भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 376

अ० १८ ] * पञ्चम अंश * ३६५


बलकृष्णौ तथाक्रूरः प्रत्यभिज्ञाय विस्मितः।
अचिन्तयद्रथाच्छीघ्रं कथमत्रागताविति ॥ ४३
विवक्षोः स्तम्भयामास वाचं तस्य जनार्दनः।
ततो निष्क्रम्य सलिलाद्रथमभ्यागतः पुनः ॥ ४४
ददर्श तत्र चैवोभौ रथस्योपरि निष्ठितौ।
रामकृष्णौ यथापूर्वं मनुष्यवपुषान्वितौ ॥ ४५
निमग्नश्च पुनस्तोये ददर्श च तथैव तौ।
संस्तूयमानौ गन्धर्वैर्मुनिभिस्सिद्धमहोरगैः ॥ ४६
ततो विज्ञातसद्भावस्स तु दानपतिस्तदा।
तुष्टाव सर्वविज्ञानमयमच्युतमीश्वरम् ॥ ४७

अक्रूर उवाच
सन्मात्ररूपिणेऽचिन्त्यमहिम्ने परमात्मने।
व्यापिने नैकस्वरूपैकस्वरूपाय नमो नमः ॥ ४८
सर्वरूपाय तेऽचिन्त्य हविर्भूताय ते नमः।
नमो विज्ञानपाराय पराय प्रकृतेः प्रभो ॥ ४९
भूतात्मा चेन्द्रियात्मा च प्रधानात्मा तथा भवान्।
आत्मा च परमात्मा च त्वमेकः पञ्चधा स्थितः ॥ ५०
प्रसीद सर्व सर्वात्मन् क्षराक्षरमयेश्वर।
ब्रह्मविष्णुशिवाख्याभिः कल्पनाभिरुदीरितः ॥ ५१
अनाख्येयस्वरूपात्मन्ननाख्येयप्रयोजन।
अनाख्येयाभिधानं त्वां नतोऽस्मि परमेश्वर ॥ ५२
न यत्र नाथ विद्यन्ते नामजात्यादिकल्पनाः।
तद्ब्रह्म परमं नित्यमविकारि भवानजः ॥ ५३
न कल्पनामृतेऽर्थस्य सर्वस्याधिगमो यतः।
ततः कृष्णाच्युतानन्तविष्णुसंज्ञाभिरीयते ॥ ५४
सर्वार्थास्त्वमज विकल्पनाभिरेतै-
र्देवाद्यैर्भवति हि यैरनन्त विश्वम्।
विश्वात्मा त्वमिति विकारहीनमेत-
त्सर्वस्मिन् हि भवतोऽस्ति किञ्चिदन्यत् ॥ ५५
त्वं ब्रह्मा पशुपतिरर्यमा विधाता
धाता त्वं त्रिदशपतिस्समीरणोऽग्निः।
तोयेशो धनपतिरन्तकस्त्वमेको
भिन्नार्थैर्जगदभिपासिशक्तिभेदैः ॥ ५६


इस प्रकार वहाँ राम और कृष्णको पहचानकर अक्रूरजी बड़े ही विस्मित हुए और सोचने लगे कि ये यहाँ इतनी शीघ्रतासे रथसे कैसे आ गये ? ॥ ४३ ॥ जब उन्होंने कुछ कहना चाहा तो भगवान्‌ने उनकी वाणी रोक दी। तब वे जलसे निकलकर रथके पास आये और देखा कि वहाँ भी राम और कृष्ण दोनों ही मनुष्य-शरीरसे पूर्ववत् रथपर बैठे हुए हैं ॥ ४४-४५ ॥ तदनन्तर, उन्होंने जलमें घुसकर उन्हें फिर गन्धर्व, सिद्ध, मुनि और नागादिकोंसे स्तुति किये जाते देखा ॥ ४६ ॥ तब तो दानपति अक्रूरजी वास्तविक रहस्य जानकर उन सर्वविज्ञानमय अच्युत भगवान्‌की स्तुति करने लगे ॥ ४७ ॥

अक्रूरजी बोले— जो सन्मात्रस्वरूप, अचिन्त्यमहिम, सर्वव्यापक तथा [कार्यरूपसे] अनेक और [कारणरूपसे] एक रूप हैं उन परमात्माको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४८ ॥ हे अचिन्तनीय प्रभो! आप सर्वरूप एवं हविःस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है। आप बुद्धिसे अतीत और प्रकृतिसे परे हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ ४९ ॥ आप भूतस्वरूप, इन्द्रियस्वरूप और प्रधानस्वरूप हैं तथा आप ही जीवात्मा और परमात्मा हैं। इस प्रकार आप अकेले ही पाँच प्रकारसे स्थित हैं ॥ ५० ॥ हे सर्व! हे सर्वात्मन्! हे क्षराक्षरमय ईश्वर! आप प्रसन्न होइये। एक आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि कल्पनाओंसे वर्णन किये जाते हैं ॥ ५१ ॥ हे परमेश्वर! आपके स्वरूप, प्रयोजन और नाम आदि सभी अनिर्वचनीय हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ५२ ॥

हे नाथ! जहाँ नाम और जाति आदि कल्पनाओंका सर्वथा अभाव है आप वही नित्य अविकारी और अजन्मा परब्रह्म हैं ॥ ५३ ॥ क्योंकि कल्पनाके बिना किसी भी पदार्थका ज्ञान नहीं होता इसीलिये आपका कृष्ण, अच्युत, अनन्त और विष्णु आदि नामोंसे स्तवन किया जाता है [वास्तवमें तो आपका किसी भी नामसे निर्देश नहीं किया जा सकता] ॥ ५४ ॥ हे अज! जिन देवता आदि कल्पनामय पदार्थोंसे अनन्त विश्वकी उत्पत्ति हुई है वे समस्त पदार्थ आप ही हैं तथा आप ही विकारहीन आत्मवस्तु हैं, अतः आप विश्वरूप हैं। हे प्रभो ! इन सम्पूर्ण पदार्थोंमें आपसे भिन्न और कुछ भी नहीं है ॥ ५५ ॥ आप ही ब्रह्मा, महादेव, अर्यमा, विधाता, धाता, इन्द्र, वायु, अग्नि, वरुण, कुबेर और यम हैं। इस प्रकार एक आप ही भिन्न-भिन्न कार्यवाले अपनी शक्तियोंके भेदसे इस सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा कर रहे हैं ॥ ५६ ॥