ २६ | तू भी यावज्जीवन नाना प्रकारके भोग भोगता हुआ अन्तमें मेरी कृपासे मेरा स्मरण करनेके कारण दिव्य लोकको प्राप्त होगा॥ २६॥ |
| धर्मे मनश्च ते भद्र सर्वकालं भविष्यति।<br>युष्मत्सन्ततिजातानां दीर्घमायुर्भविष्यति॥ २७ | हे भद्र! तेरा मन सर्वदा धर्मपरायण रहेगा तथा तेरे वंशमें जन्म लेनेवालोंकी आयु दीर्घ होगी॥ २७॥ |
| नोपसर्गादिकं दोषं युष्मत्सन्ततिसम्भवः।<br>अवाप्स्यति महाभाग यावत्सूर्यो भविष्यति॥ २८ | हे महाभाग! जबतक सूर्य रहेगा तबतक तेरे वंशमें उत्पन्न हुआ कोई भी व्यक्ति उपसर्ग (आकस्मिक रोग) आदि दोषोंको प्राप्त न होगा''॥ २८॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्त्वा तद्गृहात्कृष्णो बलदेवसहायवान्।<br>निर्जगाम मुनिश्रेष्ठ मालाकारेण पूजितः॥ २९ | श्रीपराशरजी बोले— हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा कहकर श्रीकृष्णचन्द्र बलभद्रजीके सहित मालाकारसे पूजित हो उसके घरसे चल दिये॥ २९॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे एकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
बीसवाँ अध्याय
कुब्जापर कृपा, धनुर्भंग, कुवलयापीड और चाणूरादि मल्लोंका नाश तथा कंस-वध
| श्रीपराशर उवाच<br>राजमार्गे ततः कृष्णस्सानुलेपनभाजनाम्।<br>ददर्श कुब्जामायान्तीं नवयौवनगोचराम्॥ १ | श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर श्रीकृष्णचन्द्रने राजमार्गमें एक नवयौवना कुब्जा स्त्रीको अनुलेपनका पात्र लिये आती देखा॥ १॥ |
| तामाह ललितं कृष्णः कस्येदमनुलेपनम्।<br>भवत्या नीयते सत्यं वदेन्दीवरलोचने॥ २ | तब श्रीकृष्णने उससे विलासपूर्वक कहा—‘‘अयि कमललोचने! तू सच-सच बता यह अनुलेपन किसके लिये ले जा रही है?’’॥ २॥ |
| सकामेनेव सा प्रोक्ता सानुरागा हरिं प्रति।<br>प्राह सा ललितं कुब्जा तद्दर्शनबलात्कृता॥ ३ | भगवान् कृष्णके कामुक पुरुषकी भाँति इस प्रकार पूछनेपर अनुरागिणी कुब्जाने उनके दर्शनसे हठात् आकृष्टचित्त हो अति ललितभावसे इस प्रकार कहा—॥ ३॥ |
| कान्त कस्मान्न जानासि कंसेन विनियोजिताम्।<br>नैकवक्रति विख्यातामनुलेपनकर्मणि॥ ४ | ‘‘हे कान्त! क्या आप मुझे नहीं जानते? मैं अनेकवक्रा नामसे विख्यात हूँ, राजा कंसने मुझे अनुलेपन-कार्यमें नियुक्त किया है॥ ४॥ |
| नान्यपिष्टं हि कंसस्य प्रीतये ह्यनुलेपनम्।<br>भवाम्यहमतीवास्य प्रसादधनभाजनम्॥ ५ | राजा कंसको मेरे अतिरिक्त और किसीका पीसा हुआ उबटन पसन्द नहीं है, अतः मैं उनकी अत्यन्त कृपापात्री हूँ’’॥ ५॥ |
| श्रीकृष्ण उवाच<br>सुगन्धमेतद्राजार्हं रुचिरं रुचिरानने।<br>आवयोर्गात्रसदृशं दीयतामनुलेपनम्॥ ६ | श्रीकृष्णजी बोले— हे सुमुखि! यह सुन्दर सुगन्धमय अनुलेपन तो राजाके ही योग्य है, हमारे शरीरके योग्य भी कोई अनुलेपन हो तो दो॥ ६॥ |