विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 378, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १९ ] * पञ्चम अंश * ३६७
| विलोक्य मथुरां कृष्णं रामं चाह स यादवः ।<br>पद्भ्यां यातं महावीरौ रथेनैको विशाम्यहम् ॥ १०<br>गन्तव्यं वसुदेवस्य नो भवद्भ्यां तथा गृहम् ।<br>युवयोर्र्हि कृते वृद्धस्स कंसेन निरस्यते ॥ ११<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्त्वा प्रविवेशाथ सोऽक्रूरो मथुरां पुरीम् ।<br>प्रविष्टौ रामकृष्णौ च राजमार्गमुपागतौ ॥ १२<br>स्त्रीभिर्न रैश्च सानन्दं लोचनैरभिवीक्षितौ ।<br>जग्मतुर्लीलया वीरौ मत्तौ बालगजाविव ॥ १३<br>भ्रममाणौ ततो दृष्ट्वा रजकं रंगकारकम् ।<br>अयाचेतां सुरूपाणि वासांसि रुचिराणि तौ ॥ १४<br>कंसस्य रजकः सोऽथ प्रसादारूढविस्मयः ।<br>बहून्याक्षेपवाक्यानि प्राहोच्चै रामकेशवौ ॥ १५<br>ततस्तलप्रहारेण कृष्णस्तस्य दुरात्मनः ।<br>पातयामास रोषेण रजकस्य शिरो भुवि ॥ १६<br>हत्वादाय च वस्त्राणि पीतनीलाम्बरौ ततः ।<br>कृष्णरामौ मुदा युक्तौ मालाकारगृहं गतौ ॥ १७<br>विकासिनेत्रयुगलो मालाकारोऽतिविस्मितः ।<br>एतौ कस्य सुतौ यातौ मैत्रेयाचिन्तयत्तदा ॥ १८<br>पीतनीलाम्बरधरौ तौ दृष्ट्वातिमनोंहरौ ।<br>स तर्कयामास तदा भुवं देवावुपागतौ ॥ १९<br>विकासिमुखपद्माभ्यां ताभ्यां पुष्पाणि याचितः ।<br>भुवं विष्टभ्य हस्ताभ्यां पस्पर्श शिरसा महीम् ॥ २०<br>प्रसादपरमौ नाथौ मम गेहमुपागतौ ।<br>धन्योऽहमर्चयिष्यामीत्याह तौ माल्यजीवनः ॥ २१<br>ततः प्रहृष्टवदनस्तयोः पुष्पाणि कामतः ।<br>चारूण्येतान्यथैतानि प्रददौ स प्रलोभयन् ॥ २२<br>पुनः पुनः प्रणम्योभौ मालाकारो नरोत्तमौ ।<br>ददौ पुष्पाणि चारूणि गन्धवन्त्यमलानि च ॥ २३<br>मालाकाराय कृष्णोऽपि प्रसन्नः प्रददौ वरान् ।<br>श्रीस्त्वां मत्संश्रया भद्र न कदाचित्त्यजिष्यति ॥ २४ | मथुरापुरीको देखकर अक्रूरने राम और कृष्णसे कहा—"हे वीरवरो! अब मैं अकेला ही रथसे जाऊँगा, आप दोनों पैदल चले आवें ॥ १०॥ मथुरामें पहुँचकर आप वसुदेवजीके घर न जायँ; क्योंकि आपके कारण ही उन वृद्ध वसुदेवजीका कंस सर्वदा निरादर करता रहता है" ॥ ११॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—ऐसा कह—अक्रूरजी मथुरापुरीमें चले गये। उनके पीछे राम और कृष्ण भी नगरमें प्रवेशकर राजमार्गपर आये ॥ १२ ॥ वहाँके नर-नारियोंसे आनन्दपूर्वक देखे जाते हुए वे दोनों वीर मतवाले तरुण हाथियोंके समान लीलापूर्वक जा रहे थे ॥ १३ ॥<br><br>मार्गमें उन्होंने एक वस्त्र रँगनेवाले रजकको घूमते देख उससे रंग-बिरंगे सुन्दर वस्त्र माँगे ॥ १४ ॥ वह रजक कंसका था और राजाके मुँहलगा होनेसे बड़ा घमण्डी हो गया था, अतः राम और कृष्णके वस्त्र माँगनेपर उसने विस्मित होकर उनसे बड़े जोरोंके साथ अनेक दुर्वाक्य कहे ॥ १५ ॥ तब श्रीकृष्णचन्द्रने क्रुद्ध होकर अपने करतलके प्रहारसे उस दुष्ट रजकका सिर पृथिवीपर गिरा दिया ॥ १६ ॥ इस प्रकार उसे मारकर राम और कृष्णने उसके वस्त्र छीन लिये तथा क्रमशः नील और पीत वस्त्र धारणकर वे प्रसन्नचित्तसे मालीके घर गये ॥ १७ ॥<br><br>हे मैत्रेय ! उन्हें देखते ही उस मालीके नेत्र आनन्दसे खिल गये और वह आश्चर्यचकित होकर सोचने लगा कि 'ये किसके पुत्र हैं और कहाँसे आये हैं?' ॥ १८ ॥ पीले और नीले वस्त्र धारण किये उन अति मनोहर बालकोंको देखकर उसने समझा मानो दो देवगण ही पृथिवीतलपर पधारे हैं ॥ १९ ॥ जब उन विकसितमुखकमल बालकोंने उससे पुष्प माँगे तो उसने अपने दोनों हाथ पृथिवीपर टेककर सिरसे भूमिको स्पर्श किया ॥ २० ॥ फिर उस मालीने कहा—"हे नाथ! आपलोग बड़े ही कृपालु हैं जो मेरे घर पधारे। मैं धन्य हूँ, क्योंकि आज मैं आपका पूजन कर सकूँगा" ॥ २१ ॥ तदनन्तर उसने 'देखिये, ये बहुत सुन्दर हैं, ये बहुत सुन्दर हैं'—इस प्रकार प्रसन्नमुखसे लुभा-लुभाकर उन्हें इच्छानुसार पुष्प दिये ॥ २२ ॥ उसने उन दोनों पुरुषश्रेष्ठोंको पुनः-पुनः प्रणामकर अति निर्मल और सुगन्धित मनोहर पुष्प दिये ॥ २३ ॥<br><br>तब कृष्णचन्द्रने भी प्रसन्न होकर उस मालीको यह वर दिया कि "हे भद्र ! मेरे आश्रित रहनेवाली लक्ष्मी तुझे |
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