भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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अ० १७ ]* पञ्चम अंश *३६१
अप्यङ्गमेतद्भगवत्प्रसादा-भगवत्कृपासे इनका अंगसंग पाकर मेरा शरीर भी
त्तदङ्गसङ्गे फलवन्मम स्यात्॥ २७कृतकृत्य हो सकेगा?॥ २७॥ जिनकी अंगुलीके
अप्येष पृष्ठे मम हस्तपद्मंस्पर्शमात्रसे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हुए पुरुष
करिष्यति श्रीमदनन्तमूर्तिः।निर्दोषसिद्धि (कैवल्यमोक्ष) प्राप्त कर लेते हैं क्या
यस्याङ्गुलिस्पर्शहताखिलाघै-वे अनन्तमूर्ति श्रीमान् हरि मेरी पीठपर अपना
रवाप्यते सिद्धिरपास्तदोषा॥ २८करकमल रखेंगे?॥ २८॥
येनाग्निविद्युद्रविरश्मिमाला-जिन्होंने अग्नि, विद्युत् और सूर्यकी किरणमालाके
करालमत्युग्रमपेतचक्रम् ।समान अपने उग्र चक्रका प्रहार कर दैत्यपतिकी
चक्रं घ्नता दैत्यपतेर्हतानिसेनाको नष्ट करते हुए असुर-सुन्दरियोंकी आँखोंके
दैत्याङ्गनानां नयनाञ्जनानि॥ २९अंजन धो डाले थे॥ २९॥ जिनको एक जलबिन्दु
यत्राम्बु विन्यस्य बलिर्मनोज्ञा-प्रदान करनेसे राजा बलिने पृथिवीतलमें अति मनोज्ञ
नवाप भोगान्वसुधातळस्थः।भोग और एक मन्वन्तरतक देवत्वलाभपूर्वक शत्रुविहीन
तथामरत्वं त्रिदशाधिपत्वंइन्द्रपद प्राप्त किया था॥ ३०॥
मन्वन्तरं पूर्णमपेतशत्रुम्॥ ३०
अप्येष मां कंसपरिग्रहेणवे ही विष्णुभगवान् मुझ निर्दोषको भी कंसके
दोषास्पदीभूतमदोषदुष्टम् ।संसर्गसे दोषी ठहराकर क्या मेरी अवज्ञा कर
कर्तावमानोपहतं धिगस्तुदेंगे? मेरे ऐसे साधुजनबहिष्कृत पुरुषके जन्मको
तज्जन्म यत्साधुबहिष्कृतस्य॥ ३१धिक्कार है॥ ३१॥ अथवा संसारमें ऐसी कौन वस्तु
ज्ञानात्मकस्यामलसत्त्वराशे-है जो उन ज्ञानस्वरूप, शुद्धसत्त्वराशि, दोषहीन,
रपेतदोषस्य सदा स्फुटस्य।नित्य-प्रकाश और समस्त भूतोंके हृदयस्थित प्रभुको
किं वा जगत्यत्र समस्तपुंसा-विदित न हो?॥ ३२॥
मज्ञातमस्यास्ति हृदि स्थितस्य॥ ३२
तस्मादहं भक्तिविनम्रचेताअतः मैं उन ईश्वरोंके ईश्वर, आदि,
व्रजामि सर्वेश्वरमीश्वराणाम्।मध्य और अन्तरहित पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुके
अंशावतारं पुरुषोत्तमस्यअंशावतार श्रीकृष्णचन्द्रके पास भक्ति-विनम्रचित्तसे
ह्यनादिमध्यान्तमजस्य विष्णोः॥ ३३जाता हूँ। [मुझे पूर्ण आशा है, वे मेरी कभी अवज्ञा न करेंगे]॥ ३३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥