भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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३६४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १८


अक्रूरः क्रूरहृदयश्शीघ्रं प्रेरयते हयान्।
एवमार्त्तासु योषित्सु कृपा कस्य न जायते ॥ ३०

एष कृष्णरथस्योच्चैश्चक्ररेणुर्निरीक्ष्यताम्।
दूरीभूतो हरियेन सोऽपि रेणुर्न लक्ष्यते ॥ ३१

श्रीपराशर उवाच
इत्येवमतिहार्द्देन गोपीजननिरीक्षितः।
तत्याज व्रजभूभागं सह रामेण केशवः ॥ ३२

गच्छन्तो जवनाश्वेन रथेन यमुनाटटम्।
प्राप्ता मध्याह्नसमये रामाक्रूरजनार्दनाः ॥ ३३

अथाह कृष्णमक्रूरो भवद्भ्यां तावदास्यताम्।
यावत्करोमि कालिन्द्यां आह्निकार्णमम्भसि ॥ ३४

श्रीपराशर उवाच
तथेत्युक्तस्ततस्स्नातस्स्वाचान्तस्स महामतिः।
दध्यौ ब्रह्म परं विप्र प्रविष्टो यमुनाजले ॥ ३५

फणासहस्रमालाढ्यं बलभद्रं ददर्श सः।
कुन्दमालाङ्गमुन्निद्रपद्मपत्रायतेक्षणम् ॥ ३६

वृतं वासुकिरम्भाद्यैर्महद्भिः पवनाशिभिः।
संस्तूयमानमुद्गन्धिवनमालाविभूषितम् ॥ ३७

दधानमसिते वस्त्रे चारुरूपवतंसकम्।
चारुकुण्डलिनं भान्तमन्तर्जंलतले स्थितम् ॥ ३८

तस्योत्संगे घनश्याममाताम्रायतलोचनम्।
चतुर्बाहुमुदाराङ्गं चक्राद्यायुधभूषणम् ॥ ३९

पीते वसानं वसने चित्रमाल्योपशोभितम्।
शक्रचापत्तडिन्मालाविचित्रमिव तोयदम् ॥ ४०

श्रीवत्सवक्षसं चारु स्फुरन्मकरकुण्डलम्।
ददर्श कृष्णमक्लिष्टं पुण्डरीकावतंसकम् ॥ ४१

सनन्दनाद्यैर्मुनिभिस्सिद्धयोगैरकल्मषैः।
सञ्चिन्त्यमानं तत्रस्थैर्नासाग्रन्यस्तलोचनैः ॥ ४२


भला हम-जैसी दुःखिनी अबलाओंपर किसे दया न आवेगी? परन्तु देखो, यह क्रूर-हृदय अक्रूर तो बड़ी शीघ्रतासे घोड़ोंको हाँक रहा है!॥ ३०॥
देखो, यह कृष्णचन्द्रके रथकी धूलि दिखलायी दे रही है; किन्तु हा! अब तो श्रीहरि इतनी दूर चले गये कि वह धूलि भी नहीं दीखती'॥ ३१॥

श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार गोपियोंके अति अनुरागसहित देखते-देखते श्रीकृष्णचन्द्रने बलरामजीके सहित व्रजभूमिको त्याग दिया॥ ३२॥ तब वे राम, कृष्ण और अक्रूर शीघ्रगामी घोड़ोंवाले रथसे चलते-चलते मध्याह्नके समय यमुना तटपर आ गये॥ ३३॥
वहाँ पहुँचनेपर अक्रूरने श्रीकृष्णचन्द्रसे कहा—"जबतक मैं यमुनाजलमें मध्याह्नकालीन उपासनासे निवृत्त होऊँ तबतक आप दोनों यहीं विराजें"॥ ३४॥

श्रीपराशरजी बोले— हे विप्र ! तब भगवान्के 'बहुत अच्छा' कहनेपर महामति अक्रूरजी यमुनाजलमें घुसकर स्नान और आचमन आदिके अनन्तर परब्रह्मका ध्यान करने लगे॥ ३५॥ उस समय उन्होंने देखा कि बलभद्रजी सहस्रफणावलिसे सुशोभित हैं, उनका शरीर कुन्दमालाओंके समान [शुभ्रवर्ण] है तथा नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल हैं॥ ३६॥ वे वासुकि और रम्भ आदि महासर्पोंसे घिरकर उनसे प्रशंसित हो रहे हैं तथा अत्यन्त सुगन्धित वनमालाओंसे विभूषित हैं॥ ३७॥ वे दो श्याम वस्त्र धारण किये, सुन्दर कर्णभूषण पहने तथा मनोहर कुण्डली (गँडुली) मारे जलके भीतर विराजमान हैं॥ ३८॥

उनकी गोदमें उन्होंने आनन्दमय कमलभूषण श्रीकृष्णचन्द्रको देखा, जो मेघके समान श्यामवर्ण, कुछ लाल-लाल विशाल नयनोंवाले, चतुर्भुज, मनोहर अंगोपांगोंवाले तथा शंख-चक्रादि आयुधोंसे सुशोभित हैं; जो पीताम्बर पहने हुए हैं और विचित्र वनमालासे विभूषित हैं, तथा [उनके कारण] इन्द्रधनुष और विद्युन्मालामण्डित सजल मेघके समान जान पड़ते हैं तथा जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न और कानोंमें देदीप्यमान मकराकृत कुण्डल विराजमान हैं॥ ३९-४१॥ [अक्रूरजीने यह भी देखा कि] सनकादि मुनिजन और निष्पाप सिद्ध तथा योगिजन उस जलमें ही स्थित होकर नासिकाग्र दृष्टिसे उन (श्रीकृष्णचन्द्र)-का ही चिन्तन कर रहे हैं॥ ४२॥