भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

३६२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १८

अठारहवाँ अध्याय भगवान्‌का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! यदुवंशी अक्रूरजीने
चिन्तयन्निति गोविन्दमुपगम्य स यादवः।<br>अक्रूरोऽस्मीति चरणौ ननाम शिरसा हरेः॥ १इस प्रकार चिन्तन करते श्रीगोविन्दके पास पहुँचकर उनके चरणोंमें सिर झुकाते हुए 'मैं अक्रूर हूँ' ऐसा कहकर प्रणाम किया॥ १॥
सोऽप्येनं ध्वजवज्राब्जकृतचिह्नेन पाणिना।<br>संस्पृश्याकृष्य च प्रीत्या सुगाढं परिषस्वजे॥ २भगवान्‌ने भी अपने ध्वजा-वज्र-पद्मांकित करकमलोंसे उन्हें स्पर्शकर और प्रीतिपूर्वक अपनी ओर खींचकर गाढ़ आलिंगन किया॥ २॥
कृतसंवन्दनौ तेन यथावद्दलकेशवौ।<br>ततः प्रविष्टौ संहृष्टौ तमादायात्ममन्दिरम्॥ ३तदनन्तर अक्रूरजीके यथायोग्य प्रणामादि कर चुकनेपर श्रीबलरामजी और कृष्णचन्द्र अति आनन्दित हो उन्हें साथ लेकर अपने घर आये॥ ३॥
सह ताभ्यां तदाक्रूरः कृतसंवन्दनादिकः।<br>भुक्तभोज्यो यथान्यायमाचचक्षे ततस्तयोः॥ ४फिर उनके द्वारा सत्कृत होकर यथायोग्य भोजनादि कर चुकनेपर अक्रूरने उनसे वह सम्पूर्ण वृत्तान्त कहना आरम्भ किया
यथा निर्भर्त्सिस्रस्तेन कंसेनानकदुन्दुभिः।<br>यथा च देवकी देवी दानवेन दुरात्मना॥ ५जैसे कि दुरात्मा दानव कंसने आनकदुन्दुभि वसुदेव और देवी देवकीको डाँटा था तथा जिस प्रकार वह दुरात्मा अपने पिता उग्रसेनसे दुर्व्यवहार कर रहा है और जिसलिये उसने उन्हें (अक्रूरजीको) वृन्दावन भेजा है॥ ४-६॥
उग्रसेने यथा कंसस्स दुरात्मा च वर्तते।<br>यं चैवार्थं समुद्दिश्य कंसेन तु विसर्जितः॥ ६
तत्सर्वं विस्तराच्छ्रुत्वा भगवान्देवकीसुतः।<br>उवाचाखिलमप्येतज्ज्ञातं दानपते मया॥ ७भगवान् देवकीनन्दनने यह सम्पूर्ण वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनकर कहा—'हे दानपते! ये सब बातें मुझे मालूम हो गयीं॥ ७॥
करिष्ये तन्महाभाग यदत्रौपयिकं मतम्।<br>विचिन्त्यं नान्यथैतत्ते विद्धि कंसं हतं मया॥ ८हे महाभाग! इस विषयमें मुझे जो उपयुक्त जान पड़ेगा वही करूँगा। अब तुम कंसको मेरेद्वारा मरा हुआ ही समझो, इसमें किसी और तरहका विचार न करो॥ ८॥
अहंरामश्च मथुरां श्वो यास्यावस्सह त्वया।<br>गोपवृद्धाश्च यास्यन्ति ह्यादायोपायनं बहु॥ ९भैया बलराम और मैं दोनों ही कल तुम्हारे साथ मथुरा चलेंगे, हमारे साथ ही दूसरे बड़े-बूढ़े गोप भी बहुत-सा उपहार लेकर जायँगे॥ ९॥
निशेयं नीयतां वीर न चिन्तां कर्तुमर्हसि।<br>त्रिरात्राभ्यन्तरे कंसं निहनिष्यामि सानुगम्॥ १०हे वीर! आप यह रात्रि सुखपूर्वक बिताइये, किसी प्रकारकी चिन्ता न कीजिये। तीन रात्रिके भीतर मैं कंसको उसके अनुचरोंसहित अवश्य मार डालूँगा'॥ १०॥
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर अक्रूरजी, श्रीकृष्णचन्द्र और बलरामजी सम्पूर्ण गोपोंको कंसकी आज्ञा सुना नन्दगोपके घर सो गये॥ ११॥
समादिश्य ततो गोपानक्रूरोऽपि च केशवः।<br>सुष्वाप बलभद्रश्च नन्दगोपगृहे ततः॥ ११
ततः प्रभाते विमले कृष्णरामौ महाद्युती।<br>अक्रूरेण समं गन्तुमुद्यतौ मथुरां पुरीम्॥ १२दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल होते ही महातेजस्वी राम और कृष्णको अक्रूरके साथ मथुरा चलनेकी तैयारी करते देख जिनकी भुजाओंके कंकण ढीले हो गये हैं वे गोपियाँ नेत्रोंमें आँसू भरकर तथा दुःखार्त्त होकर दीर्घ निश्वास छोड़ती हुई परस्पर कहने लगीं—॥ १२-१३॥
दृष्ट्वा गोपीजनस्सास्त्रः श्लथद्वलयबाहुकः।<br>निःश्ववासातिदुःखार्त्तः प्राह चेदं परस्परम्॥ १३
मथुरां प्राप्य गोविन्दः कथं गोकुलमेष्यति।<br>नगरस्त्रीकलालापमधु श्रोत्रेण पास्यति॥ १४"अब मथुरापुरी जाकर श्रीकृष्णचन्द्र फिर गोकुलमें क्यों आने लगे? क्योंकि वहाँ तो ये अपने कानोंसे नगरनारियोंके मधुर आलापरूप मधुका ही पान करेंगे॥ १४॥