विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० १८ ] * पञ्चम अंश * ३६३
| विलासवाक्यपानेषु नागरीणां कृतास्पदम् ।<br>चित्तमस्य कथं भूयो ग्राम्यगोपीषु यास्यति ॥ १५<br>सारं समस्तगोष्ठस्य विधिना हरता हरिम् ।<br>प्रहृतं गोपयोषित्सु निर्घृणेन दुरात्मना ॥ १६<br>भावगर्भस्मितं वाक्यं विलासवलिता गतिः ।<br>नागरीणामतीवैतत्कटाक्षेक्षितमेव च ॥ १७<br>ग्राम्यो हरिरयं तासां विलासनिगडैर्युतः ।<br>भवतीनां पुनः पार्श्वं कया युक्त्या समेष्यति ॥ १८<br>एषैष रथमारुह्य मथुरां याति केशवः ।<br>क्रूरेणाक्रूरकेणात्र निर्घृणेन प्रतारितः ॥ १९<br>किं न वेत्ति नृशंसोऽयमनुरागपरं जनम् ।<br>येनैवमक्ष्णोराह्लादं नयत्यन्यत्र नो हरिम् ॥ २०<br>एष रामेण सहितः प्रयातत्यन्तनिर्घृणः ।<br>रथमारुह्य गोविन्दस्त्वर्यतामस्य वारणे ॥ २१<br>गुरूणामग्रतो वक्तुं किं ब्रवीषि न नः क्षमम् ।<br>गुरवः किं करिष्यन्ति दग्धानां विरहाग्निना ॥ २२<br>नन्दगोपमुखा गोपा गन्तुमेते समुद्यताः ।<br>नोद्यमं कुरुते कश्चिद्गोविन्दविनिवर्तने ॥ २३<br>सुप्रभाताद्य रजनी मथुरावासियोषिताम् ।<br>पास्यन्त्यच्युतवक्त्राब्जं यासां नेत्रालिपङ्क्तयः ॥ २४<br>धन्यास्ते पथि ये कृष्णमितो यान्त्यनिवारिताः ।<br>उद्वहिष्यन्ति पश्यन्तस्स्वदेहं पुलकाञ्चितम् ॥ २५<br>मथुरानगरीपौरनयनानां महोत्सवः ।<br>गोविन्दावयवैर्दृष्टैरतीवाद्य भविष्यति ॥ २६<br>को नु स्वप्नस्सभाग्याभिर्दृष्टस्ताभिरधोक्षजम् ।<br>विस्तारिकान्तिनयना या द्रक्ष्यन्त्यनिवारिताः ॥ २७<br>अहो गोपीजनस्यास्य दर्शयित्वा महानिधिम् ।<br>उत्कृत्तान्यद्य नेत्राणि विधिनाकरुणात्मना ॥ २८<br>अनुरागेण शैथिल्यमस्मासु व्रजिते हरौ ।<br>शैथिल्यमुपयान्त्याशु करेषु वलयान्यपि ॥ २९ | नगरकी [ विदग्ध ] वनिताओंके विलासयुक्त वचनोंके रसपानमें आसक्त होकर फिर इनका चित्त गँवारी गोपियोंकी ओर क्यों जाने लगा ? ॥ १५ ॥ आज निर्दयी दुरात्मा विधाताने समस्त व्रजके सारभूत (सर्वस्वस्वरूप) श्रीहरिको हरकर हम गोपनारियोंपर घोर आघात किया है ॥ १६ ॥ नगरकी नारियोंमें भावपूर्ण मुस्कानमयी बोली, विलासवलित गति और कटाक्षपूर्ण चितवनकी स्वभावसे ही अधिकता होती है। उनके विलास-बन्धनोंसे बँधकर यह ग्राम्य हरि फिर किस युक्तिसे तुम्हारे [हमारे] पास आवेगा ? ॥ १७-१८ ॥ देखो, देखो, क्रूर एवं निर्दयी अक्रूरके बहकावेमें आकर ये कृष्णचन्द्र रथपर चढ़े हुए मथुरा जा रहे हैं ॥ १९ ॥ यह नृशंस अक्रूर क्या अनुरागीजनॉके हृदयका भाव तनिक भी नहीं जानता ? जो यह इस प्रकार हमारे नयनानन्दवर्धन नन्दनन्दनको अन्यत्र लिये जाता है ॥ २० ॥ देखो, यह अत्यन्त निष्ठुर गोविन्द रामके साथ रथपर चढ़कर जा रहे हैं; अरी ! इन्हें रोकनेमें शीघ्रता करो'' ॥ २१ ॥<br>[इसपर गुरुजनोंके सामने ऐसा करनेमें असमर्थता प्रकट करनेवाली किसी गोपीको लक्ष्य करके उसने फिर कहा-] “अरी! तू क्या कह रही है कि अपने गुरुजनोंके सामने हम ऐसा नहीं कर सकतीं ?'' भला अब विरहाग्निसे भस्मीभूत हुई हमलोगोंका गुरुजन क्या करेंगे ? ॥ २२ ॥ देखो, यह नन्दगोप आदि गोपगण भी उन्हींके साथ जानेकी तैयारी कर रहे हैं। इनमेंसे भी कोई गोविन्दको लौटानेका प्रयत्न नहीं करता ॥ २३ ॥ आजकी रात्रि मथुरावासिनी स्त्रियोंके लिये सुन्दर प्रभातवाली हुई है; क्योंकि आज उनके नयन-भृंग श्रीअच्युतके मुखारविन्दका मकरन्द पान करेंगे ॥ २४ ॥ जो लोग इधरसे बिना रोक-टोक श्रीकृष्णचन्द्रका अनुगमन कर रहे हैं वे धन्य हैं; क्योंकि वे उनका दर्शन करते हुए अपने रोमांचयुक्त शरीरका वहन करेंगे ॥ २५ ॥ 'आज श्रीगोविन्दके अंग-प्रत्यंगोंको देखकर मथुरावासियोंके नेत्रोंको अत्यन्त महोत्सव होगा ॥ २६ ॥ आज न जाने उन भाग्यशालिनियोंने ऐसा कौन शुभ स्वप्न देखा है जो वे कान्तिमय विशाल नयनोंवाली (मथुरापुरीकी स्त्रियाँ) स्वच्छन्दतापूर्वक श्रीअधोक्षजको निहारेंगी ? ॥ २७ ॥ अहो ! निष्ठुर विधाताने गोपियोंको महानिधि दिखलाकर आज उनके नेत्र निकाल लिये ॥ २८ ॥ देखो ! हमारे प्रति श्रीहरिके अनुरागमें शिथिलता आ जानेसे हमारे हाथोंके कंकण भी तुरंत ही ढीले पड़ गये हैं ॥ २९ ॥ |