भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 377

३६६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १९


विश्वं भवान्सृजति सूर्यगभस्तिरूपो
विश्वेश ते गुणमयोऽयमतः प्रपञ्चः।
रूपं परं सदिति वाचकमक्षरं य-
ज्ज्ञानात्मने सदसते प्रणतोऽस्मि तस्मै॥ ५७

हे विश्वेश! सूर्यकी किरणरूप होकर आप ही [वृष्टिद्वारा] विश्वकी रचना करते हैं, अतः यह गुणमय प्रपंच आपका ही रूप है। 'सत्' पद ['ॐ तत्, सत्' इस रूपसे] जिसका वाचक है वह 'ॐ' अक्षर आपका परम स्वरूप है, आपके उस ज्ञानात्मा सदसत्स्वरूपको नमस्कार है॥ ५७॥

ॐ नमो वासुदेवाय नमस्संकर्षणाय च।
प्रद्युम्नाय नमस्तुभ्यमनिरुद्धाय ते नमः॥ ५८

हे प्रभो! वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धस्वरूप आपको बारम्बार नमस्कार है॥ ५८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽशेऽष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥


उन्नीसवाँ अध्याय

भगवान्‌का मथुरा-प्रवेश, रजक-वध तथा मालीपर कृपा

श्रीपराशर उवाच
एवमन्तर्जले विष्णुमभिष्टूय स यादवः।
अर्चयामास सर्वेशं धूपपुष्पैर्मनोमयैः॥ १
परित्यक्तान्यविषयो मनस्तत्र निवेश्य सः।
ब्रह्मभूते चिरं स्थित्वा विरराम समाधितः॥ २
कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यमानो महामतिः।
आजगाम रथं भूयो निर्गम्य यमुनाम्भसः॥ ३
ददर्श रामकृष्णौ च यथापूर्वमवस्थितौ।
विस्मिताक्षस्तदाक्रूरस्तं च कृष्णोऽभ्यभाषत॥ ४

श्रीपराशरजी बोले— यदुकुलोत्पन्न अक्रूरजीने श्रीविष्णुभगवान्‌का जलके भीतर इस प्रकार स्तवनकर उन सर्वेश्वरका मनःकल्पित धूप, दीप और पुष्पादिसे पूजन किया॥ १॥ उन्होंने अपने मनको अन्य विषयोंसे हटाकर उन्हींमें लगा दिया और चिरकालतक उन ब्रह्मभूतमें ही समाहितभावसे स्थित रहकर फिर समाधिसे विरत हो गये॥ २॥ तदनन्तर महामति अक्रूरजी अपनेको कृतकृत्य-सा मानते हुए यमुनाजलसे निकलकर फिर रथके पास चले आये॥ ३॥ वहाँ आकर उन्होंने आश्चर्ययुक्त नेत्रोंसे राम और कृष्णको पूर्ववत् रथमें बैठे देखा। उस समय श्रीकृष्णचन्द्रने अक्रूरजीसे कहा॥ ४॥

श्रीकृष्ण उवाच
नूनं ते दृष्टमाश्चर्यमक्रूर यमुनाजले।
विस्मयोत्फुल्लनयनो भवान्संलक्ष्यते यतः॥ ५

श्रीकृष्णजी बोले— अक्रूरजी! आपने अवश्य ही यमुना-जलमें कोई आश्चर्यजनक बात देखी है, क्योंकि आपके नेत्र आश्चर्यचकित दीख पड़ते हैं॥ ५॥

अक्रूर उवाच
अन्तर्जले यदाश्चर्यं दृष्टं तत्र मयाच्युत।
तदत्रापि हि पश्यामि मूर्तिमत्पुरतः स्थितम्॥ ६
जगदेतन्महाश्चर्यरूपं यस्य महात्मनः।
तेनाश्चर्यपरेणाहं भवता कृष्ण सङ्गतः॥ ७
तत्किमेतेन मधुरां यास्यामो मधुसूदन।
बिभेमि कंसादद्विग्जन्म परपिण्डोपजीविनाम्॥ ८

अक्रूरजी बोले— हे अच्युत! मैंने यमुनाजलमें जो आश्चर्य देखा है उसे मैं इस समय भी अपने सामने मूर्तिमान् देख रहा हूँ॥ ६॥ हे कृष्ण! यह महान् आश्चर्यमय जगत् जिस महात्माका स्वरूप है उन्हीं परम आश्चर्यस्वरूप आपके साथ मेरा समागम हुआ है॥ ७॥ हे मधुसूदन! अब उस आश्चर्यके विषयमें और अधिक कहनेसे लाभ ही क्या है? चलो, हमें शीघ्र ही मथुरा पहुँचना है; मुझे कंससे बहुत भय लगता है। दूसरेके दिये हुए अन्नसे जीनेवाले पुरुषोंके जीवनको धिक्कार है!॥ ८॥

इत्युक्त्वा चोदयामास स हयान् वातरंहसः।
सम्प्राप्तश्चापि सायाह्ने सोऽक्रूरो मथुरां पुरीम्॥ ९

ऐसा कहकर अक्रूरजीने वायुके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँका और सायंकालके समय मथुरापुरीमें पहुँच गये॥ ९॥